श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
[क्रीडाखण्ड अ० ४५]
३७६ * श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-चार * [ श्रीगणेशपुराण-
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भगवान् शिवद्वारा सूर्यदेवको काशीपुरी भेजना
[क्रीडाखण्ड अ० ४५]
भगवान् वामनको राजा बलिद्वारा भूदान
[क्रीडाखण्ड अ० ३१]
क्री०ख०-अ०४५ ] * शंकरजीका सभी देवताओंको लेकर मन्दरगिरिपर जाना * ३७७
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[बायाँ स्तम्भ]
होना बन्द हो गया। तब उस समय ब्रह्माजीके वचनोंसे प्रेरित
होकर देवताओंने भगवान् शंकरकी प्रार्थना की ॥ २-३ ॥
देवता बोले—हे महादेव ! हे जगन्नाथ ! हे
करुणानिधान ! हे शंकर ! महर्षि मरीचि मन्दराचलपर
स्थित होकर दस वर्षोंसे तपस्या कर रहे हैं। हे देव !
आप उन्हें वर प्रदान करनेके लिये वहाँ जायें ॥ ४१/२ ॥
मुनि गृत्समद बोले— [हे कीर्ते !] इस प्रकारसे
देवताओंद्वारा प्रार्थना किये गये करुणासागर भगवान्
महेश्वर अग्नि, चन्द्रमा, अर्यमा (सूर्य), आदि सभी
देवताओंके साथ उन महामुनि मरीचीजीको वर प्रदान
करनेके लिये मन्दरगिरिपर गये ॥ ५-६ ॥
भगवान् शिवने देखा कि वे अस्थिमात्र शेष रह
गये हैं, कदाचित् वे उस समय वहाँ न पहुँचते तो महर्षि
मरीचि अपने प्राणोंका परित्याग कर देते ॥ ७ ॥
उनके उत्कट तपसे पार्वतीपति भगवान् शंकर
अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपना पद प्रदान किया
तथा विमानमें बैठकर वाद्योंकी ध्वनि करते हुए अपने
गणोंके साथ शीघ्र ही अपने लोकमें पहुँचाया। तभीसे
सभी देवगणोंके साथ भगवान् शम्भु अत्यन्त कल्याणकारी
पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलमें रहने लगे ॥ ८-९ ॥
जब भगवान् सदाशिवने राजा दिवोदासमें कोई
भी दोष नहीं देखा तो उन्होंने बड़ी ही उत्सुकतापूर्वक
उनके दोषोंको देखनेके लिये देवताओंको वाराणसी
पुरीमें भेजा। जो-जो देवता काशी जाते और राजा
दिवोदासमें कोई भी दोष नहीं देख पाते, तो वे अपने
नामसे वहाँ काशीमें शिवलिंग स्थापित करके वहीं
स्थित हो जाते ॥ १०-११ ॥
राजा दिवोदासके राज्यमें ब्राह्मण आदि सभी चारों
वर्णोंके लोग अपने-अपने वर्ण एवं आश्रम-धर्मोंका
परिपालन करते थे। सभी द्विजाति अपने आश्रममें स्थित
होकर शास्त्रोंमें बताये गये आचारका पालन करते थे।
शिष्य गुरुजनोंकी सेवा करते थे, स्त्रियाँ पतिव्रताएँ थीं
और [सम्पूर्ण प्रजा] धर्माचरण करनेवाली, दानपरायण
और व्रत-उपवास आदिके नियमोंका पालन करनेमें तत्पर
[दायाँ स्तम्भ]
रहती थी ॥ १२-१३ ॥
संन्यासी तीनों समय (प्रातः, मध्याह्न तथा सायं)
स्नानादि [संन्यासोचित] आचारोंका पालन करते थे,
वानप्रस्थाश्रमी होम, मौनादिका आचरण करनेवाले थे।
सभी गृहस्थाश्रम-धर्मका पालन करनेवाले, स्नान, सन्ध्या,
जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजन, अतिथिसत्कार,
बलिवैश्वदेव—इन आठ कर्मोंको निष्पाप रहकर बड़े ही
श्रद्धा-भक्तिपूर्वक स्वयं ही करते थे ॥ १४-१५ ॥
इसी कारण वहाँ धर्मकी बड़ी वृद्धि हुई और उत्तम
वृष्टि हुई। उस समय स्वर्गस्थित देवता अत्यन्त आनन्दित
रहते थे और पितरोंको स्वधाकार (श्राद्ध-तर्पण आदि)
प्राप्त होता था ॥ १६ ॥
उस समय काशीमें न तो कोई स्त्री वन्ध्या थी, न
कोई मासिकधर्मसे विहीन, न कोई स्त्री विधवा थी और
न कोई स्त्री ऐसी थी, जिसके बच्चे पैदा होते ही मर
जाते हों। न तो अवर्षण होता था, न अतिवृष्टि होती
थी, न तो कोई राजद्रोह था और न किसी शत्रुका भय
था। तोतों, टिड्डियों तथा चूहोंसे खेतीको कहीं कोई भय
नहीं था और भलीभाँति कृषिकी उपज निर्विघ्न सम्पन्न
होती थी ॥ १७-१८ ॥
नृपश्रेष्ठ दिवोदास यह डिण्डिम घोष नित्य ही
करवाते थे कि जो कोई भी व्यक्ति विश्वेश्वर, विन्दुमाधव,
ढुंढिराज गणेश, भैरव, दण्डपाणि, कार्तिकेय, मणिकर्णिका
एवं भवानी (अन्नपूर्णा)-का दर्शन किये बिना तथा
मणिकर्णिका एवं गंगामें बिना स्नान किये भोजन करेगा,
वह निश्चित ही दण्डनीय होगा ॥ १९-२० ॥
ऐसे राजश्रेष्ठ दिवोदासके राज्य करते समय वहाँ
लेशमात्र भी पाप नहीं था। बिना किसी दोषके रहते
भगवान् सदाशिव उस काशीके राज्यको लेना नहीं चाहते
थे। उस समय वाराणसीसे दूर मन्दरगिरिमें रहनेके कारण
वहाँ (काशी)-के वियोगसे भगवान् शिव अत्यन्त दुखी
हो गये थे। तब उन्होंने विघ्न उपस्थित करनेके लिये आठ
भैरवों (असितांग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण
और संहारभैरव)-को काशीमें भेजा ॥ २१-२२ ॥
३७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ]
भगवान् शिवने उनसे कहा—आपलोग राजा
दिवोदासके राज्य काशीमें अणुमात्र (यत्किंचित्) पाप
करायें। ऐसा होनेपर मैं दिवोदाससे काशीका राज्य ले
लूँगा। इसमें कोई संशय नहीं है। हे भद्रे! भगवान्
सदाशिवसे आज्ञा प्राप्तकर उन सभी भैरवोंने शीघ्र ही
काशीके लिये प्रस्थान किया। वाराणसीका दर्शनकर,
स्नान करनेके अनन्तर वे विश्राम करने लगे ॥ २३-२४ ॥
उन काशीराज दिवोदासका कोई भी पापकर्म न
देखकर वे अष्ट भैरव वहीं काशीमें निवास करने लगे।
उन भैरवोंके वहाँसे वापस न आनेपर शिवजी अत्यन्त
चिन्तित हो उठे ॥ २५ ॥
तदनन्तर भगवान् शिवने उन राजा दिवोदासके
छिद्रोंको देखनेके लिये द्वादश आदित्योंको काशीमें भेजा,
किंतु वे भी राजा दिवोदासके पुण्यकर्मोंको देखकर
अत्यन्त आनन्दित हो काशीमें ही स्थित हो गये। वे द्वादश
आदित्य कहने लगे—'हमने भगवान् शिवका कार्य तो
किया नहीं और यह पुरी भी त्याज्य नहीं है।' तदनन्तर
भगवान् शिवने चौंसठ योगिनियोंको राजाका छिद्र ज्ञात
करनेके लिये काशीपुरीमें प्रेषित किया ॥ २६-२७ ॥
उन योगिनियोंने [जब] दिवोदासका अणुमात्र भी
दोष नहीं देखा तो वे भी उन अविनाशी महेश्वरका
यजन-पूजन करते हुए वहीं वाराणसीपुरीमें निवास करने
लगीं। तदनन्तर महेश्वरने दुःखका विनाश करनेवाली
भगवती दुर्गाको काशी भेजा, किंतु राजाका कोई भी पाप
न देखकर वे दुर्गाजी भी काशी ग्राम (पुरी)-से बाहर
स्थित हो गयीं। उन्होंने ध्यानयोगके द्वारा भगवान्
शिवको प्रसन्न किया और सम्पूर्ण अभिलाषाओंको
पूर्णकर मानवोंको सन्तुष्ट किया ॥ २८-२९१/२ ॥
इसके पश्चात् भगवान् शम्भुने शीघ्र ही आठों
दिक्पालोंको काशी भेजा, वाराणसीमें गये हुए उन
दिक्पालोंने भी राजा दिवोदासके रंचमात्र भी पापकर्मको
[दायाँ स्तम्भ]
नहीं देखा। तब वे आठों दिक्पाल अपने-अपने नामसे
वहाँ लिंग स्थापितकर प्रसन्नतापूर्वक वहीं काशीमें
निवास करने लगे ॥ ३०-३११/२ ॥
तदनन्तर शंकरजीने अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक ऋषियोंको
वहाँ भेजा। भगवान् शिवके द्वारा विशेष रूपसे प्रेरित
किये जानेपर वे प्रसन्न मनसे त्वरापूर्वक वहाँ गये ॥ ३२ ॥
वाराणसीमें जाकर वे तीर्थस्नान आदिकी विधि
सम्पन्न करके राजा दिवोदासको आशीर्वाद देनेके लिये
उनके पास जा-जाकर उनकी चेष्टाओंको ध्यानसे
देखने लगे। राजा दिवोदासने भक्तिपूर्वक उन सभीको
धन तथा वस्त्र आदि प्रदानकर पूजा की, किंतु उन्होंने
उस धनको राजप्रतिग्रह समझकर ग्रहण नहीं किया।
परंतु ऋषियोंको भी राजा दिवोदासमें स्वल्प भी दोष
दिखायी नहीं दिया ॥ ३३-३४ ॥
वे ऋषिगण भी वहाँ काशीमें अपने-अपने नामसे
शिवलिंग स्थापित करके परम तप करने लगे। तदनन्तर
शिवजीने अपने कार्यको सिद्ध करनेके लिये सभी
देवताओंको काशी भेजा ॥ ३५ ॥
उन्होंने भी धर्माचरण करनेवाले उन दिवोदासका
कोई भी दुष्कर्म नहीं देखा। जब वे देवता भी नहीं लौटे
तो भगवान् शिव सोचने लगे कि जिस-जिसको भी मैंने
काशी भेजा, वहाँसे कोई भी लौटकर नहीं आया ॥ ३६ ॥
तब चिन्तापरायण भगवान् रुद्र कुछ भी निश्चय
नहीं कर सके। वे मन-ही-मन सोचने लगे कि कब मैं
उस काशीपुरीको देखूँगा ॥ ३७ ॥
राजा दिवोदासके राज्यमें जब कोई पापकर्म होगा,
तभी मेरे द्वारा काशीमें जाना होगा, ऐसा न होनेपर मुझे
काशी कभी प्राप्त नहीं हो सकेगी ॥ ३८ ॥
ढुण्डिराज तथा माधवको छोड़कर सभी देवता
विफल हो गये हैं। वे देवता वापस नहीं लौट रहे हैं और
ध्यानपरायण होकर वहीं स्थित हो गये हैं ॥ ३९ ॥
[अन्तिम पंक्ति]
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें दिवोदासके उपाख्यानमें पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥