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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

उनतालीसवाँ अध्याय

Here is the complete transcription of the text from the image, preserving the original Hindi and Sanskrit terms, layout, and line structure:

१९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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उनतालीसवाँ अध्याय
त्रिपुरासुरका इन्द्रपर आक्रमणकर अमरावतीपुरीपर अधिकार कर लेना
व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन्! गणेशजीसे वरदान
प्राप्त करनेके बाद वरप्राप्तिके अहंकारसे भरे त्रिपुरासुरने
क्या किया? उसे आप बिना कुछ शेष रखे बताइये, उस
विषयमें मुझे कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] तदनन्तर उस
त्रिपुरासुरने काश्मीर देशमें उत्पन्न होनेवाले पत्थरसे एक
गजानन गणेशजीकी मूर्तिक निर्माण कराया और मन्त्रविद्
ब्राह्मणोंद्वारा उसकी विधिवत् स्थापना करायी ॥ २ ॥
उसने गणेशपुरके मध्यमें एक महान् और सुन्दर
मन्दिरका निर्माण करवाया, जो स्वर्णनिर्मित और दिव्य
मणि-मुक्ताओंसे विभूषित था ॥ ३ ॥
उसने षोडशोपचारोंसे उन प्रभुका पूजन किया और
असंख्य बार नमस्कार, स्तुतियाँ और क्षमा-प्रार्थना करके
उन देवाधिदेवकी आज्ञा लेकर वहाँसे बाहर आया और
ब्राह्मणोंको यथायोग्य अनेक दान दिये ॥ ४-५ ॥
तबसे बंगालमें स्थित त्रिपुरका वह स्थान गणेशपुर
नामसे विख्यात और सबको सब प्रकारकी सिद्धियाँ
देनेवाला हो गया। तदनन्तर वह त्रिपुर दैत्य गणेशजीके
वरदानसे मदोन्मत्त होकर मनुष्योंका पालन और देवताओंका
अतिक्रमण करनेमें संलग्न हो गया ॥ ६-७ ॥
उसके पास दसों दिशाओंसे बलवान्‌से बलवान्
पैदल, अश्वारोही, गजारोही और रथारोही सैनिक सेवाके
लिये आ गये। जो राजा उसके अनुकूल थे, वे सेवक
हो गये और जो असमर्थ होते हुए भी उसके प्रतिकूल
थे, वे मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ ८-९ ॥
इस प्रकार भूमण्डलका अतिक्रमणकर उसने
अमरावतीके लिये प्रस्थान किया। तब युद्ध-विद्यामें
निष्णात अनेक देवगणोंसे घिरे हुए इन्द्रने भी कवचबद्ध हो
तथा ऐरावतपर समारूढ़ हो युद्धके लिये प्रस्थान किया।
उधर उस महाबली दैत्य त्रिपुरासुरने भी अपनी चतुरंगिणी-
सेनाको तीन भागोंमें विभाजित किया ॥ १०-११ ॥
उसने महान् दैत्य भीमकायको एक भागका और
वज्रदंष्ट्र नामक दानवको दूसरे भागका अधिपति बनाया।
तदनन्तर उसने धनुर्युद्ध, गदायुद्ध, शस्त्रयुद्ध, अस्त्रयुद्ध
और मल्लयुद्धमें निपुण दैत्यश्रेष्ठ भीमकायसे कहा-
'तुम मनुष्यलोकके अधिपति बनो' ॥ १२-१३ ॥
[इसके बाद] महाबली त्रिपुरासुरने वज्रदंष्ट्रसे
कहा- 'तुम इस एक तिहाई सेनाको लेकर रसातलको
जाओ और मेरी आज्ञासे शेषनाग आदि सभी प्रमुख
नागोंको वशमें करो। मैं एक तिहाई सेना लेकर इन्द्रसहित
सम्पूर्ण देवताओंपर आक्रमण करूँगा' ॥ १४-१५ ॥
[तत्पश्चात्] भीमकाय और वज्रदंष्ट्रने आज्ञानुसार
प्रस्थान किया और स्वयं त्रिपुरासुर चतुरंगिणी सेनासहित
नन्दनवनमें जा पहुँचा ॥ १६ ॥
वहाँ उन योद्धाओंने [देव] सैनिकोंके रोकनेपर भी
दिव्य वृक्षोंको तोड़ डाला। वहाँ स्थित होकर उस दैत्यराज
त्रिपुरासुरने अपने दूतोंको यह कहकर भेजा कि तुम लोग
इन्द्रको शीघ्र मेरे सामने ले आओ, मैं उसे देखना चाहता
हूँ, अथवा उससे मेरा आदेश कहो कि तुम अभी मृत्युलोक
(पृथ्वी)-को चले जाओ, वहाँ मैं तुम्हारा पालन करता
रहूँगा, तुम शान्तिपूर्वक अमरावती मुझे दे दो और यदि
तुम्हारी बुद्धिमें युद्ध करनेकी बात आ रही हो, तो शीघ्र ही
मेरे पास आ जाओ ॥ १७-१९ ॥
उन दूतोंने इन्द्रके पास जाकर त्रिपुरासुरकी सारी
चेष्टाओंका वर्णन किया। उनके वचनोंको सुनकर
इन्द्रकी स्थिति वज्रसे आहत पर्वत-जैसी हो गयी ॥ २० ॥
जैसे वायुके वेगसे वृक्ष काँपने लगता है, वैसे ही
पर्वतशत्रु इन्द्र काँपने लगे। 'यह क्या हो गया'-ऐसा
विचार करते हुए वे चिन्तासे व्याकुल हो गये ॥ २१ ॥
वे क्रोधाग्निसे प्रज्वलित-से हो उठे थे, उनकी
आँखें लाल हो गयीं। ऐसा लगता था कि वे सम्पूर्ण
लोकोंको भस्म कर देंगे और समुद्रोंको सुखा डालेंगे ॥ २२ ॥
उन्होंने दूतोंसे कहा-'जाओ और युद्धके लिये
शीघ्र आओ।' उनके उस वचनको सुनकर वे सब दूत
जैसे आये थे, वैसे ही वापस लौट गये ॥ २३ ॥
[उस समय] देवताओंके शत्रुओंका हनन करनेवाले

उ०ख०-अ० ३९] * त्रिपुरासुरका इन्द्रपर आक्रमणकर अमरावतीपुरीपर अधिकार कर लेना * ११९
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साक्षात् इन्द्रने ऐरावतपर आरूढ़ होकर गर्जना की, उनके | करनेवाले योद्धा तथा बहुत-से पैदल सैनिक [उस
[उस] महान् नादसे त्रिभुवन क्षुब्ध हो उठा ॥ २४ ॥ | युद्धभूमिमें] बिना शय्याके ही सो गये थे; उनमेंसे कुछके
[अन्य] देवताओंने भी हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र धारण | पैर कट गये थे तथा दूसरे बहुत-से दैत्य उसी प्रकार दसों
कर लिये और वे [युद्धके लिये] सुसज्जित हो गये। कुछ | दिशाओंमें पलायन कर गये, जैसे अचानक सिंहको
[देवताओं]-ने हाथमें भिन्दिपाल, तो कुछने हाथमें शक्ति | देखकर जीवित रहनेकी इच्छा करनेवाले मृग भाग जाते
और ऋष्टि [नामक शस्त्र] धारण कर रखे थे ॥ २५ ॥ | हैं ॥ ३४-३५ ॥
कुछने हाथोंमें मुद्गर और तलवार धारण कर रखी | तब देवशत्रु त्रिपुरासुरने उस भागती हुई अपनी
थी तो अन्य [देवताओं]-ने धनुष-बाण धारण कर रखे | सेनाको रोका और स्वयं वह क्रोधाग्निकी महान् ज्वालामें
थे। कुछके हाथोंमें गदा और खेट थे, तो कुछ दण्डपाणि | जलता हुआ तथा दूसरे मेघकी भाँति गर्जन करता हुआ
अर्थात् हाथमें दण्ड लिये हुए थे ॥ २६ ॥ | इन्द्रके समीप आया। उस समय वह पृथ्वी और
[तदनन्तर] ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्त्यन कराकर वज्रधारी | आकाशका भक्षण करता हुआ-सा प्रतीत हो रहा था।
इन्द्र इस प्रकार देवताओंके साथ [अमरावतीपुरीसे] | उसने अपने खड्गसे वज्रधर इन्द्रके हाथपर तीव्र प्रहार
बाहर आये। उस समय अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि | किया ॥ ३६-३७॥
हो रही थी ॥ २७ ॥ | [उस प्रहारसे] इन्द्रके हाथसे वज्र गिर पड़ा—यह
त्रिपुरासुरने भी दूतकी बातसे उनके युद्ध-उद्यमको | एक अद्भुत घटना घटित हुई! वज्रको लेकर उस दैत्यने
जानकर अपनी शक्तिशाली और हर्षसे भरी हुई चतुरंगिणी | उसीसे ऐरावत हाथीपर प्रहार किया ॥ ३८ ॥
सेनाको युद्धके लिये सुसज्जित किया। [तत्पश्चात्] | उस प्रहारसे [व्यथित होकर] ऐरावत पलायन कर
अश्वारूढ़ होकर उसने असंख्य सैनिकोंवाली सेनाके | गया। तदनन्तर इन्द्रने घूँसेसे उस दैत्यश्रेष्ठ [त्रिपुरासुर]-
साथ [युद्धके लिये] प्रस्थान किया। इस प्रकार वीर | पर प्रहार किया ॥ ३९ ॥
योद्धाओंसे सुसज्जित दोनों सेनाओंने एक-दूसरेको | उससे वह क्षणभरके लिये भूमिपर गिर पड़ा,
देखा ॥ २८-२९ ॥ | तत्पश्चात् पुनः वेगपूर्वक उठकर उसने मुक्केसे प्रहारकर
[उस समय] हाथियोंके चिंघाड़ने, घोड़ोंके हिनहिनाने, | इन्द्रको पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ४० ॥
योद्धाओंके युद्धनाद, रथोंके चलनेकी ध्वनि और अनेक | तत्पश्चात् उठकर इन्द्रने क्रोधपूर्ण वाणीमें दैत्य
प्रकारके वाद्योंके घोषसे वहाँ महान् कोलाहल हो गया। | त्रिपुरसे कहा—हे असुरेश्वर! अब तुम मल्लयुद्धके लिये
तब त्रिपुरासुरके द्वारा हुंकारमात्रसे प्रेरित किये उसके वीर | तैयार हो जाओ ॥ ४१ ॥
योद्धा देवताओंके साथ युद्ध करने लगे और इस प्रकार | तब उस बलगर्वित त्रिपुरासुरने आश्चर्यचकित
महान् संग्राम प्रारम्भ हो गया ॥ ३०-३१ ॥ | होकर कहा—हे देवेश्वर! अपने प्राणोंके प्रति क्यों निर्दय
इस युद्धमें सैनिकोंको अपने-परायेका ज्ञान न रहा | हो रहे हो? ॥ ४२ ॥
और वे परस्पर एक-दूसरेको मारने लगे। इस प्रकार उस | कृमि, कीट और पतंगोंको भी अपने प्राण अत्यन्त
भयंकर युद्धमें बहुत-से दानव मारे गये ॥ ३२॥ | प्रिय होते हैं, हे देवराज! धरतीपर जाओ, वहाँ मैंने तुम्हें
दैत्योंके शस्त्राघातसे अत्यन्त पीड़ित होकर बहुत- | सुन्दर स्थान दे रखा है ॥ ४३ ॥
से देवता भी उस युद्धभूमिमें गिर गये। वहाँ वे | ब्रह्माजी बोले—[हे व्यास!] उसके इस प्रकारके
[रक्तरंजित] सैनिक पुष्पित पलाश वृक्षोंकी भाँति सुशोभित | वचन सुनकर बलासुर और वृत्रासुरका वध करनेवाले
हो रहे थे ॥ ३३॥ | इन्द्रने कहा—रे अधम शत्रु! यदि मैं तुझे जीवित
ऊँट, हाथी, रथ और घोड़ोंपर आरूढ़ होकर युद्ध | छोड़ूँगा, तब तेरी आज्ञाके वशमें होकर पृथ्वीपर जाऊँगा।

१२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

रे दुष्ट! तू ही आज भग्न सिरवाला होकर पृथ्वीपर | हिमालयपर्वतकी गुफाओंमें चले गये ॥ ५१ ॥
जायगा ॥ ४४-४५ ॥ | वे देव (इन्द्र) कहाँ गिरे हैं? उन विभुको हम कैसे
जब देवेन्द्र ऐसा कह रहे थे, तभी उस दुष्ट | देखें ? - ऐसा चिन्तन करते और भ्रमण करते हुए उन्होंने
दैत्यराजने मुष्टिकासे उनके हृदयदेशमें प्रहार किया, तब | उनको देख लिया ॥ ५२ ॥
उन दोनोंमें युद्ध होने लगा। एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा | तब उस देवसमूहने नीचेको मुख किये आते हुए
रखनेवाले उन दोनोंका वह युद्ध चाणूर और कृष्णके | उन इन्द्रको प्रणाम किया। कुछ अन्य देवताओंने उनका
युद्धकी भाँति था। वे दोनों परस्पर छाती-से-छाती और | आलिंगन किया। कुछ अन्य देवताओंने उनका पूजन
हाथ-से-हाथपर प्रहार कर रहे थे ॥ ४६-४७ ॥ | किया और कुछने उनपर व्यजन डुलाये तथा कुछने
वे दोनों घुटनों-से-घुटनोंमें, जाँघों-से-जाँघोंमें, | भक्तिपूर्वक उनके पैर दबाये ॥ ५३-५४ ॥
मस्तक-से-मस्तकमें, कुहनी-से-कुहनीमें, पीठ-से-पीठमें, | [ तदनन्तर ] वे सभी देवता गुप्त रूपसे वहीं रहने
पैरों-से-पैरोंमें प्रहार कर रहे थे। तभी उस दैत्य त्रिपुरने | लगे। [उधर] वह दैत्य (त्रिपुरासुर) ऐरावतपर आरूढ़
इन्द्रके दोनों पैरोंको पकड़कर और उन्हें बार-बार घुमाकर | होकर अमरावतीपुरीको चला गया ॥ ५५ ॥
इतनी दूर फेंक दिया कि किसीको उनके विषयमें कोई | उसने देवताओंसे द्वेष रखनेवाले दैत्योंको सम्मानपूर्वक
जानकारी ही न रही और स्वयं चार दाँतोंवाले गजराज | देवताओंके पद बाँट दिये और स्वयं इन्द्रासनको हस्तगत
ऐरावतपर आरूढ़ हो गया ॥ ४८-५० ॥ | कर लिया अर्थात् इन्द्र बन बैठा। किन्नरगणोंसे सेवित [वह]
तदनन्तर सभी देवगण उस दैत्य त्रिपुरासुरके | त्रिपुरासुर दिव्य वाद्योंकी ध्वनि और गन्धर्वोंके गानका श्रवण
सन्त्रासरूपी अग्निसे पीड़ित होकर, इन्द्रको खोजते हुए | करते हुए अप्सराओंके साथ रमण करने लगा ॥ ५६-५७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'इन्द्रपराजयवर्णन' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥
चालीसवाँ अध्याय
ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन, देवताओंद्वारा
गणेशाराधन, गणेशजीका प्रकट होना, देवताओंद्वारा संकष्टनाशनस्तोत्रसे उनका स्तवन
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] देवलोकपर | आलिंगन कर लिया ॥ ४ ॥
अधिकार करके वह दैत्य ब्रह्मलोकको गया। ब्रह्माजीने | तत्पश्चात् वह महान् असुर युद्धोत्सुक होकर
उस दैत्यके पराक्रमको देवताओंके मुखसे पहले ही | कैलासपर्वतपर चढ़ गया। उस दैत्यके इस पुरुषार्थसे
सुन रखा था, अतः वे [विष्णुके] नाभिकमलमें छिप | महादेवजी प्रसन्न हो गये ॥ ५ ॥
गये और विष्णु [वैकुण्ठलोकको छोड़कर] क्षीरसागरमें | अपने भक्तोंको सुख प्रदान करनेवाले [वे उसे] वर
चले गये ॥ १ १/२ ॥ | देनेके लिये [अपने भवनसे] बाहर आये और दैत्य
उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-के दो मानस पुत्र थे- | त्रिपुरको देखा तथा उससे 'वर माँगो' - ऐसा कहा ॥ ६ ॥
प्रचण्ड और चण्ड। उसने स्वयं प्रचण्डको ब्रह्मलोकमें | उसने कहा कि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो
अधिनायकके रूपमें स्थापित किया और उसके बाद | [यह] कैलासपर्वत मुझे दे दीजिये, जबतक मेरी इच्छा
चण्डको वैकुण्ठमें वहाँका स्वामी बनाया ॥ २-३ ॥ | हो, मैं यहाँ रहूँ और आप आज ही मन्दारपर्वतके
तदनन्तर वह कैलास गया और उसे अपनी | शिखरपर चले जाइये ॥ ७ ॥
भुजाओंसे चलायमान कर दिया, जिससे भयभीत होकर | तब भगवान् शंकरने भी उस अत्यन्त अल्पजीवीको
गिरिराजनन्दिनी पार्वतीने भगवान् शंकरका दृढ़तापूर्वक | कैलासपर्वत दे दिया और वे स्वयं गिरिशायी [महादेव]

उ०ख०-अ०४०] * ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन * १२१
गणोंसे घिरे हुए मन्दराचलको चले गये। कैलासशिखरपर
आरूढ़ होकर अर्थात् कैलासपर्वतका स्वामित्व प्राप्तकर
त्रिपुरासुर अत्यन्त हर्षित हुआ। इस प्रकार देवताओंको
वशमें करके वह पुनः रसातलको आया ॥ ८-९ ॥
बलवान् भीमकायने भी पृथ्वीपर जाकर बलपूर्वक
राजाओं और ऋषियोंको अपने वशमें कर लिया और उन
सबको बाँध लिया। [उसने] देवताओंको तृप्ति प्रदान
करनेवाले सभी अग्निकुण्डों, आश्रमों तथा विशेष रूपसे
तीर्थोंको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ॥ १०-११ ॥
उसने तपस्वियोंको पीड़ित किया और उन्हें कारागारमें
डाल दिया। सब प्रकारसे अभिमानसे भरा हुआ वह (दैत्य
भीमकाय) देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वषट्कार, वेदाध्ययन करनेवालों
और सदाचारियोंनोंसे सदा द्वेष रखता था ॥ १२१/२ ॥
[उधर] वज्रदंष्ट्रने भी सातों पातालों*को अपने
वशमें कर लिया। उसने शेष, वासुकि और तक्षक प्रभृति
सभी नागों तथा विषहीन और विषैले सर्पोंको अपने
वशमें कर लिया। वज्रदंष्ट्रने [वहाँसे प्राप्त] श्रेष्ठ
रत्नोंका स्वयं भी भोग किया और [उन्हें] त्रिपुरासुरके
लिये भी प्रेषित किया ॥ १३-१४ ॥
वह सदा मदोन्मत्त होकर अत्यन्त हर्ष और
कौतूहलपूर्वक नागलोककी नारियोंसे रमण करता था।
[इस प्रकार] वह अनेक प्रकारके भोगोंका भोगकर
विविध रत्नोंको लेकर त्रिपुरासुरके पास आया ॥ १५ ॥
'पातालको वशमें कर लिया है' यह बात बतानेपर
उसने [त्रिपुरासुरसे] पहलेकी भी अपेक्षा अधिक सम्मान,
बहुमूल्य वस्त्र, बहुत-से ग्राम और सेवक प्राप्त किये ॥ १६ ॥
इस प्रकार त्रैलोक्यको अपने वशमें करके वह दैत्य
[त्रिपुरासुर] अत्यन्त आनन्दित हुआ और उधर सभी
देवता गुफाओंमें रहते हुए नित्य चिन्तित रहते थे कि इस
दैत्यका वध कैसे, किस समय और किसके द्वारा होगा?
हम लोग यह भी नहीं जानते कि इसने कहाँसे यह
वरदान प्राप्त कर लिया है ॥ १७-१८ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ (व्यासजी) ! [जब] देवता लोग इस
प्रकारसे व्याकुल थे तो [उसी समय] अपनी इच्छासे
त्रिलोकीमें विचरण करनेवाले नारदजी वहाँ आये ॥ १९ ॥
[वे] उन दीन दशावाले देवोंको देखकर आकाश-
मार्गसे नीचे उतर आये। नारदजीको सहसा आया
देखकर वे सब आदरपूर्वक उठकर खड़े हो गये ॥ २० ॥
अवस्थाके अनुसार उनमेंसे कुछने उनका आलिंगन
किया, कुछने नमस्कार किया और कुछने उनका पूजन
किया; तत्पश्चात् विश्रामके अनन्तर [उन्होंने उनसे]
त्रिपुरके वरदान आदिके विषयमें पूछा ॥ २१ ॥
देवता बोले-त्रिपुरासुरने स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण
प्राणियोंसहित त्रैलोक्यको अधीन कर लिया है। उसने
हमारे स्थान छीन लिये हैं; ब्रह्मा, विष्णु और शंकरको
भी उसने जीत लिया है ॥ २२ ॥
हे [मुने]! अब हम किसकी शरणमें जायँ?
उसका वध कैसे हो ? इस त्रिपुरको किसने वरदान दिया
है-यह हमें बतलाइये ॥ २३ ॥
नारदजी बोले- [हे देवताओ!] दैत्य त्रिपुरासुरद्वारा
किये गये महान् प्रयासको मैं संक्षेपमें कहता हूँ, उसने
दिव्य सहस्र वर्षोंतक परम तप किया था ॥ २४ ॥
उसने देवाधिदेव भगवान् गणेशको [अपनी तपस्यासे]
प्रसन्न किया। उन्होंने उसे सबके लिये दुर्धर्ष और
भयंकर वर प्रदान किये ॥ २५ ॥
[उन्होंने उसे] एकमात्र परमात्मा शंकरके अतिरिक्त
देवताओं, ऋषियों, पितरों, भूतों, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों
और नागोंसे अभय होनेका वर प्रदान किया है ॥ २६ ॥
अतः [आप लोग] आदरपूर्वक देवताओंके स्वामी
गजानन गणेशजीको प्रसन्न करें; सभी सिद्धियोंको प्रदान
करनेवाले विघ्नेश्वरकी आप सभी लोग आराधना करें ॥ २७ ॥
देवता बोले-हे मुनिश्रेष्ठ! उन बुद्धिमान्
देवाधिदेवका आराधन कैसे करना चाहिये, कृपया इसे
हम सबसे कहिये ॥ २८ ॥
नारदजी बोले-मैं आप सबके प्रति [गणेशजीके]
एकाक्षर मन्त्रका कथन करता हूँ, आप सब मेरे द्वारा
प्रदत्त उस मन्त्रका स्थिर मनसे भक्तिपूर्वक तबतक
अनुष्ठान करें, जबतक कि वे देव गणनायक प्रत्यक्ष
प्रकट होकर दर्शन न दे दें ॥ २९-३० ॥
वे ही आप सबसे उसके वधका उपाय कहेंगे,

  • अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल-ये पृथ्वीके नीचे स्थित सात लोक हैं; जिनकी सप्तपाताल संज्ञा है।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य (Text) दिया गया है:


शीर्षक (Header):
१२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-


बायाँ स्तम्भ (Left Column)

[इस विषयमें] मैं कोई अन्य उपाय नहीं देखता हूँ।
इसलिये मेरे वचनका पालन करो ॥ ३१ ॥
ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] नारदमुनिने ऐसा
कहकर और उन सबको उस (एकाक्षर) मन्त्रका
उपदेश देकर वीणापर [भगवन्नामका] गान करते हुए
तत्क्षण वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ३२ ॥
तदनन्तर वे सभी श्रेष्ठ देवता गणेशजीके ध्यानमें
संलग्न हो गये। उनमेंसे कुछ एक पैरपर, कुछ पद्मासनमें
और कुछ वीरासनमें स्थित थे; कुछने अपने नेत्र बन्द कर
रखे थे। वे सब श्वासपर नियन्त्रण करके निराहार रहते
हुए मुनिद्वारा उपदिष्ट मन्त्रका जप करने लगे ॥ ३३-३४ ॥
तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर करुणासागर गजानन
गणेशजी देवताओंके दीर्घकालसे चल रहे अनुष्ठानको

(मध्य में चित्र)

देखकर उनके समक्ष प्रकट हुए। उन वरदायक [गणेशजी]-
के [सिरपर] स्वर्ण मुकुट और [कानोंमें] सुन्दर कुण्डल
सुशोभित हो रहे थे ॥ ३५-३६ ॥
उन्होंने अपने हाथमें दाँत धारण कर रखा था,
उनके शरीरपर श्रेष्ठ बाजूबन्द और कटिसूत्र शोभायमान
हो रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाओंमें पाश, अंकुश, परशु
और कमल धारण कर रखे थे ॥ ३७ ॥
उनका [मस्तक] रक्तचन्दन, कस्तूरी, सिन्दूर और


दायाँ स्तम्भ (Right Column)

चन्द्रमासे विभूषित था। उनके श्रीविग्रहका तेज विद्युत्के
समान और उनकी कान्ति करोड़ों सूर्योंकी प्रभाके
समान थी ॥ ३८ ॥
सहसा अनामय देव विनायकको [अपने समक्ष]
देखकर सभी देवता उनके तेजसे पराभूत हो गये। उनमेंसे
कुछ भयभीत हो गये, कुछ देवता सहसा उन गजाननको
प्रणाम करने लगे, कुछ अन्य देवताओंने हर्षसे गद्गद
वाणीमें उनका पूजन किया ॥ ३९-४० ॥
संकटसे रक्षा करनेवाले और कृपा करनेके लिये
उत्सुक उन सुन्दर मुखवाले भगवान् गणेशका कुछ
देवताओंने अपने संकटके विनाशहेतु स्तवन* भी
किया ॥ ४१ ॥
**देवता बोले—**हे परमार्थरूप! आपको नमस्कार
है, नमस्कार है। आप अखिल [सृष्टि]-के कारणरूप
हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सम्पूर्ण
प्राणियोंको [इस भवसागरसे] तारनेवाले हैं, आपको
नमस्कार है। आप [सम्पूर्ण प्राणियोंकी] सभी इन्द्रियोंमें
भी निवास करते हैं, आपको नमस्कार है ॥ ४२ ॥
आप सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित हैं; आपको नमस्कार
है, नमस्कार है। हे देवेश! आप भूत-सृष्टिके कर्ता हैं;
आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप [सम्पूर्ण प्राणियोंकी]
बुद्धिके प्रबोधरूप हैं, संसारकी उत्पत्ति और लय करनेवाले
हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४३ ॥
हे अखिलेश! आप विश्वका भरण-पोषण
करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है।
आप कारणोंके भी कारण हैं; आपको नमस्कार है,
नमस्कार है। आप वेदके विद्वानोंके लिये भी अदृश्य
हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सबको
वर प्रदान करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार
है ॥ ४४ ॥
हे वाणीसे अनिर्वचनीय [परमात्मन्]! आपको
नमस्कार है, नमस्कार है। आप विघ्नोंका निवारण
करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप
अभक्तके मनोरथका नाश करनेवाले हैं; आपको नमस्कार
है, नमस्कार है। हे भक्तके मनोरथको जाननेवाले!

उ०ख०-अ०४०] * ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन * १२३
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