श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सतासीवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०८७ ] * वरदचतुर्थीव्रतका विधान * २५३
प्रारम्भ किस दिनसे किया जाता है, इस व्रतकी विधि | प्रसन्न हैं, तो सभी मानवोंके कल्याणके लिये तथा इस
क्या है, इसका फल क्या है और इस व्रतकी महिमाका | व्रतकी प्रसिद्धिके लिये यह सब मुझे पूर्ण रूपसे
किसे प्रत्यक्ष हुआ है? हे शंकर! यदि आप मुझपर | बताइये॥ २८-३०॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'स्कन्दोपाख्यान' नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८६॥
सतासीवाँ अध्याय
वरदचतुर्थीव्रतका विधान, शिवजीके उपदेशसे स्कन्दद्वारा वरदचतुर्थीव्रतका प्रत्यक्ष अनुष्ठान,
कार्तिकेयको लक्ष्यविनायक गणेशजीके दिव्य स्वरूपका दर्शन और अनेक वरदानोंकी प्राप्ति,
कार्तिकेयद्वारा लक्ष्यविनायक गणेशकी प्रतिमाकी स्थापना और तारकासुरका वध
शंकरजी बोले- [हे स्कन्द!] इस व्रतकी उत्तम
विधिको मैं तुम्हें बताता हूँ। श्रावणमासके शुक्लपक्षकी
चतुर्थीसे यह व्रत आरम्भ करना चाहिये॥ १॥
व्रतीको चाहिये कि व्रतके दिन प्रातःकाल तिल
और आँवलेके चूर्णका उबटन लगाकर स्नान करे।
क्रोधसे रहित होकर नित्य-नैमित्तिक सभी क्रियाओंको
सम्पन्न करे। तदनन्तर किसी पवित्र स्थानमें एक
मण्डपका निर्माण करे, जो केलेके स्तम्भसे सुसज्जित हो
तथा जो ईख, चामर एवं पुष्पोंसे सुशोभित हो और
दर्पणोंकी पंक्तिसे मण्डित हो॥ २-३॥
उस मण्डपके मध्य देशमें दो वस्त्रोंसे वेष्टित एक
कलशकी स्थापना करे और वहीं चन्दनसे आठ दलवाले
एक कमलकी रचना करे। तदनन्तर गुरुकी अनुमति लेकर
पूजाकी सामग्रीका (जलसे) प्रोक्षण करे और सोलह
उपचारोंके द्वारा गणनायक गणेशजीकी पूजा करे॥ ४-५॥
भगवान् गणेशकी प्रतिमा अपने-अपने सामर्थ्यके
अनुसार सुवर्णकी अथवा रजतकी बनवाये। इक्कीस
प्रकारके पक्वान्नोंको इक्कीस-इक्कीसकी संख्यामें बनाकर
भगवान् गजाननके लिये नैवेद्य निवेदित करे और इक्कीस
मुद्रा दक्षिणाके निमित्त प्रदान करे॥ ६-७॥
भगवान् गणेशके निमित्त दक्षिणारूपमें स्वर्णमुद्रा अथवा
रजतमुद्रा अर्पित करे, इसमें कृपणता न करे। इक्कीसकी
संख्यामें श्वेत अथवा हरित दूर्वा देवदेव गणेशजीको अर्पित
करे, तदनन्तर मन्त्रपूर्वक पुष्पांजलि प्रदान करे, इक्कीसकी
संख्यामें ही वेदज्ञ ब्राह्मणोंका पूजन करे॥ ८-९॥
ब्राह्मणोंको इक्कीस प्रकारके ही पक्वान्नोंका भोजन
कराये और उतनी ही संख्यामें उन्हें दान दे। तदनन्तर
उन्हें प्रणाम करे और उनसे क्षमा-याचना करे। अन्तमें
(व्रतकी न्यूनांगतापूर्तिके लिये) उनसे अच्छिद्रवाचन
कराये। गणेशजीकी पार्थिवपूजाकी विधिको पूर्वमें बतलाया
गया है, उसी विधि-विधानसे यहाँ भी पूजा करनी
चाहिये। तदनन्तर गणेशजीका ध्यान करते हुए बन्धु-
बान्धवोंके साथ स्वयं भी गणेशजीकी उस कथाका
श्रवण करे और फिर भोजन करे अथवा मौन रहकर
उपवास करे॥ १०-१२॥
इस प्रकार श्रावणमासकी चतुर्थीसे भाद्रपदमासकी
शुक्लपक्षकी चतुर्थीतक एक मासभर व्रत करे। भाद्रपद
चतुर्थीको अपनी शक्तिके अनुसार बड़े ही श्रद्धापूर्वक
महान् उत्सव मनाये॥ १३॥
उस दिन पूर्वोक्त विधानके अनुसार गणनायक
गणेशजीका पूजन करे। रात्रिमें गीत-वाद्यों आदिकी
ध्वनियोंसे जागरण करे। साथ ही पुराण तथा अन्य श्रेष्ठ
कथाओंका श्रवण करना चाहिये और गणेशजीके सहस्र-
नाममन्त्रोंसे उनकी स्तुति करे॥ १४-१५॥
प्रभातकालमें पवित्र जलमें स्नान करके द्विरदानन
गणेशजीका पूजन करे तथा श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एक सौ
इक्कीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये॥ १६॥
यथाशक्ति उन्हें गाय, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण
तथा धन प्रदान करे। दीनों, अन्धों तथा अनाथोंको भी
भोजन-धन आदि प्रदान करे॥ १७॥
२५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
यदि इतना सामर्थ्य न हो तो इक्कीस ब्राह्मणों
अथवा फिर एक ही ब्राह्मणको भोजन कराये। यदि
गणेशजीकी स्वर्ण आदि धातुकी मूर्ति बनवायी हो, तो
उसे ब्राह्मणको प्रदान कर देना चाहिये। यदि गणेशजीकी
प्रतिमा मिट्टीकी बनायी गयी हो; तो उसे पालकीमें
रखकर दिव्य वाद्योंकी ध्वनिके साथ बड़े ही उत्साहपूर्वक
जलके मध्यमें विसर्जित कर देना चाहिये ॥ १८-१९ ॥
उस प्रतिमाको ध्वज, पताका आदिसे आच्छादित
करके, वेदोंके घोष तथा गीतोंकी ध्वनियों और बालकोंके
दण्डयुद्धरूप क्रीड़ा-कौतुकके साथ विसर्जित करके
वापस घर आना चाहिये ॥ २० ॥
हे षडानन ! जो इस प्रकारसे एक बार भी गणेशजीका
व्रत करता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्तकर अन्तमें
गणेशजीके लोकको प्राप्त करता है ॥ २१ ॥
ब्रह्माजीने सृष्टि-रचनाकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये
भगवान् गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका जप करते हुए यह
व्रत किया था। तब गणेशजीने उनके सामने प्रकट होकर
उन्हें विविध प्रकारकी शक्ति प्रदान की थी ॥ २२ ॥
भगवान् विष्णुने भी सृष्टिका पालन-पोषण करनेके
लिये इस व्रतको किया था और परम अद्भुत षडक्षर
महामन्त्रका जप किया था ॥ २३ ॥
हे षडानन ! इस व्रतके प्रभावसे उन्होंने स्वेच्छापूर्वक
अवतार धारण करनेकी क्षमता प्राप्त की थी। हे पुत्र !
मैंने भी गणेशजीके अष्टाक्षर मन्त्रका जप करते हुए इस
व्रतको किया था ॥ २४ ॥
इससे मैं विविध प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न हो गया
और उसी शक्ति-सामर्थ्यसे मैं तीनों लोकोंका संहार करता
हूँ। वृत्रासुरका विनाश करनेके लिये देवराज इन्द्रने तथा
दैत्य शम्बरासुरका वध करनेके लिये कामदेवावतार प्रद्युम्नने
इस व्रतको किया था। इसी कारण वे दोनों उन दोनोंका
वध करनेमें समर्थ हुए। यक्षों, गन्धर्वों, मुनियों, किन्नरों,
नागों, राक्षसों, सिद्धों, चारणों तथा मानवोंने अपने-अपने
इष्टकी सिद्धिके लिये इस व्रतको किया था। अतः हे
स्कन्द ! तुम भी इस चतुर्थी व्रतको करो ॥ २५-२७ ॥
इससे तुम युद्धमें अजेय हो जाओगे और तीनों
लोकोंमें तुम्हारी प्रसिद्धि हो जायगी। मैं वरदाता गणेशजीका
षडक्षर मन्त्र तुम्हें प्रदान करता हूँ ॥ २८ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे द्विजोत्तम ! तदनन्तर शुभ
मुहूर्तमें भगवान् शिवने उन्हें षडक्षरी दीक्षा प्रदान की
और वे स्कन्द उसी समय तपस्याके लिये निकल पड़े।
वे एक ऐसे अत्यन्त निर्मल स्थानमें गये, जो वृक्षों तथा
लताओंसे व्याप्त था, बहुतसे मूलवाले तथा फलवाले
वृक्षोंसे समन्वित था और अनेक सरोवरों तथा वापियोंसे
सुशोभित था ॥ २९-३० ॥
स्कन्दजीने एक पैरपर खड़े होकर अत्यन्त दारुण
तप किया और भगवान् शंकरने पूर्वमें जो व्रत बताया था,
उसका विधिवत् पालन किया। तब षडक्षर मन्त्रके
अनुष्ठान तथा इस वरदचतुर्थी व्रतके प्रभावसे परमात्मा
गजानन उनपर अति प्रसन्न हो गये ॥ ३१-३२ ॥
तदनन्तर गणेशजीने सेनानी कार्तिकेयको अपने उस
अत्यन्त श्रेष्ठ स्वरूपका दर्शन दिया, जो योगियोंके द्वारा
ध्यान करनेयोग्य था, महान् तेजस्वी था, चार हाथोंसे
सुशोभित था, महान् मुकुटसे अलंकृत हो रहा था,
कुण्डलों तथा बाजूबन्दोंसे मण्डित था। भगवान् गणेशके
एक दाँत था, माथेपर चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था,
उनकी लम्बी सूँड सुशोभित हो रही थी। वे अपने हाथोंमें
पाश, अंकुश, माला तथा दाँतको धारणकर सुशोभित हो
रहे थे। मोती तथा मणियोंको धारण किये हुए थे।
उदरदेशमें नागराजको धारण किये थे। उन्होंने दिव्य
वस्त्रोंका परिधान धारण किया हुआ था, दिव्य सुगन्धित
द्रव्योंका अनुलेप लगाया हुआ था, वे भगवान् गणेश
अनेकों सूर्योंके सदृश आभासे देदीप्यमान हो रहे थे और
तेजकी ज्वालासे आभासित थे ॥ ३३-३६ ॥
ऐसे स्वरूपका दर्शनकर वे षण्मुख कार्तिकेय
आश्चर्यचकित और विस्फारित नेत्रोंवाले हो गये। उनका
चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा और 'यह क्या है'-
इस प्रकारसे वे सोचने लगे। मैंने जिनका ध्यान किया
था, क्या ये वे ही हैं या और कोई। मैं इन्हें नहीं जान
पा रहा हूँ, ये कौन हैं। तब उन्होंने धीरेसे पूछा- 'आप
कौन हैं और आपका नाम क्या है ?' ॥ ३७-३८ ॥
गजानन बोले- हे षडानन ! जिनका तुम एकाग्र
मनसे रात-दिन ध्यान किया करते थे, वही मैं तुम्हें वर
उ०ख०-अ०८७] * वरदचतुर्थीव्रतका विधान * २५५
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देनेके लिये प्रस्तुत हुआ हूँ, तुम्हारे हृदयमें जो इच्छा हो,
उसे बताओ, मैं गजानन गणेश तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न
हूँ और तुम्हें यथेष्ट वर देता हूँ॥ ३९॥
स्कन्द बोले- हे जगदीश्वर ! आपके जिस यथार्थ
स्वरूपको न देवता जानते हैं, न शास्त्रकार मुनिगण, न
ब्रह्मा आदि देवता और न ही शेषनाग आदि प्रमुख नाग;
हे द्विरदानन ! उसी स्वरूपका आज मुझे सम्यक् रूपसे
दर्शन प्राप्त हुआ है॥ ४० ॥
आपके दर्शन हो जानेसे ही आज मैं पूर्ण मनोरथवाला
हो गया हूँ। हे देव ! फिर भी आपके कथनके अनुसार
आपसे यह याचना करता हूँ कि कभी भी मेरी पराजय
न हो और मेरे द्वारा आपका ध्यान किये जानेपर आप
मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दें॥ ४१ ॥
[हे प्रभो !] आपके चरणारविन्दोंका कभी भी मुझे
विस्मरण न हो और सभी देवताओंमें मुझे श्रेष्ठता प्राप्त
हो। अलक्ष्य अर्थात् अदर्शनीय होनेपर भी मुझे आज
आपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है, इसलिये आप लक्ष्य
विनायक नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त करें और अपने
भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेके लिये आप कल्पवृक्षके
समान बनें ॥ ४२-४३॥
लक्ष्यविनायक बोले- हे स्कन्द ! वह सब कुछ
पूर्ण होगा, जो आज तुमने मुझसे प्रार्थना की है। कभी
भी तुम्हें मेरा विस्मरण नहीं होगा। जब-जब तुम मेरा
ध्यान करोगे, तब-तब तुम मेरा सान्निध्य प्राप्त करोगे।
तुम्हारे शत्रुओंकी पराजय होगी और तुम देवताओंमें
श्रेष्ठ पद प्राप्त करोगे ॥ ४४१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार स्कन्दजीकी नम्रता
और उनकी तपस्याके प्रभावसे प्रसन्न होकर देव गणेशजीने
उन्हें माँगे गये सभी वरोंको और अपना निजी वाहन
'मयूर' भी प्रदान किया। तभीसे स्कन्दका 'मयूरध्वज'
यह नाम भी प्रसिद्ध हो गया ॥ ४५-४६ ॥
गजानन बोले- तुम्हारे हाथों तारक आदि महान्
असुर मृत्युको प्राप्त करेंगे। हे अनघ ! मैं तुम्हारे
कथनानुसार भक्तवत्सलके रूपमें लक्ष्यविनायक इस नामसे
चिरकालतक इस क्षेत्रमें निवास करूँगा ॥ ४७१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर विकट नामवाले वे
गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर स्कन्दने ब्राह्मणोंके
साथ वहाँ गणेशजीकी महान् मूर्तिको स्थापित किया
और उस समय उन्होंने उस मूर्तिका 'लक्ष्यविनायक' यह
मंगलमय नाम रखा। उन्होंने एक लाख मोदकों, उतने
ही पुष्पों एवं उतने ही दूर्वांकुरों तथा उन-उन प्रकारकी
विविध वस्तुओंसे उस मूर्तिकी पूजा की और उतनी ही
संख्यामें अर्थात् एक लाख ब्राह्मणोंको भोजन कराया।
तदुपरान्त उन लक्ष्यविनायकका स्तवन करके और उन्हें
प्रणाम करके स्कन्द मयूरपर आरूढ़ होकर लोगोंका
कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरके समीप गये और
उनको वह सारा वृत्तान्त बतलाया तथा गणेशजीद्वारा
किया गया अपना 'मयूरध्वज' नाम भी उनको
बतलाया ॥ ४८-५२ ॥
तदनन्तर भगवान् शिवकी अनुमति पाकर और उनका
आशीर्वाद ग्रहणकर एवं भगवान् गजाननका स्मरणकर
स्कन्द तारकासुरके विनाशके लिये चल पड़े। देवताओं
तथा ऋषियोंने उन्हें देवसेनापतिके पदपर अभिषिक्त किया।
तदनन्तर महान् पराक्रमशाली सेनानी कार्तिकेयने तारकासुरको
देखकर उसके साथ युद्ध किया ॥ ५३-५४ ॥
एक लाख वर्षतक युद्ध करनेके अनन्तर उन्होंने
अपनी शक्तिके प्रहारसे उसे मार डाला। शेषनागमें भी
उस युद्धका वर्णन करनेकी सामर्थ्य नहीं है ॥ ५५ ॥
२५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
तारकासुरके मारे जानेपर सभी देवता, मुनिगण,
लोकपाल, नाग तथा सभी मनुष्य प्रसन्न हो गये।
आनन्दित होकर उन्होंने स्कन्दके ऊपर फूलोंकी वर्षा
की। तदनन्तर सभी देवता तथा सभी लोग अपने-अपने
निवास-स्थानोंको चले गये और वे पहलेके समान ही
यज्ञ-यागादि, श्राद्धादि पितृकर्म तथा अतिथिपूजन आदि
करने लगे ॥ ५६-५७१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] मैंने गणेशजीकी
इस प्रकारकी अद्भुत महिमाको आपसे कहा। उनके
व्रतकी महिमाको भी यथार्थ रूपमें आपको बतलाया,
गणेशजीके इस वरदचतुर्थीव्रतके प्रभावसे ही स्कन्दने
तैंतीस करोड़ देवताओंसे भी अवध्य उस महान् असुर
तारकको युद्धमें मार गिराया। इसी कारण वे स्कन्द इन्द्र
आदि देवताओंके लिये भी पूज्य बन गये ॥ ५८-६० ॥
व्यासजी बोले- हे प्रजापते! उन कार्तिकेयने
महान् समाधिमें स्थित होकर किस स्थानपर अनुष्ठान
किया था, उसे आप मुझे बतायें ॥ ६१ ॥
ब्रह्माजी बोले- जहाँपर घृष्णेश्वर नामक भगवान्
शंकर विराजमान हैं, उसी स्थानपर स्कन्दने अनुष्ठान
किया था। स्कन्दद्वारा वहाँपर स्थापित गणेश लक्ष्यविनायक
नामसे प्रसिद्ध हो गये ॥ ६२ ॥
उसी नगरमें बादमें अत्यन्त विख्यात एल नामक
राजा हुए। हे मुने! उन्हींके नामसे बादमें वह नगर भी
एलनगर* के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ६३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'तारकवधका वर्णन' नामक सतासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥
अठासीवाँ अध्याय
कामदेवके दग्ध किये जानेपर कामपत्नी रतिद्वारा भगवान् शिवकी प्रार्थना, प्रसन्न होकर
शिवद्वारा उसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति तथा कामदेवके सदेह होनेका वरदान दिया जाना,
कामदेवद्वारा गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका अनुष्ठान तथा गणेशजीकी आराधना
मुनि बोले- हे ब्रह्मन्! मैंने गणेशजीके व्रतसे
सम्बद्ध आख्यानको सुना, यदि उन भगवान् शंकरने
अपनी क्रोधाग्निसे कामदेवको भस्म कर डाला, तो फिर
वह कामदेव आज भी सभी लोगोंमें व्याप्त कैसे दिखायी
देता है? हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! यह सब मुझे विस्तारसे
बतलाइये ॥ १-२ ॥
ब्रह्माजी बोले- जब भगवान् शंकरने रुष्ट होकर
अपना तीसरा नेत्र खोला था, तब अपने पति कामदेवका
अपराध जानकर कामपत्नी रति मृत कामदेवके निमित्त
विलाप करती हुई भगवान् शंकरके पास पहुँची और
उन्हें साष्टांग प्रणामकर अपनी बुद्धिके अनुसार उनकी
स्तुति करने लगी ॥ ३-४ ॥
रति बोली- मैं देवी पार्वतीके स्वामी तथा मस्तकमें
तीसरा नेत्र धारण करनेवाले उन भगवान् वृषध्वजको
प्रणाम करती हूँ, जो सत्त्वगुणका आश्रय लेकर समस्त
जगत्का पालन करते हैं और रजोगुणसे सम्पन्न होकर
समस्त लोकोंकी सृष्टि करते हैं ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी वे महेश्वर तमोगुणसे
आविष्ट शरीर धारणकर अपनी इच्छासे जगत्का संहार
करते हैं। जो हाथमें कपाल धारण करते हैं और भिक्षा
ग्रहणकर भी लोगोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करते
हैं। जो भगवान् शिव स्वेच्छासे सब कुछ करने, कुछ
भी न करने तथा कुछका कुछ करनेका सामर्थ्य
रखनेवाले हैं और महान् पराक्रमसे सम्पन्न हैं; दीनोंपर
अनुग्रह करनेवाले ऐसे वे महेश्वर शिव पतिसे हीन मुझ
अबलाको शरण प्रदान करें ॥ ६-७ ॥
वे भगवान् शिव शीघ्र ही मेरे मृत पतिको जीवनदान
दे करके शरणमें आयी हुई मुझको सौभाग्यशाली बनायें,
यदि ऐसा नहीं होता है, तो हे ईश! मैं अपने प्राणोंका
त्याग करके आपकी कीर्तिको अपकीर्तिमें बदल दूँगी ॥ ८ ॥
*एलनगरका प्राचीन नाम 'एलारपुरक्षेत्र' है। यह वर्तमानमें महाराष्ट्र-प्रान्तके औरंगाबाद जिलेमें स्थित है। इसका नाम बेरोल या बेरूल है।
घृष्णेश्वर (घुश्मेश्वर) ज्योतिर्लिंग यहीं है। उसी मन्दिरमें गणेशजीकी भी मूर्ति है।
उ०ख०-अ०८८ ] * कामदेवके दग्ध किये जानेपर कामपत्नी रतिद्वारा भगवान् शिवकी प्रार्थना * २५७
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(बायाँ स्तम्भ)
ब्रह्माजी बोले—रतिके द्वारा इस प्रकारसे
स्तुत हुए भगवान् शिव उसपर प्रसन्न हो गये और
बोले— ॥ ८१/२ ॥
शम्भु बोले—सुन्दर मुखमण्डलवाली हे कामदेवकी
पत्नी ! हे महाभागे ! तुम वर माँगो। तुम्हारी इस स्तुतिसे
प्रसन्न होकर तुम्हारे मनमें विद्यमान जो-जो कामनाएँ हैं,
मैं उन सभीको देता हूँ॥ ९१/२ ॥
भगवान् शिवके इस प्रकारके वचनको सुनकर रति
अत्यन्त प्रसन्न हो गयी। उसने उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर
सौभाग्यकी अभिलाषा करनेवाली वह रति अत्यन्त व्याकुल
होकर उन भगवान् शिवसे बोली— ॥ १०१/२ ॥
रति बोली—हे स्वामिन् ! यदि आप प्रसन्न हैं, तो
मेरे श्रेष्ठ वचनको सुनें। हे त्रिलोचन ! यद्यपि पृथ्वी,
आकाश तथा पातालमें भी स्त्रियोंमें कामिनियोंके गुण
होते हैं, किंतु उन सबमें किसीमें भी मेरे लावण्यके तुल्य
लावण्य लेशमात्र भी नहीं है ॥ ११-१२ ॥
मुझे देखकर इन्द्र आदि देवताओंने भी लज्जारहित
होकर अपने तेजका परित्याग कर दिया था। उससे
मुझे महान् लज्जा उत्पन्न हो गयी थी, उस लज्जाको
आप दूर कर दें। हे शंकर ! मेरे पति कामदेवके न
रहनेपर मेरा सौन्दर्य सर्वथा निष्प्रयोजन हो गया है।
'कामपत्नी रति विधवा हो गयी है' इस प्रकारकी
(दायाँ स्तम्भ)
अपकीर्ति मुझे जला डाल रही है ॥ १३-१४॥
हे देवेश ! हे दयानिधे ! मुझे पतिका दानकर मेरी
रक्षा कीजिये। इस प्रकारसे उस रतिके द्वारा प्रार्थना किये
जानेपर लोगोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकर
कामदेवकी पत्नी रतिको आनन्दित करते हुए स्निग्ध
वाणीमें बोले ॥ १५१/२ ॥
शिव बोले—हे कल्याणि ! तुम चिन्ता मत करो
और अब लज्जा भी मत करो। हे बाले ! तुम्हारे द्वारा
स्मरणमात्र किये जानेपर वे कामदेव तुम्हें दर्शन देंगे।
मनसे चिन्तित किये जानेपर भी वे तुम्हारे पास आ
जायँगे। इसी कारण 'मनोभू' उनका यह नाम प्रसिद्ध
होगा ॥ १६-१७ ॥
कामदेव तुम्हारे सभी मनोरथोंको पूर्ण करेंगे और
तुम सर्वत्र मान्य हो जाओगी। जब वे भगवान् विष्णुके
द्वारा देवी लक्ष्मीसे उत्पन्न होंगे, तब प्रद्युम्न नामसे तुम्हारे
पतिके रूपमें लोगोंमें प्रसिद्ध होंगे। हे महाभागे ! इस
समय तुम अपने घर लौट जाओ ॥ १८-१९ ॥
शिवकी आज्ञा मानकर वह रति अपने अत्यन्त
सुन्दर भवनमें आ गयी। वहाँ आकर उसने अपने पतिका
स्मरण किया, तो वे अनंग उसके समक्ष प्रकट हो गये।
ईश्वरकी इच्छासे ही वे अनंग उसके सामने प्रत्यक्ष प्रकट
हुए, तब आश्चर्यचकित वह रति अपने पतिके साथ
अत्यन्त आनन्दित हो गयी। तदनन्तर वे अनंग भगवान्
शिवके पास गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार
कहने लगे— ॥ २०-२११/२ ॥
अनंग बोले—हे देवेश्वर ! बिना अपराधके ही मुझे
आपने अनंग (बिना देहवाला) क्यों बना दिया ? ॥ २२ ॥
हे विभो ! आपसे ही स्कन्दकी उत्पत्ति होगी—ऐसा
जाननेवाले एवं तारकासुरद्वारा पीड़ित इन्द्रादि देवताओं
तथा मुनियोंने ही आपकी तपस्याको भंग करनेके लिये
मुझसे कहा था। इसीलिये मैंने सभीका उपकार करनेकी
दृष्टिसे वैसा कर्म किया था ॥ २३-२४ ॥
तीनों लोकोंमें परोपकारके समान दूसरा कोई पुण्य
नहीं है। हे सुरेश्वर ! मेरे लिये वह सब मेरे दुर्भाग्यके
कारण विपरीत ही हुआ ॥ २५ ॥
२५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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आजसे पहले तैंतीस करोड़ देवताओंमें मैं ही सबसे
अधिक सुन्दर था और सभीके द्वारा सुन्दर पुरुषकी उपमा
मुझसे ही दी जाती रही है। हे देवेश ! अपने शरीरसे
रहित मैं प्रेतकी भाँति कैसे रहूँ? अतः हे महादेव ! कृपा
करके आप मुझपर अनुग्रह करें ॥ २६-२७ ॥
ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर प्रणाम करनेवाले उन
अनंगको भगवान् शिवने गणेशजीका एकाक्षर मन्त्र
प्रदान किया और उसका अनुष्ठान करनेके लिये उन्हें
आज्ञा प्रदान की। तदनन्तर अनंग एक रमणीय जनस्थानमें
गये, वह स्थान सब प्रकारकी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला
था। भगवान् शंकरजीकी आज्ञासे अनंगने वहाँ अनुष्ठान
किया। उन्होंने गणेशजीके ध्यानपरायण होकर उनके
एकाक्षर मन्त्रका जप करते हुए सौ वर्षपर्यन्त महान् तप
किया ॥ २८-३० ॥
रतिके साथ [वहाँ] स्थित वे नित्य वायुका ही
आहार करते थे। तदनन्तर देवदेवेश भगवान् गजानन
उनपर प्रसन्न हो गये और उनके समक्ष प्रकट हो गये।
उनकी दस भुजाएँ थीं, वे श्रेष्ठ मुकुटसे सुशोभित थे,
देदीप्यमान रत्नोंकी आभासे रमणीय, कुण्डलों और
बाजूबन्दोंसे वे मण्डित थे, करोड़ों सूर्योंके समान उनकी
आभा थी, मोतियोंकी मालाओंसे वे सुशोभित हो रहे थे,
उन्होंने दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण कर रखे थे, दिव्य
गन्धोंका अनुलेपन किया हुआ था, उनकी सूँड़ तथा
उनका मुखमण्डल सिन्दूरके समान अरुण वर्णका था।
दस आयुधवाले उनके दस हाथ सुशोभित हो रहे थे,
उनकी नाभि शेषनागसे अलंकृत थी, विविध प्रकारके
अलंकारोंसे वे सुशोभित हो रहे थे, उनके कन्धे सिंहके
समान थे, वे महान् समृद्धिसे सम्पन्न तथा अपनी
चीत्कार ध्वनिसे अखिल लोकोंको त्रास पहुँचानेवाले
थे ॥ ३१-३४ १/२ ॥
भगवान् गणेशजीके प्रकट हो जानेपर इन्द्र आदि
देवता, सभी मुनिगण, अप्सराओं, यक्षों, गन्धर्वों तथा
किन्नरोंके साथ वहाँ आये और दिव्य वाद्योंकी ध्वनि
करते हुए उन सबने पृथक्-पृथक् होकर सोलह उपचारोंके
द्वारा भगवान् गणेशजीकी पूजा की ॥ ३५-३६ १/२ ॥
तदनन्तर उठकर कामदेवने सर्वप्रथम सभी देवताओंको
प्रणाम करके उनके चरणोंमें वन्दना की, इसी प्रकार मुनियोंको
भी उन्होंने प्रणाम किया। तदनन्तर कृपालु भगवान्
गणेशकी महिमाका वे गान करने लगे ॥ ३७-३८ ॥
काम बोले—हे भक्तवत्सल ! आप धन्य हैं। सभी
देवताओंमें आप परब्रह्मस्वरूप हैं। आप निराकार होनेपर
भी साकाररूपमें प्रकट हुए हैं ॥ ३९ ॥
आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया है। मेरी
तपस्या भी आज धन्यतर हो गयी है, जो कि सभी
दुःखोंका मोचन करनेवाले आपके युगल-चरणोंका
आज मुझे दर्शन हुआ है ॥ ४० ॥
आपका दर्शन सभी सिद्धियोंका कारण और धर्म,
अर्थ, काम तथा मोक्ष इस चतुर्विध पुरुषार्थको देनेवाला
है। आज मेरे दोनों नेत्र धन्य हो गये हैं, जिन्होंने परम
पुरुष परमात्माका दर्शन किया है ॥ ४१ ॥
जिनके यथार्थ स्वरूपको न वेदान्तदर्शनके विद्वान्
जानते हैं, न सांख्यदर्शनके मनीषी और न योगदर्शनकार
महर्षि पतंजलि आदि ही जानते हैं। वे 'नेति-नेति'
कहकर मौन हो जाते हैं। जिनके स्वरूप-निर्धारणमें वेद
भी कुण्ठित हो जाता है। जिन अखिलेश्वरके एक-एक
रोम-कूपमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं, उन प्रभु
गणेशजीका मैंने जिस मन्त्रके प्रभावसे दर्शन किया है,
वह मन्त्र भी अत्यन्त धन्य है ॥ ४२-४३ ॥
गणेशजी बोले—हे रतिपते ! तुमने ठीक ही कहा
है, ब्रह्मा आदि देवता भी मुझे नहीं जानते हैं। जब मैं
साकार रूप धारण करता हूँ, तब वे मुझे जान पाते हैं ॥ ४४ ॥
हे काम ! मैं तुम्हारी तपस्या और मन्त्रानुष्ठानसे प्रसन्न
हुआ हूँ, इसी कारण इस समय तुमने मेरे अनुग्रहसे ही मेरा
दर्शन किया है। हे काम ! मुझसे तुम सम्पूर्ण मनोरथोंको माँग
लो, मैं तुम्हें इच्छित वर प्रदान करता हूँ ॥ ४५ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—भगवान् गणेशका ऐसा वचन सुनकर
मनोभव कामदेव उनसे पुनः बोले और भगवान् शिवद्वारा
किये सम्पूर्ण वृत्तान्तको उन्हें क्रमशः बतलाया। कामदेवने
प्रसन्न होकर वर प्रदान करनेवाले उन भगवान् गणेशजीको
अपनी अनंगताकी प्राप्ति, रतिके विलाप, मन्त्रकी प्राप्ति,
उ०ख०-अ०८९ ] * गणेशजीद्वारा कामदेवको अनेक वरोंकी प्राप्ति * २५९
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२६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
उन्होंने अकेले ही बहुतोंपर विजय प्राप्त कर ली।
वे कामदेव ही 'प्रद्युम्न' इस नामसे विख्यात हुए।
तदनन्तर वे रति (मायावती)-को लेकर [द्वारका]
पुरीको चले गये ॥ १२-१३॥
गणेशजीकी कृपासे वे सभी देवोंके लिये मान्य,
तीनों लोकोंमें विजय प्राप्त करनेवाले तथा आनन्दित
होकर परम प्रसन्न हो गये। रुक्मिणी आदि स्त्रियाँ उन्हें
दूसरे कृष्णके समान ही देखकर लज्जित हो उठीं और
उठकर इधर-उधर चली गयीं ॥ १४-१५ ॥
तदनन्तर नारदजीके कथनानुसार उन्हें अपना पुत्र
जानकर वे सब अत्यन्त आनन्दित हो गयीं और उनके
समीप जाकर उन्होंने उनका आलिंगन किया। प्रद्युम्नके
साथ आयी मायावतीरूपा रतिने भी उन सभीको प्रणाम
किया। उनके वहाँ आनेपर उस द्वारकापुरीके सभी लोग
अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १६ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—हे महामुने व्यासजी! इस प्रकार
मैंने आपको जनस्थानमें स्थित गणेशजीकी महिमाका
निरूपण किया। उस स्थानपर ही राम [के भ्राता
लक्ष्मण]-ने शूर्पणखाका नासिका-छेदन किया था, इसी
कारण वह जनस्थान 'नासिक' इस नामसे प्रसिद्ध
हुआ ॥ १७-१८॥
वहाँके पत्थरके टुकड़े आज भी मोदक-जैसे
दिखायी देते हैं। इस प्रकार कामदेवने षडक्षर मन्त्रके
द्वारा गजाननदेवकी वैसे ही आराधना की, जिस प्रकार
कि शेषनागने उनकी आराधना की थी। [गणेशोपासनाके]
फलस्वरूप रति तथा कामदेव (मायावती और प्रद्युम्न)
दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १९-२० ॥
व्यासजी बोले- ब्रह्मन्! शेषनागने भगवान्
गजाननकी आराधना किस प्रकार की थी, किसलिये की
थी और प्रसन्न हुए गणेशजीसे उन्होंने किस वस्तुको प्राप्त
किया था? हे चतुरानन ब्रह्माजी! यह सब मुझे विस्तारसे
बतलाइये; क्योंकि भगवान्की कथाके विषयमें प्रश्न
करनेवाले, कथा सुननेवाले तथा कथाको बतलानेवाले-
तीनोंके पुण्यकी वृद्धि होती है ॥ २१-२२॥
ब्रह्माजी बोले-हे ब्रह्मन्! आपने बहुत अच्छी
बात पूछी है। मैं उस कथारूपी अमृतको बताता हूँ।
सत्यवतीके पुत्र हे व्यासजी ! आप सावधान होकर वह
सब सुनें ॥ २३ ॥
हे मुने! किसी समयकी बात है, पार्वतीजीके साथ
भगवान् शिव सुन्दर शिखरवाले श्रेष्ठ हिमालयपर्वतकी
चोटीपर सुखपूर्वक विराजमान थे। वह पर्वत विविध
प्रकारके वृक्षों तथा लताओंसे परिव्याप्त तथा झरनोंकी
उ०ख०-अ०८९ ] * गणेशजीद्वारा कामदेवको अनेक वरोंकी प्राप्ति * २६१
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ध्वनिसे निनादित था। स्वर्ण-कमलोंपर निवास करनेवाले | समुद्र-मन्थनमें सहयोग प्रदान किया था, तभी देवताओंने
भ्रमर वहाँ गुंजन कर रहे थे। चम्पक, अशोक, बकुल | अमृत प्राप्त किया था और तभी उन्होंने अमरत्व प्राप्त
तथा मालती-पुष्पोंसे सुगन्धित वायु उस पर्वतके शिखरपर | किया था, अतः मुझसे श्रेष्ठ और कोई दूसरा नहीं है।
निवास करनेवाले जनोंके चित्तको अत्यन्त आह्लादित कर | उन शेषनागके मनके अभिमानको जानकर तीनों लोकोंका
रही थी॥ २४-२६॥ | संहार करनेवाले तथा कल्याण करनेवाले और सब कुछ
उस समय गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, किन्नर, देवता, | देख लेनेवाले भगवान् शिव मौन हो गये और फिर
मुनिगण तथा नाग उन गिरिजापति भगवान् शंकरका | सहसा उठ खड़े हुए॥ ३५-३६॥
दर्शन करनेके लिये वहाँ आये। उनमेंसे कुछने साष्टांग | उन्होंने उस प्रकारके अभिमानमें चूर शेषनागको
दण्डवत् प्रणामकर उनका अभिवादन किया। गन्धर्वोंने | भूमिपर पटक दिया, तब उनका एक-एक सिर दस-दस
उच्च स्वरसे गान किया और अप्सराएँ नृत्य करने | भागोंमें विभक्त हो गया। इससे वे शेषनाग आधे प्रहरतक
लगीं॥ २७-२८॥ | मूर्च्छित और चेतनाहीन-से हो गये। तभीसे वे शेषनाग
उन्होंने दस भुजाधारी, व्याघ्राम्बर धारण किये हुए, | हजार फणोंसे सुशोभित हो गये॥ ३७-३८॥
नन्दी तथा भृंगी आदि गणोंसे परिव्याप्त, भालमें चन्द्रमाको | प्राणोंके बच जानेपर वे शेषनाग सोचने लगे कि
धारण किये हुए, त्रिशूल लिये हुए, सारे शरीरमें भस्म | मैं तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शिवका आभूषण था
लगाये हुए, शेषनागको सिरपर धारण किये हुए, | और सम्पूर्ण नागोंका भूषणस्वरूप था॥ ३९॥
कल्याण करनेवाले तथा वृषभपर आरूढ़ भगवान् शिवकी | लेकिन आज न जाने किस कर्मके फलस्वरूप इस
पूजा की। अन्य देवोंने [भी] मानसिक उपचारोंद्वारा | अवस्थाको प्राप्त हो गया हूँ। जैसे पंखहीन पक्षी चलनेमें
भगवान् शिवका पूजन किया॥ २९-३०॥ | असमर्थ होता है, वैसे ही आज मैं चलनेमें असमर्थ हो
कोई-कोई अपनी दोनों आँखें बन्दकर उनका | गया हूँ। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। इस समय कौन मेरा
ध्यान करने लगे। वसिष्ठ, वामदेव, जमदग्नि, द्वित, त्रित, | रक्षक हो सकता है, और ऐसा कौन है, जो मुझे अपनी
अत्रि, कण्व, भरद्वाज तथा गौतम आदि मुनीश्वर विविध | पूर्वावस्थाको प्राप्त करनेका मंगलमय उपाय बता सकता
स्तुतियोंके द्वारा उन पार्वतीपति भगवान् शंकरका स्तवन | है? अथवा कौन है, जो मेरे दुःखको दूर कर सकता है,
करने लगे॥ ३१-३२॥ | इस प्रकार वे अत्यन्त चिन्तातुर हो उठे। उसी समय उन्होंने
जब वे देवता तथा मुनिगण वहाँ भगवान् शंकरकी | मार्गमें जाते हुए मुनि नारदजीको देखा॥ ४०-४२॥
आराधना कर रहे थे, उस समय शेषनाग अत्यन्त गर्वित | जैसे कोई भिक्षुक स्वप्नमें धन-सम्पत्ति प्राप्तकर
हो उठे कि तीनों लोकोंमें मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ, दूसरा | कुछ प्रसन्न हो उठता है, वैसे ही वे नागराज शेष उन्हें
और कोई श्रेष्ठ नहीं है। शिव [यदि] श्रेष्ठतर हैं तो | देखकर प्रसन्न हुए। नारदजीने अत्यन्त कष्टमें पड़े हुए
मैं तो उनके भी सिरपर विराजमान हूँ, इस पृथ्वीको | उन नागराजको अपने समक्ष देखा॥ ४३॥
धारण करनेकी शक्ति मुझमें ही है और कहीं किसीमें | उन्हें चेष्टारहित, श्वासक्रियासे हीन तथा एक
नहीं॥ ३३-३४॥ | मुनिकी भाँति ध्याननिष्ठ देखकर सब कुछ जाननेवाले
मेरे कुलमें उत्पन्न वासुकि नागने जब रस्सी बनकर | होनेपर भी नारदजीने उन शेषसे पूछा- ॥ ४४॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कामके पुनर्जन्मसम्बन्धी वृत्तान्तका वर्णन'
नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥८९॥