श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
एक सौ तेईसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०१२३ ] * देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम * ५६१
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एक सौ तेईसवाँ अध्याय
देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम, मयूरेशका विराट्स्वरूप धारण करना,
पुनः लघुस्वरूपमें होकर मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित परशुद्वारा सिन्धुका वध करना,
शिव-पार्वती तथा देवोंका उपस्थित होना और मयूरेशस्तोत्रद्वारा स्तुति करना
ब्रह्माजी बोले- दैत्यराज सिन्धु आ गया है, यह
समाचार सुनकर वे मयूरेश आनन्दित हो गये और अपने
वाहन मयूरपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही युद्धके लिये निकल
पड़े। वे अपने हाथोंमें धारण किये हुए चार आयुधोंसे
सभी दिशाओं-विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे।
उन्होंने प्रलयकालीन मेघोंकी गर्जनाके समान गर्जना करते
हुए आकाशको निनादित कर डाला॥ १-२॥
उन्होंने देखा कि युद्ध करनेके निश्चयसे दैत्य
सिन्धु आगे खड़ा है, वह दैत्य सिन्धु भी इन्हें युद्ध
करनेके लिये रणभूमिमें उपस्थित देखकर बार-बार उसी
प्रकार उन्हें देखने लगा, जैसे हाथी सिंहको देखता है,
सर्प गरुड़को देखता है, मधु और कैटभ दैत्योंनै जैसे
भगवान् विष्णुको देखा था, त्रिपुरासुरने जैसे पार्वतीपति
भगवान् शंकरको देखा और जैसे शुम्भ तथा निशुम्भ
राक्षसोंने महाबलशालिनी जगदम्बाको देखा था। तदनन्तर
विविध प्रकारके शस्त्रोंसे उन दोनों मयूरेश और दैत्य
सिन्धुमें परस्पर युद्ध हुआ॥ ३-५॥
उस समय उन दोनोंकी देह रक्तसे सनी होनेके
कारण जपापुष्पके समान लाल रंगकी हो गयी। उन
दोनोंके शस्त्रोंके परस्पर आघातसे उत्पन्न अग्निने पर्वतोंसहित
सम्पूर्ण पृथ्वीको जला डाला॥ ६॥
उस समय सागर, द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सारी
पृथ्वी काँप उठी। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने एक बाण हाथमें
लिया और उसे आग्नेयास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रितकर
रणांगणमें उपस्थित उन देव मयूरेशको जला डालनेके
लिये छोड़ा। वह अग्निबाण उस देवसेनाको जलाते हुए
दसों दिशाओंकी ओर चला॥ ७-८॥
तदनन्तर तीनों लोकोंको कम्पित करते हुए मयूरेशने
अपने पाश नामक आयुधको मेघास्त्रसे संयोजितकर
दैत्यसेनापर छोड़ा। उस मेघास्त्रने जलधाराओंकी वर्षा
करते हुए आग्नेयास्त्रसे उत्पन्न अग्निको शान्त कर
डाला। तब अत्यधिक अन्धकारके द्वारा दसों दिशाएँ
व्याप्त हो गयीं॥ ९-१०॥
उन वेगशाली जलधाराओंने पर्वतोंको चूर-चूर कर
डाला, वृक्षोंके समूहके समूह टूट पड़े। क्या यह प्रलय
हो गया ? इस प्रकारसे वह दैत्यराज सिन्धु सोचने लगा।
तब दैत्य सिन्धुने पवनास्त्रका प्रयोग करके उन जलवृष्टि
करनेवाले मेघोंको तितर-बितर कर दिया। उस वायुने
आकाशमण्डल तथा दसों दिशाओंको कम्पित कर
डाला॥ ११-१२॥
तदनन्तर देव मयूरेशने अपने हाथमें धारण किये
हुए कमलको पर्वतास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और
उसे उस महान् दैत्यके ऊपर छोड़ दिया॥ १३॥
उस पर्वतास्त्रने वृक्षोंको उखाड़ डाला और दसों
दिशाओं तथा आकाशको उद्भासित कर दिया, फिर वह
अस्त्र दैत्यसेनाके मध्यमें गया और उसने बहुत-से
पर्वतोंको प्रकट कर डाला। उत्पन्न हुए असंख्य बड़े-
बड़े पर्वतोंने सारी पृथ्वीको आच्छादित कर डाला। उस
समय न कहीं ठहरनेके लिये स्थान रह गया था और
न कहीं जानेके लिये ही मार्ग बच गया था॥ १४-१५॥
पवनास्त्रको निष्प्रभाव हुआ देखकर और सभी
ओर पर्वतोंको व्याप्त देखकर दैत्य सिन्धुने वज्रास्त्रको
प्रेरित किया, जिससे असंख्य वज्र निकल पड़े॥ १६॥
उन असंख्य वज्रोंने पर्वतोंको चूर-चूर कर डाला।
यह देखकर देव मयूरेशने अपने आयुध अंकुशको
वज्रास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उन वज्रोंपर उसे
चला दिया। तब दोनों ओरसे वज्रयुद्ध होने लगा। उन
वज्रोंके टकरानेकी ध्वनिसे पृथ्वी कम्पित हो उठी और
पाताल, सभी दिशाएँ तथा आकाश भी प्रकम्पित हो
उठा॥ १७-१८॥
५७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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क्री०ख०-अ०१२३] * देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम * ५७१
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प्रसन्नताके साथ देव मयूरेशकी स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥
सभी बोले-जो परब्रह्मस्वरूप, चिदानन्दमय,
सदानन्दरूप, देवेश्वर, परमेश्वर, गुणोंके सागर, गुणोंके
स्वामी तथा गुणोंसे अतीत हैं, उन आदि ईश्वर मयूरेश्वरको
हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ३९ ॥
जो एकमात्र विश्ववन्द्य और एकमात्र परम
ओंकारस्वरूप हैं, जो गुणोंके परम कारण एवं निर्विकल्प
हैं, उन जगत्के पालक, संहारक एवं उद्धारक आदि-
मयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं।
जो महादेवजीके पुत्र, महान् दैत्योंके नाशक, महापुरुष,
सदा विघ्नविनाशक तथा सदैव भक्तोंके पोषक हैं, उन
परम ज्ञानके कोष आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते
हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४०-४१ ॥
जिनका कोई आदि नहीं है, जो समस्त गुणोंके
आदिकारण तथा देवताओंके भी आदि-उद्भावक हैं,
पार्वतीदेवीको महान् सन्तोष देनेवाले तथा सबके द्वारा
सदा ही वन्दनीय हैं, उन दैत्यनाशक एवं भोग तथा
मोक्षके प्रदाता आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं,
नमस्कार करते हैं ॥ ४२ ॥
जो परम मायावी (मायाके अधिपति) और
मायावियोंके लिये भी अगम्य हैं, महर्षिगण जिनका सदा
ध्यान करते हैं, जो अनादि आकाशके तुल्य सर्वव्यापक
हैं, जीवमात्रके स्वामी हैं तथा जिनके असंख्य अवतार
हैं, उन आत्मतत्त्वविषयक अज्ञानके नाशक आदिमयूरेश्वरको
हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४३ ॥
जो अनेकानेक क्रियाओंके कारण हैं, जिनका
स्वरूप श्रुतियोंके लिये भी अगम्य है, जो वेदबोधित
अनेकानेक कर्मोंके आदिबीज हैं, समस्त कार्योंकी
सिद्धिके हेतु हैं तथा देवेन्द्र आदि जिनकी सदा सेवा
करते हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं,
नमस्कार करते हैं ॥ ४४ ॥
जो महाकालस्वरूप हैं, लव-निमेष आदि भी
जिनके ही स्वरूप हैं, जो कला और कल्पस्वरूप हैं तथा
जिनका स्वरूप सदा ही अगम्य है, जो लोगोंके ज्ञानके
हेतु तथा मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले
हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार
करते हैं। महेश्वर आदि देवता सदा जिनके चरणोंकी
सेवा करते हैं, जो योगियोंके नित्य रक्षक, चित्स्वरूप,
निरन्तर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और करुणाके
सागर हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं,
नमस्कार करते हैं ॥ ४५-४६ ॥
हे सुरश्रेष्ठ ! आप सदा भक्तजनोंके लिये हठात्
परमानन्दमय सुख देनेवाले हैं; क्योंकि आप संसारके
जीवोंपर शीघ्र परम करुणाका विस्तार करते हैं। हे प्रभो !
काम-क्रोधादि छः प्रकारकी ऊर्मियोंके वेगको शान्त
कीजिये; क्योंकि आपके अनन्त सुखदायक भजनकी
अपेक्षा मुक्ति भी स्पृहणीय नहीं है। हे गजानन ! क्या हम
आपके योग्य कोई उत्तम या सुन्दर स्तवन कर सकते हैं ?
आप समस्त गुणोंकी निधि और सम्पूर्ण जगत्के प्रेमपात्र
हैं। आपके गुणसमूहोंका वर्णन करनेकी शक्ति हममें नहीं
है। आपका जो यह जगत्की सृष्टि-रचनाका क्रम है,
वह समुद्रके समान अपार है ॥ ४७-४८ ॥
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर
वे सभी बड़े ही आदरपूर्वक उनसे निवेदन करने लगे-
हे मयूरेश ! जो आपने कहा था, उस महान् वचनका
आपने पालन किया ॥ ४९ ॥
सभी देवसमूहोंके लिये यह महादैत्य सिन्धु अवध्य
था, उसे आज आपने मार गिराया है। उसी समय वहाँ
पार्वती आयीं और वे बड़ी आनन्दित हुईं, उन्होंने उन
मयूरेशका आलिंगन किया। भगवान् शिव भी वहाँ आये
और उन्होंने मयूरेशका आलिंगनकर उनसे कहा-हे
वत्स ! तुमने बहुत अच्छा कर्म किया है, अब सम्पूर्ण
त्रिलोकी हर्षित हो गयी है ॥ ५०-५१ ॥
सभी देवताओंके लिये भी जो असाध्य था, उस
दैत्य सिन्धुका तुमने वध किया है, फिर भी तुम्हें कोई
श्रम मालूम नहीं हुआ, तुम महापराक्रमशाली हो, सभी
लोगोंकी रक्षामें निरत रहते हो, चारों वेद भी तुम्हारे
यथार्थ स्वरूपका निरूपण कर पानेमें असमर्थ हैं और
तुम सभी विद्याओंके निधान हो। इस प्रकारसे कहनेके
अनन्तर वे सभी सम्मानित होकर अपने स्थानोंको चले
५७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
गये। मयूरेशको प्रणाम करनेके अनन्तर जब वे सभी | विजय प्राप्त होती है। वह अत्यन्त दुर्लभ ऐश्वर्यको प्राप्त
देवता जाने लगे तो देव मयूरेश उनसे बोले—जो इस | करता है, पुत्रवान् होता है, धन-सम्पत्ति प्राप्त करता है
स्तोत्रका पाठ करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त | और सबको अपने वशमें कर लेता है॥ ५५-५६॥
कर लेता है॥ ५२-५४॥
ब्रह्माजी बोले—मयूरेशके द्वारा ऐसा कहे जानेपर
इस स्तोत्रका एक हजार बार पाठ करनेसे कारागृहमें | देवगणोंने उनके कथनका 'साधु-साधु' ऐसा कहकर
बन्द बन्दीजनको वहाँसे मुक्ति प्राप्त होती है। इस | समर्थन किया और मयूरेशसे जानेकी आज्ञा प्राप्त करके
स्तोत्रका दस हजार बार पाठ करनेसे मनुष्य जो असाध्य | वे देवता चले गये और देव मयूरेशने भी अपने गणोंके
भी है, उसे तत्क्षण ही सिद्ध कर लेता है। उसे सर्वत्र | सहित अपने धामको प्रस्थान किया॥ ५७॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुके वधका वर्णन' नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२३॥
एक सौ चौबीसवाँ अध्याय
सिन्धु-वधके अनन्तर माता-पिता तथा पत्नीका करुण विलाप, पत्नी दुर्गाका सती होना, पिता
चक्रपाणिके द्वारा मयूरेशकी स्तुति और उनसे गण्डकीनगरमें चलनेके लिये प्रार्थना करना,
शिव-पार्वती तथा गणों एवं मुनियोंसहित मयूरेशका गण्डकीनगरके लिये प्रस्थान
ब्रह्माजी बोले—युद्धभूमिमें दैत्यराज सिन्धुके गिर | हमलोग रो रहे हैं। देवताओंको मरा हुआ देखकर
जानेपर जो बचे हुए योद्धा थे, वे वापस गण्डकीनगरमें | पार्वतीका पुत्र वह मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्धस्थलमें
चले आये और यहाँ उन्होंने देखा कि दैत्य सिन्धुकी | आया, उसने अपने अस्त्रोंके द्वारा दैत्यराज सिन्धुके
माता उग्रा, पत्नी दुर्गा तथा उसके पिता चक्रपाणि | अस्त्रोंको रोककर तीक्ष्ण परशुको छोड़ा॥ ६-७॥
अत्यन्त चिन्तामग्न तथा बहुत व्याकुल होकर पड़े हुए | उस परशुके आघातसे सिन्धु मृत्युको प्राप्त होकर
थे, उस समय उन लोगोंको अनेक प्रकारके अपशकुन | भूमिपर गिर पड़े। वहाँ उन दैत्य सिन्धुके सभी सैनिक
भी दिखायी देने लगे॥ १-२॥ | तथा नगरनिवासीजन भी मूर्च्छित हो गये॥ ८॥
उन्होंने देखा कि कोई व्यक्ति अशुभकी सूचना देता | दूतोंके मुखसे इस प्रकारकी बात सुनकर वे सभी
हुआ उत्तरकी ओर सिर करके सोया हुआ है। कोई अपने | रोने लगे। दैत्य सिन्धुकी पत्नी दुर्गा अत्यन्त विलाप करने
दोनों घुटनोंके बीच सिर रखकर बैठा था और बिना कुछ | लगी और जोर-जोरसे सिर पीटने लगी॥ ९॥
बोले चुपचाप हिलता हुआ-सा प्रतीत हो रहा था॥ ३॥ | उसके केश बिखर गये, वह अपने मुखको बार-
कोई स्त्री खिन्न-सी होकर अपनी ठुड्डीमें हथेलीको | बार पीटने लगी, उसके आभूषण गिर गये थे। उस समय
टिकाकर बैठी हुई है, उसी समय यमदूतोंके समान कुछ | सिन्धुदैत्यकी माता उग्रा, पिता चक्रपाणि तथा समस्त
दूत वहाँ आये, उन दूतोंका मुख अत्यन्त मुरझाया हुआ | पुरवासी रो-रोकर अपने हाथसे मुख पीटने लगे। वे
था, उनकी स्थिति दयनीय थी, वे कुछ बोल नहीं रहे | अपना सिर जमीनपर पटक-पटककर जोर-जोरसे चिल्लाते
थे, मौन थे। उनसे पूछे जानेपर उनमेंसे कुछ दूसरे दूतोंने | हुए भूमिपर लोटने लगे॥ १०-११॥
युद्धमें जो हुआ, वह समाचार बताते हुए कहा॥ ४-५॥ | कोई-कोई दुखी होकर धूलको अपने मुखपर तथा
दूत बोले—असंख्य महान् वीरोंका वध करनेके | सिरपर उछालने लगा, कोई अपनी हथेलीके पृष्ठभागोंको
अनन्तर दैत्यराज सिन्धु हम बालकोंको असहाय छोड़कर | दाँतसे काटने लगा और उनसे जमीन पीटने लगा। स्त्रियाँ
स्वर्गको प्राप्त हो गये हैं, इसी कारण उनके विरहमें | अपनी अँगुलियोंको तोड़-मरोड़कर गिरिजाके पुत्र उस
क्री०ख०-अ०१२४ ] * सिन्धु-वधके अनन्तर माता-पिता तथा पत्नीका करुण विलाप * ५७३
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मयूरेशको शाप देने लगीं ॥ १२ ॥
उग्रा बोली—[हे वत्स !] मैंने विविध प्रकारके प्रयत्नों, कठोर तपस्या, भगवान् सूर्यकी प्रसन्नता, उन्हें नमन करने, उनकी स्तुति करने, विविध प्रकारके उपवासों तथा सभी प्रकारके दानोंको देनेके अनन्तर बहुत समयके बाद किसी प्रकार तुम्हें प्राप्त किया है, अरे शूर ! अरे मानी ! इस समय तुम्हें कौन ले गया है ? ॥ १३ ॥
तुम्हारे तीनों लोकोंके नायक होनेसे मैं भी तीनों लोकोंमें प्रशंसनीय थी, लेकिन अब इस समय लोग मुझे 'तुम भाग्यहीन हो' इस प्रकार कहकर उलाहना देंगे ॥ १४ ॥
पूर्वकालमें तुमने यमराजको जीत लिया था, फिर आज कैसे उनसे मिलना हो गया है ? हे पुत्र ! आज पुनः तुमने उसको कैसे नहीं जीत लिया ? ॥ १५ ॥
हे पुत्र ! तुम्हारे स्वर्गलोक चले जानेपर पार्वतीके पुत्र उस मयूरेशकी इच्छा पूर्ण हो गयी है। मुझसे बिना पूछे ही तुम सुख देनेवाले उस स्वर्गलोकको क्यों चले गये हो ? हे पुत्र ! मुझे दुखी देखकर तुम किस प्रकार सन्तोष प्राप्त कर सकोगे ? हे पुत्र ! जब तुम गर्जना करते थे तो भयभीत होकर मेघ गरजना छोड़ देते थे, किंतु हे पुत्र ! वही आज तुम रणांगणमें कैसे शान्त होकर गिरे पड़े हो ? ॥ १६-१७१/२ ॥
दुर्गा बोली—वेदोंके विधानके अनुसार विधाताने हम दम्पतीका शरीर दो होनेपर भी एक तो बनाया है, किंतु उस मूढ़बुद्धि ब्रह्माने प्राणोंकी एकता क्यों नहीं बनायी ? सौभाग्यके अभिमानसे गर्वित होकर मैं अपने सामने शची तथा सावित्रीको भी कुछ नहीं गिनती थी, फिर वही आज मैं विधवा कैसे हो गयी हूँ ? [हे स्वामिन् !] आप जब अपने हाथसे मेरे अंगोंमें कस्तूरी तथा चन्दनका लेप लगाते थे, तभी मेरे अंग शीतल होते थे, किंतु इस समय शोकाग्निके द्वारा वे सभी अंग दग्ध हो रहे हैं, उन्हें आप शीतलता प्रदान करें ॥ १८-२१ ॥
पहले तो आप मेरे बिना अणुमात्र विषका भी सेवन नहीं करते थे, फिर आप आज मेरे बिना स्वर्गके उस सुखका कैसे भोग कर रहे हैं ? ॥ २२ ॥
जो सज्जन होते हैं, सबके साथ समान व्यवहार करनेवाले होते हैं, वे बिना अपराधके अपने सेवककी उपेक्षा नहीं करते हैं, फिर आप क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ? देवताओंका भी अन्त करनेवाले हे स्वामिन् ! आपने पूर्वकालमें बिना गुणोंकी अपेक्षा रखते हुए मुझसे विविध प्रकारका निश्छल प्रेम किया है, फिर इस समय उस अवर्णनीय प्रेमका परित्यागकर आप क्यों चले गये हैं ? ॥ २३-२४ ॥
ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर तपोवृद्ध तथा ज्ञानवृद्ध-जन यह कठोर वचन कहकर उनको समझाने लगे कि धर्मशास्त्रको जाननेवाले विद्वान् मृत्युके अनन्तर रोनेकी प्रशंसा इसलिये नहीं करते हैं कि मित्र तथा सम्बन्धीजनोंके जो आँसू निकलते हैं, वे निश्चित ही प्रेतके मुखमें पड़ते हैं, अतः उस मृत व्यक्तिका हित करनेवाले दयावान्को चाहिये कि उस प्रेतके लिये जो हितकारी कर्म है, उसे सम्पन्न करे* ॥ २५-२६ ॥
विचार करनेपर यह सुनिश्चित होता है कि उन कृपालु, निर्गुण, चिदानन्दघन, ब्रह्मस्वरूप मयूरेशने दैत्य सिन्धुको भी मोक्ष ही प्रदान किया है। संसारका कल्याण करनेवाले उन मयूरेशने जीवोंपर दया करनेके लिये ही शरीर धारण किया है और उन्होंने युद्धमें सम्मुख उस सिन्धुका वध करके उसे मोक्ष प्रदान किया है ॥ २७-२८ ॥
आत्मा अनादि है, निर्गुण है और नित्य है, इसलिये उसकी न तो मृत्यु होती है और न कभी उसका जन्म ही होता है, ऐसा वेदमें निश्चित किया गया है ॥ २९ ॥
व्यक्ति अपने स्वार्थवश ही मृत व्यक्तिके लिये रोता है, वह उसका हित नहीं चाहता। असंख्य प्राणियोंके भारको वहन करनेवाली पृथिवी, कूर्म, वराह तथा पृथ्वीको
- ब्रह्मोवाच
तपोवृद्धा ज्ञानवृद्धाः प्राब्रुवन्निष्ठुरं वचः । न रोदनं प्रशंसन्ति धर्मशास्त्रविदो जनाः ॥
यदश्रु सुहृदामास्ये प्रेतस्य तत्पतेद् ध्रुवम् । तस्मात्तस्य हितं यत्स्यात्तत्कर्तव्यं दयावता ॥
(श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १२४ । २५-२६)
५७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
धारण करनेवाले शेषनाग—ये सब प्रेतका भार सहन नहीं
कर पाते। वृद्धजनोंद्वारा इस प्रकारसे कहा जानेपर वे
लोग तब शोकमुक्त हुए ॥ ३०-३१ ॥
तदनन्तर दैत्य सिन्धुकी माता उग्रा, पिता चक्रपाणि,
अपनी सखियोंके साथ भार्या दुर्गा तथा गण्डकीनगरके
निवासी जन—ये सभी शोक करते हुए युद्धस्थलमें गये।
वहाँ उन्होंने रणभूमिमें पड़े हुए सिन्धुको देखा, जिसे
सेवक पंखा झल रहे थे, उसका मुखरूपी कमल फैला
हुआ था और उसके नेत्र सफेद हो चुके थे ॥ ३२-३३ ॥
उसके शरीरसे रक्त प्रवाहित हो रहा था और दुर्गन्ध
भी आ रही थी। वहाँ मांसभक्षी पक्षी तथा हिंसक पशु
भरे हुए थे। उसके माता-पिता, पत्नी तथा वे सभी
नगरनिवासी उसे चारों ओरसे घेरकर बैठ गये, वे अत्यन्त
दुखी तथा शोकसे व्याकुल थे ॥ ३४ ॥
अपने स्वामी दैत्य सिन्धुका सिर अपनी गोदमें रख
करके उसकी भार्या दुर्गा बड़े जोरसे चिल्लाती हुई शोक
मनाने लगी। हे नाथ ! पहले मैं अपने दोनों हाथोंसे
आपके पैर दबाया करती थी, किंतु यहाँ लोगोंके सामने
ऐसा करना सम्भव नहीं है, अतः हे प्राणनायक ! हे वीर !
आप उठें, शत्रुके जिन्दा रहते आप कैसे निद्रामें सो गये
हैं ? ॥ ३५-३६ ॥
तदनन्तर अपने पतिके मुखमें अपना मुख रखकर
वह विलाप करते हुए हाहाकार करने लगी। तब वृद्धजनों
एवं ज्ञानीजनोंने उसे ऐसा करनेसे रोका। तत्पश्चात् दैत्य
सिन्धुकी माता उग्रा तथा पिता चक्रपाणि—दोनों उसके
मुखको धोने लगे और फिर उससे बोले—अरे वत्स ! उठो,
शत्रुगणोंके जीवित रहते, क्यों सो रहे हो ? ॥ ३७-३८ ॥
वज्र धारण करनेवाले देवराज इन्द्रके वज्रसे आहत
हुएके समान तुम भूमिपर गिरे पड़े हो। इस समय उस
छोटे-से बालक मयूरेशके साथ युद्ध करनेपर तुम कैसे
भूमिपर गिर पड़े ? ॥ ३९ ॥
तुमने तो अपनी भौंहोंके इशारेमात्रसे यमराजको भी
जीत लिया था, फिर तुम आज कैसे उस यमके वशमें
आ गये ? हे विभो ! हमारे हृदयको आनन्द प्रदान
करनेवाले कुछ वचनोंको तो तुम बोलो ॥ ४० ॥
हे अनघ ! पूर्वकालमें जिसके शब्दसे तीनों लोक
भी काँप उठते थे, फिर आज हे अमन्द पराक्रमवाले वही
तुम वह शब्द क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ ४१ ॥
हम लोगोंने तुम्हारा कोई ऐसा अपराध भी नहीं
किया है कि जिस कारण तुम मौन हो गये हो। लगता
है कि तुम क्रोधके कारण ही अपनी समस्त सेनाके साथ
हमसे कुछ नहीं बोल रहे हो ॥ ४२ ॥
जिसने अपनी कान्तिसे कामदेवको भी जीत लिया
था, वही तुम आज किस प्रकार विह्वलताको प्राप्त हो
रहे हो ? तदनन्तर विद्वज्जनों तथा वृद्धजनोंने अनेक
प्रकारके उदाहरणोंद्वारा रोते हुए उन उग्रा तथा चक्रपाणि
आदिको आश्वस्त किया और धीरज बँधाया। साथ ही
यह भी कहा कि जो मर गया है, उसके पीछे स्वयं मर
जाना ठीक नहीं है, क्या दशरथके पुत्र श्रीराम परलोकमें
नहीं गये ? क्या अपने पराक्रमके बलपर शत्रुओंको
जीतनेके अनन्तर रघुश्रेष्ठ श्रीराम परलोक नहीं गये।
अन्य और भी सैकड़ों राजा उनके लिये युद्धभूमिमें
मृत्युको प्राप्त हुए और अब वे अनेक प्रकारकी अपनी
कीर्तिको स्थापित करके स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक स्थित
हैं ॥ ४३-४५ ॥
ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उन सभीने विल्व तथा
चन्दनकी लकड़ीसे उसका दाहसंस्कार किया। पतिव्रताके
गुणोंसे सम्पन्न उसकी भार्या दुर्गा उसीके साथ सती हो
गयी। तदनन्तर दैत्य सिन्धुके पिता चक्रपाणि
नगरनिवासियोंके साथ मयूरेशके समीपमें गये, उन्होंने
उन्हें नमस्कार किया और फिर हाथ जोड़कर वे धीरे-
धीरे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४६-४७ ॥
राजा बोले—हे विभो ! आप निर्गुण हैं, परमात्मा
हैं, सम्पूर्ण चर एवं अचर जगत्की गति हैं, आप
वेदत्रयीके द्वारा गम्य नहीं हैं, सत्त्वादि तीनों गुणोंके
स्वामी हैं, निर्मल स्वरूपवाले हैं और सम्पूर्ण जगत्के
स्वामी हैं। आपकी मायाके कारण ही मोहित देवता
आपको भलीभाँति नहीं जान पाते हैं। हे प्रभो ! आज
आपके दर्शनसे मैं धन्य हो गया हूँ और ये सभी गण्डकी-
नगरमें निवास करनेवाले भी धन्य हो गये हैं ॥ ४८-४९ ॥
क्री०ख०-अ०१२५ ] * कारागारसे मुक्त हुए देवताओंका मयूरेशकी महिमाका गान करना * ५७५
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार राजाके द्वारा स्तुत
किये गये, सभी शास्त्रोंके तत्त्वार्थको जाननेवाले एवं
कृपासिन्धु देव मयूरेश अत्यन्त प्रसन्नताके साथ बोले ॥ ५० ॥
देव बोले—हे चक्रपाणे! आपका पुत्र मृत्युको
प्राप्त हो गया है, आप मुझसे वर माँग लें ॥ ५० १/२ ॥
राजा बोले—हे देवेश्वर! यदि आप मुझपर
प्रसन्न हैं और यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो आप
हमलोगोंके घरमें पधारिये और इस गण्डकीनगरीको
पवित्र कीजिये ॥ ५१ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—राजाका इस प्रकारका वचन
सुनकर मयूरेशने मोरपर आरूढ़ होकर चक्रपाणिके नगर
गण्डकीको प्रस्थान किया। उनके पीछे-पीछे भगवान्
शंकर तथा माता पार्वती भी गये। उन सभीके आगे-आगे
वे सभी गण तथा मुनिगण प्रसन्नमन होकर चल रहे थे।
समस्त वाद्योंकी ध्वनिके साथ वे सभी उस गण्डकीनगरकी
ओर गये, जो विविध प्रकारकी ध्वजाओं और पताकाओंसे
सुसज्जित था और जहाँके मार्ग जल आदिके छिड़कावसे
स्वच्छ किये गये थे ॥ ५२-५४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरेशका गण्डकीनगरीके लिये प्रस्थानका वर्णन'
नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२४ ॥
एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय
कारागारसे मुक्त हुए देवताओंका मयूरेशकी महिमाका गान करना, चक्रपाणिद्वारा मयूरेशकी
प्रथम पूजा करनेसे इन्द्रका रुष्ट होना, महान् ध्वनिके साथ मयूरेशका प्रकट होना
और पुनः पंचदेवोंके रूपमें अवतरित होना, ब्रह्माजीद्वारा सिद्धि-बुद्धि
नामक कन्याओंका मयूरेशके साथ विवाह करना
ब्रह्माजी बोले—अपने नगरमें सबसे आगे पहुँचकर
चक्रपाणिने अत्यन्त मूल्यवान् चादरों तथा वस्त्रोंके द्वारा
और पताकाओं, ध्वजों एवं चामरोंके द्वारा अपनी
राजसभाको सुसज्जित करवाया। उस सभामें भूमिमें स्थित
स्तम्भोंमें नाना प्रकारके रत्नोंकी आभा प्रकाशमान हो
रही थी, जिसमें गये मनुष्योंके प्रतिबिम्ब अनन्त प्रकारके
दिखायी दे रहे थे ॥ १-२ ॥
देवेश्वर मयूरेशने विविध प्रकारके ध्वजोंसे सुशोभित
उस गण्डकीपुरीको देखा। उस पुरीके ऊँचे-ऊँचे भवनोंके
शिखरोंपर चढ़ी हुई स्त्रियाँ उन मयूरेशको देख रही थीं ॥ ३॥
बन्धनमें डाले गये वे देवता चक्रपाणिद्वारा मुक्त
होनेपर मयूरेशके समक्ष आये। उनमें विष्णु, इन्द्र, अग्नि,
कुबेर, मरुद्गण, सूर्य तथा इन्द्राणी आदि सभी थे। वे
विविध वाद्योंकी ध्वनि करते हुए शीघ्र ही वहाँ आये।
वे सभी देवता अपने-अपने वाहनोंसे उतरे और उन
सभीने मयूरेश्वरको प्रणाम किया ॥ ४-५ ॥
देवताओंने तथा पुरवासियोंने बड़े ही आदरके साथ
मयूरेशका आलिंगन किया। मयूरेशका दर्शनकर भगवान्
विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। विष्णु आदि सभी
देवताओंने दैत्यराज सिन्धुका वध कर दिये जानेके
कारण मयूरेशकी अत्यन्त प्रशंसा की ॥ ६ १/२ ॥
देवता बोले—जिसने स्वर्ग आदि सभी लोकोंको
भी भयभीतकर अपने अधीन बना डाला था, ऐसे दैत्य
सिन्धुका क्षणभरमें आपने वध कर डाला और शीघ्र ही
देवताओंको अपना-अपना पद प्रदान कर दिया, ऐसा
दूसरा कोई देवता न देखा गया है और न कभी सुना
ही गया है ॥ ७ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—वहाँ जो-जो भी वैष्णव, शैव,
शाक्त तथा सूर्योपासक सौर थे, उन्होंने मयूरेशका अपने-
अपने इष्टदेवके रूपमें अर्थात् विष्णु, शिव, दुर्गा तथा
सूर्यके रूपमें दर्शनकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उनका
पूजन किया। मयूरेशकी जय हो, यह ध्वनि सुनकर
सभीको बड़ा ही आश्चर्य हुआ ॥ ८-९ ॥
उस समय बालकों, युवावस्थाको प्राप्त मुग्धा
युवतियों, प्रौढा स्त्रियों, वृद्धजनों तथा युवावस्थावाले
पुरुषोंने देव मयूरेशका मानसिक पूजन किया ॥ १० ॥
५७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
हे मुनि व्यासजी ! चक्रपाणिके भवनमें पहुँचकर
देवेश्वर मयूरेश वहाँ मध्यमें स्थित एक शुभ सिंहासनपर
आसीन हो गये और उनके चारों ओर देवता, मुनि और
सात करोड़की संख्यावाले सभी गण स्थित हो गये।
तदनन्तर वन्दीजनोंने स्तुतिगान किया और वैसे ही
सफलमनोरथ देवताओं तथा राजाओंने भी स्तवन
किया ॥ ११-१२ ॥
उस समय अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे।
नारद आदि ऋषिगण गान करने लगे। तदनन्तर राजा
चक्रपाणिने विधि-विधानके साथ सबका पूजन किया
और पूजनके अनन्तर वे सभाके मध्यमें स्थित होकर
कहने लगे— आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरे
कर्म सफल हो गये, जो कि इन्द्र आदि लोकपाल मेरी
सभामें उपस्थित हुए हैं। अपने सौ जन्मोंके अर्जित
पुण्यफलोंके द्वारा आज मुझे मयूरेशके दर्शनका सौभाग्य
प्राप्त हुआ है ॥ १३–१४ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- मयूरेशकी सबसे पहले हुई पूजाको
देखकर इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे, वे जगदीश्वरकी
मायासे मोहित होकर एकाएक बोल उठे ॥ १५ १/२ ॥
इन्द्र बोले- हे चक्रपाणि ! जगत्का निर्माण करनेवाले
चतुर्मुख ब्रह्मा तथा लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके यहाँ
उपस्थित होनेपर भी तुम बड़े मूर्ख ही हो, जो कि तुमने
एक बालकका सर्वप्रथम पूजन किया है। हम सभीको
अपमानित करके मोहवश तुमने एक बालकका पूजन
किया है ॥ १६-१७ ॥
तुमने सभी लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, संहार
करनेवाले भगवान् शिव, सृष्टि-पालन तथा अन्त करनेवाली
तीनों लोकोंकी माता जगदम्बा तथा तीनों लोकोंके स्वामी
एवं वैदिक कर्मोंका प्रवर्तन करनेवाले भगवान् सूर्यको
छोड़कर एक बालकका पूजन किया है, यह तुमने ठीक
नहीं किया ॥ १८-१९ ॥
ब्रह्माजी बोले- देवराज इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर
राजा चक्रपाणि बोले- इस बालकमें रुद्र, सूर्य, कुबेर,
इन्द्र, मरुद्गण तथा अग्नि आदि देवोंसे अधिक पराक्रम
देखा गया है, जो कि इन्होंने दैत्यराज सिन्धुका वध कर
दिया और इन गुणेश्वर मयूरेशने ही दैत्य सिन्धुके
कारागारसे सभी देवताओंको मुक्त कराया है ॥ २०-२१ ॥
पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये ये भगवान् शिवके
घरमें अवतीर्ण हुए हैं। ये परमात्मा हैं, अनन्त शक्तियोंसे
सम्पन्न हैं और अनेकों दैत्योंका वध करनेवाले हैं ॥ २२ ॥
ब्रह्माजी बोले- राजा चक्रपाणि जब इस प्रकारसे
बोल रहे थे कि उसी समय देवोंको एक महान् ध्वनि
सुनायी पड़ी। उस ध्वनिसे ब्रह्माण्डमें विस्फोट होनेकी
आशंकासे कुछ देवता मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ २३ ॥
सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। उस समय कुछ भी
दिखायी नहीं पड़ रहा था। करोड़ों सूर्योंके प्रकाशसे
सहसा जगत् आच्छादित हो गया ॥ २४ ॥
तदनन्तर उन देवताओंने वहाँपर एक अत्यन्त सुन्दर
देवको देखा। वह नाना प्रकारके अलंकारोंको धारण
किये हुए था, उसकी दस भुजाएँ थीं और उसका मुख
हाथीके समान था ॥ २५ ॥
इस प्रकारके स्वरूपको देखकर वे सभी देवता उस
समय आश्चर्यचकित हो उठे। उसी क्षण उन्होंने पुनः
उस देवको पाँचस्वरूपधारी ईश्वरके रूपमें देखा ॥ २६ ॥
वह मध्यमें पद्मासनमें स्थित वक्रतुण्डके रूपमें,
आग्नेयकोणमें शिवरूपमें, नैर्ऋत्यकोणमें सूर्यरूपमें,
वायव्यकोणमें पार्वतीके रूपमें और ईशानकोणमें विष्णुरूपमें
दिखायी पड़ा। यह देखकर वे सभी देवता अत्यन्त भ्रममें
पड़ गये। तभी उन्हें आकाशवाणी सुनायी दी, जो उन
सभीके भ्रमका निवारण करनेवाली थी ॥ २७-२८ ॥
उस आकाशवाणीने कहा- ये देव सभी लोगोंके
लिये आराधनीय हैं। एक होनेपर भी ये पाँच रूपोंमें प्रकट
हुए हैं। ये देव आदि और अन्तसे रहित हैं। सम्पूर्ण जगत्में
व्याप्त रहनेवाले हैं और ये गजानन नामवाले हैं ॥ २९ ॥
ये देव देवताओं, मनुष्यों, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंके
द्वारा सदैव ही पूजनीय हैं और सभी विघ्नोंका विनाश
करनेवाले हैं। इनका पूजन हो जानेसे पंचदेवों-गणेश,
विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यका पूजन हो जाता है। इन
देवके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये, ऐसा
करनेपर वह नरकप्राप्तिका कारण बनेगी ॥ ३०-३१ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारकी आकाशवाणीको
सुननेके अनन्तर इन्द्र आदि उन प्रधान देवताओंने सूँड़से