श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उ०ख०-अ०३६ ] गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा १११
उ०ख०-अ०३६ ] * गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा * १११
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कर दिया ॥ ४२ ॥
कुशनिर्मित प्रतिकृतिके स्नानजन्य पुण्यफलको [अन्य
लोगोंके निमित्त] देनेमात्रसे विनायक (गणेशजी)-की
आज्ञासे वहाँ अन्य बहुत-से विमान आ गये ॥ ४३ ॥
उनमें-से प्रत्येक आकाशगामी विमानमें वे एक-
एक करके बैठ गये। इस प्रकार [राजा] रुक्मांगद,
[उनके पिता] भीम और उनकी माता चारुहासिनी
तथा अन्य सभी लोग वहाँ पहुँच गये, जहाँ भगवान्
विनायक थे। इस प्रकार उस नगरके बालकसे लेकर
वृद्धतक तथा ब्राह्मणसे चाण्डालतक— सभी गणेशतीर्थके
स्नानजनित पुण्यफलके प्रभावसे सद्गतिको प्राप्त हो
गये ॥ ४४-४५ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार मैंने वह सब
कुछ कह दिया, जो कुछ तुम्हारे द्वारा पूछा गया था।
चिन्तामणिक्षेत्र* के अन्तर्गत स्थित गणेशतीर्थसे सम्बन्धित
इस माहात्म्यको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्रवण करता है,
वह भी उस गतिको प्राप्त कर लेता है, जो उस तीर्थमें
स्नानसे प्राप्त होती है ॥ ४६-४७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कादम्बपुरवर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥
छत्तीसवाँ अध्याय
गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा
व्यासजी बोले- हे कमलासन ब्रह्माजी! मैंने
गणेशतीर्थके माहात्म्य, रुक्मांगद और कौण्डिन्यपुरवासियोंके
चरितके विषयमें श्रवण किया, तथापि हे ब्रह्मन् ! आप
मुकुन्दाके मनोहर चरितको मुझसे कहिये ॥ १ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे पुत्र ! राजा रुक्मांगदके चले
जानेपर वह मुकुन्दा कामनारूपी अग्निमें उसी प्रकार जल
उठी, जैसे ग्रीष्मकालमें दावाग्निसे महान् वनस्थली जल
उठती है। मुकुन्दाको न शीतल वायुवाले वनमें, न लता-
पुष्पमय कुंजमें, न चन्द्रमाकी चाँदनीमें और न चन्दनके
आलेपनमें—कहीं शान्ति नहीं मिल रही थी। उसे हास्य,
गीत, नृत्य और वस्त्राभूषणादि भी रुचिकर नहीं लग रहे
थे ॥ २-४ ॥
हे मुनीश्वर ! उस कामविह्वला मुकुन्दाको अन्न
और जल भी रुचिकर नहीं लगता था। भूख-प्यास और
श्रमजनित थकानसे उसे क्षणभरमें नींद आ गयी ॥ ५ ॥
हे सुत ! उस एकान्त वनमें सोयी हुई मुकुन्दाको
रुक्मांगदके विरहमें विह्वल जानकर देवराज इन्द्र रुक्मांगदका
रूप धारणकर वहाँ आये। उन्हें देखकर मुकुन्दाको
अत्यन्त हर्ष हुआ। इन्द्रने उस पुत्रार्थिनी नारीको अपने
हृदयसे लगा लिया और अपने अनुग्रहसे मानो कृतकृत्य-
सा करते हुए उसके साथ नानाविध शृंगारचेष्टाएँ कीं।
उस पारस्परिक संयोगके फलस्वरूप मुकुन्दाने गर्भ
धारण किया। तदुपरान्त मुकुन्दाको आश्वस्तकर इन्द्र
अन्तर्धान हो गये और मुकुन्दा भी सलज्ज भावसे अपने
आश्रमको चली आयी ॥ ६-१० ॥
मुकुन्दाने नवम मासमें, शुभ वेलामें शुभ लक्षणोंसे
सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया, जो मनोहर, सर्वांगसुन्दर और
रूपमें कामदेवसे भी बढ़कर था। उसके धरणीपर गिरते
ही महान् शब्द हुआ, जिससे दसों दिशाएँ, आकाश,
पृथ्वी और रसातल भी अनुनादित हो गये ॥ ११-१२ ॥
पक्षिगण उड़-उड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण
करने लगे। वाचक्नवि भी अपना नित्यकर्म छोड़कर वहाँ
चले आये। मुकुन्दाके चरितका ज्ञान उन्हें कभी नहीं हो
पाया। उन्होंने अत्यन्त हर्षपूर्वक [शिशुके] जातकर्मादि
संस्कार किये ॥ १३-१४ ॥
उन्होंने [इस अवसरपर] ब्राह्मणोंको यथाशक्ति
और यथायोग्य दान दिया। दस दिन बीत जानेपर उन
मुनिने [शिशुका] नामकरण-संस्कार किया ॥ १५ ॥
- चिन्तामणिक्षेत्र महाराष्ट्र प्रान्तके कदम्बपुर, जिला- यवतमालमें स्थित है। मन्दिरके सामने ही 'चौमुखी गजानन' की मूर्ति है। इसकी
विशेषता यह है कि एक ही पत्थरमें चारों ओर चार गणेश मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। सामनेके गर्भगृहमें मुख्य चिन्तामणि-गणेशकी मूर्ति है।
'कलम्ब' नामसे इक्कीस गणपतिक्षेत्रमें इसकी गणना है।
११२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
ज्योतिषशास्त्रमें पारंगत द्विजोंसे अनुज्ञा लेकर उन्होंने
[उस शिशुका] गृत्समद - यह नाम रखा। तदनन्तर
पाँचवें वर्षमें उसका व्रतबन्ध-संस्कार किया ॥ १६ ॥
उन्होंने उस बटुकके चार वेदव्रत संस्कार सम्पन्न
किये। तेजसे सम्पन्न होनेके कारण वह एक बार
बोलनेपर ही वेदमन्त्रोंको ग्रहण कर लेता था ॥ १७ ॥
इस प्रकार वह वेदशास्त्रका निधान और अपने
कर्ममें भी कुशल हो गया। किसी समय शुभ मुहूर्तमें उसके
पिता वाचक्नवीने उसे ऋग्वेदके महान् मन्त्र 'गणानां
त्वा० २' का उपदेश दिया और कहा कि यह वैदिक
महामन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है ॥ १८-१९ ॥
यह आगमोंमें कहे गये सम्पूर्ण मन्त्रोंमें श्रेष्ठ है।
भगवान् गजानन गणेशजीका ध्यान करके तुम स्थिर
चित्तसे इस मन्त्रका जप करो ॥ २० ॥
इससे तुम परम सिद्धिको प्राप्त कर लोगे और
तुम्हारा यश संसारमें फैल जायगा। तब विप्र गृत्समद
पिताके मुखसे मन्त्र प्राप्तकर अनुष्ठानपरायण होकर जप
और ध्यानमें लग गये। इस प्रकार उन मुनिश्रेष्ठका बहुत
समय व्यतीत हो गया ॥ २१-२२ ॥
उस समय मगध देशमें जो राजा थे, उनका भी नाम
मगध ही था। वे सुन्दर रूपवाले, महान् स्वाभिमानी,
दानवीर, शत्रुनाशक, अनेक प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित,
महामूल्यवान् आसनपर स्थित, न्यायी, धैर्यवान्, दूसरे इन्द्रके
समान, चतुरंगिणी सेनासे समन्वित, ज्ञानी और विद्वानोंका
सम्मान करनेवाले थे। उनके दो मन्त्री थे, जो ज्ञाननिधान
और गुणोंमें बृहस्पतिसे भी बढ़कर थे ॥ २३-२५ ॥
उन (राजा मगध)- की पत्नीका नाम अम्बिका
था, जो मनोहर रूपवाली अत्यन्त गुणवती, पतिव्रता,
महान् सौभाग्यशालिनी और शाप देने तथा अनुग्रह
करनेमें सक्षम थी ॥ २६ ॥
[एक बार] उन राजाके यहाँ पितृश्राद्धमें राजाद्वारा
आमन्त्रित वेदोंमें पारंगत वसिष्ठ, अत्रि आदि बहुत-से
महर्षि आये थे ॥ २७ ॥
तपस्वी और पवित्र अन्तःकरणवाले गृत्समदको भी
वहाँ बुलाया गया था। वहाँ किसी शास्त्रसम्बन्धी प्रसंगमें
गृत्समदने गर्वपूर्ण बात कही ॥ २८ ॥
तब उन मुनियोंके बीचमें ही अत्रिजी इस प्रकार
कहने लगे कि 'तुम्हें धिक्कार है ! धिक्कार है ! तुम इस
बातपर विचार करो, चूँकि तुम तपस्वी हो, इसीलिये
मान्य हो। तुम मुनि नहीं हो; क्योंकि तुम्हारा जन्म
राजकुमार रुक्मांगदसे हुआ है। तुम हम सबके समक्ष
पूजा पानेके योग्य नहीं हो, अतः अपने आश्रमको चले
जाओ' ॥ २९-३० ॥
अत्रिके इस प्रकारके वचन सुनकर वे गृत्समद
क्रोधसे अग्निके समान प्रदीप्त हो उठे। [उस समय]
ऐसा लगता था, मानो वे त्रिलोकीको भस्म कर डालेंगे
और उन मुनियोंको खा जायँगे ॥ ३१ ॥
उनको देखकर अन्य बहुत-से मुनि तो इस प्रकार
पलायन कर गये, जैसे सिंहको देखकर हरिण भाग जाते
हैं। उन्होंने वहाँ सभामें बैठे हुए वसिष्ठ आदि मुनियोंसे
कहा- ॥ ३२ ॥
गृत्समद बोले- हे मुनीश्वरो ! यदि मैं रुक्मांगदका
पुत्र न सिद्ध हुआ तो मैं अपनी शापाग्निसे तुम सबको
भस्मावशेष कर दूँगा ॥ ३३ ॥
ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यास !] उन सभी मुनियोंसे
इस प्रकार कहकर वे अपनी माँके पास पहुँचे। गृत्समदने
उससे पूछा- अरी दुष्टे! अत्यन्त कामाचारिणी मुकुन्दा!
बता, मेरा पिता कौन है? अन्यथा तू भस्म हो जायगी।
तब उनके इस प्रकारके वचन सुनकर मुकुन्दा अत्यन्त
व्याकुल होकर उसी प्रकार काँपने लगी, जैसे आँधीके
वेगसे पुष्पयुक्त कदलीवृक्ष ! वह असती हाथ जोड़कर
अत्यन्त दीन वाणीमें बोली- ॥ ३४-३६ ॥
मुकुन्दा बोली- आखेटमें आसक्त चित्तवाले नृपश्रेष्ठ
रुक्मांगद अपने साथवालोंसे बिछुड़कर यहाँ आ गये थे।
१-चार वेदव्रत हैं- १. महानाम्नी व्रत, २. महाव्रत, ३. उपनिषद् व्रत तथा ४. गोदान।
प्रथमं स्यान्महानाम्नी द्वितीयं स्यान्महाव्रतम् । तृतीयं स्यादुपनिषद् गोदानाख्यं ततः परम् ॥ (संस्कारमयूखमें आश्वलायनका वचन)
२- गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥
(ऋक्० २।२३।१)
उ०ख०-अ०३७ ] * गृत्समदमुनिकी गणेशाराधना और वरप्राप्ति * ११३
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१९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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उनकी मुखमुद्रा प्रसन्न और क्रीडामयी थी, उनके
मस्तकपर चन्द्रमा शोभा दे रहा था, उन्होंने कमल-
पुष्पोंकी विशाल माला धारण कर रखी थी, कमल-
नालसे समन्वित उनकी सूँड़ थी और उन जगत्के
कारणरूप [भगवान् गणेश]-को उनके प्रेमी भक्तजन
नमस्कार कर रहे थे ॥ ११ ॥
वे सिंहपर सवार थे, उनके दस भुजाएँ थीं तथा
उन्होंने सर्पका यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उनका
श्रीविग्रह कुंकुम, अगुरु, कस्तूरी और सुन्दर [सुगन्धित]
चन्दनसे आलेपित था ॥ १२ ॥
हे मुने! करोड़ों सूर्योंसे अधिक प्रकाशमान वे
श्रीमान् सिद्धि और बुद्धिके साथ थे। यद्यपि उनका
स्वरूप वाणीसे परे है, तथापि वे लीला करनेके लिये
[उन गृत्समदमुनिके समक्ष] साकार रूपमें प्रकट हुए ॥ १३ ॥
उनके तेजसे उन महात्मा मुनिका तेज वैसे ही मन्द
हो गया, जैसे सूर्यके तेजसे नक्षत्रों और चन्द्रमाका तेज
मन्द पड़ जाता है ॥ १४ ॥
[उन्हें देखकर] गृत्समदने अपनी आँखें मूँद लीं
और वे अत्यन्त भयाकुल होकर काँपने लगे। वे मूर्च्छित
होकर धरतीपर गिर पड़े और उन्हें ध्यानादि मांगलिक
कार्योंका विस्मरण हो गया ॥ १५ ॥
पुनः चेतन होनेपर वे मुनि अनामय गजानन
गणेशजीका ध्यान करके मन-ही-मन यह सोचकर
व्याकुल हो गये कि इस विघ्नका कारण क्या है? मेरे
समक्ष क्षोभ उत्पन्न करनेवाला सहसा यह क्या उपस्थित
हो गया है ? आजतक मैंने जो तप किया था, वह कैसे
व्यर्थ चला गया ? ॥ १६-१७ ॥
[तदनन्तर वे मन-ही-मन गणेशजीका ध्यानकर
कहने लगे—] हे देवेश! हे सर्वात्मन्! इस भयानक
विघ्नसे मेरी रक्षा करो। आप जगदीश्वरको छोड़कर मैं
अन्य किसकी शरणमें जाऊँ ? ॥ १८ ॥
हे देव! मुझे सदैव महान् दुःख प्राप्त होता रहा है।
'तुम हमारी पंक्तिमें बैठकर पूजा पानेयोग्य नहीं हो'—
अत्रिकी यह बात मेरे मनको सदैव जलाया करती है ॥ १९ ॥
ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] गृत्समदके
इस प्रकारके वचन सुनकर उन विघ्नविनायक गणेशजीने
कहा— ॥ १९१/२ ॥
गणेशजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! तुमपर अनुग्रह
करनेके लिये उपस्थित हुए मुझे गणोंका स्वामी गणेश
जानो। चिरकालतक नियममें स्थित रहनेवाले सनकादि
[मुनियों]-के लिये भी मैं अप्राप्य हूँ। भयका त्याग
करके तुम्हारी जो मनोकामना हो, वह मुझसे कहो। एक
अँगुठेपर खड़े रहकर तुम्हारे द्वारा की गयी निरन्तर
तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ ॥ २०–२११/२॥
ब्रह्माजी कहते हैं—देवाधिदेव गणेशजीके ऐसे
सुन्दर वचन सुनकर मुनि गृत्समदने उन्हें दण्डवत् प्रणाम
किया। उनका हृदय आनन्दसे भर गया, आँखोंसे आँसू
बहाते हुए वे हर्षपूर्वक नृत्य करने लगे और उन वरदाता
विनायकसे परम प्रेमपूर्वक बोले— ॥ २२–२३१/२ ॥
गृत्समद बोले—आज मेरा जन्म, तप और नियम
सब सफल हो गये, जो मुझे चिदानन्दघन, अखण्ड
आनन्दरूप, वेद-शास्त्रोंसे भी अगोचर, निराकार ब्रह्मका
साक्षात् दर्शन हो गया। हे विभो ! अब मैं किस वस्तुके
लिये प्रार्थना करूँ ? फिर भी आपने आज्ञा दी है तो हे
गजानन ! मैं आपसे एक प्रार्थना करता हूँ—हे महाभाग !
चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्ययोनि श्रेष्ठ कही गयी है।
मनुष्योंमें वर्ण-धर्मका पालन करनेवाले श्रेष्ठतर कहे गये
हैं। उनमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। उन ब्राह्मणोंमें भी ज्ञानी
श्रेष्ठ हैं। उन ज्ञानियोंमें भी अनुष्ठानपरायण और उनमें
भी ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ हैं। इसलिये हे जगदीश्वर ! आप मुझे
ब्रह्मज्ञान (वेदज्ञान) और अनुष्ठानसम्बन्धी ज्ञान प्रदान
करें। साथ ही अपनी सतत स्मृति और अपनी सुदृढ़ भक्ति
प्रदान करें ॥ २४–२९ ॥
हे गजानन ! आपके सभी भक्तोंमें मुझे श्रेष्ठता प्राप्त
हो। हे कल्याणकर ! मैं एक अन्य वरकी भी याचना
करता हूँ, उसे मुझे प्रदान करें ॥ ३० ॥
मैं आपकी भक्तिका एकमात्र निवास बन जाऊँ,
मुझमें त्रैलोक्यको आकर्षित करनेकी क्षमता हो, मैं तीनों
लोकोंमें विख्यात और देवताओं एवं मनुष्योंसे नमस्कृत
हो जाऊँ। हे विघ्नराज ! हे अखिलार्थकृत् ! हे सुरेश्वर !
यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यह पुष्पक वन [आपके]
नामसे प्रख्यात हो जाय ॥ ३१-३२ ॥
उ०ख०-अ०३८ ] * गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म * १९५
आप यहाँ स्थित होकर भक्तोंकी कामनाओंको | अजेय होगा ॥ ४०-४१॥
नित्य पूरा करें। हे गजानन! यह पुष्पकपुर सभी | वह मेरा भक्त होगा, उसके प्राण मुझमें स्थित होंगे,
दिशाओंमें विशेष रूपसे 'गणेशपुर'—इस नामसे प्रसिद्ध | उसकी मुझमें निष्ठा होगी और वह मेरे ही परायण
हो जाय ॥ ३३१/२ ॥ | होगा। हे विप्र ! यह नगर सत्ययुगमें 'पुष्पकपुर' नामसे,
ब्रह्माजी कहते हैं—मुनि गृत्समदकी इस बातको | त्रेतायुगमें 'मणिपुर' नामसे, द्वापरयुगमें 'भानकपुर' नामसे
सुनकर गजानन गणेशजीने कहा - ॥ ३४ ॥ | और कलियुगमें 'भद्रकपुर' नामसे संसारमें विख्यात
गणेशजी बोले- हे महाबाहो ! तुम्हें साधुवाद | होगा। यहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य सभी
है। हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे प्रसन्न होनेपर भक्तोंको तीनों | कामनाओंको प्राप्त करेगा ॥ ४२-४३१/२ ॥
लोकोंमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ३५ ॥ | ब्रह्माजी कहते हैं— [हे व्यासजी !] गृत्समदको
हे विप्र ! तुम्हारे द्वारा जो भी प्रार्थना की गयी है, | इस प्रकारसे वर देकर सर्वव्यापक गणेशजी वहीं
वह सब कुछ पूरी होगी। विप्रत्व दुर्लभतर है, प्रसन्न | अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्हित हो जानेपर मुनिने वहाँ
होकर यह मैंने तुम्हें प्रदान कर दिया ॥ ३६ ॥ | गणेशजीकी मूर्तिकी स्थापना की तथा उनका सुन्दर
हे मुने ! क्योंकि तुमने 'गणानां त्वा०' इस वैदिक | मन्दिर बनवाया ॥ ४४-४५ ॥
मन्त्रका जप किया है, अतः तुम्हीं इसके ऋषि होगे ॥ ३७॥ | उन्होंने उस मूर्तिकी 'वरदविनायक' इस नामसे
तुम ब्रह्मादि त्रिदेवों और [इन्द्रादि] देवताओं तथा | स्थापना की। गणेशजीकी कृपासे वहाँ सिद्धियोंका
वसिष्ठादि मुनियोंमें भी परम श्रेष्ठताको प्राप्त करके | शाश्वत अवस्थान हुआ ॥ ४६ ॥
सर्वत्र ख्याति प्राप्त करोगे। जो लोग सभी कार्योंके | यहाँ सभीकी कामनाएँ पुष्ट होती हैं, इसलिये इस
आरम्भमें पहले तुम्हारा और उसके बाद मेरा स्मरण | क्षेत्रको पुष्पकक्षेत्र कहा जाता है। मुनि गृत्समदने उस
करेंगे, उनको कार्योंमें सिद्धि प्राप्त होगी ॥ ३८-३९ ॥ | मूर्तिका भक्तिभावपूर्वक पूजन किया ॥ ४७ ॥
[मन्त्रके] देवता, ऋषि और छन्दके ज्ञानके बिना | हे मुनीन्द्र ! श्रीविघ्नराज गणेशजीद्वारा वरदान प्रदान
किये गये [जपादि] कर्म निष्फल होते हैं। तुम्हारा पुत्र | करनेका वर्णन करनेवाली इस कथाका जो श्रवण करता
बलवान् और सभी देवताओंके लिये अत्यन्त भयंकर | है, वह समस्त कामनाओंकी प्राप्ति करता है और उसे
होगा। वह तीनों लोकोंमें महान् ख्याति अर्जित करेगा। | संसार-सागरसे पार करनेवाली दृढ़ गणेशभक्तिकी प्राप्ति
भगवान् रुद्रके अतिरिक्त वह सम्पूर्ण देवताओंके लिये | होती है ॥ ४८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'वरदाख्यान' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥
अड़तीसवाँ अध्याय
गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म, उसके द्वारा गणेशाराधन, गणेशजीका प्रसन्न होकर
त्रैलोक्य-विजयका वरदान और तीन पुर प्रदान करना
व्यासजी बोले- हे सुरेश्वर ! हे कमलजन्मा | भी श्रेष्ठ गृत्समदको आदरपूर्वक सम्मानित किया और
ब्रह्माजी ! उसके बाद गृत्समदने क्या किया-वह सब | उन्हें नमस्कार किया ॥ २ ॥
मुझ श्रद्धालुको प्रयत्नपूर्वक बतलाइये ॥ १ ॥ | गणेशजीके वरदानके प्रभावसे [उन मुनियोंने] यज्ञ-
ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! तदनन्तर (गणेशजीसे | कर्ममें उनका वरण किया तथा समस्त अनुष्ठानात्मक कर्मोंके
वरदान प्राप्त करनेपर) सभी मुनिगणोंने श्रेष्ठ मुनियोंमें | प्रारम्भमें गणेश-पूजनसे पहले उनका स्मरण किया ॥ ३ ॥
१९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
इस प्रकार वे मुनि गृत्समद विख्यात हो गये। वे
गणनायक गणेशजीके मन्त्रका सुस्थिर मनसे जप करते
हुए उनमें परम भक्ति करने लगे ॥ ४ ॥
हे व्यासजी ! किसी समय उन मुनिने बहुत जोरसे
छींका, जिससे सभी दिशाएँ, पृथ्वी और गिरि-कन्दराएँ
अनुनादित हो उठीं ॥ ५ ॥
जब उन मुनिने अपने सामने देखा तो उन्हें एक
भयंकर बालक दिखायी दिया, जो महान् नाद कर रहा
था; उसका वर्ण जपाकुसुमके सदृश रक्तवर्णका था ॥ ६ ॥
वह बालक तेजका पुंजीभूत स्वरूप था और
दृष्टिपथको चुराये-सा ले रहा था। वे मुनि उस
बालकको देखकर भयसे विह्वल होकर काँपने लगे ॥ ७ ॥
वे मन-ही-मन तर्क-वितर्क करने लगे कि यह
कौन-सा विघ्न आ गया? न जाने गणोंके स्वामी
गणेशजीने मुझे यह अद्भुत पुत्र तो नहीं दे दिया ॥ ८ ॥
जब उन्होंने पुनः देखा तो वह बालक उन्हें सुन्दर
मुख और सुन्दर नेत्रोंवाला दिखायी दिया। उसने सुवर्ण-
निर्मित सुन्दर बाजूबन्द, सुन्दर मुकुट और सुन्दर नूपुर
धारण कर रखे थे। उस पुत्रका कटिप्रदेश सुन्दर
करधनीसे सुशोभित हो रहा था। तब मुनिने उससे पूछा
कि तुम कौन हो? किसके पुत्र हो और क्या करना
चाहते हो? हे तेजके निधान बालक ! बताओ, तुम्हारे
माता-पिता कौन हैं और तुम्हारा निवास-स्थान कहाँ
है?॥ ९-१०१/२॥
ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यास !] उन मुनिके इस
प्रकारके वचन सुनकर बालकने कहा- ॥ ११ ॥
बालक बोला- आप भूत, भविष्य और वर्तमानका
ज्ञान रखनेवाले होकर भी मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? फिर
भी मैं आपके आज्ञानुसार बताता हूँ कि आपकी छींकसे
मेरा जन्म हुआ है॥ १२ ॥
हे मुने ! आप ही मेरे पिता और माता हैं, मेरे ऊपर
कृपा करें। हे पिता ! आप मेरा कुछ दिनतक पालन करें।
तब मैं त्रैलोक्यपर आक्रमण करनेमें सक्षम हो जाऊँगा
और देवराज इन्द्रको भी अपना वशवर्ती कर लूँगा। मेरी
बातपर सन्देह न करें, मेरे पौरुषको आप देख
लीजियेगा ॥ १३-१४ ॥
ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यास !] उस बालकका
इस प्रकारका वचन सुनकर भय और हर्षसे युक्त मुनि
गृत्समदने स्नेह-सिक्त वाणीमें कहा- ॥ १५ ॥
यदि यह जन्म लेते ही त्रैलोक्यका अतिक्रमण
करनेमें सक्षम है तो मैं अपने इस पुत्रको अपना मन्त्र
[जिसका मैं जप करता हूँ] प्रदान करूँगा, जिससे
जगत्के स्वामी विनायकदेव प्रसन्न होकर इसकी
मनोकामनाको पूर्ण करेंगे और मेरी भी कीर्तिका विस्तार
होगा ॥ १६-१७ ॥
मन-ही-मन ऐसा विचार करके उन्होंने अपने मन्त्र
'गणानां त्वा०' का उसे उपदेश दिया और कहा कि
इसका आदरपूर्वक अनुष्ठान करो ॥ १८ ॥
मनको गजानन गणेशजीमें स्थापित करके इस
वैदिक मन्त्रका जप करो। हे पुत्र ! जब वे सन्तुष्ट हो
जायँगें, तो तुम्हें सभी कामनाओंको प्रदान करेंगे ॥ १९ ॥
इस प्रकार उस महामन्त्रको प्राप्तकर वह तपस्या
करनेके लिये वनको चला गया और वहाँ इन्द्रियोंपर
विजय प्राप्तकर निराहार रहते हुए एक अँगूठेपर खड़े
होकर स्थिर मनसे भगवान् गजाननका ध्यान करते हुए
पन्द्रह हजार वर्षोंतक उस मन्त्रका जप करता रहा।
इससे उसके मुखसे दिशाओंको जलानेवाली अग्नि
निकलने लगी। उससे देवताओं और पातालमें रहनेवाले
दैत्योंको भय हो गया ॥ २०-२२ ॥
तदनन्तर उसके उस तपसे प्रसन्न होकर गजानन
गणेशजी दिशाओंको अन्धकाररहित और सूर्यमण्डलको
आच्छादित-सा करते हुए आविर्भूत हो गये ॥ २३ ॥
वे अपनी सुन्दर सूँड़को घुमा रहे थे। सुन्दर दाँतसे
युक्त उनके मुखकी मुद्रा प्रसन्नतापूर्ण थी। उनके चिंघाड़की
ध्वनि सुनकर विह्वल-से होते हुए उस बालकने नेत्र
खोले तो अपने समक्ष भगवान् गणेशको देखा, जो चार
भुजाओंसे युक्त, विशाल शरीरवाले और अनेक आभूषणोंसे
विभूषित थे ॥ २४-२५ ॥
उ०ख०-अ०३८ ] * गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म * ११७
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उनके हाथ परशु, कमल, माला और मोदकसे | और ईश (शिव) भी नहीं जानते हैं। यदि आप मुझे
सुशोभित हो रहे थे। तब उस बालकने उनके तेजसे | वरदान देना चाहते हैं, तो मुझे तीनों लोकोंका अतिक्रमण
पराभूत होकर धैर्य धारण करके उन प्रभुको हाथ जोड़कर | कर सकनेकी विशेष शक्ति प्रदान करें। हे विभो ! देवता,
नमस्कार किया और उनकी प्रार्थना की ॥ २६१/२॥ | दानव, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प, राक्षस, मुनि, किन्नर और चारण
बालकने कहा—हे देव ! मुझ शरणागत भक्तको | सदा मेरे वशवर्ती हों। जिन-जिन कामनाओंका मैं मानसिक
क्यो धर्षित कर रहे हैं? हे देव! आप सौम्य स्वरूप | चिन्तन करूँ, वे सब सदा सिद्ध हों ॥ ३६-३८ ॥
धारण करें और मेरी सम्पूर्ण मनोकामनाओंको प्रदान | इन्द्रादि लोकपाल सदा मेरी सेवा करें। [आप]
करें ॥ २७१/२॥ | इहलोकमें अनेक प्रकारके भोग और अन्तमें मुझे मोक्ष
ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] उसके इस | प्रदान करें ॥ ३९ ॥
प्रकारके वचनको सुनकर उन्होंने अपने तेजको समेट | आपसे एक अन्य वरकी भी मैं याचना करता हूँ,
लिया और परम प्रसन्नतापूर्वक बोले—हे बालक ! | इस पुरमें, जहाँ मैंने उग्र तपस्या की थी, वह आपकी
सावधान हो जाओ। जिसका तुम दिन-रात ध्यान करते | आज्ञासे 'गणेशपुर' इस नामसे विख्यात हो जाय और
हो, वही मैं इस समय तुम्हें वर देनेके लिये आया | लोगोंको मनोवांछित फल देनेवाला हो ॥ ४०१/२॥
हूँ॥ २८-२९ ॥ | गणेशजी बोले—तुम तीनों लोकोंका अतिक्रमण
मेरे इस स्वयंप्रकाशरूप जगन्मय परम रूपको | करोगे। तुम्हें सबसे अभय होगा। सभी तुम्हारे सदा
ब्रह्मा, रुद्र आदि भी नहीं जानते तो मनुष्य इसे कैसे जान | वशवर्ती होंगे। मैं तुम्हें लोहे, सोने और चाँदीके तीन पुर
सकते हैं ॥ ३०॥ | देता हूँ ॥ ४१-४२ ॥
देवता, मुनि, राजर्षि, असुर, सिद्ध, गन्धर्व, नाग | ये तीनों पुर तुम्हारी इच्छाके अनुसार गति करनेवाले
और दानव भी मेरे इस स्वरूपको नहीं जान पाते ॥ ३१ ॥ | और भगवान् शंकरके अतिरिक्त सभी देवताओंके लिये
वही मैं तुम्हारे तपरूपी बन्धनमें बँधकर यहाँ वर | अभेद्य होंगे। संसारमें 'त्रिपुर' नामसे तुम्हारी प्रसिद्धि
देनेके लिये आया हूँ। तुम्हारे मनमें जो-जो अभिलाषा | होगी ॥ ४३ ॥
हो, वे वर मुझसे माँग लो ॥ ३२ ॥ | जब भगवान् शिव एक ही बाणसे तुम्हारे तीनों
तब उस बालकने कहा—आपके दर्शनसे मैं धन्य | पुरोंको भेद देंगे, तभी तुम्हें मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी—
हो गया हूँ, मुझसे अधिक मेरे पिता धन्य हैं; मेरा जन्म | इस विषयमें किसी प्रकारका विचार करनेकी आवश्यकता
लेना और तप करना सार्थक हो गया है ॥ ३३ ॥ | नहीं है। मेरी कृपासे तुम्हें अन्य सभी वांछित प्राप्त
हे सुरेश्वर ! बालभाव होनेके कारण मैं स्तुति करना | होंगे ॥ ४४ ॥
नहीं जानता हूँ, जबकि आप सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] इस प्रकार
पालक और संहारक हैं ॥ ३४॥ | उसको वरदान देकर वे सर्वव्यापक देव गणेश वहीं
आपके ही प्रकाशसे सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा | अन्तर्धान हो गये। उनके वियोगसे त्रिपुरासुर विषाद-
प्रकाशित होते हैं। हे महामते ! आप अपनी महिमासे | ग्रस्त हो गया। साथ ही उसे मनोवांछित वरोंकी प्राप्तिसे
स्थावर-जंगमरूप जगत्को चैतन्य प्रदान करते हैं ॥ ३५ ॥ | अत्यन्त हर्ष भी हुआ। तब वह बलपूर्वक त्रैलोक्य-
हे गजानन ! आपकी महान् महिमाको ब्रह्मा, विष्णु | विजयमें संलग्न हो गया ॥ ४५-४६॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'वरप्रदान' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥