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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

कुछ भी नहीं है। हे राजन् ! इस व्रतकी कथा सुनकर

उ०ख०-अ०७१ ] * संकष्टचतुर्थी व्रतके उद्यापनकी विधि * २१७
सर्वसिद्धिकर व्रत, तप, दान, जप, तीर्थ, मन्त्र और विद्या
कुछ भी नहीं है। हे राजन् ! इस व्रतकी कथा सुनकर
स्वयं वाणीपर संयम रखते हुए भोजन करे ॥ १८-१९ ॥
[उस समय] हाथको घुटनेके अन्दर रखे और
हृदयमें गणेशजीका चिन्तन करे। ब्राह्मणोंको भोजन
करानेके पश्चात् जो शेष रहे, उसका बन्धु-बान्धवोंके
साथ भोजन करना चाहिये ॥ २० ॥
[इस व्रतको करनेसे] बहुत बड़ा कार्य भी थोड़े
ही महीनों (अल्पकाल) - में सिद्ध हो जाता है, इसमें
सन्देह नहीं है। बहुत क्या कहा जाय, अन्य कोई भी
साधन इससे शीघ्र सिद्धि देनेवाला नहीं है ॥ २१ ॥
इसका उपदेश अभक्त, नास्तिक तथा दुष्ट व्यक्तिको
न दे। इसका उपदेश केवल पुत्र, शिष्य और भक्तियुक्त
सज्जन व्यक्तिको ही दे ॥ २२ ॥
हे राजेन्द्र ! तुम मेरे प्रिय हो, धर्मात्मा हो और
क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ हो, प्रजाजनोंका उपकार करनेवाले हो,
इसीलिये मैंने तुम्हें इस व्रतका उपदेश दिया है ॥ २३ ॥
इसलिये सभी व्रतोंमें श्रेष्ठतम इसी व्रतको तुम्हें
करना चाहिये। इससे तुम्हारे समस्त कार्योंकी सिद्धि
होगी, मेरा वचन अन्यथा नहीं है। जब-जब कोई स्त्री
या पुरुष यह देखे कि उसके सामने कोई कठिन कार्य
उपस्थित है, तो वह इस श्रेष्ठ व्रतको करे; इससे
मनोऽभिलषित कार्य सिद्ध हो जाते हैं। भला, विघ्नेश्वर
गणेशजीके प्रसन्न होनेसे क्या दुर्लभ है ! ॥ २४-२५ ॥
सूतजी बोले - [ हे ऋषियो !] उस नृपश्रेष्ठने यह
सब सुनकर सम्पूर्ण दुःखोंकी शान्तिके लिये इस व्रतको
किया। व्रतके प्रभावसे उसने वैरियोंको जीतकर पुत्रोंसहित
निष्कंटक राज्यका भोग किया ॥ २६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रतमाहात्म्यवर्णन'
नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥
इकहत्तरवाँ अध्याय
संकष्टचतुर्थी व्रतके उद्यापनकी विधि, संकष्टचतुर्थीव्रतके
अनुष्ठानसे राजा कृतवीर्यको पुत्रप्राप्ति
राजा बोले - हे महाप्राज्ञ [ब्रह्माजी] ! इस (संकष्ट
चतुर्थी) - व्रतका उद्यापन कैसे करना चाहिये ? संसारके
हितकी कामनासे उसे मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नरेन्द्र ! व्रतकी सम्पूर्णताके
लिये प्रथम, पंचम अथवा सप्तम मासमें उद्यापन करना
चाहिये ॥ २ ॥
भक्तिमान् मनुष्य पूर्वमें बतलाये गये विधानके
अनुसार [ गणेशजीका] पूजन करे। पुष्पमण्डपिकाका
निर्माणकर उसे अनेक प्रकारके रंग-बिरंगे वस्त्रोंसे
सुसज्जित करे। उसमें अनेक प्रकारके रंगोंसे सर्वतोभद्र
मण्डलकी रचना करके पूर्वकी भाँति वहाँ कलशके ऊपर
देवेश्वर गणेशजी [-की प्रतिष्ठाकर उन]-का पूजन
करे ॥ ३-४ ॥
[तदनन्तर] सावधानचित्त होकर सुगन्धित चन्दन,
अनेक प्रकारके पुष्पों और नारिकेल फलसे [निम्न
मन्त्रसे] अर्घ्यदान करे। तिथियोंमें उत्तम हे देवि ! हे
गणेशजीकी प्रिय वल्लभा ! [इस] अर्घ्यको ग्रहण
कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये। हे देवि !
आपको नमस्कार है ॥ ५-६ ॥
[तदनन्तर गणेशजीको निम्न मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान
करे-]
हे मोदकप्रिय लम्बोदर गणेशजी ! आपको निरन्तर
नमस्कार है। हे देव ! [इस] अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और
मेरे संकटोंका निवारण कीजिये, आपको नमस्कार है ॥ ७ ॥
[तत्पश्चात् निम्न मन्त्रसे चन्द्रदेवको अर्घ्य दे-]
'क्षीरसागर [-का मन्थन होने]-से प्रकट हुए,
अत्रिगोत्रमें उत्पन्न हे चन्द्रदेव ! मेरे द्वारा दिये गये
अर्घ्यको रोहिणीसहित ग्रहण करें ॥ ८ ॥
तदनन्तर गणेशजीको भोज्य, भक्ष्य, लेह्य (चाटकर
खाये जानेवाले पदार्थ, यथा चटनी आदि), पेय तथा

२१८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
चोष्य (चूसकर खाये जानेवाले) पदार्थ निवेदित करे।
अन्य अनेक प्रकारके बहुत-से फलोंसे भी गणनायक
गणेशजीको प्रसन्न करे॥ ९॥
उसके बाद आचार्य और इक्कीस ऋत्विजोंका वहाँ
वरण करे और 'गणानां त्वा०' इस मन्त्रसे अथवा मूल
मन्त्रसे दस हजार, एक हजार अथवा उसकी आधी
(पाँच सौ) या एक सौ आठ आहुतियोंसे हवन करे;
तदनन्तर बलि प्रदान करे॥ १०-११॥
तदनन्तर पूर्णाहुति हवन करके [हवनकी अग्निमें]
वसोर्धारा गिराये। हवनके शेष कृत्योंका सम्पादन करके
उसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराये॥ १२॥
तत्पश्चात् उन ब्राह्मणोंको यथाशक्ति वस्त्रयुगल
(धोती-उत्तरीय), कलश और आसनसहित दक्षिणा
प्रदान करे। इस कार्यमें वित्तशाठ्य (कंजूसी) न करे॥ १३॥
तत्पश्चात् वस्त्रों एवं अलंकरणों आदिसे आचार्यका
पूजन करे। उनके भोजन कर लेनेके उपरान्त उन्हें
फलसहित वायन प्रदान करे। वायनसे पूर्णतया भरे हुए
सूपको लाल वस्त्रसे लपेटकर गणेशजीकी सुवर्ण प्रतिमाको
दक्षिणासहित उन्हें (आचार्यको) प्रदान करे॥ १४-१५॥
तदुपरान्त व्रतकी सम्पूर्तिके लिये एक आढक (६४
मुट्ठी) तिल तथा सम्यक् रूपसे विभूषित सवत्सा
कपिला गौ भी उन्हें प्रदान करे॥ १६॥
तदनन्तर ब्राह्मणोंसे क्षमा-याचनाकर 'अनेन पूजनेन
भगवान् विघ्नेशः प्रीयताम्' (इस पूजनसे भगवान्
गणेश प्रसन्न हों)-ऐसा कहे। इस प्रकारसे इस व्रतका
उद्यापन करके (मनुष्य) अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त
करता है॥ १७॥
[कृतवीर्यके] पिता बोले-[हे पुत्र!] इस
प्रकारसे ब्रह्माजीने लोकोपकारके लिये मुझे जिस व्रतका
उपदेश दिया था, उसे ही मैंने इस समय तुम्हें बतलाया
है। पुत्रकी प्राप्तिके लिये तुम इसे आदरपूर्वक करो॥ १८॥
इन्द्र बोले-[हे राजा शूरसेन!] जिस प्रकारसे
इस महान् व्रतको करनेका पिताने उपदेश दिया था,
बुद्धिमान् कृतवीर्यने वैसे ही उसे किया॥ १९॥
पण्डितोंने उस उत्तम व्रतका भलीभाँति व्याख्यान
करके प्रतिपादन किया। [उस व्रताराधनके अवसरपर]
स्वर्णनिर्मित तथा सिद्धि एवं बुद्धिसे युक्त गणपति-
मूर्तिको महामण्डपिकाके मध्य स्थलमें स्थापित करके
ब्राह्मणोंके द्वारा कहीं पुराणोंका पाठ किया जाता था,
कहीं शास्त्रोंकी मीमांसा हो रही थी, कहीं नृत्य-गान हो
रहा था। विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनियाँ निकलकर
आकाशको व्याप्त कर रहीं थीं। कहीं शास्त्रीय तात्पर्य-
निर्णय लोगोंके द्वारा किया जा रहा था, जिसमें कुछ लोग
निर्णायक बने थे॥ २०-२२॥
उस महाबुद्धिमान् राजा (कृतवीर्य)-ने [गणपतिके]
श्रेष्ठ मन्त्रका जप किया। जप करनेके पश्चात् हवन
तथा पूजन करके बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन भी
करवाया और उन्हें [वस्त्राभूषणोंसे] अलंकृत करके
अलंकारोंसे युक्त गायें भी प्रदान कीं। उसने दीन, अन्धे
तथा दुखी जनोंको भोजन और उनको अनेक प्रकारके
दान भी दिये॥ २३-२४॥
[भोजनादिसे] सन्तुष्ट हुए उन सभी जनोंसे उस
राजाने पुत्र-प्राप्तिका आशीर्वाद ग्रहण किया। उन
तपोनिष्ठ तथा सर्वदा सत्य-भाषण करनेवाले द्विजोंके
आशीर्वादसे थोड़े ही समयमें रानी गर्भवती हो गयी और
उसने मंगलमय मुहूर्तमें [श्रेष्ठ] लक्षणोंवाले पुत्रको जन्म
दिया॥ २५-२६॥
पुत्रजन्मसे अत्यन्त हर्षित उस राजाने अनेकविध
दान दिये और यथावसर उसका यज्ञोपवीत तथा विवाह
भी सम्पन्न किया। ज्ञान-विज्ञानसे समन्वित उस पुत्रका
राज्याभिषेक करके वह श्रेष्ठ पुत्रवाला तथा नानाविध
भोगोंसे सम्पन्न राजा अन्तमें भगवान् गणेशजीके परम
पदको प्राप्त हुआ॥ २७-२८॥
उस राजाके पुण्यसे वे सभी ऋत्विज्, पण्डित तथा
सभी दर्शक भी उसीके साथ भगवान् गणपतिके परम
धामको प्राप्त हुए॥ २९॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रतोद्यापन-विधि-वर्णन'
नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७१॥