श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
चौंतीसवाँ अध्याय
उ०ख०-अ० ३४ ] * इन्द्रद्वारा चिन्तामणितीर्थमें चिन्तामणि विनायककी स्थापना * १०७
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चौंतीसवाँ अध्याय
इन्द्रद्वारा चिन्तामणितीर्थमें चिन्तामणि विनायककी स्थापना
नारदजी बोले—हे नरेन्द्र! वे जम्भासुरके शत्रु
इन्द्र कदम्बवृक्षके नीचे एक श्रेष्ठ आसनमें स्थित होकर,
मनका नियन्त्रण करके तथा नासिकाके अग्रभागमें
दृष्टिको जमाकर षडक्षर मन्त्रका जप करने लगे ॥ १ ॥
मरुद्गणोंके स्वामी उन इन्द्रके [तपस्यामें रत
होकर] वायुका भक्षण करते हुए सहस्र वर्ष व्यतीत हो
गये। उनके शरीरदेशपर वल्मीकों (दीमककी बाँबियों)-
के समूह बन गये, परंतु वे पर्वतकी भाँति स्थिर रहे ॥ २ ॥
तदनन्तर जो सर्वत्र गमनशील, सर्वविद्, उग्र तेजवाले,
अपने तेजसे अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके तेजका तथा
सबके नेत्रोंका आच्छादन करनेवाले, चार भुजाओंवाले,
रत्नजटित किरीट और माला धारण करनेवाले, सुन्दर
बाजूबन्द धारण करनेवाले, कुण्डलोंसे सुशोभित कपोलोंवाले
हैं, जो मोतियोंकी माला, नूपुर और मूल्यवान् कटिसूत्र
धारण किये हुए हैं; जो कमलके समान नेत्रवाले, महान्
कमलनालके सदृश विशाल सूँड़वाले, कमलके फूलोंकी
माला धारण करनेवाले हैं—ऐसे सिन्दूरविलेपित विग्रहवाले
अखिलदेवमूर्ति भगवान् गणेश प्रसन्न होकर इन्द्रके
समक्ष प्रकट हुए ॥ ३–५ ॥
उन्हें देखकर इन्द्र भयभीत हो गये कि 'यह क्या
है?', 'यह कौन आ गया?', 'मात्र अस्थि और प्राण-
अवशेष मैं कैसे जीवित बचूँगा ?' ॥ ६ ॥
'न जाने किसने इस महान् विघ्नको बनाया है और
आज मेरे सम्मुख उपस्थित कर दिया है?' [इसे
देखकर] मेरे शरीरसे पसीना निकल रहा है और शरीर
पीपलके पत्तेकी तरह काँप रहा है ॥ ७ ॥
इन्द्रकी इस प्रकारकी व्याकुलताको सर्वज्ञ भगवान्
गणेश जान गये और उन विघ्नविनायकने मधुर वाणीमें
महेन्द्रसे कहा— ॥ ८ ॥
विनायक बोले—हे देवेन्द्र! भय न करो। हे
देवराज! तुम मुझे कैसे नहीं जानते! जो निर्गुण,
निर्विकार, चिदानन्द, सनातन, कारणातीत, अव्यक्त,
जगत्के कारण-का-कारण है; जिस परमात्माका तुम
निश्चल होकर इस मन्त्रसे [जप करते हुए] सदा ध्यान
करते हो, जिसके [दर्शनके] लिये तुम चिरकालतक
श्रान्त रहे हो, वही मैं तुम्हारे समक्ष प्रकट हुआ हूँ,
तुम्हारी इस तपस्यासे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वर देनेके
लिये यहाँ आया हूँ ॥ ९–११ ॥
हे अनघ! अनन्त ब्रह्माण्डोंका सृजन, पालन और
संहार मेरे द्वारा ही होता है—ऐसा तुम जानो और तुम
जो चाहते हो, वह वर मुझसे माँग लो ॥ १२ ॥
नारदजी बोले—उन गणेशजीके मनोहर वचनोंको
सुनकर बलासुरहन्ता इन्द्रने विशाल विग्रहवाले देवाधिदेव
भगवान् विनायकको पहचान लिया ॥ १३ ॥
तब उन शचीपति इन्द्रने शीघ्र ही उठकर परम
भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार किया और उन प्रत्यक्ष
ब्रह्मस्वरूप गणेशजीसे कहा— ॥ १४ ॥
इन्द्र बोले—हे महाबाहो! सृजन, पालन और
संहार करनेवाले आपके गुणोंको दिक्पालोंसहित ब्रह्मादि
देवता भी नहीं जानते हैं। सौ [अश्वमेध]-यज्ञोंके
सम्पादनसे समुद्भूत पुण्यके फलस्वरूप जो मुझे इन्द्रपद
दिया गया है, वह भी कृत्रिम ही है; [क्योंकि सबके
वास्तविक स्वामी तो आप ही हैं।] उसमें भी प्रायः
अनेक विघ्न होते ही रहते हैं ॥ १५-१६ ॥
हे गजानन! मुझे आपकी महिमा कैसे ज्ञात हो
सकती है? हे महेश्वर! जिसपर आपकी पूर्ण कृपा होगी,
उसे ही आपकी महिमाका ज्ञान होगा। हे विघ्नकारण!
उसीके पास आपके गुणों एवं रूपोंके वर्णनकी शक्ति
होगी ॥ १७-१८ ॥
आप स्वयं निराधार होते हुए भी अखिल विश्वके
आधार हैं। आप नित्य ज्ञानरूप, अजर और अमर हैं।
आप नित्य आनन्दस्वरूप, पूर्णब्रह्म, मायापति, क्षर,
अक्षर, परमात्मा, विश्वरूप और अखिलेश्वर हैं। उग्र
तपस्याके द्वारा आपके स्वरूपका ज्ञान प्राप्तकर सनकादि
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१०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
मुनि परम शान्तिको प्राप्त हो गये ॥ १९-२० ॥
हे परमेश्वर! षडक्षरमन्त्रके प्रभावसे मुझे आपके
दर्शन प्राप्त हुए। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने कृपा करके मुझे
इस मन्त्रका उपदेश दिया था ॥ २१ ॥
उस समय ब्रह्माजीने मुझसे कहा था कि जब तुम
इस मन्त्रका विस्मरण कर दोगे, तभी तुम अपने पदसे
च्युत हो जाओगे और दुर्दशाको प्राप्त हो जाओगे ॥ २२ ॥
तब (विस्मृत हुए मन्त्रवाले) मुझ अत्यन्त लोलुपने
दुर्भाग्यके वशीभूत होकर उन मुनिपत्नी अहल्याका
सतीत्व नष्ट किया, इसलिये मैं दुर्गतिंको प्राप्त हो
गया ॥ २३ ॥
हे देवेश! पुनः बृहस्पतिजीके द्वारा उपदिष्ट उस
मन्त्रके जपके प्रभावसे मैं इस समय सहस्र नेत्रोंवाला
होकर आपके स्वरूपका दर्शन कर रहा हूँ ॥ २४ ॥
मैं एक अन्य वरकी याचना करता हूँ; क्योंकि आप
चिन्तित अर्थको देनेवाले (मनोकामना पूर्ण करनेवाले)
हैं, इसलिये यह कदम्बनगर 'चिन्तामणिपुर' - इस नामसे
प्रसिद्ध हो जाय ॥ २५ ॥
हे विघ्नराज ! इस समय अनुष्ठानके फलरूपमें मैंने
आपके चरणकमलोंका दर्शन कर लिया। अब मैं जो वर
माँग रहा हूँ, उसे मुझे दीजिये। हे देव! जिससे आपका
कभी विस्मरण न हो; हे देव! वैसा करो। हे विभो! आपके
चरणकमलोंमें मेरा मन सदैव रमण करता रहे ॥ २६-२७ ॥
हे गजानन ! आजसे इस लोकमें यह [विशाल]
सरोवर 'चिन्तामणितीर्थ' के रूपमें प्रसिद्ध हो जाय ॥ २८ ॥
हे जगद्गुरु ! इस सरोवरमें स्नान करने, यहाँ दान
देनेसे मनुष्योंको आपकी कृपासे धर्म-अर्थ-काम और
मोक्ष-सम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त हों ॥ २९ ॥
मुनि बोले- इन्द्रके वचनोंको सुनकर जगत्पति
विघ्नेश्वर गणेशजी मेघसदृश गम्भीर और मधुर स्वरमें
बोले- ॥ ३० ॥
[विघ्न ] विनायक श्रीगणेशजी बोले - हे विभो!
जिन-जिन वरदानोंके लिये तुमने प्रार्थना की, वे सब तो
तुम्हें प्राप्त होंगे ही, एक अन्य वरदान भी मैं तुम्हें देता हूँ
कि तुम अपने इन्द्रपदपर सदैव स्थिर रहो ॥ ३१ ॥
हे देवेन्द्र ! तुम्हें मेरी निरन्तर अविस्मृति रहे अर्थात्
तुम मेरा स्मरण कभी न भूलो। हे वासव ! जब तुमपर
कोई संकट आये तो मुझे स्मरण कर लेना ॥ ३२ ॥
मैं सदैव प्रकट होकर तुम्हारे सारे कार्योंको सम्पादित
कर दूँगा। यह (कदम्बपुर) पृथ्वीपर चिन्तामणिपुर नामसे
प्रसिद्ध होगा और मैं चिन्तामणि विनायकके रूपमें इच्छित
मनोकामनाओंको प्रदान करूँगा ॥ ३३-३४ १/२ ॥
नारदजी बोले- तब इस प्रकार वर प्राप्त करके
इन्द्रने स्वर्गस्थित गंगाजीके जलका आनयन किया और
उसके द्वारा उन सर्वव्यापक महाभाग गणेशजीका उनके
परिवार (पत्नियों- सिद्धि-बुद्धि और पुत्रों - क्षेम-लाभ)-
सहित अभिषेक एवं पूजन किया ॥ ३५-३६ ॥
देवराज इन्द्रद्वारा पूजित होकर वे प्रभु गणेशजी
वहीं अन्तर्धान हो गये। तब शतक्रतु इन्द्रने भी स्फटिकसे
निर्मित सर्वांगसुन्दर मंगलमयी दिव्य वैनायकी मूर्तिकी
वहाँ आदरपूर्वक स्थापना की और सुवर्ण तथा रत्नोंसे
जटिल विशाल मन्दिर बनवाया ॥ ३७-३८ ॥
उनकी प्रदक्षिणा और नमस्कार करके शतक्रतु इन्द्र
अपने स्थानको चले गये। तबसे इस पृथ्वीपर वह महान्
सरोवर चिन्तामणि [तीर्थ]-के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३९ ॥
आज भी पवित्र जलवाली गंगाजी शतक्रतु इन्द्रके
आदेशसे उस मूर्तिको नित्य अभिषेक करके सदा अपने
धामको चली जाती हैं ॥ ४० ॥
[नारदजी कहते हैं- हे राजन् !] इस प्रकार मैंने
तुमसे अद्भुत दर्शनवाले इस क्षेत्रकी महिमा कह दी। [यह
क्षेत्र] सभी दोषोंका हरण करनेवाला, ऐश्वर्यसम्पन्न, सम्पूर्ण
कामनाओंको प्रदान करनेवाला और मंगलमय है ॥ ४१ ॥
हे पृथ्वीपति ! तुम वहाँ जाकर विधिपूर्वक स्नान
करो, इससे तुम सभी दोषोंसे मुक्त हो जाओगे, इसमें
संशय नहीं है ॥ ४२ ॥
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] तदनन्तर मुनि नारद
उन राजा रुक्मांगदको आशीर्वादोंसे अभिनन्दितकर और
आदरपूर्वक उनसे विदा लेकर शीघ्र ही चल दिये ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चिन्तामणितीर्थवर्णन' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥
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