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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

सत्तानबेवाँ अध्याय

५०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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सत्तानबेवाँ अध्याय
माता कद्रूका अपने पुत्र शेषनागके पास पातालमें जाना और विनता तथा गरुड़द्वारा हुए अपने
अपमानका बदला लेनेके लिये कहना, वासुकि आदि नागों तथा गरुड़ आदि पक्षियोंका
घनघोर युद्ध, नागोंद्वारा विनता और उनके पुत्रोंको बन्धनमें डालना, विनताद्वारा
मुनि कश्यपको अपना दुःख निवेदित करना और कश्यपद्वारा उसे
एक अभेद्य अण्डकी उत्पत्तिका आश्वासन देना
मुनि व्यास बोले—[हे ब्रह्मन् !] पहले आपने
मयूरेश्वर नामवाले देव विनायककी, तदनन्तर गुणेश
नामसे प्रसिद्ध उन विनायककी महिमा बतायी है ॥ १ ॥
हे विश्वकी सृष्टि करनेवाले विभो ! अब यह भी
मुझे बतानेकी कृपा करें कि उन विनायकने मयूरेश्वर नाम
कैसे प्राप्त किया और उन्होंने कौन-सा महान् कार्य
किया था ? ॥ २ ॥
ब्रह्माजी बोले—[हे मुनिवर व्यासजी !] उन
विनायकदेवने जिस प्रकार महान् कार्य किया और जैसे
उन्होंने 'मयूरेश्वर' यह नाम प्राप्त किया, वह सब मैं
आपको बतलाऊँगा ॥ ३ ॥
एक बारकी बात है, पातालभवनमें शेषनाग अपनी
अत्यन्त तेजोमयी और सुन्दर रूपवाली थीं। उन्होंने
मुक्तामणयोंसे जटिल अत्यन्त सुन्दर और शुभ उत्तरीय
वस्त्र धारण किया हुआ था ॥ ५ ॥
उनके ओष्ठ विम्बाफलके समान लालवर्णके थे,
उनका मुख चन्द्रमाके समान उज्ज्वल था और वे दिव्य
वस्त्र एवं आभूषणोंको धारण किये हुई थीं। उन माताका
दर्शन करके शेषनाग तथा वासुकि आदि जो प्रधान नाग
थे, उन्होंने माताको प्रणाम किया और कहा—हे माता !
बहुत दिनोंके बाद आपका दर्शन प्राप्त हुआ है, यहाँ
सभी नाग आपका निरन्तर दर्शन करना चाहते हैं, किंतु
आप अत्यन्त निष्ठुर हो गयी हैं ॥ ६-७ ॥
ऐसा कह करके उन्होंने माताका हाथ पकड़ा और
उन्हें पिताके लिये बनाये गये आसनपर बैठाया। अत्यन्त
भक्तिभावके साथ उनका पूजन किया, तदनन्तर शेषनाग
उनसे बोले ॥ ८ ॥
शेष बोले—हे माता ! आप तो उन महर्षि
कश्यपकी अत्यन्त सुन्दर एवं पतिपरायणा पत्नी हैं, जो
सभी विद्याओंके निधान हैं, सृष्टि-स्थिति तथा संहार
करनेवाले हैं और जिनके वास्तविक स्वरूपको ब्रह्मा
आदि देवता भी जाननेमें समर्थ नहीं हैं। आप भी उन्हींके
समान सहसा ही शाप देने तथा कृपा करनेमें समर्थ
हैं ॥ ९-१० ॥
हे माता! हम सभी आपके पुत्र हैं, जो तीनों
लोकोंको ग्रास बनानेका साहस रखते हैं, फिर आप किस
उद्देश्यको लेकर यहाँ चली आयी हैं ? ॥ ११ ॥
कद्रू बोलीं—हे पुत्र ! बिना प्रयोजनके कोई
भी किसीके पास नहीं आता। हे आत्मज ! मैं अपने
आनेका प्रयोजन बताऊँगी, तुम आदरभावसे उसका
सभाके मध्यमें विराजमान थे, उस समय वे चारों ओरसे
वासुकि आदि सर्पोंसे घिरे हुए थे ॥ ४ ॥
उसी समय वहाँ नागमाता कद्रू उपस्थित हुईं, वे

क्री०ख०-अ०१७] * माता कद्रूका अपने पुत्र शेषनागके पास पातालमें जाना * ५०३
श्रवण करो। हे पुत्र! विनता मेरी सौत है, जो पक्षियोंकी
माता है। एक बारकी बात है कि मुझे उसे देखनेकी
इच्छा हुई॥ १२-१३॥
मैं एकाएक उसके घर गयी तो उसने मेरा अपमान
किया। उसने न तो मुझे बैठनेके लिये आसन दिया, और
न ही कोई स्वागत-सत्कार किया॥ १४॥
पूर्व समयके वैरका स्मरण करते हुए उसने अपने
पुत्र जटायुको आदेश दिया। तदनुसार जटायुने मेरी
बालोंकी गूँथी हुई चोटीको खींचा और मुझे क्षणभरमें
ही वस्त्ररहित कर डाला॥ १५॥
वह मुझसे बोला, अरी महादुष्टे! तुम्हारा मुख
देखनेयोग्य नहीं है। पूर्वकालमें तुमने मेरी माताको अपनी
दासी बनाया था, तब उस समय तुम्हारे मनमें लेशमात्र
भी करुणा नहीं आयी, अरी महादुष्टे! तुम यहाँसे चली
जाओ, नहीं तो मैं तुम्हारे प्राण ले लूँगा॥ १६-१७॥
हे फणीश्वर! मैं उस जटायुके वचनोंको सुनकर
अत्यन्त दुखी हुई। मैंने तब अत्यन्त विलाप किया और
प्राणोंका त्याग करनेका निश्चय कर लिया॥ १८॥
अत्यन्त दुखी होनेके कारण ही मैं तुम लोगोंको
देखने तुम्हारे पास आयी हूँ, यदि तुम लोगोंकी मुझमें
भक्ति है तो मेरी सहायता करो॥ १९॥
हे श्रेष्ठ पुत्रो! यदि तुम लोग मुझे मानते हो तो
मेरी उस सपत्नी विनताका वध कर डालो, तभी मेरे
हृदयमें सुख होगा॥ २०॥
ब्रह्माजी बोले—माता कद्रूके इस प्रकारके वचनोंको
सुनकर शेषनाग सहसा वैसे ही रोषसमन्वित हो प्रज्वलित
हो उठे, जैसे कि अग्निमें घी पड़नेपर वह और भी
अधिक प्रदीप्त हो उठती है। 'यदि विनताके पुत्रोंने मेरी
माता कद्रूको पीड़ा पहुँचायी है, तो निश्चित ही मैं उसका
बदला लूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है'॥ २१-२२॥
ऐसा कहकर उन शेषनागने वासुकि आदि प्रमुख
नागोंके साथ वहाँ जानेका मन बनाया, जहाँ कि विनता
रह रही थी॥ २३॥
वासुकि बोला—हे निष्पाप! करोड़ों नागोंको
लेकर मैं वहाँ जाऊँगा और विनताको यहाँ ले आऊँगा।
हे नागराज! आप यहाँपर स्थित रहिये॥ २४॥
ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहनेके अनन्तर वासुकि
नाग शीघ्र ही विनताके आश्रमकी ओर निकल पड़ा।
असंख्य नागोंको देखकर उस समय विनता भयभीत हो
उठी। उसी क्षण दुष्ट स्वभाववाले क्रूर सर्पोंने उसे चारों
ओरसे लपेट लिया और वे उसे शेषनागके समीपमें ले
गये। उस समय वह विनता उन नागोंसे बोली॥ २५-२६॥
विनता बोली—अरे पापिष्ठो! तुम लोग मुझे
शीघ्र ही बतलाओ कि क्यों मुझे बन्धनमें डालकर ले
जाना चाहते हो, मैंने तो कोई अपराध भी नहीं किया
है? मेरे पुत्र गरुड़का स्वभाव तो सभी सर्पोंको विदित
ही है, अतः मुझे छोड़ दो, यदि ऐसा नहीं करोगे तो मेरा
वह पुत्र गरुड़ तुम्हारा संहार कर डालेगा॥ २७-२८॥
ब्रह्माजी बोले—उन सर्पोंकी धृष्टताको देखकर
उसने गरुड़का स्मरण किया। वह गरुड़ भी 'माताके
द्वारा मेरा स्मरण किया जा रहा है', यह जानकर
पक्षियोंके साथ वहाँ चला आया॥ २९॥
गरुड़के साथ बाज पक्षी, सम्पाति तथा पक्षिश्रेष्ठ
जटायु भी था, जिनके पंखोंकी हवासे तीनों लोक काँप
उठे। इधर वे सभी सर्प भी विषकणोंका वमन करने
लगे। उस समय नागराजों तथा पक्षियोंमें घनघोर युद्ध
होने लगा॥ ३०-३१॥
तदनन्तर वे नाग जटायु, सम्पाति तथा बाज पक्षीको
बन्धनमें डालकर ले गये। माताके द्वारा स्मरण किये
जानेपर वह गरुड़ भी अपने पंखोंकी हवासे सम्पूर्ण
जगत्‌को कँपाता हुआ तथा वृक्षों और पर्वतोंको गिराता
हुआ वहाँ आ पहुँचा। उसकी गन्धको सूँघकर सभी सर्प
भाग गये॥ ३२-३३॥
दूसरे सर्प गरुड़के पंखोंकी हवासे आकाशमें
चक्कर काटने लगे। विनता सर्पोंके बन्धनसे मुक्त हो
गयी और वह अपने स्थानपर जानेके लिये उत्सुक हो
उठी। विनताको जानेके लिये उद्यत देखकर वासुकि नाग
अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और आकाशको दग्ध करता हुआ

५०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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विष उगलने लगा। यह देखकर गरुड़ने उसे अपने | बाजको बलपूर्वक ले जाकर पातालके एक विवरमें
पंखोंके आघातसे जमीनपर पटक दिया॥ ३४-३५॥ | छिपाकर दृढ़तापूर्वक उस बिलको बन्द कर दिया
उस समय स्वस्थ होकर विनता बड़े वेगसे अपने | है॥ ४४॥
श्रेष्ठ स्थानको निकल पड़ी। वासुकि नागका वैसा | हे मुने! उनके बिना मेरे प्राण निश्चित ही चले
पराक्रम देखकर गरुडने सूक्ष्मरूप बना लिया और वह | जायेंगे। प्रभो! आप-जैसे स्वामीके होनेपर भी मैंने इतना
विनताकी रक्षाके लिये गया, उसके जानेपर वासुकि नाग | दुःख प्राप्त किया है॥ ४५॥
अत्यन्त क्रुद्ध हो गया तथा उसने संसारको जलाते हुए | ब्रह्माजी बोले-प्रिया विनताके इस प्रकारके
बहुत-सारा विष उगल डाला॥ ३६-३७॥ | वचनोंको सुनकर मुनि कश्यप उनसे बोले॥ ४५१/२ ॥
वह वासुकि नाग उन (जटायु आदि पक्षियों)- | मुनि बोले-हे कल्याणि! तुम चिन्ता मत करो,
को बन्धनमें डालकर शीघ्र ही नागलोकको ले गया | तुम्हारा मानसिक सन्ताप दूर हो जायगा। मैं तुम्हें
और उन्हें एक विवरमें छोड़ दिया। तदनन्तर उस | ऋतुदान प्रदान करूँगा, जिससे तुम्हें अन्य पुत्रकी प्राप्ति
विवरके द्वारको ढककर वह माता कद्रूके पास चला | हो जायगी। अण्डके रूपमें उत्पन्न तुम्हारा वह गर्भ
आया॥ ३८॥ | वज्रके द्वारा भी अभेद्य होगा, किंतु जब पार्वतीका पुत्र
वासुकि नागने वह सारा वृत्तान्त माता कद्रू तथा | खेल-खेलमें उस अण्डेका भेदन कर डाले, तभी तुम्हें
शेषनागको बताया। इधर विनता अपने उन पुत्रोंको | उस अण्डेमेंसे एक पुत्रकी प्राप्ति होगी॥ ४६-४७१/२ ॥
बाँधकर ले जानेका समाचार सुनकर अत्यन्त शोकमें पड़ | उसका कण्ठ नीले वर्णका होगा, वह बलवान्
गयी॥ ३९॥ | होगा और दूसरे नीलकण्ठ भगवान् शिवके समान होगा।
वे शीघ्र ही महर्षि कश्यपके पास गयीं और उन्हें | उसकी केवल शब्दध्वनिको सुनकर ही वे सभी सर्प
प्रणामकर इस प्रकार कहने लगीं- यह एक ऐसी ही | पराजित हो जायेंगे और गुणेश भी उस नीलकण्ठ पक्षीपर
विपरीत घटना हो गयी है, जो पश्चिमसे सूर्य उदय | सवार होकर पृथ्वीके भारका हरण करेंगे। तब तुम्हारे
होनेके समान है॥ ४०॥ | पुत्र भी नागोंके बन्धनसे मुक्त हो जायेंगे। ऐसा कहनेके
मैं घरमें स्थित थी, किंतु एकाएक ही शत्रु | अनन्तर एकान्तमें ले जाकर मुनि कश्यपने विनताको
वासुकि नागने मेरा हरण कर लिया। मुझे छुड़ानेके | ऋतुदान दिया॥ ४८-५०॥
लिये बाज, जटायु और सम्पाति मेरे पीछे-पीछे आये। | इसके पश्चात् वह विनता प्राणियोंसे रहित एक
उन्होंने अपने बल-पराक्रमसे उन सर्प-समूहोंको मारा, | काननमें चली गयी और यथासमय उसने एक अण्डको
परंतु हे मुने! बहुत-से सर्पोंके द्वारा शीघ्र ही उन | उत्पन्न किया, जो वज्र तथा पर्वतोंके प्रहारसे भी
बाज, जटायु तथा सम्पातिको पराजित कर दिये जानेपर | अभेद्य था॥ ५१॥
मैंने गरुड़का स्मरण किया। गरुड़ने वहाँ अणु (के | विनताने वृक्षके पत्तों तथा छालसे लपेटकर उस
समान सूक्ष्म)-रूपमें आकर उन सभी सर्पगणोंको जीतकर | अण्डेको एक मिट्टीके पात्रमें छिपा दिया और वह उस
मुझे उनके बन्धनसे मुक्त किया और वह स्वयं भी मेरे | पात्रके ऊपर उसी प्रकार बैठ गयी, जिस प्रकार कि
साथ वापस आया॥ ४१-४३॥ | भूमिमें गाड़े हुए द्रव्यके ऊपर कोई अत्यन्त बलवान् सर्प
तदनन्तर उस वासुकि नागने जटायु, सम्पाति तथा | बैठा रहता है॥ ५२॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरोपाख्यानमें अभेद्य अण्डकी उत्पत्तिका वर्णन'
नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९७॥