सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

उपांगसहित विस्तारपूर्वक अनादिसिद्ध योगका वर्णन

क्री०ख०-अ०१४९] * ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान * ६२५
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
प्रिय राजन् ! इस प्रकार तुम्हारे स्नेहसे मैंने अंग-
उपांगसहित विस्तारपूर्वक अनादिसिद्ध योगका वर्णन
किया, यह योग परमोत्तम है ॥ ३५ ॥
हे राजन् ! मेरे द्वारा कहे गये इस योगको धारण
करो और किसीसे इसे मत कहो, तुम इसे गुप्त रखोगे
तो परम उत्तम सिद्धिको प्राप्त करोगे ॥ ३६ ॥
व्यासजी बोले—इस प्रकार प्रसन्नचित्त महात्मा
गणेशजीके वचन सुनकर राजा वरेण्यने उनके वचनके
अनुसार आचरण किया। राज्य और कुटुम्बको त्यागकर
वेगसे वे वनको चले गये और उपदेश किये गये योगमें
स्थित होकर मुक्त हो गये ॥ ३७-३८ ॥
इस महागुप्त योगका जो कोई श्रद्धासे श्रवण करता
है, वह भी मुक्तिको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि वह भी
योगीके समान ही होता है। जो बुद्धिमान् इस योगके
तात्पर्यको भलीभाँति अधिगत करके दूसरोंको सुनाता है,
वह भी योगीके समान मुक्त हो जाता है ॥ ३९-४० ॥
जो इस गीताका भलीप्रकार अभ्यासकर तथा
गुरुमुखसे इसका अर्थ जानकर गणेशजीकी पूजाकर
प्रतिदिन एक काल, दो काल अथवा तीनों कालोंमें पाठ
करता है, वह ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है और
उसके दर्शनसे भी मनुष्य मुक्त हो जाता है ॥ ४१-४२ ॥
न यज्ञ, न व्रत, न दान, न अग्निहोत्र, न महाधन (प्रचुर
धनव्ययसे साध्य शास्त्रीय अनुष्ठान), न सांगोपांग वेदोंके
उत्तम ज्ञान और अभ्यास, न पुराणोंके श्रवण, न भलीभाँति
चिन्तन किये हुए शास्त्रोंसे भी ऐसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है,
जैसे इस गीतासे मनुष्योंको प्राप्त होती है ॥ ४३-४४ ॥
ब्रह्महत्यारा, मद्यपी, चोर, गुरुदारगामी तथा इन
चारों महापाप करनेवालोंका साथ करनेवाले और स्त्रीहिंसा,
गोवध आदि करनेवाले पापी भी इस गीताको पढ़नेसे
पापमुक्त हो जाते हैं। जो नियमसे इसे नित्य पढ़ता है,
वह निःसन्देह श्रीगणेशस्वरूप हो जाता है और जो
चतुर्थीके दिन इसे भक्तिसे पढ़ता है, वह भी मुक्त हो
जाता है ॥ ४५-४७ ॥
उन-उन पुण्यक्षेत्रोंमें जाकर स्नान करके गणेशजीका
पूजनकर एक बार भी भक्तिपूर्वक इस गीताका पाठ
करनेवाला ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥ ४८ ॥
भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें चतुर्थीके दिन भक्तिपूर्वक
वाहन और आयुधसहित श्रीगणेशकी मृत्तिकाकी चतुर्भुज
मूर्ति बनाकर विधिपूर्वक पूजन करके जो यत्नपूर्वक सात
बार इस गणेशगीताका पाठ करता है, उसपर सन्तुष्ट
होकर गणेशजी पुत्र, पौत्र, धन-धान्य, पशु, रत्नादि
सम्पत्ति और उत्तम भोग उसे प्रदान करते हैं ॥ ४९-५१ ॥
विद्यार्थीको विद्या, सुखार्थीको सुख, कामार्थीको
नानाविध कामोंकी प्राप्ति होती है और अन्तमें वे मुक्तिको
प्राप्त होते हैं। इस प्रकार मैंने आपको समस्त [गीतोपदेश]
बताया है, अब और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ५२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'त्रिविध वस्तुविवेकनिरूपण' नामक
एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४८ ॥

एक सौ उनचासवाँ अध्याय
ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान, कलियुगवर्णन एवं कलियुगके अन्तमें
गणपतिता अवतीर्ण होकर धर्म-संस्थापन

ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे [देवताओं, ऋषियों
तथा राजाओंसे] पूजित होकर विभु गजानन उस
राजपूजित सदन (राजसदन नामक स्थान)-में भक्तोंकी
कामनाओंको पूर्ण करते हुए निवास करने लगे ॥ १ ॥
मुनिने कहा-हे देव! आपने विनायकके
महिमावर्णनके प्रसंगमें विभिन्न प्रकारके कथानकोंका
निरूपण किया है। उन्होंने वरेण्यके भवनमें अवतीर्ण
होकर विघ्नासुर अर्थात् सिन्दूरासुरका वध किया। हे
चतुरानन ! गजाननकी गजमुख-प्राप्तिका आपने वर्णन
किया और इसी प्रसंगमें पार्वतीजीके गर्भसे गजाननरूपसे
गणपतिके आविर्भावका भी आपने निरूपण किया है।
इसके कारण मैं सन्देहमें पड़ गया हूँ। आपके अतिरिक्त

Here is the complete transcription of the text from the image, line by line:

६२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
सन्देहोंको नष्ट करनेवाला तीनों लोकोंमें दूसरा कोई | कलियुगसे सम्बन्धित कथाका वर्णन करूँगा ॥ १४ १/२ ॥
नहीं है ॥ २-४ ॥ | हे मुने! कलियुगके आ जानेपर लोग सदाचारसे
ब्रह्माजी बोले—हे व्यास! विभु गजानन नानाविध | च्युत तथा असत्यभाषी हो जायेंगे। ब्राह्मण स्नान-सन्ध्या
शक्तियोंसे सम्पन्न हैं, अतः उनके विषयमें सन्देह नहीं | तथा वेदाभ्यासका परित्याग कर देंगे। उनकी यजन,
करना चाहिये। वे स्वेच्छावश कल्पोंके भेदसे भिन्न- | याजन तथा दानकृत्योंमें प्रवृत्ति नहीं होगी और वे दुष्ट
भिन्न रूपोंमें अवतीर्ण हुआ करते हैं ॥ ५ ॥ | पुरुषोंसे अत्यन्त गर्हित दान ग्रहण करेंगे, सभी लोग
कभी वे भगवान् शंकरके मुखसे, कभी उनके | दूसरेके कलंककी चर्चा करेंगे, निन्दामें तत्पर रहेंगे और
क्रोधावेशसे, कभी पार्वतीजीके तेजसे, तो कभी उनके | परस्त्रियोंके साथ अनुचित व्यवहार करेंगे ॥ १५-१७ ॥
उदरसे और कभी उनके शरीरके मैल (उबटन)-से | वे लोग सब प्रकारसे कर्तव्योंका परित्याग कर देंगे
अवतीर्ण हुए हैं। उनका स्वरूप कभी तो दो मुखोंवाला | और प्रत्येक स्थितिमें अवश्य ही विश्वासघात करेंगे।
प्रकट हुआ और कभी पाँच एवं छः मुखोंसे युक्त | अवैध कार्योंको सफल बनानेके लिये वे मिथ्या शपथ
दृष्टिगोचर होता रहा है। कभी वे दो भुजाओंसे समन्वित | ग्रहण करेंगे। हे मुनीश्वर! उस समय धरातलपर मेघ
होते हैं, तो कभी [चार भुजाओं, छः भुजाओं और | कहीं भी [भलीभाँति] वर्षा नहीं करेंगे। महानदियोंके
कभी] दश भुजाओं, द्वादश भुजाओं और सहस्र | तटवर्ती भूभाग भी कृषिके उपयोगमें लिये जायँगे। जो
भुजाओंसे भी शोभित होते हैं। सभी आगमग्रन्थ उनके | बलवान् होगा, वह निर्बलके धनका बलात् अपहरण कर
नानाविध ध्येय स्वरूपोंका निर्देश करते हैं। हे मुने! | लेगा और उससे दूसरे दो लोग मिलकर हरण करेंगे तथा
[इसलिये] प्रभु गजाननके सम्बन्धमें तुम्हें विस्मय या | ऐसे ही उन दो बलवानोंसे तीन (अथवा अधिक) लोग
संशय नहीं करना चाहिये ॥ ६-८ १/२ ॥ | बलपूर्वक [धन आदि] छीन लेंगे ॥ १८-२० १/२ ॥
लिंगपुराणमें शिवसे ब्रह्मा और विष्णुकी उत्पत्ति | कलियुगमें शूद्र वेदाभ्यास करेंगे और ब्राह्मण
बतायी गयी है। स्कन्दपुराणमें ब्रह्माके नेत्रोंसे शिवका | शूद्रोचित कर्मोंमें प्रवृत्त हो जायँगे। क्षत्रिय वैश्योंके और
प्रादुर्भाव वर्णित है। विष्णु शिवका ध्यान करते हैं और | वैश्य शूद्रोंके लिये विहित [जीविका-सम्बन्धी] कर्मोंका
शिव भी विष्णुके ध्यानमें निरत रहते हैं। वे प्रभु शिव | सम्पादन करेंगे। ब्राह्मण चाण्डालतकसे दान ग्रहण
पंचाक्षर मन्त्रके साथ तारक मन्त्रका उपदेश करते हैं। | करेंगे ॥ २१-२२ ॥
भगवान् शंकरने सौ करोड़ श्लोकोंमें रामचरित [का | [कलियुगके] विचारशून्य लोग धनहीन [और
प्रणयन किया और उस]-को तीन भागोंमें विभक्तकर | शोकवश] हाहाकार करनेवाले होंगे। वे अपनी
[एक-एक भाग स्वर्ग तथा पातालमें रखा और तीसरे | आवश्यकताओंको सामने रखकर दूसरोंसे धनकी याचना
भागके सहित] तारकमन्त्र (रामनाम)-को पृथिवीलोकमें | करेंगे और [लौटानेके समय] कहेंगे कि हमने तो तुमसे
स्थापित किया। यह सृष्टि कभी शिवसे, कभी विष्णुसे, | तनिक-सा भी धन नहीं लिया है। लोग रिश्वत लेकर
कहीं देवीसे, कहीं सूर्यसे, कहीं गजाननसे तो कहीं | झूठी गवाही देंगे और सज्जनोंकी निन्दा तथा दुर्जनोंसे
[निर्गुण निराकार] ब्रह्म [की सिसृक्षा]-से उत्पन्न | मित्रता करेंगे। द्विज व्यर्थमें ही [पशुओंको मारकर]
बतायी गयी है। ये सभी परस्पर विरोधी बातें शास्त्रसम्मत | मांसका भक्षण करेंगे ॥ २३-२५ ॥
हैं। इनमें जो सन्देह करता है, वह निश्चय ही नरकगामी | [कलियुगमें] सत्पुरुषोंका उन्मूलन और दुराचारियोंका
होता है ॥ ९-१३ १/२ ॥ | अभ्युदय देखा जायगा। लोग देवताओंकी अर्चनाका
ब्रह्माजी बोले—हे मुने! इस प्रकार द्वापरयुगकी | त्याग करके ऐन्द्रिक अर्थात् इन्द्रजालसम्बन्धिनी (जादू-
समस्त [लीला] कथा मैंने आपको बतलायी, अब मैं | टोना) विद्याओंका आश्रय लेंगे। वे भूत-प्रेत-पिशाचादिकी

क्री०ख०-अ०१४९] * ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान * ६२७
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ]
उपासनामें दत्तचित्त रहेंगे। ब्राह्मण भाँति-भाँतिके वेष
धारण करके अपना उदर-भरण करने लगेंगे। कुछ
क्षत्रिय अपने कुलोचित आचारसे भ्रष्ट होकर भिक्षावृत्तिसे
भी जीवननिर्वाह करेंगे। लोग व्रत-नियमादिका अल्पमात्र
भी अनुपालन नहीं करेंगे॥ २६-२८॥
पृथ्वीपर रहनेवाले लोग वर्णसांकर्यको जन्म देनेवाले
कार्योंको करने लगेंगे और पतिव्रताएँ अपने पातिव्रत्यधर्मसे
च्युत हो जायेंगी। सभी [वर्णाश्रमी] लोग म्लेच्छोंके
समान पराये धनका अपहरण करनेवाले, दयाशून्य,
कुमार्गगामी तथा सर्वदा सत्यसे रहित व्यवहार करनेवाले
हो जायेंगे॥ २९-३०॥
भूमिमें सस्य अर्थात् फसल नहीं उगेगी और वृक्ष
नीरस हो जायँगे। कन्याएँ पाँच-छः वर्षकी आयुमें ही
प्रसव करने लगेंगी। कलियुगमें मनुष्योंकी परमायु सोलह
वर्ष होगी अर्थात् उनकी अधिकतम सोलह वर्ष ही
जीनेकी अवधि होगी। तीर्थ और देवालय अपने दिव्य
स्वरूपको अन्तर्हित कर लेंगे॥ ३१-३२॥
जब इस प्रकार पाप बढ़ने लगेगा और धर्म क्षीण
होता जायगा, तो देवगण [यज्ञ-यागादिके अभावमें]
भूखों मरने लगेंगे। तब स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कारादि
[के माध्यमसे जो हविष्य देवता प्राप्त करते थे, उस]-
के अभावके कारण भयाकुल हुए देवगण अनामय
गजाननदेवकी शरणमें जायँगे॥ ३३-३४॥
वे सभी विघ्नोंका नाश करनेवाले उन देवेश्वर
गजाननका भाँति-भाँतिसे स्तवन और अभिवन्दन करेंगे
तथा प्रार्थना करेंगे। देवताओंकी ऐसी प्रार्थनाका पूर्णतः
विचार करनेके उपरान्त भगवान् गजानन अवतार ग्रहण
करेंगे। उस समय उनके सूपके जैसे कान होंगे और वे
धूम्रवर्ण नामसे विख्यात होंगे॥ ३५-३६॥
क्रोधसे मानो जलते हुए भगवान् गजानन तब
हाथमें खड्ग लेकर नीलवर्ण अश्वपर आरूढ़ होंगे और
अपनी इच्छाके अनुरूप अनेक रूपोंवाली सेनाका निर्माण
करेंगे। वे बिना प्रयत्न किये [अपने संकल्पबलसे] बड़े-
बड़े अस्त्र-शस्त्रोंको प्रकट करेंगे और सेनाके सहयोग
तथा अपने तेजसे उन महाम्लेच्छोंका वध करेंगे। उस

[दायाँ स्तम्भ]
समय गजाननदेव उन सारे लोगोंका वध करेंगे, जो
म्लेच्छोंके जैसा आचरण कर रहे होंगे॥ ३७-३८ १/२॥
वे देवेश्वर [वनों और] कन्दराओंमें छिपे तथा
वनके कन्द-मूल, फल खाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले
ब्राह्मणोंको बुलवायेंगे और उन्हें समादृत करके भूमिदान
करेंगे तथा समस्त जनताको सत्कर्मनिरत एवं सज्जन
बनायेंगे अर्थात् लोगोंको अनुशासितकर नैतिक जीवन
जीनेकी शिक्षा देंगे॥ ३९-४०॥
तब (उनके ऐसा करनेपर) सम्पूर्ण विश्व धर्ममर्यादामें
आबद्ध हो जायगा और सत्ययुगका प्रारम्भ होगा।
गजाननदेव इस प्रकार धूम्रवर्णावतारके द्वारा धर्ममर्यादाकी
स्थापना करनेके अनन्तर अन्तर्धान हो जायँगे॥ ४१॥
हे अनघ व्यासजी! इस प्रकार मैंने महात्मा
विघ्नेश्वरके चारों युगोंमें होनेवाले नाम तथा रूप तुमको
बतलाये और उनके चित्र-विचित्र लीलाकृत्योंका भी
सम्पूर्ण रूपसे वर्णन किया, जिनका केवल श्रवण करनेसे
भी सभी प्राणी मोक्ष प्राप्त करते हैं॥ ४२-४३॥
गजाननदेवके स्वरूप अन्तहीन हैं, अतः [उनका
समग्रतया] वर्णन कर पाना मेरी शक्तिके बाहर है।
जिनकी महिमाका वर्णन करनेमें चारों वेद कुण्ठित हो
जाते हैं, वहाँ मेरी अथवा मेरे जैसे किसी अन्य व्यक्तिकी
तो बात ही क्या है? [हे व्यासजी!] अब आप
अनुष्ठानके लिये प्रस्थान कीजिये और मैं भी अपने
[सृष्टि-] प्रपंचको सम्हालता हूँ॥ ४४-४५॥
भृगुजी बोले—हे सोमकान्त! ब्रह्माजीके मुखसे
सभी पापोंका नाश करनेवाली कथाका श्रवण करके
व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहने लगे॥ ४६॥
मुनि बोले—इस परम अद्भुत आख्यानको सुनकर
मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ। आपका मुझपर बड़ा अनुग्रह
हुआ है, मैं धन्य हो गया हूँ; क्योंकि गणपतिचरित्र-
मूलक इस कथानकके माध्यमसे आपने मेरे सभी सन्देह
दूर कर दिये। इसे बारम्बार सुनकर भी मुझे वैसे ही तृप्ति
नहीं मिल रही है, जैसे अमृत कितना ही पिया जाय,
तृप्ति नहीं होती॥ ४७-४८॥
इस आख्यानके श्रवणमात्रसे जन्म-जन्मान्तरमें अर्जित

६२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो | वनकी ओर चल पड़े। जहाँपर कन्द, फलादि सुलभ थे,
जाती हैं। इस पुराणको सुननेका अवसर मनुष्योंको | निर्मल जल था। जहाँ वायुकी प्रबलता नहीं थी और न
पूर्वकृत पुण्योंके कारण ही मिलता है। सर्वसिद्धिप्रद यह | अग्नि अथवा घामका ही भय था। ऐसे [उत्तम तपः]
पुराण दुर्जनको सुनानेयोग्य नहीं है॥ ४९-५०॥ | स्थानपर आसनस्थ होकर एकाग्र चित्तसे व्यासजी
भृगुजी बोले—इस प्रकार कहकर व्यासजीने | [गणपतिके] एकाक्षर मन्त्र (गं)-का जप करने लगे।
स्वयम्भू ब्रह्माजीको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा | जब तपस्या करते-करते व्यासमुनिके बारह वर्ष बीत गये,
करके तपस्याहेतु आज्ञा प्राप्त की, तत्पश्चात् वे उत्तम | तब भगवान् गजानन उनके समक्ष प्रकट हुए॥ ५१-५३॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'मुनिविसर्जन' नामक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४९॥


एक सौ पचासवाँ अध्याय

व्यासमुनिको गणपतिदेवका साक्षात्कार और उनसे वरकी प्राप्ति

सोमकान्तने कहा— हे भृगुजी! उन महात्मा व्यासजीके समक्ष गजाननदेव किस रूपमें प्रादुर्भूत हुए, वह सब बतलाइये, क्योंकि उस (के श्रवण)-से पापनाश होता है॥ १॥

भृगुजी बोले— हे भूमिप! जिस प्रकार गजाननदेव व्यासजीके समक्ष प्रादुर्भूत हुए थे, वह सब वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, उसका तुम आदरपूर्वक श्रवण करो। [जिस समय वे प्रकट हुए, उस समय] गजाननदेवने रक्तवर्णकी पुष्पमाला, रक्तवस्त्र तथा रक्तगन्धानुलेपन धारण कर रखा था। सिन्दूरके लेपनके कारण उनका मस्तक अरुणाभ था। कमलके समान नेत्रोंवाले गणपति अनेक सूर्योंके समान प्रतिभासित हो रहे थे। वे [कानोंमें] दिव्य कुण्डल, [बाहुयुगलमें] बाजूबन्द, [मस्तकपर] मुकुट, [हाथोंमें कंकण] तथा [यज्ञोपवीतके रूपमें] शेषनागको धारणकर शोभित हो रहे थे॥ २-४॥

मुनिने जब गणपतिके ऐसे रूपको देखा तो आँखें मूँद लीं, वे भयभीत होकर काँप उठे और मन्त्रका चिन्तन करते हुए मूच्छित हो गये। [जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई] तब गजाननने कहा—'हे मुनिसत्तम! भयभीत मत होइये। हे मुने! जिसका आप अहर्निश चिन्तन करते हैं और जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अगम्य है, वह मैं तुमको वर प्रदान करनेके लिये तुम्हारे समीप आया हूँ'॥ ५-६ १/२॥

भृगुजी बोले— इस प्रकारकी मधुरवाणी सुनकर मुनिश्रेष्ठ व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए। गजाननदेवके चरणोंमें अपना मस्तक रखकर वे बारम्बार कहने लगे कि मैं धन्य हूँ, मेरे माता-पिता धन्य हैं, मेरी तपस्या धन्य है, यह पृथिवी धन्य है और [तपोवनके ये] वृक्ष धन्य हैं; क्योंकि सर्वरूप, गुणातीत, समस्त प्रपंचके आश्रय, चिदानन्दघन, अनन्त और सभी कारणोंके परमकारण [आप गजानन]-का मैंने साक्षात्कार किया है। वरप्रद गजाननका इस प्रकार स्तवन करके वे उनसे प्रार्थना करने लगे॥ ७-९॥

मुनि बोले— हे देवेश! मेरी समस्त भ्रमबुद्धिको दूर करके आप मुझे अपने प्रति स्थिर भक्तिभाव प्रदान कीजिये। मैं जिस प्रकार अठारह महापुराणोंके प्रणयनमें समर्थ हो सकूँ और आपका भी गुणगान करनेमें सक्षम हो सकूँ, वैसा [कृपापूर्ण] विधान कीजिये। हे अनघ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे हृदयमें निवास कीजिये॥ १०-११ १/२॥

गजानन बोले— वत्स! तुमने जो प्रार्थना की है, वह सब आज ही पूर्ण हो जायगी। व्यास नामवाले मुनिवर! आप सबके मान्य, सभी पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले, अपरोक्षज्ञान (अद्वैतबोध)-से सम्पन्न तथा गुरुओंके भी गुरु होंगे। आप प्रसिद्धि, सद्गुण, कीर्ति तथा श्रीके विषयमें नारायणके तुल्य होंगे। हे मुनीश्वर!