श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पचासवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०५० ] * मुद्गलद्वारा काशिराजको विनायक-लोकका परिचय बताना * ३८९
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पचासवाँ अध्याय
महर्षि मुद्गलद्वारा काशिराजको विनायकके लोक 'स्वानन्दभुवन' का परिचय बताना तथा
सदैव वहाँ विद्यमान रहनेवाले विनायकके स्वरूपका निरूपण करना, मुद्गलजीके उपदेशसे
काशिराजद्वारा गणेशोपासना और अन्तमें विनायक-लोकको प्राप्त करना
[बायाँ स्तम्भ]
व्यासमुनि बोले— [हे ब्रह्मन् !] काशिराजने महर्षि
मुद्गलजीके उपदेशसे किस प्रकार विनायकके उस उत्तम
स्थानको प्राप्त किया, इसे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले—तीर्थयात्राके प्रसंगसे एक बार महर्षि
मुद्गल काशिराजके पास गये। राजाने उनका आतिथ्य-
सम्मान करके उन सर्वज्ञ मुनि मुद्गलसे पूछा— ॥ २ ॥
राजा बोले—विनायकका लोक कौन-सा है? और
मेरेद्वारा उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? ॥ २१/२ ॥
मुद्गल बोले— [हे राजन् !] स्वानन्दभुवन तथा
निजलोक—ये दो अत्यन्त प्रसिद्ध नाम विनायकलोकके
हैं। जब देवान्तक तथा नरान्तक नामके दो दैत्य उत्पन्न
होंगे, तब विनायक भी उनके वधके लिये मनुष्यरूपमें
अवतरित होंगे ॥ ३–४१/२ ॥
वे पराक्रमी विनायक अपनी इच्छाके अनुसार इस
मनुष्यलोकमें बालकरूपसे अद्भुत पराक्रमशाली लीला करेंगे।
हे राजन् ! जब आप अपने पुत्रके विवाहके उद्देश्यसे उन्हें
अपने घर लायेंगे, तो उस समय वे [अपना लोकोत्तर]
पुरुषार्थ प्रदर्शित करेंगे और [लीलावश] भगवद्भक्त निर्धन
'शुक्ल' नामक ब्राह्मणके घरमें भोजन करके उन्हें देवराज
इन्द्रके लिये भी दुर्लभ अमोघ लक्ष्मी प्रदान करेंगे [तथा
और भी बहुत-सी लीलाएँ करेंगे], हे काशिराज ! हे महाबाहु!
तब (उसी समय) आप उनकी भक्तिके प्रभावसे विनायकके
निजलोकको प्राप्त करेंगे ॥ ५-८ ॥
ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर मुनि मुद्गलके चले
जानेपर महान् बुद्धिमान् काशिराज गणेशजीकी भक्ति करते
हुए समयकी प्रतीक्षा करने लगे। तदनन्तर बहुत दिन बीत
जानेपर लीलाके लिये विग्रह धारण करनेवाले वे प्रभु विनायक
कश्यपके घरमें अवतीर्ण हुए ॥ ९-१० ॥
उन्होंने अनेकों दैत्योंका वध किया और नाना प्रकारकी
क्रीड़ाएँ कीं। शुक्ल ब्राह्मणके घरमें भोजन करके उन्होंने
[दायाँ स्तम्भ]
शीघ्र ही उसके दारिद्र्यका हरण कर लिया। तदनन्तर वे
काशिराजके भवनमें [पुनः लौट] गये। उन्होंने [उसी
अवतारकालमें] देवान्तक तथा नरान्तक नामक महाबलशाली
दो दैत्योंका वध किया ॥ ११-१२ ॥
तत्पश्चात् वे विनायकदेव क्षीरसागरके मध्य स्थित
अपने 'स्वानन्दभुवन' नामक लोकको चले गये। तबसे
काशिराज विनायकके विरहसे दुखी होकर सदा उनका
स्मरण-ध्यान किया करते थे ॥ १३ ॥
वे अपनी राजसभाके मध्य किसी पुरुषको यह
समझकर आलिंगन कर लेते थे कि यही विनायक है।
वे सम्पूर्ण जगत्को विनायकरूप समझते थे ॥ १४ ॥
वे दिन-रात ध्यानमें उनका दर्शन करते हुए
विनायकमय ही हो गये थे। कभी वे निराहार ही रह
जाते थे। उन दिनों कभी वे अपनी रुचिके अनुसार एक
ग्रासमात्र ही भोजन करते, कभी वे हँसने लगते तो कभी
नाचने लगते ॥ १५-१६ ॥
स्वप्नमें वे उन विनायकका दर्शन करके बहुत
समयतक सोते ही रह जाते थे। राजाकी इस प्रकारकी
अन्यमनस्कताकी स्थिति देखकर उनके मन्त्रीगण अत्यन्त
चिन्तित हो उठे ॥ १७ ॥
वे यह सोचने लगे कि यदि लोग राजाकी इस
प्रकारकी मनःस्थितिके विषयमें जान जायँगे तो शत्रुओंकी
सेना आक्रमण कर सकती है। इस प्रकारकी चिन्ता करते
हुए जब मन्त्रीगण राजाके दरबारमें उपस्थित थे, तो उसी
समय महर्षि मुद्गल अपना ध्यान भंगकर राजाके पास
आये। उन मुनिके दर्शनसे चेतनाको प्राप्त हुए राजाने
उन्हें प्रणाम किया ॥ १८-१९ ॥
उन्हें आसनपर बैठाकर राजाने यथाविधि उनका
पूजन किया और फिर हाथ जोड़कर कहने लगे—'हे
मुने! आपके दर्शनसे आज मेरा वंश धन्य हो गया, मेरा
जन्म लेना सफल हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये,
मेरा भवन धन्य हो गया और मेरे नेत्र धन्य हो गये।
जिनकी कृपासे मनुष्योंको संसारसे तारनेवाला परम स्थान
प्राप्त होता है और जिनकी अवमाननासे महान् दुःखोंकी
प्राप्ति होती है, उन्हीं आपका मैंने बड़े ही पुण्यके प्रभावसे
आज दर्शन किया है।' तदनन्तर उनकी वाणीसे परम सन्तुष्ट
होकर वे ब्राह्मण मुद्गल उनसे बोले- ॥ २०-२२॥
मुद्गल बोले - [हे राजन्!] आप-जैसा विनीत
स्वभाववाला व्यक्ति न तो मैंने देखा है और न आप-
जैसे व्यक्तिके विषयमें कुछ सुना ही है। आपके द्वारा
किये गये पूजनसे मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ। मैं आपके
मनोरथको पूर्ण करूँगा ॥ २३ ॥
ब्रह्माजी बोले- महर्षि मुद्गलके वचनसे परम
सन्तुष्टिको प्राप्त काशिराज उनसे बोले- 'हे मुने! मैं
इसी शरीरसे विनायकके धाम स्वानन्दभुवनको प्राप्त
करना चाहता हूँ और वहाँ चिरकालतक रहना चाहता
हूँ। मुझे अन्य किसी सम्पदाकी आवश्यकता नहीं है।'
तदनन्तर महर्षि मुद्गल उनसे बोले- 'मैं आपकी वाणीसे
सन्तुष्ट हूँ। हे राजन्! आप अपने इसी पांचभौतिक जड़
देहसे विनायकजीके 'स्वानन्दभुवन' नामक उस लोकको
प्राप्त करेंगे, जो जन्म-मरणके बन्धनसे सर्वथा रहित है।
वहाँ पाँच हजार वर्षोंतक अनेक प्रकारकी सम्पदाओंका
उपभोग करनेके अनन्तर आप ब्रह्माजीके एक कल्पपर्यन्त
परम आनन्दको प्राप्त करेंगे' ॥ २४-२७ ॥
राजा बोले - मुने! विनायकका वह लोक कैसा
है? उसका क्या नाम है? आप सत्य-सत्य बतायें। उस
लोकमें किस पुण्यके द्वारा जाना होता है। मैंने अन्य
लोकोंके विषयमें तो बहुत कुछ सुन रखा है, पर इस
लोकको मैं नहीं जानता ॥ २८ ॥
मुद्गलजी बोले - हे राजन्! सुनिये, मैंने महर्षि
कपिलजीके मुखसे उस लोककी महिमाको सुना है।
आपने जिन लोकोंके विषयमें सुना है, वे सामान्यतः
प्रसिद्ध हैं ॥ २९ ॥
हे भूपते! इस गणेशलोककी गति अत्यन्त गहन
है। इस स्वानन्दभुवन लोकका एक नाम दिव्यलोक है
और दूसरा नाम निजलोक है। हे महामते! उस लोकमें
भगवान् विनायक कामदायिनी नामक पीठमें विराजमान
रहते हैं, वह पाँच हजार योजनके विस्तारवाला है।
वहाँकी भूमि रत्नमयी तथा सुवर्णमयी है। वहाँ वे
विनायक दिशाओंको प्रकाशित करते हुए सुशोभित होते
हैं। स्वानन्दभुवन नामका वह दिव्य लोक इक्षुसागरके
मध्यमें स्थित है ॥ ३०-३२ ॥
न वेदोंके पारायणसे, न दानसे, न व्रत-यज्ञ और
जपसे, न ही विविध प्रकारकी तपस्याओंके द्वारा कभी
भी वह लोक प्राप्त किया जा सकता है। भगवान्
विनायककी कृपा और उनकी निरन्तर भक्तिसे ही वह
प्राप्त होता है। विघ्नराट् विनायक वहाँ समष्टि तथा
व्यष्टिरूपसे निरन्तर विद्यमान रहते हैं ॥ ३३-३४ ॥
वे विनायक अपने पैरोंसे सातों पातालोंको व्याप्त
करके स्थित हैं। वे शेषनागके सहस्र सिरोंको तथा जलमें
स्थित कूर्मको [आक्रान्त किये हुए हैं।] उन्होंने कानोंके
द्वारा सभी दिशाओंको व्याप्त कर रखा है। बालोंके द्वारा
आकाशमण्डलको धारण करके वे आधारकमलपर विद्यमान
हैं। पुण्यात्माजन भ्रूमध्यमें स्थित अग्निचक्रमें विद्यमान
द्विदल कमलमें उनका ध्यान करते हैं ॥ ३५-३६ ॥
खेचरी मुद्रासे समन्वित सिद्ध साधक ही उनका
ध्यान कर सकता है, दूसरा और कोई ध्यानमें समर्थ नहीं
हो पाता। प्रभासे सुशोभित सहस्र दलोंवाला जो ब्रह्माण्डकमल
है, उस ब्रह्माण्डकमलमें वे विनायक तेजोरूपसे स्थित
रहते हैं। इसी प्रकार हृदयमें स्थित द्वादशदल कमलमें,
नाभिचक्रमें स्थित दशदल कमलमें, लिंगदेशमें स्थित
शुभ षड्दल कमलमें और कण्ठदेशमें स्थित षोडशदल
कमलमें वे विघ्नराट् तेजःस्वरूपमें देदीप्यमान होकर
उसी तरह सर्वत्र विद्यमान रहते हैं, जैसे कि सत्यलोकमें
ब्रह्मा विद्यमान रहते हैं ॥ ३७-३९ ॥
द्वादशदल कमल वैकुण्ठ है, वहाँ भगवान् विष्णु
सदा विद्यमान रहते हैं, कण्ठमें स्थित षोडशदल कमलमें
पंचवक्त्र भगवान् शिव अपने गणोंके साथ उसी प्रकार
निवास करते हैं, जैसे कि कैलासमें रहते हैं ॥ ४० ॥
चन्द्रमा, सूर्य तथा अग्नि-ये विनायकके तीन नेत्र
क्री०ख०-अ०५० ] * मुद्गलद्वारा काशिराजको विनायक-लोकका परिचय बताना * ३९१
[बायाँ स्तम्भ]
हैं। सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डल उनका उदरदेश है। वे विनायक
इक्कीस स्वर्गोंमें व्याप्त हैं। औषधियाँ उनके रोम हैं।
नदियाँ तथा सागर उनके पसीनेकी बूँदके रूपमें भासित
होते हैं। उनके प्रत्येक रोमके अन्तर्गत [अनन्तानन्त]
ब्रह्माण्ड धूलिकणोंके समान अवस्थित हैं ॥ ४१-४२ ॥
तैंतीस करोड़ देवता और जो हजारों प्रकारके जीव
हैं, वे उनके प्रत्येक रोमकूपमें उसी प्रकार आभासित होते
हैं, जैसे कि गूलरमें बैठे हुए मच्छर ॥ ४३ ॥
हे राजन् ! अब मैं विनायकके उस लोककी
रचनाके विषयमें संक्षेपमें बताता हूँ। मेरुपर्वतका जो उच्च
शिखर है, वह कैलासशिखरके समान है। वह हजार
योजन ऊँचा है। वह जनशून्य तथा श्रेष्ठ मुनिजनोंके
लिये भी अगम्य है। वहाँपर एक उच्च शक्ति है, जिसका
नाम भ्रामिका है ॥ ४४-४५ ॥
उस शक्तिके चारों ओर विशुद्ध तेजवाले भ्रमर गुंजन
करते रहते हैं। उस भ्रामिका शक्तिके ऊपर पद्मासनपर
आधारशक्ति स्थित है, जो स्वर्णिम आभावाली है। उस
आधारशक्तिके मस्तकपर कामदायिनी नामक शक्ति है,
उसकी आभा करोड़ों सूर्योंके समान है, उसीके मस्तकपर
बृहत्तम गणपतिपीठ अवस्थित है ॥ ४६-४७ ॥
वह अत्यन्त विकराल जटाओंके भारको धारण किये
रहती है तथा [वैसे ही विकराल मुखसे युक्त है।] वह
हजारों सूर्योंके समान प्रकाशमान है और अपनी आभासे
दसों दिशाओंको द्योतित करती रहती है। उस (पीठ) का
विस्तार दस हजार योजन है, उतनी ही उसकी चौड़ाई भी
है। उस पीठके मध्यमें एक योजन चौड़ा स्वानन्दभुवन
नामक लोक है, जो असंख्यों सूर्योंके समान आभावाला है।
वहाँपर स्वर्ण तथा रत्नोंसे निर्मित असंख्य गृह हैं, जो गज-
मुक्ताके समान प्रभासे सम्पन्न हैं। वह स्वानन्दभुवन नामक
विनायकधाम दुःख तथा मोहसे रहित है, उन विनायककी
कृपासे ही वह लोक प्राप्त हो सकता है। उस स्वानन्दभुवनसे
उत्तर दिशामें श्रेष्ठ इक्षुसागर है ॥ ४८-५१ ॥
उस इक्षुसागरके मध्यमें सहस्रदलकमलसे समन्वित
एक मंगलमयी पद्मिनी (पुष्करिणी) है, उस (पुष्करिणी)-
के मध्यमें सहस्र दलोंवाला एक कमल उसी प्रकार
[दायाँ स्तम्भ]
सुशोभित होता है, जिस प्रकार कि चन्द्रमा [आकाशमण्डल-
में] शोभित होता है। उस सहस्रदल कमलकी कर्णिकामें
एक शय्या है, जो रत्नों तथा स्वर्णसे निर्मित है। हे
राजन् ! उसी तल्पमें दिव्य वस्त्रोंको धारण किये हुए
भगवान् विनायक शयन करते हैं ॥ ५२-५३ ॥
उनकी सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो पत्नियाँ बड़ी
ही प्रसन्नतापूर्वक सदैव उनके चरणोंको दबाया करती
हैं। सामवेद मूर्तिमान् विग्रह धारणकर भक्तिपूर्वक उनकी
महिमाका गान करते रहते हैं। सभी शास्त्र मूर्तिमान्
होकर उनका स्तवन करते रहते हैं। सभी पुराण उनके
सद्गुणोंका वर्णन करते रहते हैं ॥ ५४-५५ ॥
उस स्वानन्दभुवनमें सहस्रदलकी कर्णिकामें स्थित
तल्पके ऊपर भगवान् विनायक बालरूप धारणकर विराजमान
रहते हैं। वे अपनी सूँड़से सुशोभित रहते हैं। उनके सभी
अंग अत्यन्त कोमल हैं। उनकी आभा अरुणवर्णकी है।
उनके नेत्र विशाल हैं। वे दाँतवाले हैं। उन्होंने मुकुट तथा
कुण्डल धारण कर रखे हैं। उनके मस्तकपर कस्तूरीका
तिलक सुशोभित है। स्वतः प्रकाशमान वे विनायक दिव्य
मालाओं तथा वस्त्रोंको धारण किये हुए हैं, उनके शरीरपर
दिव्य गन्धोंका अनुलेपन लगा हुआ है ॥ ५६-५७ ॥
वे मोतियों तथा मणियोंकी माला धारण किये हैं,
जिसमें अनेक रत्न लगे हुए हैं। वे विनायक अनन्त कोटि
सूर्योंके समान ओजसे सम्पन्न हैं और उनके मस्तकपर
अर्धचन्द्र सुशोभित है। वे विनायक भगवान् स्मरणमात्र
करनेसे मनुष्योंके पापोंको उसी प्रकार तत्क्षण विनष्ट कर
देते हैं, जैसे कि गंगाजी करती हैं। हे राजन् ! उनकी
शय्याके दोनों ओर तेजोवती तथा ज्वालिनी नामक दो
शक्तियाँ सदैव स्थित रहती हैं, जो सहस्रों सूर्योंके समान
प्रभावाली हैं ॥ ५८-५९१/२ ॥
उस स्वानन्दभुवन नामक लोकमें न तो शीत है, न
वृद्धावस्था है, न थकावट है, न स्वेद है और न तन्द्रा
ही है। वहाँ भूख एवं प्यास तथा दुःख कभी भी नहीं
होता है। अपने पुण्यके प्रभावसे जो व्यक्ति वहाँ निवास
करते हैं, वे सदा ही आनन्द-सरोवरमें निमग्न रहते हैं;
क्योंकि वहाँ विश्वमें व्याप्त रहनेवाले, बालकका स्वरूप