श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०१२६ ] * विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान * ५७९
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एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय
विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान, मयूरेशपुरीका वर्णन, भाद्रपदमासके
गणेशव्रतकी विधि तथा उसकी महिमा, मयूरेशका द्वापरयुगमें सिन्दूरवधके लिये पुनः
अवतरित होनेका आश्वासन देकर अन्तर्धान होना, ब्रह्माजीका एक सुन्दर
प्रासादको निर्मितकर उसमें गजाननप्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना,
मयूरेशचरित्रश्रवणकी महिमा
ब्रह्माजी बोले—सिद्धि तथा बुद्धिके साथ विवाह | सुननेमात्रसे तत्काल ही चक्रपाणिकी आँखोंमें आँसू आ गये।
सम्पन्न हो जानेके अनन्तर देव मयूरेशने अपने वाहन | सभी नगरनिवासी उन मयूरेशको प्रणाम करके शोकाकुल
मोरपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही अपनी नगरीके लिये | होते हुए उच्चस्वरमें यह बात कहने लगे। आप जहाँ जा
प्रस्थान किया॥ १॥ | रहे हैं, हम सभीको भी वहीं ले चलें। आपका हम लोगोंको
उसी समय सभी देवता भी अपने-अपने वाहनोंपर | इस प्रकार यहाँ छोड़ना ठीक नहीं है ॥ ९-१० ॥
विराजमान होकर उन मयूरेशके आगे-आगे चलने लगे | यदि आप पहले यहाँ न आये होते, तो हम लोगोंको
और मुनिगण उनके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ २॥ | दुःख नहीं होता। ऐसा कहकर उन मयूरेशको प्रणाम
चक्रपाणिके साथ नगरके सभी निवासी, स्त्रियाँ | करके और उनसे आज्ञा लेकर वे सभी चले गये ॥ ११ ॥
तथा बालक बड़े ही आनन्दके साथ सहसा बाहर | राजा चक्रपाणिने भी उन्हें प्रणामकर अपने नगरको
निकलकर उनके पीछे चलने लगे। उस समय सभी | प्रस्थान किया। उन मयूरेशके बहुतसे अद्भुत गुणोंका
प्रकारके वाद्य बज रहे थे, अप्सराओंके समूह-के-समूह | वर्णन करते हुए वे सभी नगरनिवासी क्षणभरमें ही अपनी
नृत्य कर रहे थे। उन सभीसे घिरे हुए मयूरेश जैसे ही | नगरीमें पहुँच गये और चक्रपाणिसे आज्ञा प्राप्तकर
युद्धभूमिमें पहुँचे, त्यों-ही स्कन्द आदि वीर उन विभु | अपने-अपने घरोंको चले गये। चक्रपाणि भी अपने घर
मयूरेशसे प्रार्थना करते हुए कहने लगे ॥ ३–४१/२ ॥ | चले गये ॥ १२-१३ ॥
वीर बोले—युद्धभूमिमें जिन सेनानियोंको दैत्योंकी | राजा चक्रपाणिने अपने नगरमें सूर्य, गणेश, विष्णु,
सेनाने मार डाला था, वे सभी आपके दृष्टिपातरूप | शिव तथा दुर्गा—इन पंचदेवोंके लिये पाँच मन्दिर
अमृतसे सिंचित होकर उठ खड़े हुए हैं। मयूरेशके द्वारा | बनवाये और उनमें एक-एक मूर्तिकी स्थापनापूर्वक
उनको जीवित किया गया देखकर सभी देवता तथा | प्रतिष्ठा करवायी ॥ १४ ॥
नगरनिवासीजन अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये और 'साधु- | राजा चक्रपाणि भक्तिभावपूर्वक उन पंचदेवोंकी
साधु' इस प्रकारसे कहने लगे ॥ ५–६१/२ ॥ | नित्य पूजा किया करते थे। इधर मयूरेश भी क्षणभरमें
योजनमात्र मार्ग तय करनेपर देवेश्वर मयूरेश मार्गमें | अपनी मयूरेशपुरीमें पहुँच गये ॥ १५ ॥
ठहर गये और चक्रपाणिके सिरपर अपना मंगलमय हाथ | उस नगरीको देखकर सभी गण बड़े ही आश्चर्यमें
रखकर तथा शत्रुपक्षके वीरोंको भय पहुँचानेवाले अपने | पड़ गये। उस पुरीके स्तम्भ रत्नोंसे बने हुए थे और
दसों हाथोंसे राजाका आलिंगनकर उनसे बोले ॥ ७-८॥ | उसकी दीवारें सोनेसे निर्मित थीं ॥ १६ ॥
देव बोले—मेरे कथनानुसार तुम शीघ्र ही सभी | उन रत्नमय तथा स्वर्णिम दीवारोंमें अपना प्रतिबिम्ब
नागरिकोंके साथ अपने गण्डकीपुरकी ओर प्रस्थान | अकेला नहीं दिखता था, अपितु असंख्य जनोंसे समन्वित
करो ॥ ८१/२ ॥ | दिखता था। उस रमणीय सभामण्डपमें ब्रह्मा आदि
ब्रह्माजी बोले—मयूरेशके इस प्रकारके वचन | देवोंको बैठाकर मयूरेशने सभाके मध्यमें प्रवेश किया
५८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
और सभी ओर दृष्टि दौड़ायी। उन्होंने उस सभाके
पूर्वभागमें रतिके साथ कामदेवको तथा मार्जारी नामवाली
लोकमें प्रसिद्ध देवीको देखा, जो सुख प्रदान करनेवाली
हैं। सभाकी दक्षिण दिशामें उन्होंने भगवान् शिव और
पार्वतीको देखा ॥ १७-१९॥
उनके आगे देवी विरजाको देखा, जो भक्तोंकी
सकल कामनाओंको पूर्ण करनेवाली हैं। पश्चिम दिशामें
धरणीदेवीसे समन्वित भगवान् वाराहको और सब प्रकारके
विघ्नोंका नाश करनेवाली आश्रया नामवाली मंगलकारिणी
देवीको देखा ॥ २० १/२ ॥
उत्तर दिशामें श्रीहरिका और प्रसिद्ध मुक्तादेवीका
दर्शन किया, वे देवी सब प्रकारकी मुक्तिको प्रदान करनेवाली
हैं। तैंतीस करोड़ देवता भी उन मयूरेशका दर्शन
करनेकी इच्छासे वहाँ आकर स्थित हो गये ॥ २१-२२ ॥
[इसी प्रसंगमें ब्रह्माजी भाद्रपद चतुर्थी-व्रतानुष्ठानका
निरूपण करते हुए कहते हैं—हे व्यासजी !] भाद्रपदमासके
शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिको स्नान करनेके अनन्तर
सर्वप्रथम गजाननकी पूजा करे, तदनन्तर पूर्व दिशामें
जाकर वहाँ मार्जारी देवीका पूजन करे ॥ २३ ॥
पूजनके अनन्तर ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके दान
प्रदान करे और गजाननका स्मरण तथा ध्यान करके मौन
व्रतसे रहे। इस प्रकारसे धीरे-धीरे चले कि चलते समय
पैरोंसे होनेवाली आवाज न सुनायी दे ॥ २४ ॥
कृमि, कीट तथा पतंग आदिकी हिंसा न करे, प्रयत्नपूर्वक
पवित्रता एवं संयमसे रहे। तदनन्तर पुनः स्नान करके
देवाधिदेव गजाननकी (सायंकालीन) पूजा करे। इसी
प्रकार दूसरे दिन तथा तीसरे दिन भी पहले दिनकी भाँति
क्रमशः पूजन आदि करे, दूसरे दिन दक्षिणद्वारपर देवी
विरजाकी पूजा मार्जारीदेवीके समान ही करे ॥ २५-२६ ॥
तीसरे दिन पश्चिमद्वारपर आश्रया नामवाली देवीको
नमस्कार करके पूर्ववत् उनका पूजन करे, चतुर्थी
तिथिको व्यक्तिको चाहिये कि वह उत्तरद्वारपर पूर्वोक्त
विधिके अनुसार देवी मुक्ताका पूजन करे और फिर
मयूरेशका पूजन करे। महोत्सव मनाये तथा रात्रिमें
जागरण करे ॥ २७-२८ ॥
इस प्रकारसे जो उपवासपूर्वक चारों द्वारोंमें स्थित
देवियोंका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह भगवान्
मयूरेशके कृपाप्रसादसे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त
कर लेता है। यदि समर्थ हो तो चतुर्थी तिथिको ही चारों
द्वारोंपर पूर्वकी भाँति मार्जारी आदि देवियों और मयूरेशका
पूजन करे। इन देवियोंके पूजनके आदि और अन्तमें जो
स्नान करके देवेश्वर मयूरेशका दर्शन करता है, तो
उसका फल देव गजानन प्रसन्न होकर तुरन्त ही प्रदान
करते हैं ॥ २९-३० १/२ ॥
अतः भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे
प्रारम्भ करके ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए चतुर्थी
तिथिके दिन उषाकालमें स्नान करके तथा विधिपूर्वक
सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्म सम्पन्न करनेके अनन्तर
विधि-विधानसे मयूरेश्वरका पूजन करे ॥ ३१-३२ ॥
पूजनके अनन्तर इक्कीस बार प्रदक्षिणा और
नमस्कार करे। तदनन्तर शीघ्रतासे पूर्वद्वारमें जाकर
मार्जारीको नमस्कार करे। फिर दक्षिणदिशामें विरजा,
पश्चिमद्वारमें आश्रया, उत्तरद्वारमें जाकर श्रेष्ठ मुक्तादेवीको
प्रणाम करे। इसके पश्चात् किंचित् दिन शेष रहनेपर
मयूरेश्वरकी पूजाका आरम्भ करे। पूजक व्यक्ति अत्यन्त
ध्यानपूर्वक सोलह उपचारोंद्वारा मयूरेश्वरका पूजन करे
और रात्रिमें गीत तथा वाद्योंकी ध्वनिके साथ जागरण
करे ॥ ३३-३५ ॥
प्रातःकाल होनेपर निर्मल जलमें स्नान करनेके अनन्तर
पुनः देवेश्वर मयूरेशका पूजन करे। तदनन्तर यथाशक्ति
ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी व्रतकी पारणा करे ॥ ३६ ॥
उन ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र, धान्य तथा गो आदि
प्रदान करे। इस प्रकारसे जो व्यक्ति व्रत करता है, वह
जो कुछ असाध्य है, उसे भी सिद्ध कर लेता है। वह
पुत्र-पौत्रोंकी सम्पदासे सम्पन्न होता है और विविध
सुखोंका उपभोग करनेके अनन्तर अन्तमें स्वर्गलोक प्राप्त
करता है। वहाँ इन्द्र, यम, कुबेर आदि लोकपाल उस
मनुष्यकी पूजा करते हैं ॥ ३७-३८॥
आठों प्रकारकी नायिकाएँ उस व्रती व्यक्तिके
चरणकमलोंकी सेवा करती हैं। अन्धेको दृष्टि प्राप्त हो
क्री०ख०-अ०१२६]
* विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान *
५८१
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जाती है, मूक व्यक्ति अवश्य ही वाणी प्राप्त कर लेता
है। जो भार्याकी अभिलाषा करता है, वह भार्या प्राप्त
कर लेता है और जो विद्यार्थी है, वह उत्तम बुद्धिको
प्राप्त कर लेता है। चारों द्वारोंमें उपवास करनेपर भी यही
फल कहा गया है॥ ३९-४०१/२॥
[इस प्रकार चतुर्थी-व्रतानुष्ठानका निरूपण करके
ब्रह्माजी पुनः पूर्ववर्ती प्रसंगका वर्णन करते हैं—]
तदनन्तर किसी दिनकी बात है, देवेश्वर मयूरेश विष्णु,
ब्रह्मा तथा शिव आदि सभी देवताओंसे अत्यन्त स्निग्ध
वाणीमें कहने लगे ॥ ४११/२ ॥
मयूरेश बोले— हे देवो ! जिस कार्यको सम्पन्न
करनेके लिये मैं अवतरित हुआ था, वह कार्य मैंने पूर्ण
कर लिया है। मैंने बहुत-से दैत्योंका वध किया और
पृथ्वीके भारको हलका कर दिया। दैत्य सिन्धुके
कारागृहसे सभी देवताओंको मुक्त किया है॥ ४२-४३॥
अब स्वाहाकार, स्वधाकार तथा वषट्कार आदि
अर्थात् देवपूजन, यज्ञ तथा पितृकर्म-श्राद्धादि पहलेकी
भाँति होने लगेंगे। हे देवो ! आप सबसे आज्ञा लेकर अब
मैं अपने धामको जाना चाहता हूँ॥ ४४॥
मयूरेशके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सभी
देवता शोकमें पड़ गये। आँसू बहाते हुए तथा एक-
दूसरेका मुख देखते हुए वे कहने लगे॥ ४५॥
हे मयूरेश ! हम लोगोंको छोड़ करके आप कहाँ
जाना चाहते हैं? आप स्नेहका परित्यागकर इस प्रकारसे
अत्यन्त निष्ठुर कैसे हो गये हैं? तदनन्तर देवी पार्वती
भी यह सब सुनकर एकाएक शोकसे व्याकुल हो उठीं।
मूर्च्छित होकर वे भूमिपर गिर पड़ीं। एक मुहूर्तके बाद
चेतना लौटनेपर वे कहने लगीं—॥ ४६-४७॥
हे दीनानाथ ! हे दयासागर ! हे जगन्नाथ ! हे
सिन्धुदैत्यका विमर्दन करनेवाले ! मुझ अपनी माताका
परित्यागकर तुम कहाँ जाओगे ? हे सुरेश्वर ! आपके
चले जानेपर मेरे प्राण भी नहीं रहेंगे ॥ ४८१/२ ॥
देव बोले— हे शुभे ! द्वापरयुग आनेपर मैं पुनः
आपकी पुत्रताको प्राप्त होऊँगा। मेरा वचन मिथ्या नहीं
होगा। आप कुछ भी चिन्ता न करें। आपके वियोगसे
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मुझे भी अतुलनीय दुःख हो रहा है॥ ४९-५०॥
हे माता ! सुहृज्जनोंका एक स्थानपर रहना सर्वदाके
लिये सम्भव नहीं होता है। आगे अत्यन्त भयंकर सिन्दूर
नामक एक दैत्य उत्पन्न होगा। वह सभी देवताओंके
लिये अवध्य होगा, तब मैं आपके पुत्रके रूपमें उत्पन्न
होऊँगा। हे शिवप्रिये ! मैं स्मरणमात्र करनेसे ही आपके
समक्ष उपस्थित हो जाऊँगा॥ ५१-५२॥
तदनन्तर कार्तिकेय बोले—आप जहाँ जा रहे हैं,
मुझे भी वहाँ ले चलें। बालक, असहाय तथा दीनकी
उपेक्षा करना ठीक नहीं है॥ ५३॥
देव बोले— हे बन्धु ! आप चिन्ता न करें, मैं यहाँ
पुनः आऊँगा। मुझ अन्तर्यामीका आपसे कभी भी वियोग
नहीं होगा। तदनन्तर मयूरेश्वरने अपने भाई कार्तिकेयको
अपना वाहन मयूर प्रदान किया और उसी समय उनका
मयूरध्वज यह नाम रखा ॥ ५४-५५ ॥
तदनन्तर बन्धु गुणेश्वरकी आज्ञासे कार्तिकेय उस
मयूरके ऊपर [जैसे ही] आरूढ़ हुए, उसी क्षण वे देव
मयूरेश्वर अन्तर्धान हो गये ॥ ५६ ॥
उन मयूरेश्वरके अन्तर्धान हो जानेपर ब्रह्मा, विष्णु
तथा महेशने सर्वदा ही उन्हें अपने हृदयदेशमें प्रतिष्ठित
देखा। तदनन्तर ब्रह्माजीने एक अत्यन्त मनोहर प्रासाद
बनवाया और बालुकासे गजाननकी मूर्ति बनाकर उस
मन्दिरमें विधिवत् स्थापित की। सभी लोगोंने विविध
उपचारोंके द्वारा यथाविधि उन गजाननका पूजन किया।
वसिष्ठ आदि मुनिगणोंने ब्रह्मकमण्डलु नामक नदीमें
स्नान किया और सन्ध्यावन्दनादि सम्पूर्ण कर्म सम्पन्न
करनेके अनन्तर वे गजाननकी उस अत्यन्त सुन्दर मूर्तिके
समीप गये॥ ५७–५९॥
कुछ मुनियोंने व्रत करके गजाननके धामको प्राप्त
करनेके लिये मन्दिरके चारों ओर चार द्वार बनाये। कुछ
स्नान करनेके अनन्तर उन गजाननको प्रणाम करके
दौड़ते हुए उनकी परिक्रमा करने लगे॥ ६० ॥
उस समय सभी देवता तथा मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न
होकर परस्पर कहने लगे कि इस प्रकारका पुण्यक्षेत्र
अन्य कहीं देखा नहीं गया है, जहाँ कि साक्षात् देव
५८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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गजानन स्थित हों। ये मयूरेश विघ्नोंका निवारण करनेवाले | प्राप्ति होती है और यह आख्यान मनुष्योंके सभी
हैं और भक्तोंकी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। | प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाला है ॥ ६४-६५ ॥
इस प्रकार कहकर तथा उन गजाननका पूजन करके वे | इस मयूरेश-चरितका श्रवण पुत्र देनेवाला, धन
सभी मुनिगण अपने-अपने आश्रमोंकी ओर चले | प्रदान करनेवाला, विद्या प्रदान करनेवाला तथा समस्त
गये ॥ ६१-६२ ॥ | दुःखोंका निवारण करनेवाला है। यह शारीरिक तथा
तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता भी अपने-अपने स्थानोंपर | मानसिक सभी बाधाओंको दूर करनेवाला और कुष्ठ
चले गये। भगवान् शंकर अपने परिवारके साथ आनन्दित | आदि दुष्ट रोगोंका विनाश करनेवाला है ॥ ६६ ॥
होते हुए कैलासको चले गये। तब स्वधा, स्वाहा और | यह मयूरेशका आख्यान पढ़ने तथा सुननेवाले
वषट्कार होने लगा, जिससे इन्द्र आदि देवता बड़े प्रसन्न | पुरुषोंके लिये अत्यन्त मंगलकारी है और भुक्ति तथा
हो गये ॥ ६३ १/२ ॥ | मुक्ति प्रदान करनेवाला है। यह मनुष्योंको विजयश्रीका
ब्रह्माजी बोले- हे मुनि व्यासजी! त्रेतायुगमें | अधिष्ठान है। क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों-सभीको लक्ष्मी
मयूरेश्वरने जो कुछ भी किया था, वह सम्पूर्ण चरित्र | प्रदान करनेवाला और पुष्टिको बढ़ानेवाला है ॥ ६७ १/२ ॥
आपको बता दिया है। देव मयूरेशके चरितका श्रवण | [ब्रह्माजी बोले-] हे मुनि व्यासजी! जो-जो
सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। मयूरेशकी कथाके | आपने पूछा, वह सब मैंने बता दिया। अब आप मेरे
सुननेसे कृतार्थता प्राप्त होती है, यश तथा आयुष्यकी | मुखसे पुनः गजाननके चरित्रका श्रवण करेंगे ॥ ६८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'द्वारमहिमाका वर्णन' नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२६ ॥
एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय
गजानन-अवतारके प्रसंगमें ब्रह्माजीकी जँभाईसे सिन्दूरकी उत्पत्ति, ब्रह्माजीद्वारा उसे अनेक
वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानोंकी परीक्षाके लिये सिन्दूरका ब्रह्माजीको ही लक्ष्य
बनाना और ब्रह्माजीका भयभीत होकर वैकुण्ठ जाना
व्यासजी बोले- हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! हे देवेश ! | प्राप्त करते हैं। हे मुने! मैं विनायकचरितकी उस कथाको
आपने गुणेशके शुभ चरितका विस्तारसे वर्णन किया। फिर | आपसे कहूँगा, जो चरित देव विनायकने द्वापरयुगमें किया
भी हे देव ! उसके सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं हुई है। मनुष्य | था, उसे आप इस समय सुनें ॥ ४-५ १/२ ॥
अमृतके पानसे तो तृप्त हो सकता है, किंतु कथाके श्रवणसे | जिस प्रकारसे वे देव गजानन रक्तवर्णवाले, चार
तृप्त नहीं हो सकता। मैंने त्रेतायुगमें हुए गुणेशके अवतारकी | भुजाओंवाले, गजके मुखवाले एवं मूषकके वाहनवाले
सम्पूर्ण कथा सुन ली है ॥ १-२ ॥ | हुए, वह सब मैं आपसे कहता हूँ ॥ ६ १/२ ॥
तदनन्तर द्वापरयुगमें गजानन नामसे उन्होंने कहाँ | किसी समयकी बात है, भगवान् शंकर संयोगवश
अवतार लिया और हे महाप्रभु ! मूषक उनका वाहन | ब्रह्मलोकमें पहुँचे। तब उन्होंने शयन कर रहे ब्रह्माजीको
किस प्रकार हुआ ? हे कमलासन ब्रह्माजी ! आप मेरे इस | जगाया। उस समय वे क्रुद्ध होकर उठे और उन्होंने दीर्घ
संशयको दूर करनेकी कृपा करें ॥ ३ १/२ ॥ | जँभाई ली ॥ ७-८ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे वत्स ! हे मुने ! मेरे मनमें जो | उस जँभाईसे एक महाभयानक पुरुष उत्पन्न हुआ।
बात थी, उसे पूछकर आपने बहुत अच्छा किया है, | उत्पन्न होते ही उस पुरुषने सभीको भयभीत कर
क्योंकि श्रोता, वक्ता तथा पूछनेवाला - ये तीनों ही सिद्धिको | देनेवाला तीव्र ध्वनियुक्त शब्द किया, उस ध्वनिसे समुद्र,
क्री०ख०-अ०१२७ ] * गजानन-अवतारके प्रसंगमें ब्रह्माजीकी जँभाईसे सिन्दूरकी उत्पत्ति * ५८३
द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। दिशाओंके
रक्षक, सभी दिक्पाल आश्चर्यचकित हो उठे। क्षुब्ध
होकर शेषनाग विष उगलने लगे ॥ ९-१० ॥
सभी पर्वत चूर-चूर होकर गिर पड़े और समस्त
प्राणी व्याकुल हो उठे। तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले
मनुष्योंके लिये कल्पान्तमें होनेवाले प्रलय-जैसी स्थिति
हो गयी। वह अपने मस्तकसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको विदीर्ण
करता हुआ-सा खड़ा हो गया। उसके शरीरसे निकलनेवाली
सुन्दर गन्ध तीनों लोकोंमें फैल गयी ॥ ११-१२ ॥
उस पुरुषके जपाकुसुमके समान कान्तियुक्त देहकी
प्रभासे सभी दिशाएँ अरुणिम वर्णकी हो उठीं। क्या
ब्रह्माजीद्वारा यह कोई दूसरा कामदेव उत्पन्न हो गया है,
यह विचारकर कामदेव उस पुरुषके सौन्दर्यको देखकर
तत्क्षण ही लज्जित हो उठा। अपने सामने स्थित उस
पुरुषको देखकर कमलयोनि ब्रह्मा विस्मित हो गये और
उससे बोले—तुम किसके पुत्र हो? कहाँसे उत्पन्न हुए
हो? तुम्हारी क्या करनेकी इच्छा है? वह सब मुझे
बताओ ॥ १३-१४१/२ ॥
पुरुष बोला—हे सुरेश्वर! आप अनेकों ब्रह्माण्डोंकी
रचना करनेवाले होनेपर भी तथा सब कुछ जाननेवाले
होनेपर भी भ्रममें पड़े हुएकी भाँति मुझसे क्यों पूछ रहे
हैं? आपकी जँभाईसे ही उत्पन्न मुझे आप क्यों नहीं
जान पा रहे हैं? ॥ १५-१६ ॥
आप अपने पुत्र मुझपर कृपा करें और अपनी
बुद्धिके अनुसार मेरा नाम रखें। हे नाथ! मुझे रहनेके
लिये स्थान प्रदान करें, साथ ही मेरा भोजन क्या होगा
तथा मुझे कौन-सा कार्य करना है, यह सब मुझे बतायें।
उस पुरुषके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर चतुरानन
ब्रह्माजी बोले—चूँकि तुम्हारा शरीर रक्तवर्णका है,
इसलिये तुम 'सिन्दूर' नामसे प्रसिद्ध होओगे ॥ १७-१८ ॥
तुम्हारी सामर्थ्य महान् होगी और तुम तीनों
लोकोंको वशमें करनेमें सक्षम होओगे। तुम क्रोधके
आवेशमें जिसका भी आलिंगन करोगे, वह सौ टुकड़ोंमें
विभक्त हो जायगा ॥ १९ ॥
तुम्हें पाँच भूतों—पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाशसे
भी कभी कोई भय नहीं होगा। देवता, दानवों, यक्षों तथा
मनुष्योंसे तुम्हें भय नहीं होगा। इन्द्र आदि लोकपालों तथा
साक्षात् कालसे भी कोई तुम्हें भय नहीं होगा। नागों,
राक्षसोंसे भी कोई भय नहीं होगा, तुम्हें न तो दिनमें भय
रहेगा और न रात्रिमें कोई भय रहेगा ॥ २०-२१ ॥
हे सिन्दूर ! तुम्हें न तो सजीव प्राणियोंसे भय होगा
और न निर्जीव प्राणियोंसे। तीनों लोकोंमें जहाँ भी
तुम्हारा रहनेको मन करे, वहाँ रहो ॥ २२ ॥
तदनन्तर ब्रह्माजीके मुखसे उत्पन्न वह सिन्दूर
अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया। तब वह अपनी आवाजके द्वारा
चराचरसहित तीनों लोकोंको कँपाते हुए दहाड़ा ॥ २३ ॥
उस तीव्र ध्वनिसे समुद्र क्षुब्ध हो उठे, सभी
लोकपाल भाग उठे। तदनन्तर उस सिन्दूरने पितामह
ब्रह्माजीको प्रणाम करके कहा ॥ २४ ॥
सिन्दूर बोला—हे अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी
ब्रह्माजी ! आपके वचनरूपी अमृतसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हो
गया हूँ। आप ही सत्त्व-रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके
द्वारा इस विश्वकी रचना करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं
और अन्तमें उसका लय भी कर देते हैं ॥ २५ ॥
आपके सो जानेपर यह समस्त संसार भी सो जाता
है और सर्वत्र अन्धकार व्याप्त हो जाता है। हे विभो !
मेरा यह महान् अहोभाग्य है कि बिना तपस्या किये,
बिना दानोंको दिये और बिना व्रत, उपवास किये आप
मुझपर पुत्रका स्नेह प्रकट करके प्रसन्न हैं, अन्यथा आप
प्रसन्न नहीं होते। हे प्रभो ! करोड़ों कल्पोंतक तपस्याके
परिणामस्वरूप ही आप प्रसन्न होते हैं ॥ २६-२७ ॥
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार कहनेके अनन्तर उन्हें
प्रणामकर और उनकी प्रदक्षिणा करके वह सिन्दूर अपने
मनको अनुकूल लगनेवाले स्थानकी ओर चल पड़ा।
मार्गमें वह यह तर्क-वितर्क करने लगा कि न तो मैंने
कोई तपस्या की है, न ध्यान किया है, न किसी मन्त्रका
जप किया है और न ही शास्त्रोंका स्वाध्याय किया है,
तो फिर क्यों उन ब्रह्माजीने मुझे इतने वर प्रदान किये
हैं, क्या उनके दिये वरदान सत्य हैं अथवा मिथ्या हैं?
वहाँ पिता ब्रह्माके पास जाकर ही इन वरदानोंकी परीक्षा
५८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * : [ श्रीगणेशपुराण-
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करूँगा। ऐसा कहकर वह सिन्दूर पितामह ब्रह्माजीके | जायगी, वे गजानन 'सिन्दूरप्रिय' हो जायँगे और वे देव
पास गया। उसने अपने दोनों हाथ फैलाकर भयंकर | गजानन 'सिन्दूरवधकर्ता' के नामसे प्रसिद्ध हो जायँगे।
गर्जना की ॥ २८-३०॥ | ऐसा कहकर भयभीत हो कमलयोनि वे ब्रह्माजी वहाँसे
उसने ब्रह्माजीका आलिंगन करना चाहा, तब | शीघ्र ही चल पड़े ॥ ३४-३५ ॥
पितामह ब्रह्माजी उससे बोले, मैंने तुम्हें पुत्रस्नेहके कारण | वे ब्रह्मा मनकी गति तथा वायुके वेगके समान
ही वर प्रदान किये हैं, जो अन्यके लिये दुर्लभ हैं; किंतु | वहाँसे पलायित हुए थे, अतः तीव्रतावश श्वास लेने तथा
दुर्भावनावश तुम मेरा ही अपकार करनेके लिये यहाँ | छोड़नेके कारण वे हाँफने लगे। शाप सुनकर क्रुद्ध हुआ
आये हो, निश्चित ही सर्पको दिया गया दूध विष ही | वह दैत्य सिन्दूर भी उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा ॥ ३६ ॥
हो जाता है। तुम दुष्ट भावनासे ग्रस्त हुए हो, अतः | दौड़नेके कारण पसीनेसे भीगे शरीरवाला वह दुष्ट
जाओ, तुम दैत्य हो जाओगे। परमात्मा गजानन शीघ्र ही | दैत्य सिन्दूर जहाँ-जहाँ वे ब्रह्माजी जाते थे, उनको देखते
अवतार लेकर तुम्हारा वध कर डालेंगे ॥ ३१-३३॥ | हुए वह उनके पीछे-पीछे जाने लगा। अगला चरण
तुम्हारे शरीरमें सुगन्ध है, यह जानकर देव गजानन | रखते ही मैं इन्हें पकड़ लूँगा यह कहते हुए वह दैत्य
अपने अंगोंमें उस सुगन्धित सिन्दूरका लेप भी करेंगे। | पीछे दौड़ने लगा। काँपते हुए ब्रह्माजी शीघ्रतासे वैकुण्ठमें
इसीसे उन गजाननकी देह भी अरुणम वर्णकी हो | जा पहुँचे ॥ ३७॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्दूरकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक
एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२७॥
एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय
ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना, उसी समय सिन्दूरका वहाँ आना,
भगवान् विष्णुके कहनेपर सिन्दूरका भगवान् शिवसे युद्ध करने कैलासपर जाना,
शिवको ध्यानस्थ देखकर सिन्दूरका पार्वतीका हरण करना, मयूरेशका
द्विजरूपसे उपस्थित होकर सिन्दूरको समझाना, सिन्दूरका वापस
लौट जाना, मयूरेशद्वारा माता पार्वतीको अपने
गजानन-अवतारका स्मरण दिलाना
ब्रह्माजी बोले- ब्रह्माजीने वैकुण्ठलोकमें जाकर | उनकी सेवा-पूजा करके भगवान् विष्णुने उनसे
देखा कि भगवान् नारायण निर्विकार भावसे रत्नों तथा | पूछा कि कौन-सा ऐसा कार्य आपके समक्ष आ
सुवर्णसे सुशोभित कमलके आसनपर विराजमान हैं ॥ १ ॥ | उपस्थित हुआ है, आपका मुख क्यों मुरझाया हुआ है,
भगवान् विष्णुने भी अपने सामने म्लान मुखवाले | आप क्यों लम्बी-लम्बी साँस ले रहे हैं और प्रभाहीन
ब्रह्माजी और उनके पीछे आकाशसे स्पर्धा करनेवाले | क्यों दिखायी दे रहे हैं? हे पितामह ! आपकी ऐसी
मस्तकसे युक्त महादैत्य सिन्दूरको आता हुआ देखा ॥ २ ॥ | स्थिति देखकर मुझे महान् कष्ट हो रहा है ॥ ४१/२ ॥
यह देखकर दयालु लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु | भगवान् विष्णुके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर
सहसा शीघ्र ही उठ पड़े और उन्होंने ब्रह्माजीका हाथ | कमलयोनि ब्रह्माजी बोले ॥ ५ ॥
पकड़कर एवं उनका आलिंगनकर उन्हें अपने आसनपर | ब्रह्माजी बोले- मैं अपने भवनमें प्रगाढ़ निद्रामें
बैठाया ॥ ३ ॥ | सोया हुआ था, उसी समय भगवान् शिवने मुझे जगाया,
क्री०ख०-अ०१२८ ] * ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना * ५८५
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[बायाँ स्तम्भ]
तब जँभाई लेनेपर मेरे मुखसे एक विशाल पुरुष प्रकट
हुआ। उसका मस्तक इतना ऊँचा था कि उस ऊँचे
मस्तकके टकरानेसे आकाशसे ग्रह-नक्षत्र नीचे भूमिपर
गिरने लगे। उसके शरीरसे निकलनेवाली सुगन्धित वायुसे
सभी देवता विस्मित हो उठे ॥ ६-७ ॥
वह इतना सुन्दर था कि उसके लावण्यको देखनेमात्रसे
कामदेव लज्जित हो गये। उसके चिल्लानेके शब्दसे तीनों
लोक कम्पित हो उठे। हे देव ! वह पुरुष मुझे नमस्कार
करके विनीत भावसे मेरे सामने खड़ा हो गया। हे
माधव ! तब मैंने उसे अपना पुत्र समझकर पुत्रस्नेहके
कारण अनेक वर प्रदान किये ॥ ८-९ ॥
मैंने वर देते हुए उससे कहा कि तुम जिस-जिसका
आलिंगन करोगे, वह निश्चित ही मृत्युको प्राप्त हो
जायगा, साक्षात् काल भी युद्धमें तुम्हारे सामने खड़ा
होनेमें समर्थ नहीं हो सकेगा ॥ १० ॥
हे देव ! तदनन्तर मैंने उसे रहनेके लिये उसकी
इच्छाके अनुरूप ही स्थान दिया। तब वह मुझे नमस्कार
करके कुछ ही दूर गया था कि कुछ सोच-विचारकर
पुनः वापस आया। फिर वह मुझे आलिंगन करनेके लिये
मेरे समीप आया। उसके भयसे मैं भाग उठा। मैं अपने
हंसपर आरूढ़ हुआ और वेगसे उड़ता हुआ आपके पास
आ पहुँचा हूँ ॥ ११-१२ ॥
उसे अपने पीछे-पीछे आता देख-देखकर मेरा
शरीर काँपने लगा और मैं हाँफने लगा। हे सर्वसुरेश्वर !
आपके बिना मैं और दूसरे किसकी शरणमें जाऊँ ? तब
उन शरणमें आये हुए ब्रह्माजीसे भगवान् महाविष्णु
कहने लगे ॥ १३१/२ ॥
श्रीविष्णु बोले— हे देव ! आपने पहले तो
जानबूझकर उसे वर प्रदान किये और अब संकट आ
गया है तो चिन्ता करनेसे क्या लाभ ! जो होना है, वह
तो होकर ही रहेगा ॥ १४१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले— वह तो तीनों लोकोंको पीड़ित
करनेके लिये उद्यत हो गया है ॥ १५ ॥
जब इस प्रकारसे ब्रह्मा तथा भगवान् विष्णु
चिन्तासे व्याकुल हो रहे थे कि उसी समय उन दोनोंको
[दायाँ स्तम्भ]
अपने सामने वह महादैत्य खड़ा दिखायी दिया ॥ १६ ॥
वह अत्यन्त जोरसे गरजा और अपनी तीव्र
गर्जनासे उसने तीनों लोकोंको निनादित कर डाला। उस
दुष्ट दैत्यने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा ब्रह्माको भी कम्पित कर
डाला। तब ब्रह्माजी तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले
भगवान् विष्णुसे 'रक्षा करो', 'रक्षा करो' इस प्रकारसे
कहने लगे। तदनन्तर भगवान् विष्णुने अत्यन्त मधुर
वाणीमें उससे कहा ॥ १७-१८ ॥
श्रीहरि बोले— ब्रह्माजीके द्वारा वर प्राप्तकर उन्मत्त
हुए तुम्हारे साथ मैं युद्ध करनेका साहस नहीं करता।
मैं तो सत्त्वगुणका आश्रय लेकर जीवोंके पालनमें ही
सदा लगा रहता हूँ। ये ब्रह्माजी ब्राह्मण हैं, अतः इनके
साथ भी तुम्हारा युद्ध करना ठीक नहीं है, तुम्हारे साथ
युद्ध करनेमें भगवान् शिव ही समर्थ हैं, उन्होंने कामदेवको
भी भस्म कर डाला है। तुम उन्हीं शिवके साथ युद्ध
करो, इससे तुम्हारी महान् कीर्ति तीनों लोकोंमें फैल
जायगी ॥ १९-२० ॥
ब्रह्माजी बोले— भगवान् विष्णुके इस प्रकारके
वचनोंको सुनकर दैत्य सिन्दूर प्रसन्न हो उठा। तदनन्तर
वह सहसा तीनों लोकोंको कँपाता हुआ, पर्वतोंको
गिराता हुआ और वृक्षोंको चूर-चूर करता हुआ तत्क्षण
ही उड़कर चल पड़ा ॥ २१-२२१/२ ॥
उसके भयसे दिशाओंके सभी हाथी इधर-उधर
दिशाओं-विदिशाओंमें चले गये। इस प्रकारसे जाता
हुआ वह दैत्य सिन्दूर महान् पर्वत कैलासकी तलहटीमें
जा पहुँचा। उस दुष्टने वहाँ पर्वतकी चोटीपर ध्यानमें
निमग्न भगवान् शिवको देखा। नन्दी तथा भृंगी आदि
गण उनके चारों ओर स्थित थे और माता पार्वती उन
प्रभुकी सेवा कर रही थीं ॥ २३-२४ ॥
भगवान् शिवने व्याघ्रचर्म धारण किया हुआ था,
उनके मस्तकपर अर्धचन्द्र विभूषणके रूपमें शोभित था।
उन्होंने भस्मका अंगराग लगाया था, जिससे उनकी
शोभा और भी अधिक हो रही थी, उन्होंने गजचर्मको
उत्तरीय वस्त्रके रूपमें धारण किया था ॥ २५ ॥
भगवान् शंकरको देखकर वह दैत्य सहसा उनकी
५८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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निन्दा करने लगा। उसने कहा—इस तपस्वीके साथ मैं
क्या युद्ध करूँ। मैं इसकी सुन्दर भार्याको लेकर यथारुचि
यथास्थानको चला जाता हूँ। ऐसा मनमें निश्चयकर वह
गौरी पार्वतीके समीपमें आया ॥ २६-२७॥
उस समय गिरिजा उसी प्रकार कम्पित हो उठीं,
जैसे कल्पान्त प्रलयमें संसार काँप उठता है। उन्होंने
अपने नेत्रोंको बन्द कर लिया। भयसे विह्वल होकर वे
क्षणभरमें ही मूर्च्छित हो गयीं ॥ २८ ॥
कुत्सित विचारवाले दैत्य सिन्दूरने पार्वतीके
केशपाशको पकड़ा और वह उड़कर वेगसे चल पड़ा।
तब पार्वती अत्यन्त शोक करने लगीं। वह दैत्य उन्हें
उसी प्रकार ले जा रहा था, जैसे कि दशानन रावणके
द्वारा जगज्जननी सीताका हरण हुआ था ॥ २९१/२॥
गिरिजा बोलीं—हे देव! आप तो सम्पूर्ण अर्थोंके
ज्ञाता हैं, फिर मेरे प्रति आप क्यों ऐसी उदासीनता दिखा
रहे हैं? आपके अंकमें बैठी आपकी अर्धांगिनीका हरण
हो चुका है, फिर भी आप ध्यानमें कैसे मग्न हैं? मैंने
आपकी अल्प भी सेवा नहीं की है, इसी कारण आप
ऐसी निष्ठुरता दिखा रहे हैं ॥ ३०-३१॥
इस समय कौन ऐसा मित्र है, जो मुझे इस दैत्यके
चंगुलसे छुड़ायेगा, कौन मेरा प्राणरक्षक होगा और कौन
ऐसा बलशाली होगा, जो पुनः मुझे शंकरका दर्शन
करायेगा ? ॥ ३२ ॥
ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उन देवी पार्वतीको
शोकसे व्यथित देखकर गण उनसे कहने लगे। इस समय
तीनों लोकोंका विनाश करनेवाले इस सिन्दूरके साथ युद्ध
करनेकी हमारी शक्ति नहीं है ॥ ३३ ॥
भगवान् शिव ध्यानमें निमग्न हैं, दैववश इस
दैत्यको अनुकूल अवसर प्राप्त हो गया है। फलतः यह
दैत्य सृष्टि, स्थिति तथा अन्त करनेवाली हमारी माता
पार्वतीको हर ले गया है। ये देवी सभी देवताओंको
मोहित करनेवाली हैं, सभीके सब प्रकारके दुःखोंका
हरण करनेवाली हैं, सौन्दर्यकी लहरी हैं और सब
प्रकारसे शुभ करनेवाली तथा सभी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ हैं,
इन्हें यह दैत्य हर ले गया है ॥ ३४-३५॥
श्रेष्ठ रत्नरूपा उन देवी पार्वतीको वह दैत्य कैसे
ले गया और कैसे वे पुनः वापस आयेंगी? इस समय
जबकि अपने नेत्रकी अग्निसे सभीका विनाश करनेवाले
भगवान् शंकर ध्यानमें स्थित हैं ॥ ३६ ॥
गणोंके द्वारा इस प्रकारसे शोक करनेपर, हाहाकार
करके रोनेपर भगवान् महेश्वर क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने
शीघ्र ध्यान भंग किया ॥ ३७ ॥
वे अपनी क्रोधाग्निसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा दसों
दिशाओंको जलाने लगे। तब उन्होंने उन गणोंसे पूछा
कि कौन-सा संकट आ उपस्थित हुआ है? ॥ ३८ ॥
जिसने तुम्हें कष्ट पहुँचाया है, उसे मैं भस्म कर
डालूँगा। भगवान् शंकरके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर
उस समय वे गण बोले— ॥ ३९॥
हे देव! आप जब ध्यानमें स्थित थे, उसी समय
एक महान् दैत्य यहाँ आ उपस्थित हुआ, वह मन्दराचल-
पर्वतके समान आकृतिवाला था और साक्षात् कालके
समान ही उसका स्वरूप था ॥ ४० ॥
उसकी श्वासरूपी वायुके प्रवाहसे अचल होनेपर भी
पर्वत चलित हो गये। हे शंकर! उसको देखनेमात्रसे ही देवता
सम्मोहित हो गये। तब उस महाबलीने गिरिजा पार्वतीके
बाल पकड़कर उन्हें उठा लिया और वह शीघ्र ही
आकाशमार्गसे हमारी माताको हर ले गया ॥ ४१-४२॥
उसके द्वारा ले जायी जाती हुई माता पार्वती
'दौड़ो-जल्दी दौड़ो' इस प्रकारसे कह रही थीं, फिर वे
मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ीं और हम सभी भी
मूर्च्छित हो गये ॥ ४३ ॥
वैसी स्थितिवाली शिवाको वह दुष्ट मनोवृत्तिवाला
दैत्य लेकर चला गया। उन गणोंके वचनोंको सुनकर
भगवान् शिव अत्यन्त क्रोधसे प्रज्वलित हो उठे ॥ ४४ ॥
वे लोकोंको भस्म करते हुए-से अपने वाहन
वृषपर आरूढ़ हो गये और उन्होंने अपनी दसों भुजाओंमें
त्रिशूल आदि आयुधोंको धारण कर लिया ॥ ४५ ॥
वे दिशाओं तथा विदिशाओंको निनादित करते हुए
आकाशमार्गसे होते हुए तत्क्षण ही वहाँ पहुँच गये, जहाँ
वह सिन्दूर नामक दैत्य स्थित था ॥ ४६ ॥
क्री०ख०-अ०१२८ ] * ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना * ५८७
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भगवान् शिवने उसकी पीठपर प्रहार किया, तब
वह दैत्य उनके सामने खड़ा हो गया। भगवान् शिवने
उससे कहा—अरे महादुष्ट ! तुम मेरी भार्याको छोड़ दो।
प्रसन्न होकर तुम कहाँ जा रहे हो ? ॥ ४७ ॥
शिवद्वारा इस प्रकारसे कहा गया वह दैत्य क्रोधके
वशीभूत हो गया और तीनों लोकोंको जलाता हुआ-सा
और बाहुओंसे प्रहार करता हुआ-सा वह शिवके समीप
आ पहुँचा ॥ ४८ ॥
अभिमानके मदसे मोहित वह महादैत्य बोला—
समस्त लोकोंका स्वामी मैं तुम-जैसे मच्छरके वाक्योंसे
भयभीत होनेवाला नहीं हूँ। जिसकी श्वासवायुके निकलनेसे
सुमेरुपर्वत भी तत्क्षण काँप उठता है, इस प्रकारकी
शक्ति-सामर्थ्यवाले मेरे सामने तुम्हारी क्या गणना ! तुम
मुझे अपना मुख मत दिखलाओ ॥ ४९-५० ॥
यदि तुममें मेरे साथ युद्ध करनेकी सामर्थ्य है, तभी
युद्ध करो, यदि ऐसा नहीं तो तुम किसी दूसरी स्त्रीके साथ
विवाह कर लो, ऐसा करनेसे तुम सुख प्राप्त करोगे ॥ ५१ ॥
अरे तुच्छ ! मच्छरके समान तुम मेरे साथ क्या युद्ध
करोगे ? ऐसा कहकर वह दैत्य सिन्दूर बाहुयुद्ध करनेके
लिये भगवान् शंकरके समीप आया ॥ ५२ ॥
उस समय देवी पार्वतीने अपने मनमें मयूरेशका
स्मरण किया। तब उन दोनों भगवान् शंकर तथा दैत्य
सिन्दूरके मध्य तत्क्षण ही देवेश्वर मयूरेश प्रकट हो गये।
वे ब्राह्मणका रूप बनाये हुए थे, उनकी प्रभा करोड़ों
सूर्योंके समान थी, उनके सभी अंग अत्यन्त मनोहर थे
और वे नाना प्रकारके आभूषणोंसे भलीभाँति अलंकृत
थे ॥ ५३-५४ ॥
उन मयूरेशने अपना अस्त्र परशु उन दोनोंके बीचमें
करके दैत्यराज सिन्दूरको रोका और फिर वे द्विजश्रेष्ठ
अत्यन्त मधुरवाणीमें उस सिन्दूरसे कहने लगे ॥ ५५ ॥
तुम तीनों लोकोंकी माता इन पार्वतीको शीघ्र ही
मेरे समीपमें रख दो और फिर शंकरके साथ तबतक युद्ध
करो, जबतक कि किसी एककी जय-पराजय नहीं हो
जाती, इस युद्धमें जो जीतेगा, वही इन पार्वतीको प्राप्त
करेगा। मेरा वचन झूठा नहीं होगा ॥ ५६१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—द्विजरूपधारी मयूरेशकी बात सुनकर
सिन्दूर अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गया और युद्धकी विशेष
लालसा रखनेवाले उस दैत्य सिन्दूरने पार्वतीको उनके
पास रख दिया। उन द्विजरूपधारी मयूरेश तथा पार्वतीके
देखते-देखते वे दोनों—शिव और सिन्दूर युद्ध करने
लगे ॥ ५७-५८ ॥
सिन्दूर और शिव—दोनों ही युद्धकी विविध
कलाओंमें पारंगत थे, उस समय क्रोधसे उन दोनोंके नेत्र
रक्तवर्णके हो गये थे। उन दोनोंका तेज और पराक्रम
बराबरका था। उस दैत्य सिन्दूरने ज्योंही अपने बाहुपाशमें
शंकरको आबद्ध करना चाहा, उसी समय मयूरेशके
परशु नामक अस्त्रने अदृश्य होकर उस दैत्यकी छातीमें
बलपूर्वक प्रहार किया ॥ ५९-६० ॥
उस प्रहारसे दैत्य सिन्दूरकी शक्ति जाती रही,
तदुपरान्त भगवान् शिवने त्रिशूलसे उसपर आघात किया।
तब शक्तिहीन हुए उस सिन्दूरसे द्विजश्रेष्ठ मयूरेशने
उसके लिये हितकर बात करते हुए कहा— ॥ ६१ ॥
तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शिवके साथ तुम्हारा
युद्ध करना ठीक नहीं है, अतः पार्वतीकी प्राप्तिकी आशा
छोड़कर तुम शीघ्र ही अपने घरको चले जाओ। यदि
तुम ऐसा नहीं करोगे तो ये शिव तुम्हें इस समय भस्म
कर डालेंगे। द्विज मयूरेशके द्वारा इस प्रकार कहा गया
वह दैत्य सिन्दूर पार्वतीकी अभिलाषा छोड़कर पृथ्वीलोकको
चल पड़ा ॥ ६२-६३ ॥
तदनन्तर भगवान् शिवको विजयकी प्राप्ति होनेपर
वे पार्वती उन द्विजरूपधारी मयूरेशसे बोलीं—हे मुनिश्रेष्ठ !
आप कौन हैं, जिनके द्वारा मैं उस दुष्टसे मुक्त करायी
गयी हूँ ? आप मुझे अपना यथार्थ स्वरूप दिखायें, यह
मुनिका वेश आपका स्वाभाविक वेश नहीं है। आप मुझे
प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, आपने मुझे जीवन प्रदान
किया है, अतः आप मेरे सखारूप हैं। हे द्विजश्रेष्ठ !
प्राणोंका दान करनेपर भी आपके उपकारको चुकाया
नहीं जा सकता ॥ ६४-६५१/२ ॥
पार्वतीके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे मुनीश्वर
मयूरेश उनसे बोले—हे माता ! मैंने यहाँ कुछ भी नहीं
५८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
किया है, भगवान् महेश्वरने ही दैत्यपर विजय प्राप्त की
है और आपको दैत्यके बन्धनसे भी भगवान् शिवने ही
छुड़ाया है। ऐसा कह करके वे विनायक द्विजस्वरूपको
छोड़कर अपने पूर्वरूपमें हो गये ॥ ६६-६७१/२॥
उनका शरीर दस भुजाओंसे सुशोभित होकर
अत्यन्त सुन्दर लग रहा था, उनके कान कुण्डलोंसे
मण्डित थे। उनके मस्तकपर कस्तूरीका तिलक लगा
हुआ था। वे रत्नों तथा मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित
थे। नाना प्रकारके अलंकारोंसे वे मनोहर लग रहे थे।
उन्होंने कण्ठमें शेषनागको धारण कर रखा था, जिसकी
मणिकी प्रभासे वे सुशोभित हो रहे थे ॥ ६८-६९ ॥
तब इस प्रकारके स्वरूपवाले परमात्माको देखकर
पार्वतीजी अत्यन्त प्रसन्न हो उठीं। उन्होंने उनके चरणोंमें
प्रणाम किया तो उन मयूरेशने उन्हें उठाकर उनसे
कहा- ॥ ७० ॥
विनायक बोले- त्रेतायुगमें मैंने आपसे कहा था
कि मैं आपको पुनः दर्शन दूँगा और द्वापरयुगमें आपके
घरमें गजानन नामसे अवतार धारण करूँगा तथा अपने
ओजसे दैत्य सिन्दूरका वध करूँगा ॥ ७११/२ ॥
ब्रह्माजी बोले-मुनिका रूप धारण किये हुए वे
देव मयूरेश इस प्रकार देवी पार्वतीसे कहकर अन्तर्धान
हो गये। तब वे देवी पार्वती सोचमें पड़ गयीं और
अंत्यन्त मूर्च्छित हो गयीं। तब भगवान् विश्वनाथ उनसे
बोले- हे प्रिये ! अपने मनको स्वस्थ करो ॥ ७२-७३ ॥
तुम अपने हृदयमें उन अविकारी विनायकका दर्शन
करो, उनका कहा हुआ मिथ्या नहीं होता है, उन्होंने
जैसा कहा है, वे वैसा ही करेंगे ॥ ७४ ॥
इस प्रकार कहकर भगवान् महादेव देवी पार्वतीके
साथ वृषपर आरूढ़ हुए और अत्यन्त प्रसन्नताके साथ
पर्वतराज कैलासपर चले आये ॥ ७५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'पार्वतीकी बन्धनसे मुक्तिका वर्णन' नामक
एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२८ ॥
एक सौ उनतीसवाँ अध्याय
सिन्दूरके अत्याचारसे पीड़ित देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा विनायककी स्तुति, दुःखप्रशमनस्तोत्र
और उसका माहात्म्य, विनायकद्वारा सिन्दूरके वधका आश्वासन दिया जाना, माता पार्वतीके
गर्भमें तेजःपुंजका प्रकट होना, उस तेजसे सन्तप्त पार्वतीका भगवान् शिव तथा
गणोंके साथ पर्यली नामक वनमें जाना और वहाँ सखियोंके साथ निवास करना
ब्रह्माजी बोले- सिन्दूर नामक वह दैत्य कैलाससे
मृत्युलोकमें आया और बड़े ही गर्वसे उसने गर्जना की।
उस भीषण ध्वनिसे सभी पर्वत कम्पित हो उठे और वृक्ष
भूमिपर गिर पड़े ॥ १ ॥
पक्षी, सिंह और अन्य हिंसक जीव-जन्तु वनमें
भ्रमण करने लगे। तदनन्तर उस महादैत्य सिन्दूरने सभी
राजाओं और सभी वीरोंको जीत लिया ॥ २ ॥
ब्रह्मा आदि देवता भी जिसके द्वारा जीत लिये गये
थे, भला उसके साथ सामान्य राजागण कैसे युद्ध करते !
कुछ राजाओंको काटकर उसने दो टुकड़ोंमें विभक्त कर
दिया और कुछ आकाशमें चक्कर काटने लगे ॥ ३ ॥
कुछ राजा जो उसके सामने युद्ध कर रहे थे, वे
वीरगति प्राप्तकर स्वर्ग चले गये। कुछ राजा उसकी
शरणमें आ गये और उन्होंने उसकी सेवा करना स्वीकार
कर लिया ॥ ४ ॥
कुछ राजा अपने अधिकारसे वंचित हो गये तो
उन्होंने उसका सेवक होना स्वीकार नहीं किया और वे
अभिमानपूर्वक वन चले गये। इस प्रकार सभी राजाओंको
जीत लेनेके पश्चात् उस दैत्य सिन्दूरने मुनियोंपर आक्रमण
करनेका विचार किया। उस दुष्ट बुद्धिवाले दैत्य सिन्दूरने
एकाएक मुनियोंको बन्धनमें डाल दिया। उस समय कुछ
मुनिजन अपना शरीर छोड़कर स्वर्ग चले गये ॥ ५-६ ॥
कुछ मुनिगण मेरुकी कन्दरामें चिन्तारहित होकर
रहने लगे। कुछ मुनियोंको उसने मार डाला और
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