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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

इकसठवाँ अध्याय

उ०ख०-अ०६१ ] * गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना * १९३
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इकसठवाँ अध्याय
गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना तथा देवताओंकी प्रार्थनापर पुनः
अनुग्रह करना, चन्द्रमाद्वारा वरद विनायककी स्थापना

ब्रह्माजी बोले—हे राजन् ! एक बार मैं गिरिशायी
भगवान् शंकरके निवास-स्थान कैलासपर्वतपर गया
हुआ था। वहाँ सभाके मध्यमें बैठे हुए मैंने नारदजीको
आते हुए देखा। उन्होंने शंकरजीको एक अद्वितीय फल
निवेदित किया, तब उस (फल)-के विषयमें गणेश और
कुमार कार्तिकेय—दोनोंने शम्भुसे याचना की ॥ १-२ ॥
उस समय भगवान् शंकरने 'यह फल मुझे किसे
देना चाहिये'—ऐसा मुझसे भी पूछा। तब मैंने उनसे
कहा कि कुमार बालक हैं, अतः उन्हें यह फल दे
दीजिये ॥ ३ ॥
तब शिवजीने उस फलको कुमारको दे दिया,
[इसपर] गणेशजी क्रुद्ध हो गये। तदनन्तर जब मैंने
अपने निवास ब्रह्मलोकमें जाकर सृष्टि करनेकी इच्छा
की तो विघ्नकर्ता [उन] गणेशजीने एक अत्यन्त अद्भुत
विघ्नकी सृष्टि कर दी, और वे उग्ररूप धारणकर मुझे
भयभीत करने लगे ॥ ४-५ ॥
[उस रूपको देखकर] मेरे भ्रमित हो जानेपर
चन्द्रमा गजानन गणेशजीके क्रूरतर रूपको देखकर अपने
गणोंसहित हँस पड़े। तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होंने
चन्द्रमाको शाप दे दिया कि मेरे वचनानुसार [अब] तुम
तीनों लोकोंमें अदर्शनीय हो जाओगे ॥ ६-७ ॥
कदाचित् यदि कोई तुम्हें देख लेगा तो वह
महापातकी हो जायगा। इस प्रकार शाप देकर वे
देवाधिदेव अपने गणोंके साथ अपने धामको चले
गये। चन्द्रमा भी मलिन, दीन और चिन्ता-समुद्रमें
लीन हो गये कि अणिमादि सिद्धियोंसे समन्वित,
जगत्के कारणके भी कारण उन भगवान् गणेशके
प्रति अज्ञानवश बालककी भाँति मैंने दुष्टता क्यों की;
जिसके कारण मैं सभीके लिये अदर्शनीय, विवर्ण
और मलिन हो गया हूँ!॥ ८-१०॥
अब मैं [पुनः] कैसे स्वरूपवान्, वन्दनीय और
अपनी कलाओंसे देवताओंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाला
बनूँगा ? इसी बीचमें देवताओंने चन्द्रमाको प्राप्त महान्
शापके विषयमें सुना। तब अग्नि, इन्द्र आदि [देवता]
वहाँ गये, जहाँ गजानन गणेशजी थे। उन देवगणोंने
सम्पूर्ण विघ्नोंका प्रवर्तन एवं हरण करनेवाले गणेशजीसे
प्रार्थना की— ॥ ११-१२ ॥
देवताओंने कहा—हे देवाधिदेव ! आप सम्पूर्ण
संसारके लिये वन्दनीय हैं। हे ईश! आप अपनी इच्छासे
इस संसारका सृजन, पालन और संहार करते हैं। हे त्रिदेवों
(ब्रह्मा, विष्णु और महेश)-के स्वामी! आप निर्गुण
[स्वरूप] होते हुए भी गुणवानोंके गुणोंके कर्ता हैं। हे
देव ! आज हम आपकी ही शरणमें आये हैं ॥ १३ ॥
हे ईश ! सम्पूर्ण जगत् आपके शापसे भयभीत
है, आप हमारी रक्षा करें। चन्द्रमाके अपराधके कारण
हम सबपर यह महान् कष्ट कैसे आ गया है? हे
जगदीश ! हे भुवनेश ! अतः आप ऐसा विधान करें,
जिससे हम सब, यह सम्पूर्ण संसार और चन्द्रमा भी
शान्ति प्राप्त कर सकें ॥ १४ ॥
हे प्रभो ! चन्द्रमाके अदृश्य हो जानेसे यह संसार
कष्टमें पड़ गया है, इसलिये आप इन चन्द्रमापर अनुग्रह
करके तीनों लोकोंपर कृपा करें ॥ १५ ॥
[हे प्रभो!] आपके जिस स्वरूप और महिमाको
वेदत्रयी भी नहीं जान सकती, उसका स्तवन कोई कैसे
कर सकता है, तथापि हम सभी आपकी स्तुति कर रहे
हैं। आपका दर्शन करके और आपसे सम्भाषण करके
हम सब कृतकृत्य हो गये। हे शरणागतोंके कष्टका
हरण करनेवाले अविनाशी [प्रभु!] हम सब आपकी
शरणमें आये हैं ॥ १६-१७ ॥
[तब] उनके इस प्रकारके वचन सुनकर और उनके
द्वारा किये हुए स्तवनसे अत्यन्त प्रसन्न हुए धर्म, अर्थ, काम
और मोक्षको देनेवाले गजानन गणेशजी बोले— ॥ १८ ॥

१९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
विकट* (गणेशजी) बोले—हे देवताओ! मैं
आप सबकी स्तुतिसे प्रसन्न हूँ; आप लोग अपना मनोऽभिलषित
वर माँगें। यदि वह तीनों लोकोंमें महान् असाध्य होगा,
तो भी उसे आप लोगोंको प्रदान करूँगा॥ १९॥
देवताओंने कहा—[हे प्रभो!] हम सब लोग
अमृतमयी किरणोंवाले चन्द्रमापर आपका अनुग्रह चाहते
हैं, आपके द्वारा उसे अनुगृहीत किये जानेपर हम सबपर
आपका अनुग्रह हो जायगा॥ २०॥
गणेशजी बोले—एक वर्ष या उसका आधा
यानी छः मास या उस आधेका आधा तीन मासतक
चन्द्रमा अदर्शनीय हो जाय। हे देवताओ! अब आप
लोग कोई दूसरा वर भी माँगें॥ २१॥
तदनन्तर उन सबने गजानन गणेशजीको दण्डवत्
प्रणाम किया [शापनिवारणकी प्रार्थना की]। तब
उन प्रणतजनोंसे गणेशजीने भावपूर्वक कहा—अहो!
आश्चर्य है कि मैं अपने ही वचनको अप्रमाणित
करनेके लिये कैसे उद्यत हो गया हूँ? शरणमें आये
हुए प्रपन्नजनोंका त्याग करनेकी भी मेरी इच्छा नहीं
हो रही है, जबकि चाहे सुमेरुपर्वत चलायमान हो
जाय (अपना स्थान छोड़ दे), सूर्य [आकाशसे
पृथ्वीपर] गिर पड़े, अग्नि शीतल हो जाय, समुद्र
अपनी मर्यादा छोड़ दे, परंतु मेरा वचन असत्य नहीं
हो सकता, फिर भी हे श्रेष्ठ देवताओ! मेरे द्वारा
कही जा रही बातोंको सुनो। [मैं अपने शापको
सीमित कर रहा हूँ, मात्र] भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी
चतुर्थी तिथिको ज्ञानमें अथवा अज्ञानमें भी जो अभिशप्त
चन्द्रको देख लेगा, वह महान् दुःखका भाजन होगा।
उनके इस प्रकारके वचन सुनकर सभी देवता प्रसन्न
हो गये। उन सब देवताओंने [स्वीकारसूचक] 'ओम्'
शब्दका उच्चारणकर उनके चरणोंमें प्रणिपात किया
और उनपर पुष्पवृष्टि की तथा उनसे अनुज्ञा लेकर
चन्द्रमाके पास चले गये॥ २२—२७॥
[वहाँ जाकर] उन सबने [चन्द्रमाको उलाहना
देते हुए] उनसे कहा कि तुम बड़े मूर्ख हो, जो तुम
गजानन गणेशजीपर हँसे। श्रेष्ठोंके प्रति अपराध करनेवाले
तुमने तीनों लोकोंको संकटमें डाल दिया॥ २८॥
तुमने तीनों लोकोंके स्वामी, तीनों लोकोंके विधाता,
अविनाशी, निर्गुण, नित्य, परम ब्रह्मस्वरूप, अखिलगुरु
भगवान् गजानन गणेशजीके प्रति अपराध किया है, अतः
सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छा रखनेवाले गणेशजीने
तुम्हें दण्डित किया था॥ २९-३०॥
हम लोगोंके द्वारा अत्यन्त कष्टपूर्वक वे परमात्मा
प्रसन्न किये गये। [तदनन्तर उन्होंने कहा—] भाद्रपद
मासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको तुम कभी दर्शनीय
नहीं होगे। [अतः हे चन्द्र!] तुम भी उन देवाधिदेव
गजाननकी शरणमें जाओ। उनकी कृपासे तुम शुद्ध
शरीरवाले होकर परम ख्यातिको प्राप्त करोगे॥ ३१-३२॥
देवताओंके इस प्रकारके हितकारी वचनको सुनकर
चन्द्रमा शिव आदि देवताओंद्वारा वन्दित शरणागतवत्सल
देवेश्वर भगवान् गजानन गणेशजीकी शरणमें गये और
पापोंका नाश करनेवाले श्रेष्ठ एकाक्षर मन्त्रका जप करने
लगे॥ ३३-३४॥
इन्द्रद्वारा उपदिष्ट [मन्त्रका जप करते हुए]
चन्द्रमाने परम समाधिमें स्थित होकर सम्पूर्ण सिद्धियोंको
प्रदान करनेवाली गंगाजीके दक्षिणी किनारेपर बाईस
वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप किया। तब [उनकी
तपस्यासे] प्रसन्न होकर भगवान् गजानन उनके सम्मुख
आये॥ ३५-३६॥
[वे भगवान् गणेश] लाल रंगके पुष्पोंकी माला
और लाल रंगके वस्त्र धारण किये हुए थे। उनके शरीरमें
लाल चन्दनका आलेप लगा हुआ था। चार भुजाओंसे
युक्त, विशाल शरीरवाले उनका श्रीविग्रह सिन्दूरसे लिप्त
होनेके कारण अरुण वर्णका था॥ ३७॥
करोड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रभाववाले वे अपनी
आभासे सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित कर रहे थे। उस
तेजःपुंजको देखकर चन्द्रमा अत्यन्त [भयभीत होकर]

  • मुद्गलपुराणके अनुसार कामासुरका पराभव करनेके लिये गणेशजीने 'विकट' नामका अवतार लिया था।

उ०ख०-अ०६१ ] * गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना * १९५
कम्पायमान हो उठे ॥ ३८ ॥
तदनन्तर वे अत्यन्त धैर्य धारण करके उनके
सम्मुख हाथ जोड़कर मनमें यह विचार करने लगे कि
ये गजानन गणेशजी ही हैं, जो मुझे वर देनेके लिये यहाँ
आये हैं—ऐसा मानकर उन्होंने उन्हें नमन किया और
अपनी परमभक्तिसे उन देवाधिदेव गजानन गणेशजीको
प्रसन्न किया ॥ ३९-४० ॥
चन्द्रमा बोले—मैं उन भगवान् गजानन गणेशजीको
प्रणाम करता हूँ, जो लोगोंके सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करते
हैं। जो सबके लिये धर्म, अर्थ और कामकी उपलब्धि
कराते हैं, उन विघ्नविनाशकको नमस्कार है ॥ ४१ ॥
हे कृपानिधान ! हे विश्वका विधान करनेमें दक्ष !
आप ब्रह्ममय, विश्वात्मा, विश्वके बीजरूप, जगन्मय,
त्रैलोक्यका संहार करनेवाले हैं; हे देव ! आपको नमस्कार
है। वेदत्रयीस्वरूप, अखिल बुद्धिदाता, बुद्धिप्रदीप, सुरेश्वर,
नित्य, सत्य, नित्यबुद्ध, नित्य निष्काम आपको नित्य
नमस्कार है ॥ ४२-४३ ॥
हे महात्मन् ! मैंने अज्ञानदोषके कारण जो अपराध
किया है, दया करनेवाले आप उसे क्षमा करें। मुझपर
दया कीजिये; क्योंकि शरणागतके त्यागसे आपको भी
दोष होगा ॥ ४४ ॥
ब्रह्माजी बोले—चन्द्रमाके इस प्रकारके वचन
सुनकर गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन
देवाधिदेवने चन्द्रमाके स्तवन और नमस्कारसे सन्तुष्ट
होकर उन्हें अनेक वरदान दिये ॥ ४५ ॥
गजानन बोले—[हे चन्द्र !] तुम्हारा स्वरूप जैसे
पहले था, वैसा ही हो जायगा; परंतु भाद्रपदमासके
शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको जो मनुष्य तुम्हें देखेगा, उसे
निश्चय ही अभिशाप और पाप लगेगा। उसे हानि और
मूर्खताकी प्राप्ति होगी। जैसा कि मैंने देवताओंके साथ
वार्तालापमें पहले ही कह दिया है, तुम उस [चतुर्थी
तिथि]-को अदर्शनीय होओगे ॥ ४६-४७ ॥
[भाद्रपदमासके] कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको
मनुष्योंद्वारा जो व्रत किया जायगा, उसमें तुम्हारे उदय
होनेपर ही मेरी पूजा होगी और तुम भी प्रयत्नपूर्वक पूजे
जाओगे। उस तिथिपर तुम प्रयत्नपूर्वक दर्शनीय होओगे,
इसके विपरीत होनेपर व्रत (संकष्टचतुर्थी) व्यर्थ हो
जायगा। हे शशि! तुम मुझे प्रसन्न करनेवाले हो, अतः
तुम अपनी एक कलासे मेरे ललाटपर स्थित रहो। तुम
प्रतिमासकी [शुक्लपक्षकी] द्वितीया तिथिको सबके लिये
प्रणम्य होओगे ॥ ४८-४९१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर इस प्रकार वर प्राप्त
करके चन्द्रदेव पहलेकी ही भाँति [स्वरूपवान्] हो गये।
उन्होंने देवताओं और ऋषियोंके साथ वरद विनायक
नामक मूर्तिकी स्थापना की। देवताओं और मुनियोंने उस
मूर्तिका 'भालचन्द्र' यह नाम रखा ॥ ५०-५१ ॥
चन्द्रमाने उस मूर्तिके लिये रत्नजटित स्वर्णमन्दिरका
निर्माण कराया और आदरपूर्वक उसका षोडश उपचारोंसे
पूजन किया ॥ ५२ ॥
सम्पूर्ण देवताओं और मुनियोंने भी उस मूर्तिका
पूजन किया और यह वरदान दिया कि संसारमें यह
स्थान सिद्धक्षेत्रके रूपमें विख्यात होगा। यहाँ अनुष्ठान
करनेवालोंके लिये यह स्थान सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान
करनेवाला होगा ॥ ५३१/२ ॥
तदनन्तर उन देवताओं और मुनियोंने गजानन
गणेशजीको नमस्कार किया और प्रसन्न मनसे अपने-
अपने स्थानको हर्षपूर्वक चले गये। उन देवताओं और
मुनियोंके चले जानेपर देवाधिदेव गणेशजीने भी अपने
शरीरको अन्तर्धान कर लिया ॥ ५४-५५ ॥
तदनन्तर उन भालचन्द्र गणेशजीके अन्तर्धान हो
जानेपर चन्द्रमा भी अपने तेजको प्राप्तकर प्रसन्न मनसे
अपने धामको चले गये ॥ ५६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चन्द्रशापानुग्रहवर्णन'
नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥