सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

क्री०ख०-अ०६९] विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ४३५

क्री०ख०-अ०६९] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३५
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ]
तलवारके दृढ़ आघातसे देव विनायक कुछ मूर्च्छित-
से हो गये, परंतु पलक झपकनेमात्रमें सावधान होकर वे
उस दैत्यराजके प्रति इस प्रकार दौड़े, जैसे हिरण्य-
कशिपुका वध करनेके लिये विष्णु और वृत्रासुरका वध
करनेके लिये शचीपति इन्द्र दौड़े थे ॥ १३ १/२ ॥
वे अपने चारों हाथोंमें बाण, कमल, पाश और
अंकुश धारण किये थे और वीरोचित शोभासे अत्यन्त
प्रकाशमान होकर सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने मेघसदृश
गर्जना करके अपने चारों आयुधोंसे उस दैत्यश्रेष्ठ
देवान्तकपर वेगपूर्वक प्रहार किया, परंतु फिर भी वह
विचलित नहीं हुआ। तब अपने शस्त्रोंको व्यर्थ हुआ
देखकर विनायक अत्यन्त आश्चर्यको प्राप्त हुए और
माना कि इस दैत्यका शरीर वज्रके सारभागसे बना हुआ
है ॥ १४-१६ १/२ ॥
तदनन्तर देवाधिदेव विनायकने उस महान् अस्त्रको
ग्रहण किया, जो वज्रको भी चूर्ण कर सकता था और
जिसे [विनायकके द्वारा पूर्वमें मारे गये] धूम्राक्षने
[सूर्योपासनाके फलस्वरूप] सूर्यमण्डलसे प्राप्त किया
था। उन्होंने दैत्य देवान्तकपर उसी अस्त्रसे प्रहार किया,
किंतु [देवान्तककी शारीरिक दृढ़ताके कारण] उसके
सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ १७-१८ ॥
उससे उसका एक रोम भी विचलित नहीं हुआ—
यह एक महान् आश्चर्यकी बात थी ! तदनन्तर उन
दोनोंने अनेक शस्त्रोंसे एक-दूसरेके सिर, पीठ, हृदय
और भुजाओंपर प्रहार किया। तब उन शस्त्रोंके प्रहारसे
उत्पन्न अग्नि पृथ्वीको जलाने लगी, परंतु वे दोनों
[उससे] भयभीत नहीं हुए और युद्ध करते रहे। आधी
रात हो जाने और अँधेरा फैल जानेपर भी उन्होंने युद्ध
बन्द नहीं किया ॥ १९-२१ ॥
तदनन्तर वे दोनों कृत्रिम प्रकाशमें परस्पर युद्ध
करने लगे। तब रौद्रकेतुने देवताओंको विमोहित करनेवाली
मायाका प्रयोग किया ॥ २२ ॥
उसने सुन्दर स्वरूपवाली अदितिकी रचनाकर उसे
दैत्य देवान्तकके हाथमें दे दिया। वह कमलनयनी पीन
पयोधरोंवाली और भालदेशपर रक्तवर्णके कुंकुमका आलेप
किये हुए थी। उसके गलेमें मुक्ताहार, हाथोंमें सुन्दर

[दायाँ स्तम्भ]
कंगन और शरीरपर दिव्य वस्त्र शोभायमान थे।
स्वर्णाभूषणोंसे विभूषित और दिव्य कंचुकी धारण किये
वह सौन्दर्यलहरीके समान थी ॥ २३-२४ ॥
दैत्यके हाथमें पड़ी वह विनायकको देखकर रुदन
करने लगी और उनसे बोली—'दौड़ो-दौड़ो, मैं संकटमें
हूँ, तुम देख क्या रहे हो?' ॥ २५ ॥
वह ऐसा कह ही रही थी कि उस दैत्यने बलात्
उसकी कंचुकी फाड़ डाली तथा उस मदोन्मत्त चित्तवाले
दैत्यने उसके वस्त्रोंको भी खींच लिया। तब उस
[मायारचित] अदितिने उच्च स्वरमें विनायकदेवसे कहा—
'तुम्हारा पुरुषार्थ कहाँ चला गया? अरे निष्ठुर !
लोकलब्जाके भयसे तुम शीघ्र मुझे [इस दैत्यसे]
छुड़ाओ' ॥ २६-२७ ॥
अदितिको ऐसी अवस्थामें देखकर आँसुओंसे
विनायकका कण्ठ भर आया, वे क्रोधित हो उठे, उन्हें
कुछ भी स्मरण नहीं रहा और न वे कुछ विचार ही कर
सके, शस्त्र उनके हाथोंसे गिर गये ॥ २८ ॥
वे सोचने लगे कि यह मेरी माता इसके हाथमें कैसे
आ गयी ? उस पुत्रके जन्मको धिक्कार है, जिसकी
जननी इस प्रकारकी दुरावस्थाको प्राप्त हो ॥ २९ ॥
देवताओंकी जननी होते हुए भी वह कैसे इस
दुष्टके चंगुलमें पड़ गयी ? गणनायकको इस प्रकार शोक
करते देखकर स्वयं काशिराज भी अत्यन्त शोकाकुल हो
उठे और साथ ही नगरमें स्थित लोग भी। तब उस
देवान्तकने विनायकदेवकी बहुत प्रकारसे निन्दा की—
'अरे ! तेरे जन्मको धिक्कार है, आज तेरा पौरुष कहाँ
गया ? तू प्राण क्यों नहीं त्याग देता ? तू तो निर्लज्ज है,
जो इस समय भी संसारमें अपना मुख दिखा रहा है।
अरे दुष्ट ! मैं तेरे समक्ष ही इसके शरीरसे इसका सिर
काटकर इसे मार डालता हूँ' ॥ ३०-३२ १/२ ॥
ब्रह्माजी कहते हैं— देवान्तकके इस प्रकारके
निष्ठुर वचनोंको सुनकर [विनायकदेवने] मनमें विचार
किया कि यह सत्य ही कह रहा है, अब मुझे
प्राणत्यागके लिये क्या करना चाहिये—'विषपान या
पाशबन्धन ? अथवा मृत्युकी प्राप्तिके लिये मुझे उदरमें
शस्त्राघात कर लेना चाहिये ?' जब वे दुःख और

४३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
शोकसे समन्वित होकर इस प्रकार विचार कर ही रहे | विनायक प्रातःकाल होनेपर युद्धके लिये गये ॥ ३८-३९॥
थे, तभी विनायकने आकाशवाणी सुनी ॥ ३३-३५१/२ ॥ | उस दैत्यने भी [रात्रिकालीन] युद्धकी समाप्तिपर
आकाशवाणीने कहा— हे देव! यह जान लो | [उषाकालमें] लाल-लाल आँखोंवाले, मुकुटसे सुशोभित
कि यह [अदिति] दुष्टबुद्धि दैत्यद्वारा मायासे रची गयी | और उज्ज्वल कुण्डल धारण किये विनायकको अपने
है। अतः संयतचित्त होकर अपने शत्रु का वध करो। तब | सम्मुख देखा ॥ ४० ॥
उस अदितिको मायामयी जानकर वे विनायक सावधान | दाँतोंकी कान्तिसे वे अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे,
हो गये ॥ ३६-३७ ॥ | मोतियोंकी मालासे विभूषित थे। वे दिव्य वस्त्र धारण किये
महाबुद्धिमान् विनायक हर्षित हो गये और दैत्य | हुए थे और अत्यन्त कान्तिमान् थे। उन सर्वव्यापक प्रभुकी
देवान्तकको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये। उन्होंने | सूँड़ आकाशका स्पर्श कर रही थी। विनायकके [ऐसे]
उस वरदानका स्मरण किया, जो भगवान् शंकरने उस | रूपको देखकर देवान्तक भयभीत और अत्यन्त विस्मित
दुरात्माको दिया था कि उषाकालके बिना सभी शस्त्रास्त्र | होकर [बोल पड़ा] —अरे! यह आधा मनुष्यका और
तुमपर व्यर्थ हो जायँगे। इस प्रकार उसको प्राप्त वरको जानकर | आधा हाथीके जैसे शरीरवाला कौन है? ॥ ४१-४२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन'
नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥
सत्तरवाँ अध्याय
देवान्तक-वध
ब्रह्माजी बोले—भयसे भ्रमित बुद्धिवाला वह | लोगोंने इसे [दैवीय] उत्पात माना ॥ ६-७ ॥
देवान्तक जब ऐसा कह रहा था, तभी विनायकदेवने उसे | उस समय युद्ध देख रहे सभी देवताओंके देखते-
छोटे बालकके समान उठाकर अपनी गोदमें ले लिया ॥ १ ॥ | देखते दैत्य [देवान्तक]-के शरीरसे निकलकर एक
तदनन्तर गणोंके स्वामी विनायकने अपने प्रभावसे | ज्योति विनायकमें प्रवेश कर गयी ॥ ८ ॥
सुन्दर पद्मासनमें बैठकर दैत्यराजसे कहा—'अपने सुन्दर | उसका शरीर तीन योजनके वृक्षसमूहों, पर्वतों और
वरदानका स्मरण करो' ॥ २॥ | पौधोंको चूर-चूर करता हुआ भूतलपर गिर पड़ा ॥ ९ ॥
तब वह दैत्य उनके दाँतको दोनों हाथोंसे पकड़कर | उसकी ऐसी गति देखकर उसके सैनिक दसों
अपने शरीरको अन्तरिक्षमें बार-बार झुलाने लगा ॥ ३॥ | दिशाओंमें भाग गये। उसके शरीरके गिरनेसे कितने ही
तब जैसे ही वह देवान्तक दाँतको तोड़कर भूतलपर | सैनिक मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ १० ॥
गिरा, वैसे ही उन सर्वव्यापक देव विनायकने शीघ्रतासे | अपने-अपने स्थानसे आये हुए देवता [विनायकपर]
अपने उस दाँतको पकड़ लिया ॥ ४ ॥ | पुष्पवर्षा करने लगे। राजा (काशिराज)-के नगाड़ोंकी
उन्होंने उसी दाँतसे देवान्तकके मस्तकपर प्रहार | ध्वनिके साथ देव-दुन्दुभियोंकी भी ध्वनि होने लगी ॥ ११॥
किया और अत्यन्त उच्च स्वरसे गर्जना की, जिससे | दिशाएँ निर्मल हो गयीं और सुखदायक हवा चलने
दिशाएँ-विदिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं ॥ ५ ॥ | लगी, अग्नि तेजयुक्त हो गयी और लोग प्रसन्न हो गये।
सम्पूर्ण पृथ्वी और सभी पाताल विचलित हो गये। | प्रतिकूल बह रही नदियाँ सन्मार्गगामिनी हो गयीं। तब इन्द्रादि
उस दन्ताघातसे देवान्तकके शरीरके तत्क्षण सैकड़ों | देवताओं और मुनियोंने उनका पूजन किया ॥ १२-१३॥
टुकड़े हो गये। आकाशसे मेघवृष्टिकी भाँति शीघ्र ही | उन्होंने परम भक्तिभावसे देवाधिदेव विनायकका
रक्तकी वर्षा होने लगी। पृथ्वीपर निवास करनेवाले सभी | स्तवन किया और कहा—'हे विभो! आपने हमें देवान्तकके

क्री०ख०-अ०७१ ] * काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप * ४३७
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
बन्धनसे मुक्त किया। हे देवेश ! आपने उपेन्द्र* (विष्णु)-
के समान कार्य किया है, अतः लोकमें आपकी ख्याति
'उपेन्द्र' नामसे होगी' ॥ १४-१५॥
अब हम लोग अपने-अपने पदोंपर भयरहित होकर
रहेंगे। स्वाहा, स्वधा और वषट्कार घर-घरमें होंगे ॥ १६॥
ऐसा कहकर उन सबने विनायकदेवको नमस्कारकर
उनकी प्रदक्षिणा की और आज्ञा लेकर प्रसन्नतापूर्वक
अपने-अपने स्थानोंको वापस लौट आये ॥ १७॥
देवताओं और मुनियोंने उनका 'हृषीकेश' ऐसा
नामकरण किया और उन्हें प्रणामकर हर्षित मनसे
अपने-अपने आश्रमोंको चले गये ॥ १८ ॥
तदनन्तर सभी राजाओंने विनायकका सम्यक् रूपसे
पूजनकर और प्रणामकर उनसे कहा- 'हे देव ! आपने
दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका उद्धार किया, इसलिये
आप 'धरणीधर' कहे जायँगे।' ऐसा कहकर वे सब
उनकी आज्ञा लेकर अपने-अपने नगरोंको चले गये।
तत्पश्चात् काशिराजने विनायकको देखा, वे बालरूप
धारण किये थे और सिंहपर आरूढ़ होकर बालकोंके
साथ खेल रहे थे ॥ १९-२१ ॥
बालक [-रूपधारी] विनायकने भी उन राजा
(काशिराज)-को देखकर परम आदरसे उनका आलिंगन
किया। वे दोनों आनन्दसे परिपूर्ण थे और आँखोंसे
आँसुओंकी वर्षा कर रहे थे॥ २२॥
तदनन्तर राजाने विनायकदेवसे कहा- 'मेरा महान्
भाग्योदय हुआ है, जो कि ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी
अगम्य सनातन परब्रह्म हैं, उनका मैं नित्य दर्शन कर रहा
हूँ। यह मेरे पूर्वजन्मके पुण्योंके फलका उदय है कि जो
विश्वके कारणोंके भी कारण हैं, और स्वयं कारणरहित
हैं, जो वेदान्तवेद्य, नित्य, ग्रह-नक्षत्रोंके प्रकाशक और
स्वयं प्रकाशरूप हैं, जो अनेक रूपवाले और निराकार
हैं, पृथ्वीके भारका हरण करनेवाले और मनोहर स्वरूपवाले
हैं, वे ही बालरूपसे मेरे घरमें स्वेच्छानुसार खेल रहे
हैं'॥ २३-२५१/२ ॥
ब्रह्माजी कहते हैं- काशिराजद्वारा की गयी इस
प्रकारकी स्तुति सुनकर विघ्नराजने आँसुओंको पोंछकर
कहा- 'मैं आपसे क्षणभरके लिये भी कभी दूर नहीं
जाऊँगा।' ॥ २६१/२ ॥
तब देवान्तकके वधसे हर्षित राजाने उनका अनेक
प्रकारसे उपचारोंसे पूजन किया और अनेक प्रकारके
वाद्योंकी ध्वनि तथा वन्दिजनोंद्वारा गायी गयी स्तुतियोंके
साथ सैनिकोंसहित बालरूप विनायककी स्तुति करते हुए
अपने नगरको गये ॥ २७-२८१/२ ॥
वहाँ सभी लोगोंको अनेक प्रकारके वस्त्र देकर
तथा कुछको पान देकर [राजाने] विदा किया। तत्पश्चात्
विनायकको आगे करके हर्षित मनसे उन्होंने अपने
रमणीय भवनमें प्रवेश किया ॥ २९-३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'पुरप्रवेश' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥

इकहत्तरवाँ अध्याय
काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप, मगधराजकी कन्याके साथ काशिराजके पुत्रका
विवाह, विनायकको साथ लेकर काशिराजका महर्षि कश्यपके आश्रममें गमन, पुरवासियोंका
वियोगमें व्यथित होना तथा विनायकद्वारा उन्हें पुनः आनेका आश्वासन देना

ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! दूसरे दिन जब राजा
काशिराज भद्रासनमें बैठे थे, तब उन्होंने अमात्यों, प्रधान
वीरों, वृद्धजनों, मित्रों तथा ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें
नमस्कार करके अपने मनकी बात बतलायी ॥ १ १/२ ॥
राजा बोले- मैंने अपने पुत्रके विवाहको सम्पन्न
करानेके लिये विनायकको बुलवाया था। उनके यहाँ
आनेपर अनेक उत्पात भी उत्पन्न हो गये, जिनका
निराकरण उन्होंने कर दिया। विनायककी माता अदितिसे

* भगवान् विष्णु वामनावतारमें इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिसे प्रकट हुए थे, अतः उन्हें 'उपेन्द्र' कहा गया था; वैसे ही विनायक भी
अदितिपुत्र और इन्द्रके अनुज हैं, अतः उन्हें भी उपेन्द्र कहते हैं।

४३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
मैंने कहा था कि शीघ्र ही मैं आपके पुत्रको वापस ले | आरूढ़ होकर वाद्योंकी ध्वनिके साथ महर्षि कश्यपजीके
आऊँगा, किंतु बहुत-से दिन जल्दी ही बीत गये। अब | श्रेष्ठ आश्रमके लिये प्रस्थान किया ॥ १३-१४ १/२ ॥
सारा लोक स्वस्थ हो गया है, अतः पुत्रके विवाहके | उस समय नगरके सभी लोग अपने-अपने कार्योंको
विषयमें आपको विचार करना चाहिये ॥ २-४ ॥ | छोड़कर बाहर निकल आये। उन्होंने भोजन करना,
अमात्य बोले— हे महाराज ! आपने ठीक ही कहा | पढ़ना, निद्रा, व्यासंग (नानाविध कर्मोंमें आसक्ति) आदिका
है, विघ्नोंके द्वारा विवाह-कार्यमें विलम्ब हो गया है, अब | परित्याग कर दिया और अपनी वेष-भूषाको पहने बिना
सब विघ्न दूर हो गये हैं, अतः विवाह-कार्य प्रारम्भ करना | ही वे शीघ्रतासे पुरीसे बाहर निकल आये ॥ १५-१६ ॥
चाहिये। विनायकके कृपा-प्रसादसे सम्पूर्ण जगत् स्वस्थ | उस समय हजारों बालकोंने उन विनायकको जाकर
एवं निर्भय हो गया है, अतः अब दूर देशोंमें स्थित | रोक दिया और वे कहने लगे—'आप हमको छोड़कर
मित्रजनोंको विवाहकी लग्नपत्रिका भेजनी चाहिये और | क्यों जा रहे हैं, क्यों आप इतने निष्ठुर हो गये हैं ? आपने
विवाहकी सभी सामग्री एकत्रित करनेके लिये दूतोंको | किसी बातचीतके प्रसंगमें पहले हमें कभी नहीं बताया था
गाँव-गाँवमें नियुक्त कर देना चाहिये ॥ ५-६ १/२ ॥ | कि 'मैं वापस जाऊँगा', हमारे घरमें भोजन किये बिना
ब्रह्माजी बोले— मन्त्रियोंद्वारा कही गयी इस | आप अपने आश्रमको क्यों जा रहे हैं?' ॥ १७-१८ ॥
प्रकारकी बातोंको सुनकर सभी लोग तथा सभामें बैठे | किसी बालकने रोते-रोते उनके चरणकमलको
हुए सभासद् कहने लगे—आप लोगोंने बहुत अच्छी बात | पकड़ लिया तो किसीने प्रेमपूर्वक उनका आलिंगन करके
कही है। यह सुनकर राजाको अत्यन्त हर्ष हुआ। उसी | उनके करकमलोंको पकड़ लिया ॥ १९ ॥
दिन उन्होंने ज्योतिषियोंसे विवाहका लग्न दिन निश्चित | नगरीकी स्त्रियाँ, बालिकाएँ तथा युवावस्थाको
करवा लिया ॥ ७-८ ॥ | प्राप्त सभी मुग्धा युवतियाँ अस्त-व्यस्त वेषमें ही उन्हें
तदनन्तर राजाने मित्रजनोंको बुलवानेके लिये | देखनेके लिये वैसे ही आ पड़ीं, जैसे कि वर्षार्ऋतुमें
मांगलिक दूतोंको भेजा और उचित रीतिसे विश्वस्त | समुद्रकी ओर जानेवाली सभी नदियाँ समुद्रकी ओर
दूतोंके द्वारा विवाह-सामग्रीको एकत्रित करवाया। तदनन्तर | प्रवाहित होने लगती हैं, जैसे हंस मोतियोंकी राशिकी
मगध देशके राजा भी अपनी पुत्रीको लेकर उस नगरीमें | ओर दौड़ पड़ते हैं, और जैसे मरुद्गण देवराज इन्द्रकी
आये और सभी मित्र तथा सम्बन्धी भी नाना दिशाओंसे | ओर चल पड़ते हैं ॥ २०-२१ ॥
वहाँ उपस्थित हुए ॥ ९-१० ॥ | वे स्त्रियाँ अत्यन्त प्रीतिसे समन्वित होकर कहने
उन्होंने परस्पर एक-दूसरेको अनेकों उपहार प्रदान | लगीं—'हे विनायक ! आप अकस्मात् स्नेहका परित्यागकर
किये। काशिराज तथा मगधके राजाने देवताओंकी स्थापना | क्यों जा रहे हैं? आज आप इतने निष्ठुर कैसे हो गये
की और बड़े-बड़े महोत्संवोंका आयोजन किया। उन्होंने | हैं?' ॥ २२ ॥
बड़े ही प्रयत्नपूर्वक विवाहकी समस्त विधियोंका सांगोपांग | ब्रह्माजी बोले—थके हुए, दौड़ते हुए, फिसलते
सम्पादन किया और धन आदिके प्रदानके द्वारा ब्राह्मणों | हुए तथा गिरते हुए उन सभी जनोंको देखकर राजासहित
तथा अन्य लोगोंको सन्तुष्ट किया ॥ ११-१२ ॥ | विनायक रथसे उतर पड़े ॥ २३ ॥
तदनन्तर काशिराजने सभी मित्रगणोंको विदा करके | राजाके साथ नगरसे शीघ्र ही बाहर आये वे
उबटनका अनुलेपन एवं स्नान कराकर विविध प्रकारके | विनायक एक मुहूर्त वहीं ठहरकर उन सभीसे बोले—
श्रेष्ठ आभूषणों तथा वस्त्रोंसे विनायकको सुसज्जित किया | 'इस समय मैं आप सबसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरे ऊपर
और अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ उन्हें भोजन कराया। | कृपा करना न छोड़ें, आप लोगोंके घर आकर वहाँ जो
इसके पश्चात् नृपश्रेष्ठ काशिराजने विनायकके साथ रथमें | अपराध मुझसे हुए हैं, उन्हें आप क्षमा कर दें। यदि आप

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य रूप (Transcription) नीचे दिया गया है:

क्री०ख०-अ०७२ ] * विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन * ४३९
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ - ऊपरी भाग]
लोगोंका पुनः दर्शन होगा, तो आप मुझे पहचाननेमें भूल
न करें।' उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर शोकमें
निमग्न समस्त पुरवासियोंके शरीरमें रोमांच हो आया
और वे गद्गद वाणीमें कहने लगे ॥ २४-२६१/२ ॥
लोग बोले—'आप समस्त जगत्के पिता हैं,
सबपर दया दिखानेवाले हैं, किंतु हमपर आपकी कुछ
भी ममता नहीं है। बालक कितने भी अपराध करनेवाले
क्यों न हों, पिता कभी भी उनका परित्याग नहीं करते।
चन्द्रमा कभी उष्ण नहीं होता और सुवर्ण कभी नीला
नहीं हो जाता, फिर क्यों आप इतने निष्ठुर हो गये हैं
और क्यों जानेके लिये इतनी उतावली कर रहे हैं? यदि
पहले आप यहाँ आये ही नहीं होते तो आज हमें जो
विरहजन्य शोक हो रहा है, वह नहीं होता ॥ २७-२९ ॥
हम सभीके मनको चुराकर आप चले क्यों जा रहे
हैं, हमारे मनको [आपके द्वारा] ले लिये जानेपर हम
सब मनके बिना कैसे कार्य करेंगे? जलके विनष्ट हो
जानेपर जलचर जीव कैसे जीयेंगे, यह आप हमें बताइये,
प्राण चले जानेपर हमारे शरीरका क्या प्रयोजन है? यदि
ईखसे विष निकलने लगे तो फिर उसका क्या प्रतिकार
है? इसलिये आप हम किंकरोंको भी अपने साथ वहीं
ले चलें, जहाँ आप जा रहे हैं' ॥ ३०-३२ ॥
उनके वचनोंको सुनकर वे विनायक अपने नेत्रोंसे
आँसुओंकी धारा बहाते हुए उन सभी स्त्रियों, वृद्धों एवं
बालकोंसे गद्गद वाणीमें बोले— ॥ ३३ ॥

[दायाँ स्तम्भ - ऊपरी भाग]
**विनायकदेव बोले—**आपको कभी भी दुखी
नहीं होना चाहिये। आपलोगोंको मेरा वियोग कभी नहीं
होगा; क्योंकि मैं सबकी अन्तर्आत्मामें निवास करनेवाला
हूँ, विनाशरहित हूँ और आनन्दस्वरूप हूँ। मुझ निराकारका
केवल चिन्तनमात्र करनेसे आपके मनका समाधान नहीं
होगा, अतः आप लोग अपने-अपने घरमें मेरी मिट्टीकी
मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करें। हे सज्जनो! आप लोग
जब संकटमें पड़ें, तब आप मेरा स्मरण करें, मैं आप
लोगोंको प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा और आप लोगोंके संकटका
विनाश करूँगा ॥ ३४-३६ ॥
**ब्रह्माजी बोले—**उनका वचन सुनकर सभी
नगरनिवासी अत्यन्त आनन्दित हो गये। उन्होंने देव
विनायकको प्रणाम किया, उनकी प्रदक्षिणा करके जय-
जयकार करते हुए उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३७ ॥
तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर सभी पुरवासी जन
अपने-अपने घरोंको चले गये, देव विनायक भी माताके
दर्शनकी लालसासे शीघ्र ही रथपर आरूढ़ होकर
काशिराजके साथ आगे चल पड़े ॥ ३८१/२ ॥
विनायकने मुँह घुमाकर पीछे नगरनिवासी बालकोंकी
ओर देखा, वे रो रहे थे। उनसे विनायकने कहा—'मैं
पुनः आऊँगा, तुम लोग जाओ, तुम्हें कोई चिन्ता नहीं
करनी चाहिये। मैं सत्य बोल रहा हूँ, कभी भी मैं झूठ
नहीं बोलता।' इस प्रकार समझा-बुझाकर उन्हें लौटाकर
वे क्षणभरमें ही अपने आश्रममें जा पहुँचे ॥ ३९-४० ॥

[अध्याय समाप्ति पुष्पिका]
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकका आश्रमकी ओर प्रस्थान'
नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७१ ॥


बहत्तरवाँ अध्याय
विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन, काशिराजद्वारा विनायककी महिमाका कथन,
काशिराजका काशीमें प्रत्यागमन तथा ढुण्ढिविनायककी स्थापना, माता अदिति तथा पिता
कश्यपको आश्वासन देकर विनायकका निजलोकगमन

[बायाँ स्तम्भ - निचला भाग]
**ब्रह्माजी बोले—**काशिराजके दूतने विनायककी
माता देवी अदितिसे यह पहले ही बता दिया था कि वे
विनायक काशिराजके साथ रथमें बैठकर यहाँ आ रहे
हैं। तदनन्तर वियोगसे व्यथित हुई वे अदिति शीघ्र ही

[दायाँ स्तम्भ - निचला भाग]
दौड़ती हुई आगेको गयीं। उत्सुकतावश शीघ्रतामें दौड़ते
हुए वे यह भी नहीं जान पायीं कि उनका उत्तरीय वस्त्र
गिर पड़ा है ॥ १-२ ॥
माताको देखकर मुनि कश्यपके पुत्र वे विनायक

४४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

शीघ्र ही रथसे उतर पड़े और माताके समीप चले आये,
माताने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उनका आलिंगन किया॥ ३॥
देवी अदितिके आनन्दाश्रु निकल पड़े। बहुत समय
बाद आनेके कारण विनायक भी आँसू बहाने लगे।
मुहूर्तभरके लिये वे दोनों उसी प्रकार एकीभावको प्राप्त
हो गये, जैसे जलमें जल मिलकर एक हो जाता है॥ ४॥
तदनन्तर स्नेहसे स्वच्छचित्त हुई माता अदितिने
प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया। उनके आँसू पोंछकर
वे बोलीं—'तुम बहुत दिनोंसे थके हुए हो।' तदनन्तर
काशिराजने अदितिको प्रणाम किया और वे गद्गद
वाणीमें कहने लगे॥ ५॥
राजा बोले—देव विनायकको [मेरे साथ] यहाँसे
गये हुए बहुत दिन व्यतीत हो चुके हैं, इसके निमित्त हे
मातः! आप मुझपर क्रोध न करें। हे कश्यपप्रिया! मैं इन
विनायकका वियोग सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ ६-७॥
अमृतसे कभी तृप्ति नहीं होती और खजानेके प्रति
कोई उदासीन नहीं होता। ये विनायक हमारे घरमें दिन-
प्रतिदिन नित्य नया-नया प्रेम बढ़ाते रहे हैं॥ ८॥
हमारे नगरमें होनेवाले बहुत-से उत्पातोंका इन्होंने
निवारण कर दिया है। असंख्य दैत्योंका वध कर डाला है।
इससे देवताओंको भी अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुई। इन्होंने
महान् यश अर्जित किया है और धर्मसेतुकी स्थापना की
है। इन्होंने इस प्रकारका पौरुष दिखलाया है, जैसा कि
इन्द्र आदि देवता भी नहीं दिखला पाये॥ ९-१०॥
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार काशिराजने सारा
वृत्तान्त उन्हें बतलाया। तदनन्तर माता अदितिने दुष्ट
जनोंकी दृष्टि (नजर) लगनेसे होनेवाले उत्पातकी
शान्तिके लिये बालक विनायकके सिरके ऊपर दही और
अन्न (सरसों आदि)-को घुमाकर घरके बाहर फेंका।
तदनन्तर वे बालक विनायकको काशिराजसहित अपने
आश्रममण्डलमें ले गयीं॥ ११-१२॥
अपने पुत्र विनायकको काशिराजके साथ आया
देखकर मुनि कश्यप बाहर चले आये, उन दोनोंने हाथ
जोड़कर भक्तिपूर्वक मुनिको प्रणाम किया॥ १३॥
तदनन्तर मुनि कश्यपने उन दोनोंका आलिंगन किया

और पुत्र विनायकके सिरको सूँघकर तथा उसे गोदमें
बैठाकर रुँधे हुए कण्ठसे वे कहने लगे—हे काशिराज!
आपने बालकको ले जाकर वापस लानेमें विलम्ब किया,
यह ठीक नहीं किया। आप 'शीघ्र ही वापस ले आऊँगा'
कहकर, इसे क्यों ले गये थे? हे राजन्! इसके वियोगमें
संतप्त मेरे अंगोंको बड़े ही पुण्यसे अभी इसका दर्शनकर
शीतलता प्राप्त हो रही है॥ १४-१६॥
ब्रह्माजी बोले—तब काशिराजने मुनि कश्यपके
वचनामृतका पान करके तथा उनकी आज्ञा प्राप्तकर
सुन्दर आसनपर बैठकर कहना प्रारम्भ किया॥ १७॥
राजा बोले—हे मुनीश्वर! इन विनायककी ही
माया अर्थात् सामर्थ्यके कारण मुझे [स्व-स्वरूपकी]
सत्यताका बोध हुआ। इन देवदेवने मेरे घरको निश्चित
रूपसे अपना घर बना लिया। हे मुने! ये विनायकदेव
सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण हैं और ये अपनी इच्छाओंके
वशीभूत हैं अर्थात् नित्य स्वतन्त्र हैं। मेरे पुत्रका विवाह
सम्पादित कराकर ये यहाँ आये हैं॥ १८-१९॥
ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर काशिराजने उन
विनायकद्वारा किये गये दैत्योंके वध आदि समस्त
कर्मोंको उन्हें बतलाया। यह सुनकर वे मुनि कश्यप तथा
उनकी पत्नी देवी अदिति अपने पुत्र विनायकका पराक्रम
तथा उनके बहुतसे गुणोंके विषयमें जानकर बहुत प्रसन्न
हुए। इसके पश्चात् उन सभीने बड़े ही आदरपूर्वक छः
रसोंसे सम्पन्न व्यंजनोंका भोजन किया॥ २०-२१॥
इसके बाद मुनि कश्यपने उन काशिराजको आशीर्वाद
प्रदानकर उन्हें विदा किया। राजाने भी उन सभीको
प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा करते हुए उनकी
अनुमति प्राप्तकर दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए बड़े दुखी
मनसे उन्होंने वहाँसे प्रस्थान किया॥ २२१/२॥
उन विनायकके गुणगणोंका स्मरण करते हुए
स्नेहसे परिपूर्ण काशिराजने वाद्योंकी ध्वनिके साथ शीघ्र
ही नगरमें प्रवेश किया। विनायकदेवको देखनेकी इच्छावाले
नगरके सभी लोग तथा बालक वहाँ आये, किंतु उन्होंने
वहाँ उन्हें नहीं देखा, तो वे अत्यन्त दुखी मनवाले हो
गये। वे उन काशिराजको अकेला देखकर अपने-अपने

क्री०ख०-अ०७२ ]
* विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन *
४४१


[बायाँ स्तम्भ]

घरोंको चले गये ॥ २३-२५ ॥
दूसरे दिन सभी नागरिकोंने राजासे अत्यन्त प्रीतिपूर्वक
पूछा—'हे राजन्! उन विनायकदेवने 'पुनः आऊँगा'—
ऐसा कहा था, तो फिर वे क्यों नहीं आये? आप भी
बड़े ही निष्ठुर बनकर उन्हें छोड़कर यहाँ कैसे चले
आये' ॥ २६१/२ ॥
राजा बोले—मेरे द्वारा बार-बार प्रार्थना किये
जानेपर मुनि कश्यपके पुत्र वे विनायक मुझसे कहने
लगे—'आप सभी लोग मेरी मूर्तिकी प्रतिष्ठापूर्वक
स्थापना करके उसकी सेवा-पूजा करें। सबके हृदयमें
स्थित रहनेवाले मुझे अन्तर्यामीका आप लोगोंसे वियोग
किसी प्रकार भी नहीं हो सकता' ॥ २७-२८ ॥
तदनन्तर नगरवासियोंने विनायककी धातुनिर्मित
अत्यन्त शुभ मूर्तिका निर्माण करवाया। वह प्रतिमा चार
भुजावाली थी। उसके तीन नेत्र थे। वह सभी प्रकारके
आभूषणोंसे सुसज्जित थी। उसके कान शूर्पके समान थे।
मुख हाथीके समान था। उसके शरीरके सभी अंग
अत्यन्त मनोहर थे। पुरवासियोंने उसका 'ढुण्डिराज' यह
नाम रखा और बड़े ही आदरभावसे ऋत्विजों, ब्राह्मणों
तथा अन्य वेदशास्त्रमें पारंगत विद्वानोंद्वारा उसकी स्थापना
करवायी ॥ २९-३०१/२ ॥
उन्होंने एक उत्तम मन्दिर बनवाया और उसमें उन
विनायककी प्रतिदिन वे पूजा करने लगे ॥ ३१ ॥
जिस-जिसके द्वारा भी जिस-जिस कामनासे
विनायककी पूजा की जाती, भक्तिपूर्वक पूजित हुए वे
प्रभु विनायक उस-उस व्यक्तिकी उन-उन कामनाओंको
उन्हें प्रदान करते ॥ ३२ ॥
इस प्रकार विविध स्वरूपोंको धारण करनेवाले वे
विनायक वहाँ सुशोभित हुए। जब सभी देवताओंके साथ
भगवान् विश्वनाथ अपनी नगरी काशीपुरीमें चले आये
और काशिराज दिवोदास अविमुक्तक्षेत्रमें सुखपूर्वक निवास
करने लगे, तब वे विनायक अपने पिता मुनि कश्यप तथा
माता अदितिसे कहने लगे ॥ ३३-३४ ॥


[दायाँ स्तम्भ]

प्राचीन कालमें तपस्याके द्वारा आराधित होनेपर मैं
आपके पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ था। मैंने पृथ्वीके
भारको भलीभाँति दूर कर दिया है तथा तीनों लोकोंको
पीड़ित करनेवाले महाबली दुष्ट दैत्यों देवान्तक तथा
नरान्तकका वध कर डाला है। मैंने देवताओं तथा साधु-
सन्तोंकी रक्षा की है और देवताओंको उनके पदोंपर
स्थापित कर दिया है, अब इस समय मैं अपने शाश्वत
लोकको जाऊँगा ॥ ३५-३६१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—विनायकके ऐसे वचनोंको सुनकर
अदिति तथा कश्यपको बड़ा दुःख हुआ। वे गद्गद कण्ठसे
उनसे कहने लगे—'हे देव! हम दोनोंको पुनः आपका
दर्शन कब प्राप्त होगा?' तब वे माता अदितिसे बोले—'हे
मातः! भवानीके मन्दिरमें शीघ्र ही मेरा दर्शन आपको
होगा। यह मेरा सत्य एवं प्रिय वचन है' ॥ ३७-३८१/२ ॥
विनायककी यह बात सुनकर जबतक वे कुछ
बोलतीं, उससे पहले ही वे अन्तर्धान हो गये। तब वे दोनों
खिन्न मनवाले हो गये। भक्तिपरायण उन्होंने एक अत्यन्त
सुन्दर मन्दिर बनवाया और एक मूर्ति बनवायी। उस
मूर्तिका 'विनायक' यह नाम रखा। उस मूर्तिका ध्यान
करनेमात्रसे वे सर्वव्यापक एवं विविध रूपधारी विनायक
प्रभु नित्य ही साक्षात् दर्शन देते हैं ॥ ३९-४११/२ ॥
इस प्रकारसे मैंने भगवान् विनायकका अत्यन्त
मंगलकारी चरित्र आपको बतलाया। यह आख्यान
सुननेमात्रसे सब प्रकारकी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला
है। कृतार्थ करनेवाला है। यश प्रदान करनेवाला है।
आयुष्य प्रदान करनेवाला और सभी प्रकारके उपद्रवोंको
विनष्ट करनेवाला है। यह सभी प्रकारकी कामनाओंको
पूर्ण करनेवाला और सभी प्रकारके संचित पापोंका नाश
करनेवाला है ॥ ४२-४३१/२ ॥
अब मैं आपको सिन्धु दैत्यके वधके लिये शिवके
घरमें मयूरेश्वर नामसे अवतरित हुए देव विनायकके
विषयमें बतलाऊँगा। जिन्होंने कि बाल्यकालसे ही
अत्यन्त अद्भुत नाना कर्मोंको किया था ॥ ४४-४५ ॥


॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकके चरित्रोंका वर्णन' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥