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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

उपासना-खण्ड

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
श्रीमन्महर्षिकृष्णद्वैपायनव्यासविरचित
श्रीगणेशपुराण
[ पूर्वार्ध ]
उपासना-खण्ड
पहला अध्याय
ऋषियों और सूतजीके संवादके प्रसंगमें गणेशजीकी महिमा और
राजा सोमकान्तके चरित्रका वर्णन

नमस्तस्मै गणेशाय ब्रह्मविद्याप्रदायिने।
यस्यागस्त्यायते नाम विघ्नसागरशोषणे ॥
ब्रह्मविद्याके प्रदाता उन गणेशजीको नमस्कार है,
जिनका नाम अगस्त्यमुनि*की भाँति विघ्नरूपी समुद्रको
सुखानेवाला है ॥ १ ॥
ऋषियोंने कहा—हे महाबुद्धिमान् वेदशास्त्रविशारद
सूतजी ! आप समस्त विद्याओंके निधिरूप (खजाने)
हैं, आपसे बढ़कर श्रेष्ठ वक्ता नहीं मिल सकता।
हमारे जन्म-जन्मान्तरीय महान् पुण्योंका उदय हुआ
है, जो कि आप-जैसे सर्वज्ञ सत्पुरुषका दर्शन हो
रहा है। इस संसारमें हम सब सर्वाधिक धन्य हैं,
हमारा जीवन सफल जीवन है। हमारे पूर्वज, हमारा
वेद-शास्त्रोंका अध्ययन, हमारी तपस्याका श्रम—ये
सब धन्य हो गये। [वक्ताओंमें] श्रेष्ठ [हे सूतजी] !
आपने हमें अठारह पुराणोंको विस्तारपूर्वक सुनाया है,
हमारी अन्य पुराणोंको भी सुननेकी इच्छा है, अतः
उन्हें भी सुनायें ॥ २-५ ॥
हम सब शौनकजीद्वारा आयोजित द्वादशवर्षीय
महासत्रमें नियुक्त हैं, आपद्वारा कराये जानेवाले
कथामृतपानके अतिरिक्त हमारे श्रमका निवारण किसी
प्रकार नहीं हो सकता ॥ ६ ॥

सूतजी बोले—पुण्य कर्ममें निरत हे महाभाग्यशाली
[ऋषियो] ! आप लोगोंके द्वारा अत्यन्त उत्तम प्रश्न
किया गया है; क्योंकि राग-द्वेषरहित, सम चित्तवाले
साधुजनोंकी बुद्धि संसारके उपकारमें लगी रहती है ॥ ७ ॥
हे द्विजगण ! मुझे भी कथाओंके कहनेमें ही सन्तोष
प्राप्त होता है, अतः मैं आप सब साधु चरितवाले
सत्पुरुषोंको विशेष रूपसे कथा सुनाऊँगा ॥ ८ ॥
[अष्टादश महापुराणों, जिनकी कथा मैं सुना चुका

  • महाभारत-वनपर्व, अध्याय १०५ में वर्णित है कि अगस्त्यमुनिने समुद्रके सम्पूर्ण जलका पानकर उसे सुखा दिया था।

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४४          * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् *          [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

हूँ, के अतिरिक्त] गणेश, नारदीय, नृसिंह आदि वैसे ही
अन्य अठारह उपपुराण भी हैं, उनमें जो गणेशजीसे
सम्बन्धित गणेशपुराण है, उसका प्रवचन मैं सर्वप्रथम
करूँगा, जिसका कि विशेष रूपसे मर्त्यलोकमें श्रवण
दुर्लभ है ॥ ९-१० ॥
जिस गणेशपुराणके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य
हो जाता है, जिसके प्रभावको कहनेमें [सहस्र मुखवाले]
शेषजी और चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, तो भी
आप सबकी आज्ञासे मैं इसको संक्षेपमें कहूँगा। बहुत-
से जन्मोंके पुण्योंके एकत्र होनेसे ही इसका श्रवण होता
है, पाखण्डियों, नास्तिकों और पापकर्मियोंको इसका
श्रवण सम्भव नहीं होता ॥ ११-१२१/२ ॥
श्रीगणेशजी तत्त्वतः नित्य, निर्गुण और अनादि हैं;
इसलिये उनके स्वरूपका कथन किसीके लिये सम्भव
नहीं है; फिर भी उनकी उपासनामें निरत भक्तोंद्वारा उन्हें
सगुणरूपमें निरूपित किया जाता है ॥ १३-१४॥
ॐकाररूपी जो भगवान् [गणेश] वेदोंमें सर्वप्रथम
प्रतिष्ठित हैं, मुनिगण तथा इन्द्रादि देवगण जिनका
हृदयमें सदा स्मरण करते रहते हैं, ब्रह्मा, ईशान (शिव),
इन्द्र और विष्णु जिनका सतत पूजन करते हैं, जो समस्त
जगतोंके हेतु और सम्पूर्ण कारणोंके भी कारण हैं,
जिनकी आज्ञासे ब्रह्माजी [विश्वका] सृजन करते हैं,
जिनकी आज्ञासे विष्णु पालन करते हैं, जिनकी आज्ञासे
भगवान् शंकर संहार करते हैं, जिनकी आज्ञासे सूर्य
संचरण (भ्रमण) करते हैं, जिनकी आज्ञासे पवनदेव
प्रवहमान होते हैं, जिनकी आज्ञासे जल सभी दिशाओंमें
प्रवाहित होता है, जिनकी आज्ञासे ग्रह-नक्षत्र (उल्कापिण्ड)
पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, जिनकी आज्ञासे तीनों लोकोंमें
अग्नि प्रज्वलित होती है, उन भगवान् गणेशका जो गुप्त
चरित है, जिसे किसीके समक्ष प्रकट नहीं किया गया
है, उसे मैं आप सबसे कहता हूँ। हे द्विजगण! आप लोग
आदरपूर्वक उसे सुनें ॥ १५-१९ ॥
इसे पूर्वकालमें ब्रह्माजीने अमिततेजस्वी व्यासजीसे
कहा था, उन्होंने इसे भृगुजीसे और भृगुजीने इसे
[राजा] सोमकान्तसे कहा- ॥ २० ॥


[दायाँ स्तम्भ]

जिन्होंने करोड़ों व्रतों, यज्ञों, तपस्याओं, दानों और
तीर्थसेवनद्वारा पुण्य अर्जित किया है, हे श्रेष्ठ द्विजगणो!
उन्हींकी बुद्धि इस गणेशसंज्ञक पुराणके श्रवणमें प्रवृत्त
होती है। जिनका मन स्त्री, पुत्र, भूमि आदि सांसारिक
मायाजालमें आसक्त नहीं होता, हे श्रेष्ठ मुनिगण!
भगवान् मयूरेश (गणेशजी)-की कथाका वे ही सादर
श्रवण करते हैं। अब आप लोग सोमकान्तके आख्यानके
माध्यमसे इसकी (गणेशपुराणकी) महिमाका श्रवण
करें ॥ २१-२३ ॥
सौराष्ट्र देशमें स्थित देवनगरमें सोमकान्त नामका
एक राजा हुआ, जो वेद और शास्त्रके तत्त्वको जानने-
वाला तथा धर्मशास्त्रके प्रयोजनभूत विहित कर्मानुष्ठानमें
रत रहनेवाला था ॥ २४ ॥
जब वह प्रस्थान करता तो दस सहस्र गजारोही,
उसके दुगुने अर्थात् बीस सहस्र अश्वारोही और छः हजार
रथारोही उसका अनुगमन करते थे। साथ ही असंख्य
पैदल सैनिक, आग्नेयास्त्रधारी तथा दो तरकस धारण
करनेवाले धनुर्धारी भी उसके साथ होते थे ॥ २५-२६ ॥
उसने बुद्धिसे बृहस्पतिको, धन-सम्पत्तिसे कुबेरको,
क्षमासे पृथ्वीको और गाम्भीर्यसे महासागरको जीत लिया
था। उस राजाने अपनी प्रकाशमयी आभासे सूर्य और
कान्तिसे चन्द्रमाको, प्रतापसे अग्निको और सौन्दर्यसे
कामदेवको जीत लिया था ॥ २७-२८ ॥
उसके पाँच मन्त्री थे, जो प्रबल शक्तिशाली, दृढ़
पराक्रमी, नीतिशास्त्रके तत्त्वार्थको जाननेवाले और शत्रु-
राष्ट्रका ध्वंस करनेवाले थे ॥ २९ ॥
उनमेंसे प्रथमका नाम रूपवान्, दूसरेका विद्याधीश,
तीसरेका क्षेमंकर, चौथा ज्ञानगम्य और पाँचवाँ सुबल
नामवाला था ॥ ३० ॥
ये सभी नित्य राज्यकार्य करनेवाले और राजाके
अत्यन्त प्रिय थे। इन्होंने अनेक देशोंपर आक्रमण करके
अपने पराक्रमसे उन्हें विजित किया था ॥ ३१ ॥
ये सभी अत्यन्त सुन्दर थे तथा अनेक प्रकारके
आभूषणों और वस्त्रोंसे अलंकृत रहते थे। उस राजाकी
सुधर्मा नामक गुणशालिनी पत्नी थी, जिसके रूपको


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उ०ख०-अ०२ ] * गलित कुष्ठसे पीड़ित राजा सोमकान्तका वनमें जानेका निश्चय करना * ४५
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देखकर [कामदेवकी पत्नी] रति तथा रम्भा और | रहती थी तथा पतिसेवा और उनके वचनोंके पालनमें
तिलोत्तमा [-जैसी स्वर्गकी अप्सराएँ] भी लज्जित हो | सदा सन्नद्ध रहती ॥ ३६१/२ ॥
जाती थीं; वे न कहीं सुख पाती थीं, न कहीं सुख मानती | इन (दम्पती)-के एक हेमकण्ठ नामवाला शुभ
थीं ॥ ३२-३३ ॥ | लक्षणोंसे युक्त पुत्र हुआ, जो दस हजार हाथियोंके समान
वह अपने कानोंमें अनेक रत्नोंसे जड़ित और | बलशाली, बुद्धिमान्, पराक्रमी और शत्रुओंको सन्ताप
स्वर्णनिर्मित सुन्दर कर्णफूल, कण्ठमें सोनेका हार तथा | देनेवाला था ॥ ३७१/२ ॥
मोतियोंकी माला, कटिप्रदेशमें रत्नमयी करधनी, पैरोंमें | हे श्रेष्ठ द्विजगण! इस प्रकार (-की गुण-समृद्धिसे
वैसे ही नूपुर तथा हाथों और पैरोंकी अँगुलियोंमें उत्तम | परिपूर्ण) सोमकान्त पृथ्वीका एक श्रेष्ठ राजा हुआ।
प्रकारकी अँगूठियाँ एवं अनेक रंगोंके सहस्रों बहुमूल्य | उसने सम्पूर्ण राजाओंको अपने वशमें करके इस पृथ्वीपर
वस्त्र धारण करती थी ॥ ३४-३५१/२ ॥ | राज्य किया। वह नित्य धर्ममें रत रहनेवाला, यज्ञकर्ता,
वह भगवद्भजन, दान एवं अतिथि-सत्कारमें लगी | दानी और त्यागी था ॥ ३८-३९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें पुराणोपक्रममें 'सोमकान्तवर्णन' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
गलित कुष्ठसे पीड़ित राजा सोमकान्तका वनमें जानेका निश्चय करना
सूतजी बोले-हे ऋषियो! आप सब अब | राजा सोमकान्तने प्रयत्नपूर्वक मनको स्थिर करके मन्त्रियोंसे
सोमकान्तके दुष्कृत्यको सुनें, उस धर्मशील राजाको | कहा- ॥ ६ ॥
पूर्वजन्मोंके कर्मफलसे अकस्मात् अत्यन्त दुःखदायी | राजाने कहा-मेरे राज्य और रूपको धिक्कार
गलित कुष्ठ हो गया ॥ १ १/२ ॥ | है; [मेरे] बल, जीवन और धनको धिक्कार है! न जाने
मनुष्यके द्वारा किया गया शुभ या अशुभ कर्म | मेरे किस कर्मका बीज इस कष्टके रूपमें [प्रस्फुटित
उसका कभी पीछा नहीं छोड़ता; जिस-जिस अवस्थामें | होकर] समुपस्थित हुआ है ॥ ७ ॥
जैसा-जैसा कर्म किया गया होता है, उस-उस अवस्थामें | जिस [शरीर]-की कान्तिसे सोम (चन्द्रमा)-को
प्राणीको उसका फल भोगना पड़ता है, यह ध्रुव सत्य | जीतकर मैं सोमकान्त कहलाया; जिससे मैंने साधुओं,
है ॥ २-३ ॥ | दीनों, श्रोत्रिय ब्राह्मणों और सभी आश्रमोंके लोगों,
अनेक घावोंसे युक्त, इधर-उधर बहते हुए रक्तवाले, | जनपदके निवासियों और अन्य लोगोंका भी पुत्रवत्
मवाद और खूनसे लथपथ राजा (सोमकान्त) कीड़ोंद्वारा | पालन किया; जिसके द्वारा मैंने अपने बाणोंसे भयंकर
काटकर विह्वल कर दिये जाते थे। उस समय वे | रूपवाले शत्रुओंको जीत लिया; जिसके द्वारा मैंने सम्पूर्ण
दुःखरूपी सागरमें उसी प्रकार निमग्न हो जाते थे, | पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया; सम्यक् रूपसे देवाधिदेव
जैसे समुद्रमें बिना नौकाके मनुष्य। उस समय उन्हें | परमात्मा सदाशिवका आराधन किया; जो दुष्टोंके संगसे
ऐसी पीड़ा प्राप्त होती थी, जैसी कि सर्पके डसनेसे | रहित और चित्तका निग्रह करनेवाला था, पूर्वकालमें मैंने
होती है ॥ ४-५ ॥ | अपने जिस शरीरके द्वारा रुचिकर सुगन्धियोंका विशेषरूपसे
उन राजाका शरीर क्षयरोगसे ग्रस्त रोगीकी भाँति | सेवन किया था, वही आज सड़े हुए मांसकी गन्धवाला
हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया। सभी इन्द्रियोंके रोगयुक्त | हो गया है, अतः मेरा जीवन निरर्थक है; इसलिये मैं
हो जानेसे वे चिन्तासे व्याकुल हो उठे। तदनन्तर उन | आप सबकी अनुमति लेकर वनमें जाऊँगा ॥ ८-१२ ॥
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४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
मेरे बुद्धि-पराक्रम-सम्पन्न पुत्र हेमकण्ठको आप
सब राज्य-संचालनहेतु अभिषिक्त करें और अपने पराक्रमसे
उसकी रक्षा करें॥ १३॥
हे महामन्त्रियो! अब मैं लोकमें अपना मुख
किसीको नहीं दिखलाऊँगा; न मुझे [अब] राज्यसे कोई
प्रयोजन है, न स्त्रीसे, न जीवनसे और न धनसे। अब
मैं वनमें जाकर अपना हितसाधन करूँगा॥ १४१/२ ॥
सूतजी बोले—हे श्रेष्ठ द्विजगण! ऐसा कहकर
मवाद, रक्त और पसीनेसे लथपथ वे (राजा सोमकान्त)
आँधीके झोंकेसे उखड़े हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर
पड़े। [उस समय] मन्त्रियों और स्त्रियोंका वहाँ महान्
कोलाहल हो रहा था॥ १५-१६॥
क्षणभरमें ही लोगोंका वहाँ अत्यन्त दारुण हाहाकार
होने लगा। तब मन्त्रियोंने वस्त्रसे पोंछकर, हवा करके, शीघ्र
लाभ करनेवाली औषधियों और मन्त्रोंका प्रयोग करके
उन्हें सचेतन किया और उन राजा सोमकान्तके स्वस्थ
होनेपर उनसे मन्त्रियोंने इस प्रकार कहा—॥ १७-१८॥
मन्त्रियोंने कहा—हे राजन्! आपकी कृपासे सभी
मनुष्योंके लिये दुर्लभ देवराज इन्द्रके तुल्य सुखोंका हमने
भोग किया, अब हम आपके बिना कैसे रह सकते हैं?
पशुओंका वध करनेवाले कसाईकी भाँति कैसे जीवन
धारण कर सकते हैं? आपका पुत्र बलवान् है, शत्रुओंका
नाश करनेवाला है और राजकोष भी प्रभूत धनसे सम्पन्न
है, अतः वह अकेला ही राज्य कर सकता है। हम लोग
सारे सुखोंका त्याग करके आपके साथ ही वनको चलते
हैं॥ १९-२०॥
सूतजी बोले—तदनन्तर [राजा सोमकान्तकी रानी]
सुधर्माने कहा कि हे श्रेष्ठ मन्त्रियो! मैं ही अकेली
राजाकी सेवाके लिये इनके साथ वनको जाऊँगी और
आप लोग मेरे पुत्रके साथ राज्यका भलीभाँति रक्षण-
पालन करें॥ २१॥
पूर्वकालमें किये गये [पाप या पुण्य] कर्मका फल
दुःख या सुखके रूपमें प्राणीको स्वयं ही भोगना पड़ता
है, दूसरा कोई उसे नहीं भोग सकता। जिस-जिस
प्रकारसे कर्मफलको भोगना निश्चित होता है, उसे वैसे
ही और स्वयंको ही भोगना पड़ता है॥ २२॥
मैंने भी इनके साथ अनेक प्रकारके सुखोंका भोग
और राज्य किया है। मुनियोंका कथन है कि नारीको
इहलोक और परलोक—दोनोंमें पतिका ही अनुगमन
करना चाहिये॥ २३॥
तब विनीत और शोकसंतप्त पुत्र हेमकण्ठने
[अपने पिता] राजा सोमकान्तसे उस समय यह वचन
कहा—॥ २४॥
हेमकण्ठ बोला—हे नृपश्रेष्ठ! आपके बिना मुझे
राज्य, पत्नी, धनसंचय तथा प्राणोंसे भी कोई प्रयोजन
नहीं है॥ २५॥
हे धर्मपालक! जैसे बिना तेलके दीपक और बिना
प्राणोंके शरीर व्यर्थ हैं, वैसे ही हे राजन्! आपके बिना
राज्य भी व्यर्थ है॥ २६॥
सूतजी बोले—मन्त्रियों, रानी सुधर्मा और पुत्र हेम-
कण्ठके अमृतके समान वचनोंको सुनकर प्रसन्नमन सोम-
कान्तने पुत्रसे इस प्रकार धर्मानुकूल बात कही—॥ २७॥
राजा बोले—पिताके वचनोंका पालन करनेमें
नित्य रत रहनेवाला, [मरणोपरान्त] श्रद्धापूर्वक श्राद्ध
करनेवाला और गयामें पिण्डदान करनेवाला पुत्र ही पुत्र
कहा जाता है*॥ २८॥
इसलिये मेरी आज्ञा मानकर मन्त्रियोंसहित तुम
नीतिपूर्वक राज्य करो और सम्पूर्ण प्रजाका पुत्रवत्
अनुशासन करो॥ २९॥
धर्मशास्त्रोंके तत्त्वार्थको जाननेवाला, नीतिज्ञ, सबको
सन्तुष्ट करनेवाला, पितरोंका उद्धार करनेवाला और जो
स्वयं भी पुत्रवान् है, उसीको पुत्र कहा जाता है॥ ३०॥
हे उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले [पुत्र]!
गलित कुष्ठवाला मैं अत्यन्त निन्दित हूँ, अतः पत्नी
सुधर्माके साथ मैं वनमें जाऊँगा, इसका तुम समर्थन
करो॥ ३१॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सोमकान्तकुष्ठप्राप्तिवर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥

  • जीवतो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात्। गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता॥ (श्रीमद्देवीभागवत ६।४।१५)
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