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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

तिहत्तरवाँ अध्याय

Here is the text transcription in Devanagari from the provided image:

४४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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तिहत्तरवाँ अध्याय
गण्डकीनगराधिपति राजा चक्रपाणिका आख्यान, निःसंतान राजाको महर्षि शौनकद्वारा
पुत्रप्राप्तिके लिये सौरव्रतके अनुष्ठानका उपदेश करना, राजा-रानीद्वारा सम्यग् रूपसे
सौरव्रतके नियमोंका पालन, भगवान् सूर्यद्वारा स्वप्नमें रानीको पुत्रकी प्राप्ति,
रानीद्वारा गर्भके तापको सहन न कर सकनेके कारण समुद्रमें उसका त्याग
व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन् ! हे पितः ! भगवान्
शिवके घरमें विनायकदेव मयूरेश्वर नामसे कैसे अवतीर्ण
हुए? उनके अवतीर्ण होनेका प्रयोजन क्या था और
उन्होंने कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं? उन विनायकका
'मयूरेश्वर' यह नाम क्यों पड़ा? यह सब आप मुझे
बतलाइये। सुननेपर भी मुझे कभी तृप्ति प्राप्त नहीं हो
रही है॥ १-२॥
ब्रह्माजी बोले- प्राचीन कालमें त्रेतायुगकी बात
है, सिन्धु नामक एक महान् दैत्य उत्पन्न हुआ था। उसे
भगवान् शिवके घरमें अवतरित हुए उन बलिष्ठ विनायकने
मारा था। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण
दिया जाता है, जो शौनक मुनि तथा राजा चक्रपाणिके
मध्य हुए संवादके रूपमें है॥ ३-४॥
मैथिलदेशके गण्डकी नामक शुभ नगरमें एक राजा
हुए थे, जो चक्रपाणि इस नामसे विख्यात थे और
साक्षात् दूसरे विष्णुभगवान्‌के समान ही थे॥ ५॥
इनके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन करनेमें शेषनाग भी
समर्थ नहीं हैं। उन्होंने अपने तेजके द्वारा भगवान्
सूर्यको भी निस्तेज बना दिया था तथा अपने लावण्यके
द्वारा कामदेवको भी तुच्छ बना दिया था। अपनी
बुद्धिके द्वारा बृहस्पतिको भी जीत लिया था और
अपने बल एवं पराक्रमके द्वारा कार्तिकेयको भी पराजित
कर दिया था। इन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वीको क्षणभरमें
अपने अधीन कर लिया था। सभी राजा इनकी सेवामें
उपस्थित रहते थे॥ ६-७१/२॥
इस पृथ्वीमें विद्यमान, विजयकी इच्छा रखनेवाले
उनके अश्वारोहियों, गजारोहियों, पैदल सैनिकों तथा रथारोही
सैनिकोंकी गणना नहीं की जा सकती थी। उनके भवनमें
साक्षात् लक्ष्मी स्थित होकर दर्शन देती थीं ॥ ८-९ ॥
उन नरेशका भद्र (राजसिंहासन) रत्न, सुवर्ण तथा
मोतियोंके द्वारा दिशाओंको उद्भासित करनेवाला और
लोकका कल्याण करनेवाला था एवं [उस राजसिंहासनसे
समन्वित वहाँका सभाभवन] अलकापुरीके समान
[शोभामय] था॥ १०॥
उन राजाके दो महाबुद्धिमान् अमात्य थे, एकका
नाम था साम्ब तथा दूसरेका नाम था सुबोधन। वे अपने
स्वामीकी सेवा किया करते थे और उनके कार्यकी
सिद्धिके लिये अपने प्राणोंको तृणके समान समझते थे।
उस राजाकी उग्रा नामवाली एक रानी थी, जो अत्यन्त
रमणीय तथा सुन्दर मुसकानवाली थी। उसके मुखचन्द्रकी
कान्तिसे दिनमें ही कुमुद खिल उठते थे ॥ ११-१२॥
वह धारण किये हुए अपने अनेक आभूषणोंकी
दीप्तिसे समस्त तमोराशिको विनष्ट कर देती थी। उसके
पातिव्रत्यके अनुकरणीय गुणोंको देखनेके लिये सभी
पतिव्रता स्त्रियाँ उसके समीप आती थीं ॥ १३ ॥
इस प्रकारके अत्यन्त बुद्धिमान् वे राजा चक्रपाणि
सबके लिये मान्य तथा सर्वदा भगवान् विष्णुकी भक्तिमें
परायण रहते थे। पुराणोंके कथाश्रवणमें उनका अत्यन्त
अनुराग था और वे धर्मशास्त्रपरायण थे ॥ १४ ॥
सन्तानसे रहित होनेके कारण वे रात-दिन अत्यन्त
दुखी रहते थे। यद्यपि उन्होंने सन्तानकी प्राप्ति तथा
उसके जीवित रहनेके लिये अनेक व्रतोंका पालन किया,
विविध दान दिये और बहुतसे यज्ञोंका अनुष्ठान किया,
किंतु उनके जो-जो सन्तति होती, वह तत्क्षण ही मृत्युको
प्राप्त हो जाती थी ॥ १५१/२॥
तदुपरान्त एक दिनकी बात है, राजा अपनी
राज्यसम्पदासे जब अत्यन्त विरक्त हो गये तो उन्होंने
अपनी भार्यासहित दोनों साम्ब तथा सुबोधन नामक

क्री०ख०-अ०७३ ] * गण्डकीनगराधिपति राजा चक्रपाणिका आख्यान * ४४३

अमात्यों और पुरवासियोंको बुलाया तथा उन सबसे कहा—'इस समय मैं अब अपने दण्ड (सैन्यदल), राजकोश तथा राज्यका परित्याग कर रहा हूँ। पुत्रसे हीन होनेसे स्वर्गसे हीन हुए मेरा अब राज्यसे क्या प्रयोजन ? पुत्रप्राप्तिके लिये मैंने जो-जो भी कर्म किये थे, यदि वे कर्म ईश्वरार्पणबुद्धिसे किये होते, तो हम दोनोंको मोक्ष भी प्राप्त होता और पूर्वजन्मोंमें किये कर्मोंके बन्धन भी विनष्ट हो जाते ॥ १६—१९॥

हे जनो ! मेरा जीवन व्यर्थ ही चला गया। अब मैं इसी समय [राज्यसम्बन्धी] सभी दायित्व मन्त्रियोंको सौंपकर प्रसन्नतापूर्वक वन जाऊँगा। आप लोग भी उन मन्त्रियोंकी आज्ञाका पालन करें ॥ २० ॥

हे सज्जनो ! मैं अपने आत्मकल्याणकी दृष्टिसे तपस्या करनेके लिये वनमें जाऊँगा। यदि मुझे अपने अभीष्टकी प्राप्ति हो जाती है, तो पुनः मैं अपनी नगरीमें चला आऊँगा। हे लोगो ! इस समय अब आप लोग मुझे निश्चित ही आज्ञा प्रदान करें' ॥ २११/२ ॥

राजाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सभी दुखी मनवाले हो गये। आँसुओंकी धारा बहाते हुए वे लोग उन नृपश्रेष्ठसे बोले— ॥ २२१/२ ॥

पुरवासीजन बोले— हे प्रभो ! आप ही हमारी माता हैं और आप ही पिता भी हैं। फिर आज ऐसी निष्ठुरता क्यों दिखा रहे हैं ? बिना अपराधके आप हमारा परित्याग क्यों कर रहे हैं ? आपके बिना हमारा जीवन वैसे ही व्यर्थ है, जैसे कि माताके बिना शिशुका जन्म व्यर्थ होता है। हे प्रभो ! आप जहाँ जा रहे हैं, हम सब भी वहीं चलेंगे ॥ २३-२४॥

ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे जब नगरनिवासी लोग राजासे वार्तालाप कर ही रहे थे कि उसी समय मुनिश्रेष्ठ शौनकजी वहाँ आ पहुँचे। वे साक्षात् दूसरी अग्निके समान थे ॥ २५ ॥

वे सभी वेदों, शिक्षा-कल्प आदि वेदांगों एवं सभी शास्त्रोंके प्रवक्ता, तीनों लोकोंमें विख्यात, देवराज इन्द्र आदि सभी देवताओंद्वारा वन्दनीय तथा भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंके ज्ञाता थे ॥ २६॥

उनको अपने समक्ष देखकर राजा अपने आसनसे उठ खड़े हुए और उन्होंने उन्हें प्रणाम किया। राजाने अपने राजसिंहासनपर उन्हें बैठाया और परम प्रसन्नताके साथ उनकी पूजा की ॥ २७ ॥

भोजन ग्रहण कर चुके हुए तथा संवाहन (दबाने) आदिके द्वारा पैरोंकी सेवा हो जानेपर विश्रामको प्राप्त हुए उन मुनिश्रेष्ठ शौनकजीसे राजा चक्रपाणिने कहा— 'मेरा कौन-सा पुण्य फलीभूत हुआ है, जो आज मुझे आपका वह दर्शन प्राप्त हुआ है, जो सभी पापोंका हरण करनेवाला, अत्यन्त मंगलदायक, मनुष्योंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा पापीजनोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है ?' ॥ २८-२९ ॥

तदनन्तर मुनि शौनक नृपश्रेष्ठ चक्रपाणिसे बोले— मैं आपकी परम भक्ति, सेवा-शुश्रूषा तथा आत्मसंयमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ ॥ ३० ॥

शौनक बोले— हे राजेन्द्र ! आप कोई चिन्ता न करें और न राज्यका ही परित्याग करें। आपको मेरे वचनके अनुसार निश्चित ही पुत्रकी प्राप्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं है। मैंने आजतक कभी भी परिहासतकमें मिथ्या वाणी नहीं बोली ॥ ३११/२ ॥

ब्रह्माजी बोले— मुनिका यह वचन सुनकर राजश्रेष्ठ चक्रपाणि अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। उन्होंने उन्हें रत्नों तथा सुवर्णसे बने हुए अनेकों आभूषण और अत्यन्त मूल्यवान् वस्त्रोंको समर्पित किया, किंतु मुनि शौनकने कुछ भी ग्रहण नहीं किया ॥ ३२-३३॥

तदनन्तर वे मुनि शौनक राजासे बोले— हम लोग वल्कल वस्त्रोंको धारण करनेवाले हैं। सभी प्रकारके सुख-भोगोंमें किसी भी प्रकारकी आसक्ति नहीं रखते। सभी प्राणियोंके कल्याणमें निरत रहते हैं। सृष्टि तथा संहार करनेमें समर्थ हैं। दयाके सागर हैं। साधुपुरुषोंके दर्शनकी अभिलाषा करते रहते हैं। मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सुवर्णमें समान दृष्टि रखनेवाले हैं। विद्वानोंके पास लक्ष्मी कभी भी नहीं रहती। इसी कारण मैं आपके द्वारा प्रदत्त इस सुवर्ण तथा सुन्दर वस्त्रको ग्रहण नहीं करूँगा ॥ ३४-३६॥

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४४४ [थ्रीगणेशपुराण-
[५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५
तीर्थयात्राके प्रसंगमें मैं आपके पास आया था। आपके
दर्शन किये हुए मेरे बहुत दिन व्यतीत हो गये थे ॥ ३७ ॥
ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर पुनः उन दम्पती-राजा
तथा रानीने भलीभाँति उन मुनि शौनकको प्रणाम किया
और सन्तानकी प्राप्तिके विषयमें समर्थ उपाय पूछा ॥ ३८॥
तब शौनकमुनिने सभी प्रकारके व्रत, तप, यज्ञ तथा
दानोंको वृथा जानकर उनसे उस सौर व्रतको करनेके
लिये कहा, जो मनुष्योंको सब प्रकारके पदार्थोंको प्रदान
करनेवाला, अनेकों जन्मोंके संचित पापोंका शमन करनेवाला
तथा पुत्र एवं पौत्रको देनेवाला है ॥ ३९१/२॥
शौनकमुनि बोले-सूर्यसप्तमीसे आरम्भ करके
एक मासतक यह व्रत करना चाहिये। [उसमें सर्वप्रथम]
मातृकापूजन करके आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये।
गणेशजीका पूजन करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन
कराना चाहिये ॥ ४०-४१ ॥
सुवर्णकलशके ऊपर सुवर्णका सूर्यमण्डल बनाकर
स्थापित करे और भक्तिभावसे समन्वित होकर षोडश
उपचारोंद्वारा उसका पूजन करे ॥ ४२ ॥
लाल चन्दनमिश्रित तण्डुलों, लाल रंगके फूलों,
विविध प्रकारके रक्त वर्णके रत्नों तथा अनेक प्रकारके
फलों, बारह अर्घों, नमस्कारों तथा प्रदक्षिणाओं, स्तुतियों
एवं प्रार्थनाओंके द्वारा परमेश्वर सूर्यनारायणकी प्रार्थना
करे॥ ४३-४४॥
तदनन्तर भगवान् सूर्यको स्वयं एक लाख बार
प्रणाम करे अथवा [ब्राह्मणोंद्वारा] करवाये। परम प्रसन्नताके
साथ प्रतिदिन एक लाखकी संख्यामें ब्राह्मणोंको भोजन
कराये। वेदज्ञ कुटुम्बी ब्राह्मणको प्रतिदिन एक गौका दान
करे। हे नृपश्रेष्ठ ! व्रतके समापनपर्यन्त सपत्नीक ब्रह्मचर्यका
पालन करे ॥ ४५-४६॥
दयाभावसे युक्त होकर दीनों, अन्धों तथा निर्धनोंको
अन्न प्रदान करे। मासके अन्तमें सभी सामग्रियोंको
ब्राह्मणको निवेदित कर दे॥ ४७ ॥
हे राजन् ! इस प्रकार सौरव्रतका अनुष्ठान करनेसे
मेरी कृपासे आपको पुत्रकी प्राप्ति होगी, वह महान्
यशस्वी, सूर्यकी भक्तिसे समन्वित तथा पुण्यात्मा
होगा ॥ ४८ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार सौर व्रतके विधि-
विधानका उपदेश देकर मुनि शौनक अन्तर्धान हो गये।
तदनन्तर राजाने उस व्रतको उसी प्रकार किया, जिस
प्रकारका कि उन्हें उपदेश प्राप्त हुआ था ॥ ४९ ॥
अपनी पत्नीके साथ विनीतात्मा राजाने सूर्यभक्तिपरायण
होकर वह व्रत किया और प्रतिदिन एक लाख ब्राह्मणोंको
उनकी इच्छाके अनुसार भोजन कराया ॥ ५० ॥
इस प्रकार पत्नीके साथ उपवास करते हुए राजाको
एक मासका समय व्यतीत हो गया। राजाने प्रतिदिन
गोदान किया और भगवान् सूर्यको एक लाख नमस्कार
किया तथा ब्राह्मणोंसे भी करवाया ॥ ५१ ॥
वे प्रतिदिन भगवान् सूर्यके मन्त्रका जप करते थे
और सदा ही उनके नामका जप किया करते थे।
तदनन्तर एक दिनकी बात है, उनकी रानीने रात्रिमें
स्वप्नमें भगवान् सूर्यको अपने पतिके सुन्दर रूपमें देखा।
कामदेवके समान उनका मनोरम रूप देखकर रानीने
उनके साथ रमणकी अभिलाषा की ॥ ५२-५३॥
संतप्त अंगोंवाली वे उनसे बोलीं- 'इस समय
काम मुझे अत्यन्त पीड़ित कर रहा है, मैं शरीरमें
विद्यमान ऋतुकालीन अग्निसे दग्ध हो रही हूँ ॥ ५४ ॥
हे स्वामिन् ! अतः मुझे सहवास प्रदान करें,
अन्यथा मेरी मृत्यु निश्चित है।' तब उसके पति राजा
चक्रपाणिको सन्तानोत्पादनकी शक्तिसे विहीन और रानीको
सकाम जानकर उसके पतिके स्वरूपको धारण किये हुए
भगवान् सवितादेवने उसे ऋतुदान किया। इसके अनन्तर
जब रानी निद्रासे जागी तो उसने अपने पतिको जगाया
और उनसे बोली - ॥ ५५-५६ ॥
'हे स्वामिन् ! आपने ब्रह्मचर्य नियम-पालनमें स्थित
रहते हुए भी मेरे साथ सहवास क्यों किया ?' तब राजा
उनसे बोले- 'हे शुभे ! मेरा मन तो व्रतके नियमोंमें लगा
हुआ है, मैं निरन्तर उपवासमें रहनेके कारण क्षीण
शक्तिवाला हो गया हूँ और मैं भगवान् सूर्यकी भक्तिमें
परायण हूँ। मैंने तुम्हारे साथ रमण नहीं किया' ॥ ५७१/२ ॥
तदनन्तर पतिव्रता रानी पुनः उनसे बोली- मैं तो
आपके अतिरिक्त और किसी पुरुषको किसी प्रकार
भी नहीं जानती हूँ। मैं आपके ही स्वरूपमें भगवान्

क्री०ख०-अ०७४] * राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना * ४४५
सूर्यका ध्यानकर व्रतमें स्थित हुई हूँ। अतएव निश्चय
ही आपके रूपमें आये सूर्यदेवने ही मुझे ऋतुदान
दिया है। तब राजा चक्रपाणिने प्रियभाषिणी अपनी
रानीसे पुनः कहा॥ ५८-५९॥
राजा बोले-हे प्रिये ! वे भगवान् सूर्य हमारे द्वारा
किये गये नमस्कारों, ब्राह्मण-भोजन, गोदान, उपवास
तथा जपसे अत्यन्त सन्तुष्ट प्रतीत होते हैं। लगता है
उन्होंने हमें सिद्धि प्रदान की है, अब निश्चित ही तुमको
पुत्रकी प्राप्ति होगी॥ ६०१/२॥
ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर दिन-प्रतिदिन रानीका गर्भ
वृद्धिको प्राप्त होने लगा और उसका शारीरिक ताप भी
बढ़ने लगा। वह बार-बार मूर्च्छित-सी होने लगी। तब
वह अपने शरीरमें शीतल चन्दन तथा खस लगाने लगी
और समस्त अंगोंमें कपूरका लेपन करने लगी। किंतु इन
उपायोंसे उसका वह ताप नष्ट नहीं हुआ ॥ ६१-६२॥
गीले वस्त्रोंद्वारा ठण्डी हवा करनेपर भी उसकी
उष्णता कम नहीं हुई। तब उसने अपनी सखियोंके साथ
जाकर सिन्धुके तटपर उस महान् गर्भका परित्याग कर
दिया। तदुपरान्त वह स्वस्थ होकर अपनी सखियोंके
साथ अपने भवनमें चली आयी। उसने अपने पतिको उस
गर्भको परित्यक्त करनेकी बात बता दी और वह अपने
गृहकार्यमें संलग्न हो गयी ॥ ६३-६४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७३ ॥
चौहत्तरवाँ अध्याय
राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना और उनसे विभिन्न वरोंकी प्राप्ति
ब्रह्माजी बोले- राजा चक्रपाणिकी रानीके द्वारा
समुद्रमें उस गर्भके छोड़ दिये जानेपर उस गर्भसे एक
बालक उत्पन्न हुआ, जो महान् बलशाली, तेजसम्पन्न,
विकराल मुखवाला, विस्तृत मस्तकवाला एवं तीन
नेत्रोंवाला था। वह लाल रंगके बालोंकी जटाओंसे सम्पन्न
था। उसने हाथमें चक्र तथा त्रिशूल लिया हुआ था। उस
बालकके रुदनसे तीनों लोक काँप उठे ॥ १-२ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ व्यासजी ! उस बालकके हाथ
घुटनोंतक लम्बे थे। उसने तीनों लोकोंपर आक्रमणकर
उनपर विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा की। उस
बालकके भयसे समुद्री जीव-जन्तुओंसहित समुद्र क्षुब्ध
हो उठा, समुद्रमें स्थित उस बालकने समुद्रको सुखा-
सा डाला ॥ ३१/२ ॥
समुद्र बोला- यह राजपुत्र सूर्यदेवसे समुत्पन्न है,
इसे मैं राजदरबारमें ले जाऊँगा ॥ ४ ॥
ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वह द्विजरूपधारी
समुद्र उस बालकको लेकर राजभवनमें गया और राजा
तथा रानीके आगे उसे रखकर वह कहने लगा ॥ ५ ॥
[हे राजन्!] आपकी पत्नीने अपने गर्भके दुस्सह
होनेके कारण मेरे अन्दर वह गर्भ छोड़ दिया था। उसी
गर्भसे यह अत्यन्त उग्र बालक उत्पन्न हुआ है, जो सम्पूर्ण
लोकके लिये महान् भय उत्पन्न करनेवाला है। इसने
उत्पन्न होते ही मुखसे जो पहली ध्वनि की, उससे तीनों
लोक काँप उठे। इसे मैं अपनी आँखोंसे देखतक नहीं सकता,
अतः मैं इसे यहाँ आपके पास ले आया हूँ ॥ ६-७ ॥
ऐसा कहकर बालकको वहाँ छोड़कर वह समुद्र
अन्तर्हित हो गया। तब राजभार्याने उसे दोनों हाथोंसे
पकड़कर अपनी गोदमें बैठा लिया और अत्यन्त प्रसन्नताके
साथ उस बालकको प्रेमपूर्वक स्तनपान कराया। पुत्रके
दर्शनसे वे दोनों राजा एवं रानी उसी प्रकार अत्यन्त
आनन्दित हुए, जैसे कि चिरकालतक योग-साधनामें
निरत रहनेवाला साधक ब्रह्मरूपी अमृतको पाकर आनन्दित
होता है ॥ ८-९१/२ ॥
तदनन्तर राजाने ब्राह्मणों तथा अपने मित्रगणोंको
आमन्त्रण करके बुलवाया। राजा तथा रानीने उसका
यथाविधि जातकर्म-संस्कार करवाया और ज्योतिर्विदोंके
साथ परामर्श करके उस बालकका 'सिन्धु' यह मंगलदायक
नाम रखा। तदनन्तर हर्षसमन्वित हुए राजाने अनेकों
ब्राह्मणोंको अनेकविध दान तथा विविध वस्त्र प्रदान
किये ॥ १०-१२॥

४४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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उस समय नगर अनेक प्रकारकी पताकाओंसे
अलंकृत था और सभी प्रकारके वाद्य बज रहे थे। राजाने
घर-घरमें शर्करा भिजवायी। सभी लोगोंके चले जानेपर
राजा और रानीने स्नेहवश पुकारनेके लिये उसका
'रक्तांग' यह नाम रखा। तदनन्तर दोनों अमात्योंने
कहा—'चूँकि यह उग्राका पुत्र है और उग्र मुद्रा धारण
करनेवाला है, अतः यह 'उग्रेक्षण' इस नामसे भी प्रसिद्ध
होगा' ॥ १३-१५॥
नगरनिवासियोंने उसका 'विप्रप्रसादन' यह नाम
रखा और उन सभी पुरवासियोंने राजाको अनेक-अनेक
प्रकारकी भेंट प्रदान की। राजाने भी उस समय उन
सभीको उपहार प्रदान किये। वह बालक उसी प्रकार
बढ़ने लगा, जैसे शुक्ल पक्षमें दिन-प्रतिदिन चन्द्रमा
वृद्धिको प्राप्त होता है॥ १६-१७॥
जिस प्रकार वायुके वेगसे अग्नि क्षणभरमें ही बढ़ने
लगती है, वैसे ही वह बालक अपने तेजके प्रभावसे
बढ़ता हुआ आकाशमण्डलका स्पर्श करने लगा ॥ १८ ॥
दिन-प्रतिदिन खेल-खेलमें वह बालक घरके समीपके
बहुतसे वृक्षोंको बायें हाथकी हथेलीसे उखाड़कर गिरा
देता था। जंगलमें क्रीडा करते हुए उसने पर्वतों तथा
वृक्षोंको चूर-चूर कर डाला। ऐसे ही एक बार उसने
चन्द्रमें दिखायी देनेवाले हिरणको उछलकर क्षणभरमें
पकड़ लिया ॥ १९-२०॥
एक बार किसी हथिनीके द्वारा जलमें उतरनेके
ही मार्गको अवरुद्ध कर दिये जानेपर इस बालकने
मुष्टिकाके प्रहारसे उसके गण्डस्थलको भेद डाला,
जिससे वह गिर पड़ी। उसके इस प्रकारके अद्भुत
कर्मोंको देखकर लोग अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये।
उसके अतिमानवीय बल-पराक्रमको देखकर उसके
माता और पिता अत्यन्त प्रसन्न थे॥ २१-२२॥
इस प्रकारके कर्मोंको करता हुआ वह सिन्धु
नामक महाबली बालक वृद्धिको प्राप्त होने लगा।
तदुपरान्त [एक दिन] वह अपने पितासे बोला कि हे
राजन् ! मैं तप करनेके लिये जाता हूँ। मैं तपके
अनुष्ठानके द्वारा स्वर्गलोक, भूलोक तथा रसातललोकपर
आक्रमण करके उन्हें अपने अधीन कर लूँगा। मेरा ऐसा
मानना है कि यहाँ घरपर रहकर तो मेरी आयु व्यर्थ ही
बीत जायगी ॥ २३-२४॥
उसका ऐसा वचन सुनकर उसके माता-पिता
उससे बोले— [हे वत्स!] पिता अपने पुत्रके उत्कर्षके
लिये नित्य ही प्रार्थना किया करते हैं और तुम्हारी
माता भी व्रत, दान, उपवास-पूजा आदिके द्वारा सभी
देवताओंको मनाती ही रहती हैं। इस प्रकारसे उनकी
अनुमति प्राप्तकर उन्हें प्रणामकर वह वनकी ओर
चल पड़ा ॥ २५-२६ ॥
वहाँ घूमते हुए उसने कमलोंसे समन्वित एक
सरोवर देखा। वहाँ जनशून्य स्थान देखकर उसका मन
प्रसन्न हो गया और उसने वहीं ठहरनेका निश्चय किया।
वह पैरके एक अँगूठेके बलपर भूमिपर खड़े होकर दोनों
हाथोंको ऊपर उठाकर भगवान् सूर्यका ध्यान करते हुए
शुक्राचार्यजीद्वारा उपदिष्ट उस मन्त्रका जप करते हुए
पर्वतके समान अडिग हो गया ॥ २७-२८ ॥
वह दाहिने घुटनेपर अपना बायाँ पैर रखकर हृदयदेशमें
दोनों हाथोंकी अंजलिको लगाकर उसी स्थितिमें रहकर
सतत भगवान् सूर्यका ध्यान करता था ॥ २९ ॥
शीत, वात, घाम एवं जलवृष्टियोंको दृढ़तापूर्वक
सहन करते हुए वह केवल वायुका आहार करने लगा।
उसका शरीर वल्मीकका ढेर बन गया था ॥ ३० ॥
शरीरके केवल अस्थिमात्र शेष रह जानेपर भी वह
उस महामन्त्रके जपमें तल्लीन था। इसी प्रकार साधना
करते हुए उसे दो हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ३१ ॥
उस समय उस सिन्धुके शरीरसे प्रकट होनेवाली
आभासे सूर्यदेव सन्तप्त हो उठे। इस प्रकारका उग्र तप
देखकर भगवान् सूर्य प्रकट हो गये ॥ ३२ ॥
वे बोले—इस समय मैं तुम्हारे साधनानुष्ठानसे
अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम अपने मनमें जो भी कामना हो,
उसे माँगो, मैं जीवित रहनेतक वह वरदान तुम्हें दूँगा।
भगवान् सूर्यद्वारा स्फुट रूपसे कहे गये उस वचनको
सुनकर सिन्धुने शारीरिक चेतनाको प्राप्तकर अपने सामने
प्रभु भगवान् सूर्यको प्रत्यक्ष देखा। तब वह उनके
चरणकमलोंमें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर इस
प्रकार स्तुति करने लगा ॥ ३३-३४ १/२ ॥

क्री०ख०-अ०७४] * राजा चक्रपाणिके पुत्र सिन्धुद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना * ४४७
सिन्धु बोला—हे दीनोंके स्वामी! आपको नमस्कार
है। सर्वसाक्षी भगवान् भास्करको नमस्कार है। देवताओंके
स्वामीको नमस्कार है, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव इस प्रकार
त्रिदेवस्वरूप सूर्यको नमस्कार है। समस्त विश्वके लिये
वन्दनीयको नमस्कार है। विश्वके कारणस्वरूप आप
भगवान् सूर्यको नमस्कार है॥ ३५-३६॥
वृष्टिके कारणरूप भगवान् सूर्यको नमस्कार है।
फसलोंकी उत्पत्तिके हेतुभूत आपको नमस्कार है, परब्रह्म
स्वरूपको नमस्कार है और सृष्टि, पालन तथा संहारके
कारणरूप आपको नमस्कार है॥ ३७॥
आप गुणातीत हैं, आपको नमस्कार है। गुरुरूप
आपको नमस्कार है। सत्त्वादि तीन गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न
करनेवाले आपको नमस्कार है। सर्वज्ञ, ज्ञान प्रदान
करनेवाले और सभीके स्वामीरूप आपको नमस्कार है*।
हे देव! आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरा वंश
धन्य हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये और मेरी
तपस्या भी धन्य हो गयी, जो कि आपका मुझे प्रत्यक्ष
दर्शन प्राप्त हुआ है॥ ३८-३९॥
हे दिनेश! यदि आप मुझे वर प्रदान करना चाहते
हैं, तो किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो—यह वरदान आप
मुझे प्रदान करें। आपकी कृपासे मैं संग्राममें सभी
देवताओंपर विजय प्राप्त करूँ। इस समय जो देवता हैं,
उनसे मेरी मृत्यु न हो॥ ४०१/२॥
ब्रह्माजी बोले—उस सिन्धुके द्वारा इस प्रकारके
माँगे गये वरदानोंको सुनकर सन्तुष्ट हुए भगवान् सूर्य
तपस्यानुष्ठानसे अत्यन्त दुर्बल शरीरवाले अपने उस
भक्तसे बोले॥ ४१॥
सूर्य बोले—मेरे वचनोंके अनुसार तुम्हें न तो
देवयोनियोंसे, न मनुष्योंसे, न तिर्यक् योनिके पशु-
पक्षियोंसे, न नागोंसे ही कोई भय होगा। न तो दिन, न
रात्रि, न उषाकाल और न सन्ध्याकाल—इस प्रकार
किसी भी समय तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी। हे राजपुत्र!
इस अमृतके पात्रको ग्रहण करो। यह जबतक तुम्हारे
कण्ठदेशसे लगा रहेगा, तबतक तुम्हारी मृत्यु नहीं
होगी॥ ४२-४४॥
इस अमृतपात्रको जो कोई भी तुमसे अलग कर
लेगा, उसीके हाथों तुम्हारी मृत्यु होगी। ऐसा कोई
देवता, जब अवतार ग्रहण करेगा, जो अपने केशोंके
अग्रभागसे स्वर्गको हिला डाले और जिसके अंगुष्ठके
नखके अग्रभागमें करोड़ों ब्रह्माण्ड समाये हुए हों, वे ही
प्रभु तुम्हें मार सकते हैं। अन्य किसीसे कभी तुम्हें भय
करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ ४५-४६॥
मेरे वरदानके प्रभावसे सब कोई तुम्हारे लिये तृणके
समान हो जायँगे। मैंने तुम्हें तीनों लोकोंका राज्य प्रदान
कर दिया है—इसमें कोई सन्देह करनेकी आवश्यकता
नहीं ॥ ४७॥
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार अनेक प्रकारके वरदान
देकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये। तब वह सिन्धु भी
अत्यन्त आनन्दमग्न होकर अपने भवनको चला गया ॥ ४८ ॥
तब माता एवं पिताने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उसके
मस्तकको सूँघा, और वे दोनों उससे कहने लगे—
'हे पुत्र! तुम्हारे वियोगमें हमने अन्नका परित्याग कर
दिया है। चिन्ताके कारण हम दोनों अत्यन्त कृश हो गये
हैं। तुम हमारी इस दशाको देखो।' तदनन्तर माता-
पिताके चरणोंमें प्रणाम करके अत्यन्त हर्षित होकर पुत्र
सिन्धुने कहा— ॥ ४९-५० ॥
भगवान् सवितादेवने प्रसन्न होकर मुझे तीनों
लोकोंका स्वामित्व प्रदान किया है। उनके वरसे मैं तीनों
लोकोंको अपने वशीभूत कर लूँगा। अतः आप लोगोंको
चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ ५१॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'वरप्रदान' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७४॥

  • सिन्धुरुवाच—
    नमस्ते दीननाथाय नमस्ते सर्वसाक्षिणे ॥
    नमस्ते त्रिदशेशाय ब्रह्मविष्णुशिवात्मने । नमस्ते विश्ववन्द्याय नमस्ते विश्वहेतवे ॥
    नमस्ते वृष्टिबीजाय सस्योत्पादनहेतवे । परब्रह्मस्वरूपाय सृष्टिस्थित्यन्तहेतवे ॥
    गुणातीताय गुरवे गुणक्षोभविधायिने । सर्वज्ञाय ज्ञानदात्रे सर्वस्य पतये नमः ॥