श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सहीं। उन दोनोंके सम्पूर्ण दुःखोंका वर्णन करनेमें शेषजी
३३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
उन दोनोंने बहुत वर्षोंतक इक्कीस नरकोंकी यातनाएँ
सहीं। उन दोनोंके सम्पूर्ण दुःखोंका वर्णन करनेमें शेषजी
भी समर्थ नहीं हैं। इस प्रकारसे हजार वर्षोंतक अनेक
प्रकारके दुःखोंको भोगकर पापोंका भोग हो जानेके बाद
उन्होंने शेष पापोंको भोगनेके लिये पृथ्वीपर जन्म
लिया ॥ ३०-३१॥
इस जन्ममें एकने कौएकी योनिमें जन्म लिया तो
दूसरा उलूक योनिमें उत्पन्न हुआ। दूसरे जन्ममें एक
मेढक हुआ तो दूसरेने गिरगिटकी योनिमें जन्म लिया ॥ ३२॥
अगले जन्ममें एक विषधर सर्प हुआ तो दूसरा
बिच्छू बना। उन योनियोंमें भी उन दोनोंने पापकर्म करते
हुए अनेक लोगोंको काटा ॥ ३३ ॥
तदनन्तर वे दोनों कुत्ते तथा बिल्लीकी योनिमें, फिर
नेवले तथा सूकरकी योनिमें, तदनन्तर भेड़िये तथा सियारकी
योनिमें, फिर घोड़े और गधेकी योनिमें उत्पन्न हुए। इसके
पश्चात् वे दोनों ऊँट और हाथी बने, तदनन्तर मगरमच्छ
तथा महान् मत्स्य बने, तदनन्तर बाघ और मृग और फिर
बैल तथा महिषकी योनिमें उत्पन्न हुए ॥ ३४-३५ ॥
इस प्रकारसे नाना योनियोंमें भटकते हुए वे
चाण्डाल तथा कीटककी योनिमें उत्पन्न हुए। इसके
पश्चात् अन्तमें राक्षस तथा भील (व्याध)-की योनिमें
उन्होंने जन्म लिया। इस जन्ममें साम्ब नामक राजा
दुर्बुद्धि (भीम) नामवाला व्याध बना और दुष्टबुद्धि
नामक वह अमात्य पिंगाक्ष नामक राक्षसके रूपमें
भूतलमें प्रसिद्ध हुआ। जन्मभर केवल पाप ही करनेवालेकी
चर्चामें बहुत दोष बताये गये हैं॥ ३६-३७ ॥
जब वे दोनों राजा साम्ब और दुष्टबुद्धि नामक
अमात्य पूर्वकालमें पापपरायण थे, तो उन्हीं दिनों
एकबार आखेटके लिये जाते समय उन दोनोंसे एक
पुण्यकर्म भी बन गया था ॥ ३८ ॥
उन्होंने भगवान् विनायकका दर्शन किया। उन्हें
प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा की, साथ ही फल,
पुष्प आदिके द्वारा उनका अर्चन किया। जिसके कारण
गजानन उनपर सन्तुष्ट हो गये ॥ ३९ ॥
उन दोनोंके उस जन्मका वह संचित पुण्य अगाध
था। पूर्वकालमें जब वह राक्षस उस भीम नामक व्याधको
खानेके लिये आया, तो वह शमीके वृक्षपर चढ़ गया।
वहाँ हिलनेसे शमीके पत्ते गणेशजीके मस्तकपर गिर पड़े।
तब गणेशजी दोनोंपर बड़े ही प्रसन्न हुए ॥ ४०-४१ ॥
उन दोनोंको दिव्य देह प्रदानकर उन विभु गजाननने
उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति करा दी थी। इस प्रकार उन
दोनोंके पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके विषयमें आपको
बताया। केवल शमीपत्रमात्रके द्वारा [अज्ञानमें ही हुए]
पूजनसे वे गजानन प्रसन्न हो गये। जिस प्रकार कश्यपपुत्र
वामनने उन गणेशकी स्थापना की थी और उनके द्वारा
किये गये अनुष्ठानके विषयमें तथा जिस प्रकारसे
गणनायने प्रसन्न होकर उन्हें वर प्रदान किये, हे मुनि
व्यासजी ! वह सब मैं आपको बताता हूँ ॥ ४२-४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत भीम तथा राक्षसके पूर्वजन्मका वर्णन'
नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥
उनतीसवाँ अध्याय
महर्षि कश्यपकी पत्नी दिति तथा अदितिके वंशका वर्णन, हिरण्याक्ष तथा
हिरण्यकशिपुकी उत्पत्तिका वर्णन, उनकी तपस्या तथा उन्हें वरदानकी
प्राप्ति, प्रह्लादपुत्र विरोचनके वधका आख्यान
ब्रह्माजी बोले—मैंने कश्यपको आज्ञा दी थी कि
आप विविध प्रकारकी सृष्टि करें। महर्षि कश्यप अत्यन्त
विनीत, महान् ज्ञानी, भूत-भविष्य तथा वर्तमानका ज्ञान
रखनेवाले, सूर्य तथा अग्निके तेजसे भी अधिक तेजस्वी
और उत्तम तपस्याकी निधि थे। उन्होंने सृष्टि करनेकी सामर्थ्य
प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त महान् तप किया ॥ १-२ ॥
उन्होंने षडक्षर मन्त्रके द्वारा भगवान् गणेशजीका
ध्यान किया। इस प्रकार दिव्य हजार वर्ष बीत जानेपर
क्री०ख०-अ०२९ ] * महर्षि कश्यपकी पत्नी दिति तथा अदितिके वंशका वर्णन * ३३९
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वे देव गजानन उनके लिये वरप्रदाता हुए॥ ३॥
उन्होंने महर्षि कश्यपजीको सभी प्रकारके अभीप्सित
विविध वरोंको प्रदान किया था। तब वरदानके प्रभावसे
वे जो-जो भी अपने मनमें कल्पना करते थे, उस-उसको
शीघ्रतासे अपने समक्ष पाते थे॥ ४१/२॥
उन्होंने अपनी चौदह पत्नियोंमें अनेक बार गर्भाधान
करके अपने तेजसे सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि की
थी। उन चौदह पत्नियोंमें दिति तथा अदिति नामवाली
दो पत्नियाँ श्रेष्ठ थीं॥ ५-६॥
भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये अदितिने भी
दस हजार वर्षोंतक तपस्या की। इससे भगवान् जनार्दन
सन्तुष्ट हो गये॥ ७॥
उसके तपसे सन्तुष्ट होकर भगवान् विष्णु संसारके
पालन-पोषणके लिये, धर्मकी स्थापनाके लिये तथा इन्द्र
आदि देवताओं और उनकी सन्ततिकी रक्षा और दुष्टोंके
संहारके लिये पहले देवी अदितिके पुत्रके रूपमें अवतरित
हुए। तदनन्तर एक समयकी बात है, जब महर्षि कश्यप
होम करनेके लिये उद्यत थे। उस समय दितिने अपने
स्वामीसे आदरपूर्वक कहा— ॥ ८-९॥
हे भगवन्! मुझे कामाग्नि पीड़ित कर रही है।
अतः आप ऋतुदान कीजिये। उसका ऐसा वचन सुनकर
महर्षि कश्यप आदरपूर्वक उससे बोले— ॥ १०॥
यह भयंकर सन्ध्याकाल है। इस समय हवन-कार्य
उपस्थित है। तुम क्षणभर धैर्य धारण करो। तदनन्तर मैं
तुम्हारे साथ रमण करूँगा। इस समय सहवास करनेसे
देवताओं तथा धर्मका विरोधी दुष्ट पुत्र उत्पन्न होगा।
दिति स्वामीके इस प्रकारके वचन सुनकर उनका हाथ
पकड़कर उनके चरणोंमें गिर पड़ी॥ ११-१२॥
लाल-लाल नेत्रोंवाली होकर वह तीनों लोकोंको
जला देनेकी इच्छासे बोल पड़ी—हे मुने! इसी समय
यदि आप मेरी अभिलाषा पूर्ण नहीं करेंगे तो कामदेवकी
अग्निसे विह्वल हुई मैं अपने शरीरका त्याग कर दूँगी।
दैवयोगसे मेरा पुत्र देवताओं अथवा धर्मका विरोधी चाहे
जैसा भी हो॥ १३-१४॥
उसका ऐसा वचन सुनकर शरणागतवत्सल महर्षि
कश्यपने उसे ऋतुदान दिया और फिर स्नान करनेके
अनन्तर होम किया॥ १५॥
कालान्तरमें दितिको महान् बलशाली हिरण्याक्ष
तथा हिरण्यकशिपु नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। उन
दोनोंने अत्यन्त उत्कट तपस्या की॥ १६॥
पञ्चाक्षर मन्त्र (नमः शिवाय)-का बहुत वर्षोंतक
जप करते हुए वे दोनों पैरके एक अँगूठेके बलपर खड़े
होकर केवल वायुका भक्षण करते रहे। उनके शरीरपर
३४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
दीमकोंने बाँबी बना ली थी ॥ १७ ॥
जब कृपानिधि भगवान् शंकर उन्हें वर प्रदान
करनेके लिये उपस्थित हुए, तब उन दोनोंने भक्तिपूर्वक
भगवान् त्रिलोचनकी स्तुति की ॥ १८ ॥
अपने हाथ जोड़कर वे दोनों उनके चरणोंपर गिर
पड़े और उनके दर्शनके प्रभावसे प्रस्फुटित बुद्धिवाले वे
यथाज्ञान यथाशक्ति स्तुति करने लगे ॥ १९ ॥
जो देव वृषभके वाहनपर विराजमान रहनेवाले हैं,
दस भुजाओंवाले हैं। ललाटपर अर्धचन्द्रको धारण
करनेवाले तथा नागोंसे सुशोभित हैं। जो विविध रूपवाले
गणों तथा गिरिराजपुत्री पार्वतीसे समन्वित हैं, सम्पूर्ण
चराचर जगत्के कारण हैं। जो बाघम्बर तथा गजचर्म
धारण करनेवाले हैं। जिनके तीन नयन हैं, जो त्रिशूलको
धारण करनेवाले और कामदेवका दहन करनेवाले हैं।
जो भक्तोंकी इच्छा पूरी करनेके लिये एकमात्र आश्रय-
स्वरूप हैं और जो धर्म-अर्थ [, काम] तथा मोक्ष प्रदान
करनेवाले हैं [वे भगवान् शिव हमपर प्रसन्न हों] ॥ २० ॥
इस प्रकार सर्वव्यापी परमेश्वर महादेवकी स्तुति
करके उन्होंने भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये
कल्पवृक्षके समान उन भगवान् शिवको प्रणाम किया ॥ २१ ॥
तदनन्तर भगवान् शिवने प्रसन्न होकर उन दोनोंसे
कहा-वर माँगो। तब उन दोनोंने वरोंको माँगते हुए
कहा कि देवताओं, यक्षों, राक्षसों, किन्नरों, श्रेष्ठ मनुष्यों,
पिशाचों तथा चारण आदि किसी भी योनिके प्राणीके
द्वारा हमारी मृत्यु न हो। न शस्त्रोंसे, न गीले पदार्थसे,
न शुष्क पदार्थसे, न किसी जन्तु और न किसी जलचर
प्राणीके द्वारा ही हमारी मृत्यु न हो। अन्य किसी स्थावर
अथवा जंगम प्राणीसे हमारी मृत्यु न हो। हमारी मृत्यु
न दिनमें हो, न रातमें हो। न तो पृथ्वीमें हो, न आकाशमें
हो, न उन दोनोंके मध्यमें हो और न ही उषाकालमें
हमारी मृत्यु हो ॥ २२-२४ ॥
तब भगवान् शिवने 'ऐसा ही होगा' कहा और
फिर वे अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर उन दोनोंने पृथ्वी
तथा आकाशके मध्यभाग [स्वर्गादि दिव्यलोक] और
रसातलपर विजय प्राप्त कर ली ॥ २५ ॥
देवताओंके सभी स्थानोंको बलपूर्वक जीतकर वे
वहाँ स्थित हो गये। हिरण्यकशिपुका प्रह्लाद नामक पुत्र
उत्पन्न हुआ। वह दैत्योंके लिये कण्टकके समान था
और भगवान् विष्णुके भक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ था। भगवान्
नारायणका नाम-मन्त्र जपनेपर पिता हिरण्यकशिपुने उसे
अत्यन्त प्रताड़ित किया था ॥ २६-२७॥
पिता हिरण्यकशिपुके द्वारा अनेक प्रकारकी यातनाओंके
दिये जानेपर उन करुणासागर भगवान् विष्णुने जलमें,
स्थलमें और विष तथा अग्निसे उसकी अनेक बार रक्षा
की। सभी लोगोंको भय पहुँचानेवाले उस हिरण्यकशिपुको
नरसिंहरूप धारण करके श्रीहरिने अपने नाखूनोंके द्वारा
सायंकालके समय विदीर्ण कर डाला ॥ २८-२९ ॥
इससे पूर्व भगवान् विष्णुने वाराहरूप धारण करके
हिरण्याक्षद्वारा समुद्रमें डुबोयी गयी पृथ्वीको अपनी
दाढ़ोंके ऊपर उठाकर यथास्थान स्थित किया। प्रह्लादका
पुत्र विरोचन हुआ और उसका पुत्र हुआ बलि ॥ ३० ॥
विरोचन भगवान् सूर्यका भक्त था। उसने उनसे
मुकुट प्राप्त किया था। सात अश्वोंवाले रथमें आसीन
रहनेवाले भगवान् सूर्यने विरोचनसे कहा था कि इस
मुकुटपर यदि किसी दूसरेके हाथका स्पर्श होगा तो यह
नष्ट हो जायगा। इसमें कोई संशय नहीं है। भगवान्
क्री०ख०-अ०३०] * विष्णुभक्त राजा बलिका आख्यान * ३४१
सूर्यके वरके प्रभावसे विरोचनने तीनों लोकोंको अपने
अधीन कर लिया ॥ ३१-३२॥
अपने स्थानोंसे च्युत हो जानेपर देवता भगवान्
अच्युतकी शरणमें गये। भगवान् विष्णु महान् चिन्ता
करते हुए भी किसी निश्चयपर नहीं पहुँचे ॥ ३३ ॥
तब उन्होंने स्त्रीका रूप धारण किया, जो सभी
स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ थी। उस स्त्रीरूपके द्वारा उन्होंने
दीर्घकालतक विरोचनको आनन्दित किया ॥ ३४ ॥
तदनन्तर कुत्सित बुद्धिवाला वह विरोचन जब उस
स्त्रीरूपके साथ रमण करनेको उद्यत हुआ, तो सुन्दर दाँतोंवाली
उस स्त्रीने कहा—भो [दैत्य] ! मेरी भी एक कामना है,
वह यह कि पहले तुम अपने शरीरमें तेलका अभ्यंग करो।
उसके बाद ही मेरे साथ रमण करो। उस स्त्रीका यह वचन
सुनकर कामासक्त विरोचनने वैसा ही किया ॥ ३५-३६ ॥
वह मुकुटको उतारकर सिरमें तेलकी मालिश करने
लगा। उसी समय उस मुकुटके सौ टुकड़े हो गये।
मुकुटके चूर्ण होनेके समान ही वह विरोचन भी (प्राप्त
वरदानके अनुसार) मुकुटकी गतिको प्राप्त हुआ ॥ ३७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विरोचनवधवर्णन' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥
तीसवाँ अध्याय
विष्णुभक्त राजा बलिका आख्यान, बलिके द्वारा सौवाँ अश्वमेधयज्ञ करनेपर इन्द्रका
चिन्तित होना तथा भगवान् विष्णुको अपनी चिन्ता निवेदित करना,
भगवान् विष्णुद्वारा अदितिके गर्भसे वामनरूपमें प्रकट होना
ब्रह्माजी बोले—बलि भगवान् विष्णुका भक्त था,
अतः उसे पिता विरोचनकी मृत्युपर कुछ भी सन्ताप नहीं
हुआ। बलि वेद तथा वेदांगोंका ज्ञाता, प्रतिभासम्पन्न
तथा सभी शास्त्रोंमें पारंगत था। वह परायी निन्दा, पराये
द्रव्य तथा परद्रोहसे सर्वथा पराङ्मुख था। वह दानी, यज्ञ
करनेवाला तथा माननीय जनोंका बड़े ही आदरके साथ
सम्मान करनेवाला था ॥ १-२ ॥
वह चलते हुए, बोलते हुए, सोते हुए, भोजन करते
हुए, बैठते हुए, जप करते हुए तथा पीते हुए—इस प्रकार
सभी समयोंमें अनन्य मनसे नित्य ही भगवान् विष्णुका
ध्यान किया करता था ॥ ३ ॥
एक बार बलिने शुक्राचार्यजीको बुलाकर यथाविधि
उनकी पूजा करके उनसे नीति-सम्बन्धी यह प्रश्न पूछा
कि हे प्राज्ञ ! इन्द्र अमरावतीका सुख-भोग करते हैं। फिर
क्यों नहीं अमरावतीके राज्यमें हमारा भाग है, जबकि इन्द्र
आदिके साथ हमारा निरन्तर भाईचारा है? मेरे इस संशयका
निवारण करनेमें आप पूर्णरूपसे समर्थ हैं ॥ ४-५ ॥
शुक्राचार्य बोले—हे महाभाग ! तुम्हारे पूर्वजोंने
इसी कारण निरन्तर देवताओंसे वैर किया था। देवताओंने
भगवान् विष्णुकी सहायता लेकर नाना प्रकारकी मायाका
आश्रय ग्रहणकर उन सभीका वध कर दिया था। अतः
तुम वैरभाव छोड़कर भलीभाँति सौ अश्वमेध यज्ञोंको
सम्पन्न करो। उस पुण्यबलके प्रभावसे तुम निश्चित ही
पूर्ण ऐन्द्रपदको प्राप्त कर लोगे ॥ ६-७१/२ ॥
बलि बोला—हे ब्रह्मन् ! आप नीतिशास्त्रमें अत्यन्त
कुशल हैं। आपने अच्छी बात बतायी है। साम, दान तथा
भेदनीतिको छोड़कर चौथी नीति निग्रह (दण्ड-युद्ध)-
को निकृष्ट माना गया है। चौथा वह उपाय दण्डनीति
भी पुण्यके प्रभावसे ही सफल हो पाता है, अतः [उसमें
भी] पुण्यको ही प्रबल माना गया है ॥ ८-९ ॥
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारका निश्चय करके
राजा बलिने वसिष्ठ आदि महर्षियोंको बुलाया और भृगु
आदि उन सभी मुनियोंकी पूजा करके उसने बहुत
प्रकारकी सामग्रियोंसे सम्पन्न होनेवाले तथा सभीको आनन्द
प्रदान करनेवाले श्रेष्ठ अश्वमेधयज्ञका प्रारम्भ किया।
उन सभी ऋषि-मुनियोंने [शास्त्रीय रीतिसे] पूर्व दिशाका
निर्धारण करके यज्ञकुण्डोंका निर्माण किया। सामग्रियोंका
संचयन करवाया और भूमिका शोधन करके वेदी तथा
३४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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मण्डप आदिका निर्माण कराया ॥ १०—१२॥
उन सभी ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन करके आभ्युदयिक
श्राद्ध (नान्दीश्राद्ध) तथा मातृकापूजन करनेके अनन्तर
विविध प्रकारके तत्तद् मन्त्रोंके द्वारा बड़े ही आदरभावपूर्वक
सभी मण्डप-देवताओंका स्थापन किया ॥ १३१/२ ॥
उस यज्ञमण्डपमें राजा बलि और उनकी धर्मपत्नी—
दोनों दम्पती श्वेत वस्त्रोंसे विभूषित एवं [अलंकारादिसे]
अलंकृत होकर सुशोभित हो रहे थे। सभी मन्त्रीगण,
राजपरिवारके मित्रगण तथा पुरवासी जनोंसे वे घिरे हुए
थे। नगरकी सम्मानित स्त्रियाँ झरोखोंसे उस महोत्सवको
देख रही थीं ॥ १४-१५ ॥
यज्ञके लिये वरण किये गये ब्रह्मा (यज्ञकी रक्षाके
लिये कुण्डके दक्षिण दिशामें स्थित रहनेवाले ब्राह्मण
आचार्य)-द्वारा अन्वारब्ध किये गये अर्थात् कुशसे स्पर्श
किये जाते हुए उन ब्राह्मणोंने यज्ञका पूर्वांग कर्म अर्थात्
पंचांग-पूजन आदि सम्पन्न किया। तदनन्तर उन्होंने
वेद-कल्पोंके वचनोंके अनुसार यज्ञीय पशुका आलभन
किया ॥ १६ ॥
तदनन्तर उन्होंने उन-उन देवताओंके निमित्त उनके
मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक आहुतियाँ प्रदान
कीं। चार द्वारोंवाले उस यज्ञमण्डपके परिसरके मार्गमें
तीनों वर्णोंके सभी लोग सम्मानित होकर बिना रोक-
टोकके आवागमन कर रहे थे। वहाँ एक ओर विद्वज्जनोंका
विवादपूर्वक शास्त्रार्थ चल रहा था ॥ १७-१८॥
कहीं अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और कहीं वैदिक
जन वेदमन्त्रोंका पाठ कर रहे थे। कहींपर शैव तथा
वैष्णव भक्त मृदंग तथा ताल-वादनके साथ गीतोंका गान
कर रहे थे। कहींपर ब्राह्मणजन अपनी इच्छाके अनुसार
छः रसोंसे युक्त व्यंजनोंका सेवन कर रहे थे और नाना
प्रकारकी कथाओंको कह रहे थे। जिसे सुनकर श्रोतागण
अत्यन्त आनन्दित हो रहे थे ॥ १९-२० ॥
इस प्रकारसे उस यज्ञके सम्पादित हो जानेपर
वसिष्ठ आदि महर्षियोंने अग्नियोंमें घृतकी विशाल धारा
(वसोर्धारा) डाली। तदनन्तर उत्तरंग कर्मोंके समापनके
पश्चात् उन दोनों दम्पती (बलि तथा उनकी पत्नी)-को
रथमें विराजमानकर अवभृथ स्नान (यज्ञान्तमें किया
जानेवाला स्नान) करानेके लिये सभी लोग साथमें गये।
उस समय नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि हो रही थी।
श्रेष्ठ बन्दीजनोंद्वारा स्तुतिगान हो रहा था। बहुत प्रकारसे
वेदध्वनियोंका उच्चारण हो रहा था तथा भगवान्को प्रिय
लगनेवाले सामोंका गायन हो रहा था ॥ २१-२३ ॥
स्नान करनेके अनन्तर वापस आकर राजा बलिने
भगवान् विष्णुका पूजन किया तथा उन वसिष्ठ आदि
महर्षियोंको अनेक प्रकारके रत्नसमुदाय, सम्पत्तियाँ,
अनेक वस्त्र, गौएँ, घोड़े, हाथी, विविध प्रकारके
सुगन्धित पदार्थ और इच्छापूर्ति करनेवाली वस्तुएँ प्रदानकर
सन्तुष्ट किया। इस प्रकारसे उन ब्राह्मणोंने राजा बलिके
निन्यानबे यज्ञ पूर्ण किये ॥ २४-२५ ॥
सौवाँ यज्ञ प्रारम्भ होनेपर देवराज इन्द्र अत्यन्त
चिन्तित हो उठे। अपना इन्द्रपद छीने जानेकी आशंकासे
वे इन्द्र क्षीरसागरके मध्य विराजमान रहनेवाले अपने
कनिष्ठ भ्राता (उपेन्द्र विष्णु) शेषशायी भगवान् विष्णुकी
शरणमें गये। उस समय उन विष्णुके चरणोंकी मैं ब्रह्मा
स्वयं सेवा कर रहा था। वे देवताओंद्वारा सेवित हो
रहे थे। वीणा हाथमें धारण करके देवर्षि नारद तुम्बुरु
आदि अन्य प्रमुख गन्धर्वों, अप्सरासमूहों तथा
किन्नरगणोंसहित बड़े ही आदरपूर्वक उनका गुणगान
कर रहे थे ॥ २६-२८ ॥
ऐसे उन भगवान् विष्णुका दर्शनकर इन्द्रने दोनों
हाथ जोड़कर अपने अभीप्सित कार्यकी सिद्धिके लिये
बड़े ही आदरभावसे उनकी स्तुति की ॥ २९ ॥
इन्द्र बोले—हे अनन्तशक्ति! आपको नमस्कार
है। विश्वके योनिस্বরূপ आपको नमस्कार है। विश्वका
भरण-पोषण करनेवालेको नमस्कार है। विश्वकी सृष्टि
करनेवालेको नमस्कार है, हे दैत्योंके विनाशक ! आपको
नमस्कार है। अनेक स्वरूपोंवाले आपको नमस्कार है।
भक्तोंके मनोभिलषित पदार्थोंको उन्हें प्रदान करनेवालेको
नित्य नमस्कार है ॥ ३० ॥
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे स्तुति करनेके अनन्तर
देवराज इन्द्रने बलिके द्वारा किये जा रहे सौवें अश्वमेध
यहाँ पृष्ठ पर अंकित सम्पूर्ण पाठ का पंक्तिवार लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
क्री०ख०-अ०३१ ] * पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना * ३४३
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[पूर्वार्ध - स्तम्भ १ (बायाँ)]
यज्ञके प्रयत्नके विषयमें बताते हुए कहा—विरोचनका
पुत्र बलि तीनों लोकोंमें विख्यात है॥ ३१॥
वह सौवाँ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न कर लेनेके
अनन्तर मेरे इन्द्रपदको ले लेगा। जब वे इतना कह ही
पाये थे कि भगवान् विष्णुने सब कुछ जान लिया ॥ ३२॥
तदनन्तर भगवान् विष्णुने इन्द्रके कष्टके विषयमें
चिन्ता करते हुए उनसे कहा—हे इन्द्र! राजा बलि मेरा
भक्त है। वह तपस्वी है तथा उसने अपनी इन्द्रियोंपर
विजय प्राप्त कर ली है। वेदवचनोंके अनुसार उसे
तपस्याके शुभ फलको प्राप्त करना चाहिये। शुभ या
अशुभ जो भी कर्म किया जाता है, वह निष्फल नहीं
होता ॥ ३३-३४ ॥
हे इन्द्र ! तुम अपना चित्त स्थिर करो। मैं तुम्हारा
कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा। तदनन्तर वे प्रभु देवी
अदितिके गर्भमें आये। देवी अदितिने नौवें मासमें शुभ
पुत्रको जन्म दिया। उस शिशुकी प्रभासे प्रसवगृहके वे
दीपक निष्प्रभ हो गये ॥ ३५-३६ ॥
बुद्धिमान् कश्यपजीने शीघ्र ही शीतल जलसे स्नान
करनेके अनन्तर स्वस्तिवाचनपूर्वक उस बालकका यथाविधि
जातकर्म-संस्कार किया। तदनन्तर मातृपूजन करनेके
अनन्तर नान्दीमुख श्राद्ध करके बालकको घृत तथा
[पूर्वार्ध - स्तम्भ २ (दायाँ)]
मधुका प्राशन कराकर उसको देखा ॥ ३७-३८ ॥
उस बालकको ह्रस्व किंतु प्रशस्त मस्तकवाला,
छोटे पैर, विशाल शरीरयुक्त एवं दिव्य ज्ञानसे समन्वित,
दिव्य देहवाला, चार भुजाओंवाला तथा विविध प्रकारके
अलंकरणोंसे समन्वित देखकर कश्यपजीने उसे साक्षात्
विष्णु समझकर उसको प्रणाम किया और आनन्दित
होकर कहा—आज मेरा तप, मेरा वंश, मेरे नेत्र, मेरा
ज्ञान तथा मेरा यह आश्रम धन्य हो गया है। आप
सच्चिदानन्द-स्वरूपका दर्शनकर आज यह धरती, स्वर्ग
और रसातल भी धन्य हो गया है ॥ ३९-४१ ॥
ब्रह्माजी बोले—महर्षि कश्यपके इस प्रकारके
वचनोंको सुनकर वे जगदीश्वर बोले—माता अदितिकी
तपस्यासे प्रसन्न होकर पृथिवीके महान् भारका हरण
करनेके लिये तथा बड़े भ्राता देवराज इन्द्रके कार्यको
सफल बनानेके लिये मैं आपके यहाँ पुत्ररूपमें प्रकट हुआ
हूँ। ऐसा कहकर वे सामान्य बालक बनकर रोने लगे और
उन्होंने माताके स्तनोंका पान किया ॥ ४२-४३ ॥
तदनन्तर कश्यपमुनिने उस बालकका नामकरण,
निष्क्रमण तथा अन्नप्राशन-संस्कार किया। तदुपरान्त
तीसरे वर्षमें चूडाकरण और पाँचवें वर्षमें यज्ञोपवीत-
संस्कार सम्पन्न किया ॥ ४४ ॥
[अध्याय समाप्ति एवं नवीन अध्याय शीर्षक]
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'वामनावतार-वर्णन' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥
——— ❖ ———
इकतीसवाँ अध्याय
पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना, वामनद्वारा गणेशकी
आराधना, गणेशका प्रकट होकर वामनको दर्शन और अनेक वर देना, वामनभगवान्द्वारा
बलिके यज्ञमें पधारना और तीन पग भूमिका दान प्राप्तकर अपने भक्त बलिको पाताल
भेजना, वामनद्वारा स्थापित सुमुख नामक गणेश-प्रतिमाका माहात्म्य
[उत्तरार्ध - स्तम्भ १ (बायाँ)]
ब्रह्माजी बोले—मुनि कश्यपजीने शिक्षा, कल्प,
निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष—इन षट् अंगोंके
साथ चारों वेदोंका अध्ययन बालक वामनको करवाया।
एक दिन वामनने अपने पिताजीसे पूछा—[हे तात !]
किस उपायके द्वारा देवताओं [-को उन]-के पदकी
प्राप्ति होगी और पृथ्वीके भारका हरण कैसे होगा? उसे
[उत्तरार्ध - स्तम्भ २ (दायाँ)]
आप मुझे यथार्थरूपसे बतलाइये ॥ १-२ ॥
कश्यप बोले—हे मेरे पुत्र! मैं तुम्हें गणेशजीके
षडक्षरमन्त्रका उपदेश प्रदान करूँगा, वह मन्त्र सिद्धि
प्रदान करनेवाला है और गणेशजीको प्रसन्न करनेवाला
है। जगत्की सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले, अनेक
ब्रह्माण्डोंकी संरचना करनेवाले तथा सभी कारणोंके भी
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
[शीर्षक एवं पृष्ठ संख्या]
३४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ]
कारणके महाकारणरूप उन विघ्नेश्वर गणेशजीके प्रसन्न
हो जानेपर सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, अतः तुम उन्हें
प्रसन्न करनेका यत्न करो ॥ ३-४ १/२ ॥
**ब्रह्माजी बोले—**ऐसा कहकर मुनि कश्यपने उन्हें
शुभ मुहूर्तमें गणेशजीका महामन्त्र प्रदान किया ॥ ५ ॥
उसी समय वे बालक वामन मुनि कश्यपको
प्रणामकर तथा उनसे आज्ञा प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक
तपस्याहेतु उस आश्रमसे चल पड़े ॥ ६ ॥
इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने विदर्भदेशमें
एक उत्तम स्थान देखा, जो लताओं तथा वृक्षोंसे घिरा
हुआ था और सरोवरसे सुशोभित था ॥ ७ ॥
वहाँ पद्मासनमें स्थित होकर बालक वामनने
निराहार तथा जितेन्द्रिय होकर संवत्सरपर्यन्त उस शुभ
षडक्षर मन्त्रका जप किया। उन बालक वामनकी वैसी
निर्वाणावस्था (मनोयोग) देखकर भगवान् गणेश सिद्धि-
बुद्धिके साथ प्रकट हुए। वे मयूरपर आरूढ़ थे तथा
लम्बी सूँड़से सुशोभित हो रहे थे ॥ ८-९ ॥
उनकी दस भुजाएँ शोभित हो रही थीं, वे रत्नोंकी
मालाओंसे विभूषित थे। उनकी नाभि विषधर सर्पसे
सुशोभित हो रही थी। वे नाना प्रकारके अलंकारोंसे
विभूषित थे ॥ १० ॥
दृढ़ निष्ठावाले अपने भक्तके पास वे उसी प्रकार
आये, जैसे कोई धेनु अपने बछड़ेके समीप आती है।
वामन अपने समक्ष अपने तेजसे सभी तेजोंको निष्प्रभ
बना देनेवाले, सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले तथा
सभी प्रकारके विघ्नोंका निवारण कर देनेवाले देवाधिदेव
भगवान् गजाननका दर्शनकर अत्यन्त भक्तिभावसे उनकी
स्तुति करने लगे ॥ ११-१२ ॥
**वामन बोले—**मैं उन विघ्नराजकी वन्दना करता
हूँ, जो स्वयं अव्यक्त हैं, किंतु (दृश्यमान जगत्के)
कारणरूप हैं, जिनके स्वरूपकी वेदोंद्वारा वन्दना की गयी
[दायाँ स्तम्भ]
है, जो सभी देवोंके अधिदेव हैं, अनन्त ब्रह्माण्डोंके
अधीश्वर हैं, जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं, सभी वेदान्तोंके
द्वारा वेद्य हैं, मायासे परे हैं, स्वसंवेद्य हैं, जगत्का पालन
तथा लय करनेवाले हैं, सभी विद्याओंके निधान हैं,
सर्वेश्वर हैं, सर्वरूप हैं, सभी प्रकारके भयोंका निवारण
करनेवाले हैं तथा जो सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले
हैं, जिनका स्वरूप अत्यन्त कमनीय है। नागोंके सहित
ब्रह्मा, शंकर तथा मुनिजनोंद्वारा जो नित्य सेवित होते
रहते हैं, जो तेजकी राशि हैं, तीनों कालोंमें विद्यमान
रहनेवाले सत्स्वरूप हैं, तीनों गुणोंसे रहित अर्थात्
गुणातीत हैं, तत्त्वमसि आदि महावाक्योंद्वारा बोध्य हैं,
अपने भक्तोंके इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं, अपने
भक्तोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं, तत्त्वज्ञानके प्रकाशक
हैं, साम्ब आदिके द्वारा स्तूयमान हैं और जो सभी
जीवोंके देहमें स्थित रहनेवाले तथा भुक्ति एवं मुक्तिको
प्रदान करनेवाले हैं* ॥ १३-१४ ॥
इस प्रकारसे स्तुति किये गये वे देवाधिदेव गजानन
प्रसन्न होकर वामनसे बोले—मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम्हारे
मनमें जो भी कामना हो, वैसा तुम वर माँगो। मैं तुम्हारी
तपस्या तथा इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर वह तुम्हें प्रदान
करूँगा ॥ १५ ॥
**वामन बोले—**हे जगदीश्वर! आपके यथार्थ
स्वरूपको ब्रह्मा आदि देवता तथा सनक-सनन्दन आदि
ब्रह्मर्षिगण भी नहीं जानते हैं, आज आपके उसी
स्वरूपका मुझे दर्शन हुआ है, फिर आपसे मैं अन्य
किसी दूसरे वरकी क्या याचना करूँ? ॥ १६ ॥
फिर भी आपका वचन भंग न हो, इस भयसे मैं
आपसे वर माँगता हूँ। हे नाथ! उसे आप मुझे प्रदान
करें। मुझे कभी भी पराजय प्राप्त न हो और सम्पूर्ण
कार्योंमें मुझे विघ्नका कोई भय न हो ॥ १७ ॥
राजा बलि यज्ञके प्रभावसे इन्द्रके पदको प्राप्त
[पाद-टिप्पणी (मूल संस्कृत श्लोक)]
* अव्यक्तं व्यक्तहेतुं निगमनुततनुं सर्वदेवाधिदेवं ब्रह्माण्डानांमधीशं जगदुदयकरं सर्ववेदान्तवेद्यम्।
मायातीतं स्ववेद्यं स्थितिविलयकरं सर्वविद्यानिधानं सर्वेशं सर्वरूपं सकलभयहरं कामदं कान्तरूपम् ॥
तं वन्दे विघ्नराजं विधिवरमुनिभिः सेव्यमानं सनागैः तेजोरार्शि त्रिसत्यं त्रिगुणविरहितं तत्त्वमस्यादिबोध्यम्।
भक्तेच्छोपात्तदेहं निजजनसुखदं तत्त्वबुद्धिप्रकाशं साम्बाद्यैः स्तूयमानं सकलतनुगतं भुक्तिमुक्तिप्रदं तम् ॥
(श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ३१।१३-१४)
क्री०ख०-अ०३१ ] * पिता कश्यपमुनिसे वामनको गणेशाराधनाका उपदेश प्राप्त होना * ३४५
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३४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण-
हे ब्रह्मन्! मैंने भूमि दे दी, [तब] संकल्प करवानेके | पदसे निवृत्त हो जानेके पश्चात् तुम ही उस पदको प्राप्त
लिये उद्यत वामनने राजा बलिसे कहा- संकल्प कीजिये। | करोगे। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता उन प्रभु भगवान्
उसी समय शुक्राचार्य दूसरा रूप धारणकर संकल्पजलकी | वामनकी स्तुति करने लगे ॥ ४१-४२ ॥
धाराको रोककर वैसे ही स्थित हो गये। तब राजा बलिने | देवताओंने उनके ऊपर पुष्पवर्षा की और वे विविध
उस जलपात्र (कमण्डलु)-की टोंटीके अन्दर एक | वाद्योंको बजाने लगे। उन सबने भगवान् वामनकी पूजा
तिनका प्रविष्ट कराया, जिससे भग्ननेत्र होकर शुक्राचार्य | की, उनके गीत गाये तथा दूसरे देवता नृत्य करने लगे।
बाहर निकल आये ॥ ३५-३६ ॥ | तदनन्तर अनन्त पराक्रमवाले वे वामन भगवान् अन्तर्धान
तब उन वामनके हाथमें बलिने संकल्पजल दिया। | हो गये। प्रसन्नमन होकर देवतागण जहाँसे आये थे,
आनन्दविभोर होते हुए वामनने भगवान् गणेशका स्मरण | वहाँ-वहाँ अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ४३-४४॥
किया और वे बढ़ने लगे। तदनन्तर अपने सिरसे | ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार देव वामनद्वारा स्थापित
स्वर्गलोकका अतिक्रमणकर उन्होंने एक पैरसे आकाश | की गयी भगवान् गणेशजीकी वह मूर्ति तीनों लोकोंमें
और पृथ्वीको तथा दूसरे पैरसे सभी पातालोंको नापकर | विख्यात हो गयी। वह मूर्ति मनुष्योंको सब प्रकारकी
तीसरा पग बलिके मस्तकपर रख दिया ॥ ३७-३८ ॥ | कामना प्रदान करनेवाली है॥ ४५ ॥
तब भगवान् वामन बलिसे बोले—तुम पाताललोकमें | इस प्रकार मैंने राजा बलिके द्वारा की गयी सभी
जाओ। तदनन्तर राजा बलिने उनसे कहा- आपको छोड़कर | चेष्टाओंका प्रसंगानुसार वर्णन किया। साथ ही भगवान्
मैं कैसे जाऊँ? राजा बलिका यह वचन सुनकर भगवान् | वामनके बुद्धिकौशल तथा चातुर्यका और सुमुख गजाननकी
वामन उनसे पुनः बोले- तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करनेके | महिमाका भी प्रतिपादन किया। उन महात्मा वामनने
लिये तुम्हें मेरा सान्निध्य वहाँ भी प्राप्त होगा ॥ ३९-४० ॥ | रेवानदीके दक्षिण भागमें स्थित अदोष नामक नगरमें दस
देवराज इन्द्र मेरी शरणमें आये थे, अतः मुझे | भुजाओंवाले उन सुमुख गजाननकी स्थापना की। अब
उनका प्रिय करना था। तुम मेरे भक्त हो, अतः इसके | मैं उन भगवान् विनायकको शमीके प्रिय होनेके विषयमें
अनन्तर तुम्हारा भी प्रिय होगा। देवराज इन्द्रके ऐन्द्र | स्पष्ट रूपसे आपसे वर्णन करूँगा ॥ ४६-४७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बलिचेष्टित' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥
बत्तीसवाँ अध्याय
गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य, राजा प्रियव्रतका आख्यान, उनकी
ज्येष्ठ पत्नी कीर्तिद्वारा गणेशजीकी आराधना
ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् व्यासजी ! आप सावधान | शमीपत्रको अर्पण करनेसे होती है ॥ २-३ ॥
होकर उस प्राचीन इतिहासको सुनिये, जिसे स्वयं | 'शमी' इस नामके उच्चारणमात्रसे ही वाणीद्वारा
भगवान् गणेशजीने प्रियव्रतसे कहा था ॥ १ ॥ | किया गया समस्त पाप नष्ट हो जाता है। शमीका स्मरण
गजानन बोले- हे आर्य! आप शमीपत्रकी महान् | करनेसे मानस पाप तथा उसका स्पर्श कर लेनेसे
फलप्रद महिमाको सुनिये। न यज्ञोंके द्वारा, न दानोंसे, न | शारीरिक पाप नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥
सैकड़ों-करोड़ व्रतोंसे, न जपोंसे अथवा न विविध | शमीका नित्य पूजन करनेसे, उसका ध्यान करनेसे
प्रकारके पूजनोंसे, न कमलपुष्पोंके अर्पणसे और न अन्य | तथा श्रद्धाभक्तिसे उसका वन्दन करनेसे निर्विघ्नता,
पुष्पोंसे मुझको वैसी सन्तुष्टि प्राप्त होती है, जैसी कि | आयुष्य तथा ज्ञानकी प्राप्ति होती है और पापका क्षय