श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अट््ठावनवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०५८] * काशिराजकी पत्नीका विलाप करना * ४११
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अट््ठावनवाँ अध्याय
काशिराजकी पत्नीका विलाप करना और विनायककी सिद्धि नामक शक्तिका विशाल सेना
और क्रूर नामक कालपुरुषको प्रकट करना, कालपुरुषद्वारा नरान्तककी
सेनाका भक्षणकर उसे विनायकके पास ले आना
ब्रह्माजी बोले- इधर नरान्तक हर्षपूर्वक आधा
ही मार्ग तय कर पाया था कि तबतक काशिराजकी
पत्नीको यह सूचना प्राप्त हो गयी कि राजाको बन्दी
बनाया गया है। राजपत्नी इस बातसे अतिशय शोकाकुल
हो गयी और [असुरोंके द्वारा किये गये विनाशसे] जो
बच निकले थे, वे नागरिक भी शोकमग्न हो गये।
जलहीन सरोवरमें स्थित मछलियोंकी भाँति व्याकुल उन
लोगोंने अत्यधिक क्रन्दन किया ॥ १-२ ॥
शत्रुओंके द्वारा पतिको बन्दी बनाये जानेसे व्याकुल
हुई महारानी वायुवेगसे गिरे कदलीवृक्षकी भाँति भूतलपर
गिर पड़ीं। उन्हें मूर्च्छा आ गयी और उनकी कान्ति नष्ट
हो गयी। [कुछ समयके पश्चात् जब उन्हें चेतना हुई
तो] वे सखियोंके साथ विलाप करने लगीं और रोती हुई
बोलीं- ॥ ३१/२ ॥
अम्बा [राजभार्या] बोलीं-जो शत्रुओंका मर्दन
करनेवाले, गजसेनाके संहारक और सिंहके सदृश वीरतापूर्ण
चेष्टाओंवाले थे, वे काशिराज कैसे शृगालतुल्य दैत्यके
द्वारा बलपूर्वक बन्दी बनाये गये ? दैत्यसमूहके विनाशक
एवं मदमत्त हजारों हाथियोंके समान बलशाली मेरे
स्वामीका बल कहाँ चला गया ? भगवान् महेश्वर मुझपर
किसलिये रुष्ट हो गये ? कब मैं अपने पतिको देख
सकूँगी ? ॥ ४-६॥
अब मैं किस देवताका आश्रय लूँ, जो उनको शीघ्र
ही मुक्त करा सके ? कश्यपपुत्र विनायकके कारण राजाने
प्रबल संग्राम किया। राजाका वह सब (शरणागतरक्षणका
भाव) व्यर्थ हो गया। वे [कर्तव्याकर्तव्यके विषयमें]
मोहग्रस्त हो गये और बालककी बातोंमें आकर व्यर्थमें
ही प्रबल वैरियाँसे विरोध कर बैठे ॥ ७-८॥
पतिको बन्दी बना लेनेवाले उस महादैत्य नरान्तकको
सबके बिना अर्थात् बिना सभी साधनोंसे सम्पन्न हुए
कौन जीत सकेगा? आज तो मुझ मन्दभागिनीके लिये
यह प्रलयकाल ही आ गया है। मुझको और पृथिवीको
[अकारण ही] वैधव्य क्यों प्राप्त हुआ है ? उन
(राजा)-के जैसा कोई करुणासागर कहीं दृष्टिगोचर
नहीं होता, जो हमें शरण दे सके ॥ ९-१० ॥
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारके राजपत्नीके शोकपूर्ण
उद्गार सुनकर बलवान् कश्यपपुत्र विनायकने बड़े जोरसे
गर्जना की। वह गर्जनघोष ब्रह्माण्डको फाड़ देनेवाला
जान पड़ता था ॥ ११ ॥
उनकी गर्जनासे प्रतिध्वनित आकाश और दिशाएँ
भी गरज उठीं, जिससे पर्वतों और वनोंकी आधारभूमि
सारी पृथ्वी काँप उठी। पक्षीगण गिर पड़े और मरने लगे
तथा मनुष्योंमें विह्वलता छा गयी ॥ १२१/२ ॥
तदुपरान्त क्रोधसे विकृत नेत्रोंवाले विनायकने सिद्धि
नामक शक्तिकी ओर देखकर कहा- 'अरे ! उस भीषण
संग्रामके अवसरपर तू कहाँ चली गयी थी?' तब सिद्धिने
विनायकके मनोभावको जानकर विविध प्रकारकी सेनाओंको
प्रकट किया ॥ १३-१४॥
[सिद्धिद्वारा] प्रादुर्भूत हुए वे हजारों वीर
भयानक मुखोंवाले थे। उनके दाँत हलके समान, जिह्वाएँ
सर्प-जैसी और मस्तक पर्वतोंके समान विशाल थे ॥ १५ ॥
वे वीर इस प्रकारसे मुखोंको फैलाये थे, मानो
एकाएक भूमण्डलको ही निगलना चाह रहे हों। उन
महाबली पुरुषोंके सैकड़ों नेत्र थे और वे मुखसे अग्नि-
ज्वालाएँ उगल रहे थे। उनके नथुनोंमें प्रविष्ट होकर
बड़े-बड़े हाथी भी ओझल हो जाते थे और जिनके
श्वासवेगसे चन्द्रमा और सूर्य भी भूतलपर गिर जाते
थे ॥ १६-१७ ॥
जिनकी जटाएँ सम्पूर्ण पृथिवीको बुहार देती थीं
और जिनके हाथ हजार योजन लम्बे तथा पैर दो हजार
४१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
योजनकी दीर्घतावाले थे ॥ १८ ॥
उन वीरोंका स्वामी क्रूर विनायकके समीप आकर
पूछने लगा- 'हे प्रभो ! मेरे लिये क्या कर्तव्य है ? प्रभो !
मैं भूखा हूँ, अतः सर्वप्रथम आप मुझे तृप्ति देनेवाला
भक्ष्य प्रदान कीजिये।' इस प्रकारसे निवेदन करते हुए
उस वीरपुरुषसे विनायकने कहा- ॥ १९-२० ॥
'नरान्तकके द्वारा भलीभाँति संरक्षित इस विशाल
सेनाका तुम भक्षण करो और उस नरान्तकको मारकर
शीघ्र ही उसका मस्तक मेरे पास ले आओ। अगर तुम
उसकी सेनाको खाकर तृप्त न हो सके तो तुमको खानेके
लिये कुछ और दूँगा।' कश्यपात्मज विनायकसे इस
प्रकारकी आज्ञा प्राप्त करके [उसने] उनको प्रणाम
किया और घोर गर्जन करके नरान्तकके समीप जा
पहुँचा ॥ २१-२२१/२ ॥
उसकी घोर गर्जना और वैसे [भयावह] रूपके
कारण नरान्तक तथा उसके सैनिक भयभीत हो गये और
वे दसों दिशाओंमें भागने लगे। [तब वह क्रूर] उन सभी
सैनिकोंको हाथमें ले-लेकर मुखमें डालने लगा। उस
समय भूतलसे उठती धूलके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं
हो रहा था। उस घनघोर अँधेरेमें नरान्तकके सैनिक
मशालोंके सहारे कुछ देख पा रहे थे ॥ २३-२५ ॥
उस भयानक पुरुषको देखकर कुछ सैनिकोंने प्राण
त्याग दिये। जो मर चुके थे और जो जीवित थे, उन
सभीको वह वेगपूर्वक खाता जा रहा था ॥ २६ ॥
इस प्रकार समस्त सेनाका विनाश होते देख नरान्तक
अपने मनमें सोचने लगा कि' [अरे !] यह तो कालका भी
काल आया हुआ है। अब मुझे क्या करना चाहिये, यह तो
बड़ा ही बलवान् जान पड़ता है।' ऐसा कहते हुए उसने
देखा कि आधी सेना तो खायी जा चुकी है ॥ २७-२८ ॥
[नरान्तक सोचने लगा कि अरे !] 'यह तो
प्रलयाग्निके समान सेनाका बलपूर्वक संहार करनेमें लगा
है। [यदि इसे रोका न गया तो] यह इस (सेना)-को
वैसे ही निश्शेष कर देगा, जैसे महर्षि अगस्त्यने समुद्रको
किया था' ॥ २९ ॥
उस समय सभी दैत्य सैनिक भयानक चीत्कार कर
रहे थे। कुछ योद्धा खा लिये गये थे और कुछ चरणोंके
आघातसे पीस डाले गये थे। कुछ उसकी श्वासवायुके
आघातसे मर गये, तो कुछने केवल उसके भयसे ही प्राण
त्याग दिये। [भागते हुए] सैनिक एक-दूसरेपर गिरते जा
रहे थे ॥ ३०-३१॥
वे उस नरान्तकको चीखते हुए बुला रहे थे कि
'आइये, यहाँ आइये और हमें बचा लीजिये।' उधर वह
(विनायकका गण) हाथके प्रहारसे सैनिकोंको मार-
मारकर तत्काल ही उनको खाता जा रहा था ॥ ३२ ॥
असंख्य सैनिकोंको खा लेनेपर भी उसकी जठराग्नि
शान्त नहीं हो पा रही थी। हे मुने ! उस गणने [इस
प्रकारसे] अश्वारोहियों, गजारोहियों, रथारोहियों और
पैदल सैनिकोंको खाया तथा हाथी आदि बहुतसे वाहक
पशुओंको मार डाला ॥ ३३१/२ ॥
तब इस प्रकारके कोलाहलको सुनकर उस नरान्तकने
धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ायी और भूतलपर अपने
घुटने टेक करके दोनों [कन्धोंमें बँधे तरकसों]-से
बाण निकालकर धनुषको खींचा तथा बाणवर्षा करने
लगा ॥ ३४-३५ ॥
तब बाणवर्षाके कारण अँधेरा छा गया और
[आकाशमें उड़ते] पक्षी तथा बहुत-से राजसैनिक
भूतलपर गिरने लगे। दैत्यराज नरान्तकके द्वारा छोड़े गये
बाणोंको वह पुरुष (विनायकका गण) निगलता जा रहा
था। उसके रोमकूपोंमें असंख्य बाण प्रविष्ट होते जा रहे
थे और उन (रोमकूपों)-से रुधिर बह रहा था। इसपर
भी उसे अणुमात्र वेदना नहीं हो रही थी। तदुपरान्त
नरान्तकने अपने सामर्थ्यसे [बहुत-सारे] अस्त्रोंको उत्पन्न
किया ॥ ३६-३८ ॥
तब उस गणने उन सभी अस्त्रोंको वैसे ही निगल
लिया, जैसे आजगरी (मादा अजगर) अण्डे निगल लेती
है। नरान्तकके अस्त्र कुण्ठित हो गये, शस्त्र नष्ट हो गये
और उसका बाणसंग्रह भी समाप्त हो चुका था। तब वह
बलहीन दैत्यराज भाग निकला। उसके पीछे-पीछे वह
कालपुरुष भी दौड़ने लगा ॥ ३९-४० ॥
भूतलपर दौड़ते-भटकते उस दैत्यने जब पीछा करते
क्री०ख०-अ०५९] * काशिराजकी नरान्तकसे मुक्ति * ४१३
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उस कालपुरुषको देखा, तो उसके भयवश त्वरित गतिसे
नरान्तक स्वर्ग जा पहुँचा। जब वहाँ भी उसने अपने पीछे
आते हुए [उस] कालपुरुषको देखा तो वह धरातलपर
कूद पड़ा और पातालमें प्रविष्ट हो गया। पातालमें जाते
हुए नरान्तकको उस कालपुरुषने बाल पकड़कर वैसे ही
खींच लिया, जैसे बिलमें प्रवेश करते हुए अतीव बलवान्
सर्पको गरुड़ खींच लेते हैं ॥ ४१-४३ ॥
तदुपरान्त उस बलशाली कालपुरुषने नरान्तकसे
कहा—'नरान्तक! कहाँ जाओगे, तुम तो मेरे सामने ही
दीख रहे हो। अरे महापापी! तूने शिवके वरदानसे
मदमत्त होकर देवताओं और ऋषियोंको सताया है तथा
इतने मनुष्योंका संहार किया है, जिसकी कोई संख्या
नहीं है ॥ ४४-४५ ॥
अरे दुष्ट! तेरा ही संहार करनेके लिये विनायकदेव
अवतीर्ण हुए हैं। इसलिये समग्र अभिमानका त्यागकर
उनकी शरणमें चला जा। उनके चरणकमलका अवलोकन
करते ही तेरे सारे पाप विनष्ट हो जायेंगे' ॥ ४६ १/२ ॥
ऐसा कहकर वह कालपुरुष दैत्यराज नरान्तकको
बलपूर्वक विनायकके समीप ले आया और फिर स्वामी
विनायकदेवको प्रणाम करके कहने लगा— ॥ ४७-४८ ॥
'हे विनायक! हे विभो! आपके आदेशानुसार
मैंने विशाल दैत्यसेनाका पूर्णरूपसे भक्षण कर लिया
है। इस नरान्तकने भी मुझे अत्यधिक पीड़ा पहुँचायी
है, मैं इसे पकड़कर आपके पास ले आया हूँ। अब
मुझे थकावट दूर करनेके लिये कोई शयनयोग्य स्थान
प्रदान कीजिये और सबको सुखी करनेके लिये इसको
मोक्ष दीजिये' ॥ ४९-५० ॥
कालपुरुषके ऐसे कथनको सुनकर उससे विभु
विनायकने कहा—'तुम मेरे मुखके भीतर प्रविष्ट हो
जाओ और इच्छानुरूप निद्रासुख प्राप्त करो।' विनायकके
मुखसे निकली इस प्रकारकी उत्तम बात सुनकर वह
पुरुष उनके मुखमें प्रविष्ट हुआ और उन्हींके स्वरूपमें
विलीन हो गया। जैसे पृथिवीसे उद्भूत गन्ध उसीमें लीन
हो जाती है, वैसे ही विनायकसे समुत्पन्न वह पुरुष
उन्हींमें लीन हो गया ॥ ५१-५३ ॥
जो मनुष्य इस आदरणीय उत्तम आख्यानका
भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह निश्चय ही कामनाओंको
सिद्ध करके अन्तमें मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है ॥ ५४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'नरान्तकनिग्रह' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥
उनसठवाँ अध्याय
काशिराजकी नरान्तकसे मुक्ति
मुनि बोले—बालरूपधारी विनायकने उस पुरुषको
कैसे उत्पन्न किया था, जिसने नरान्तककी सेनाका भक्षण
किया और जो नरान्तकको [विनायकके समीप] ले
आया था। यह बात मुझे स्पष्ट रूपसे बतलाइये, इस
विषयमें मुझे अत्यधिक सन्देह हो रहा है ॥ १ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—जो परब्रह्म गुणोंसे परे है, वही
ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मक विनायकके रूपमें सगुण-साकार
होकर भास रहा है। वे विनायकदेव पृथ्वीका भार हरने,
दुष्टोंका विनाश करने और स्वधर्म अर्थात् वेदानुमोदित
धर्ममर्यादाके रक्षणके लिये अनन्तानन्त रूपोंको धारण
करते हैं ॥ २-३ १/२ ॥
वे ही अपनी शक्तिसे विश्वकी रचना करते हैं, पालन
करते हैं और संहार करते हैं। वे [यद्यपि स्वतन्त्र हैं,
तथापि] लोक [-व्यवहारकी सिद्धि]-के लिये [उत्पत्ति-
विनाशादिकी] निमित्तभूता पराशक्ति नियतिका अनुवर्तन
करते हैं। इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये, क्योंकि
वे विभु अनेकानेक मायाओंके आश्रय हैं ॥ ४-५ ॥
उनकी ही इच्छासे इस जगत्की सर्वविध प्रवृत्तियाँ
होती हैं। अब मैं उनकी मायाका तुमसे विस्तारपूर्वक
वर्णन करूँगा ॥ ६ ॥
नरान्तकके द्वारा बन्दी बनाये गये मन्त्रिपुत्र और
काशिराज जबतक राजधानी पहुँचते, उतने समयतक वह
कालपुरुष दैत्यराजके द्वारा संरक्षित उस सेनाका भक्षण
करता रहा। तदुपरान्त जब विनायकने उस कालपुरुषको
४१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
मुखमें रख लिया तो उसी समय राजा और मन्त्रिपुत्र भी
विनायकके मुखमें चले गये। उन सबने विनायकदेवके
उदरदेशमें समस्त विश्वका अवलोकन किया॥ ७-९॥
विनायकदेवके उदरमें भ्रमण करते हुए उन लोगोंने
पर्वत, वृक्ष, सरिता, सागर, वापी तथा तडागोंसे समन्वित,
मनुष्योंसे भरी हुई सप्तद्वीपवती पृथिवीको देखा। देवता,
गन्धर्व, मुनिजन, सिद्धगण, यक्ष, निशाचर, सर्प और
अप्सराओंसे शोभायमान स्वर्गादि ऊर्ध्ववर्ती लोकोंको
देखा और पाताल आदि सात अधोलोकोंको भी उस
समय देखा ॥ १०-१११/२ ॥
इस प्रकार विनायकके उदरदेशमें स्थित विविध
कोष्ठों (उदरके अन्तराल)-में भाँति-भाँतिके ब्रह्माण्ड-
समूहोंको उन्होंने देखा। उनका चित्त विस्मयाविष्ट हो
गया था। तदुपरान्त उन्होंने उद्विग्न होकर देवदेव
विनायककी शरण ली और मनोयोगपूर्वक वे विनायकदेवसे
प्रार्थना करने लगे- 'हे कृपानिधे ! उद्विग्न चित्तसे भटकते
हुए हमलोगोंपर आप अनुग्रह कीजिये' ॥ १२-१४॥
तब बालरूपधारी विभु विनायकने [उनके अन्तःकरणमें
प्रकट होकर] काशिराज और मन्त्रिपुत्रोंको मार्ग दिखलाया।
फिर रोमांचित हुए विनायकदेवके रोमकूपोंसे वे लोग
बाहर निकल आये तथा पूर्वकी भाँति काशिराजने अपने
नगरको सर्वथा सुरक्षित देखा। राजाने बालरूपमें क्रीड़ा
करते हुए कश्यपपुत्र उन विनायकको देखकर और
उन्हींकी अनुकम्पासे विचार-सामर्थ्य प्राप्त करके बड़ी
ही प्रसन्नतासे उनका स्तवन किया - ॥ १५-१६१/२ ॥
राजा बोले- हे नाथ! मैंने आपके कुक्षिदेशमें स्थित
होकर आपकी परम मायाका परिचय पा लिया है। आप
ही देवता, मनुष्य, दिशा, [विविध प्रकारके] स्वर्गों, सरिताओं
और पाताल आदि अधोलोकोंको उत्पन्न करनेवाले हैं;
क्योंकि आपके रोमकूपोंमें कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड विद्यमान
है। [आपके उदरदेशमें] भटकते हुए मैंने आपके अनुग्रहसे
उन सबको देखा है ॥ १७-१९॥
हे विश्वकर्ता! आपके आश्चर्यजनक क्रियाकलाप
मैंने बहुत बार देखे हैं। मैं युद्ध करनेके लिये गया था
और [उस युद्धभूमिमें मेरे साथ] सेना भी आयी थी। मेरी
सेनाने नरान्तकके सैन्यबलको शीघ्र ही जीत लिया था
और बादमें मन्त्रिपुत्रोंके साथ मैंने नरान्तकको संकटापन्न
कर दिया, किंतु उसने एकाएक मेरी सेनाको परास्त करके
क्षणभरमें मुझे भी बन्दी बना लिया ॥ २०-२११/२॥
तदुपरान्त मैंने अपने समस्त नगरको दग्ध होते देखा
और बादमें उस कालपुरुषको भी देखा, जिसने नरान्तककी
अनेक प्रकारकी सेनाको क्षणभरमें खा लिया था। वह
पुरुष नरान्तकको पकड़कर आपके समीप आया और
इसके पश्चात् वह कालपुरुष और हम सभी लोग आपके
उदरमें प्रविष्ट हो गये। हे प्रभो! मैंने वहाँ भी आपका
दर्शन किया। वहींपर हमने समग्र विस्तारके साथ सम्पूर्ण
जम्बूद्वीपका भी दर्शन किया था ॥ २२-२४॥
हे जगदीश्वर ! ऐसे ही हमने उदरके दूसरे अन्तरालमें
विस्तृत भूमण्डलको देखा। इस [विश्वप्रपंचको देखने]-
के कारण उद्विग्न हम लोग आपके शरणापन्न हुए॥ २५॥
तदुपरान्त आपकी आज्ञासे रोमांचद्वार अर्थात्
स्वाभाविक आनन्दवश उद्घाटित रोमकूपोंसे हम बाहर
निकल आये। तदुपरान्त [बाहर भी] हमें अपना विशाल
प्रासाद और बालरूपधारी आप दृष्टिगोचर हुए॥ २६॥
हे देव ! हे विभो ! यह कैसा आश्चर्यजनक मायाजाल
है? वह पुरुष कौन है, जिसने [नरान्तककी] विशाल
सेनाका भक्षण किया था? वह दैत्य नरान्तक किसके द्वारा
पकड़ा गया था और किसने दैत्यको बचाया था तथा हम
लोगोंको [बाहर] निकलनेके लिये किसने रोमांचद्वार
दिखलाया था? हे देव ! मुझ भक्तके इस प्रकारके सन्देहको
आप यत्नपूर्वक दूर कीजिये ॥ २७-२८१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले-जब इस प्रकारका प्रश्न उन बुद्धिमान्
नरेशने किया तो विनायकदेवने कृपापूर्वक उनके मस्तकपर
अपना करतल रखा। तत्काल ही राजा दिव्यज्ञानसे सम्पन्न
हो गये और उन काशिराजने बड़े ही भक्तिभावसे देवदेव
विनायकका स्तवन किया - ॥ २९-३०१/२ ॥
राजा बोले- हे कश्यपात्मज ! आप ही ब्रह्मा,
विष्णु, शिव तथा सूर्य हैं। पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष,
दिशाएँ, पर्वतोंसहित वृक्षराशि, सिद्धगण, गन्धर्वगण,
यक्ष-राक्षसादि, मुनिगण और मनुष्य ये सभी आपका ही
क्री०ख०-अ०६० ] * भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध * ४१५
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स्वरूप हैं। हे सर्वदेवेश्वर ! आप ही चेतनाचेतनात्मक | प्रभाव है, जो कि हमलोग आपके चरणकमलका दर्शन
स्थावर-जंगम-जगद्रूप हैं। जन्म-जन्मान्तरकी पुण्यराशिके | कर पा रहे हैं। विनायककी मायाने हमें मोहित कर लिया
कारण ही आप दृष्टिगोचर हुए हैं ॥ ३१-३३१/२ ॥ | था और उसीके प्रभावसे हम मुक्त भी हो सके ॥ ३९१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- जब काशिराज ऐसा कह रहे थे, | जब सभी लोग लौट गये तो काशिराज वहाँसे
तभी विनायकने उनको पुनः मोहित कर दिया। तब वे | अपनी धर्मपत्नी महारानी अम्बाके निकट गये और हर्षसे
नरेश [पुनः वात्सल्यविवश हो गये और युद्धसे सकुशल | गद्गद वाणीसे कहने लगे- ॥ ४०१/२ ॥
लौटे,] वेदना आदिसे शून्य उन विनायकका अभिनन्दन | राजा बोले- दैत्यने हमे बन्दी बना लिया था,
करने लगे। तभी राजाके दर्शनार्थ हर्षोल्लाससे भरे | [जिसके कारण] हम बड़े संकटमें पड़ गये थे, परंतु इन
नगरवासी भी [वहाँ] आ पहुँचे ॥ ३४-३५ ॥ | विनायकने अपनी मायासे हमें मुक्त कराया और अपने
नगरवासियोंने राजाको पुनः-पुनः प्रणाम करके | नगरमें पहुँचा दिया ॥ ४११/२ ॥
[उपहारके रूपमें] वस्त्र और आभूषण अर्पित किये तथा | ब्रह्माजी बोले- विविध प्रकारके वाद्योंके घोषसे,
राजाने भी वस्त्र आदि विविध उपहार उनको दिलवाये॥ ३६॥ | भाँति-भाँतिकी पताकाओंसे, नानाविध महोत्सवोंसे और
उन सभी नागरिकोंको विदा करके राजा अपनी | विनायकदेवकी सामर्थ्यके कारण [नरान्तकके चंगुलसे
माताके समीप उपस्थित हुए [और उनसे बोले-] हे | छूटकर राजधानी] लौटे हुए सभी [स्त्री-पुरुषादि]
मातः ! आपके अनुग्रहसे ही आपके चरणयुगलका दर्शन | लोगोंसे वह नगर शोभायमान हो रहा था ॥ ४२-४३ ॥
कर पा रहा हूँ। मुझे तो दैत्यराजने बन्दी बना लिया था, | कुमार, कुमारियाँ, विवाहित स्त्रियाँ, उनके पति,
पर देवदेव विनायकने बचा लिया। तब हर्षित जननीने | पिता, माताएँ, पुत्रगण और भाई - ये सभी परस्पर
दीर्घकालके उपरान्त आये हुए [अपने पुत्र] उन नरेशको | मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और एक-दूसरेको हृदयसे
हृदयसे लगा लिया ॥ ३७-३८ ॥ | लगाने लगे। उन्होंने [इस अवसरपर] अनेकविध दान-
तदुपरान्त दोनों अमात्यों (मन्त्रिपुत्रों)-ने उन | पुण्य किये। वे सभी [उल्लासपूर्वक] खान-पान, दर्शन-
राजमाताको प्रणाम करके कहा- आपके ही पुण्योंका | भाषणादि करने लगे ॥ ४४-४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'राजमोक्षण' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥
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साठवाँ अध्याय
भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध
ब्रह्माजी बोले- तदुपरान्त (कालपुरुषके द्वारा | दर्शन भी किया ॥ ३ ॥
पकड़े जानेपर) विनायकके [पराक्रमपूर्ण] क्रिया-कलाप | इससे यह बात निश्चित हो जाती है कि यह मुझे
देखकर नरान्तक बुद्धिसे सोचने लगा कि मैंने [आज] | भोग और मोक्ष दोनों दे सकता है। [इसलिये विनायकसे
इसका अद्भुत तेज देख लिया है ॥ १ ॥ | विरोध करना भी कल्याणकारी है,] अतएव मैं इसका वध
जब काशिराज पकड़े गये तो इसने कालपुरुषको | करूँगा, अथवा [यदि मैं इसे न मार सका तो] यह मुझे
उत्पन्न किया और उसने सब प्रकारसे मेरी समस्त | मार डालेगा। [दोनों ही दशाओंमें मेरा लाभ है] ऐसा
सेनाका भक्षण कर डाला ॥ २ ॥ | निश्चय करके वह विनायकसे कहने लगा - ॥ ४१/२ ॥
[बादमें] मन्त्रिपुत्रोंके साथ काशिराज इसके उदरमें | दैत्य बोला- तुमने इन्द्रजालका चमत्कार अनेक
प्रविष्ट हुए और बिना दैहिक क्षति हुए सकुशल बाहर | प्रकारसे मुझे दिखाया है, किंतु मैं नरान्तक उससे नहीं
लाये गये। राजाने [इसके उदरदेशमें समग्र] विश्वका | डरता; क्योंकि मैं स्वयं ही मायावी हूँ। जिसके निःश्वासमात्रसे
४१.६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ]
बड़े-बड़े पहाड़ गिर जाते हैं, [उस] मुझ नरान्तकके
केवल भृकुटि-विक्षेपसे ब्रह्माण्ड अत्यधिक काँपने लगता
है। जिसके करतलके प्रहारसे [समूचे] भूमण्डलके दो
भाग हो जाते हैं, उसके साथ तुझ बालकका संग्राम किस
प्रकार हो सकेगा? जो बाघके सामने जाय, वह सुखी
कैसे हो सकेगा?॥५-८॥
ब्रह्माजी बोले—नरान्तककी ऐसी बातें सुनकर वे
बालरूपधारी परमात्मा विनायक कहने लगे—॥९॥
विनायक बोले—अरे मूढ़! तू किसलिये डींग
हाँक रहा है। जिस पराक्रमका तू बार-बार वर्णन कर
रहा है, वह उस समय कहाँ गया था, जब तेरी सम्पूर्ण
सेना खायी जा रही थी॥१०॥
शूर-वीर तो शौर्य दिखलाते हैं, वे शत्रुके पराक्रमकी
निन्दा करनेवाली बातें नहीं कहते और [जो तुमने यह
कहा कि मैं बालक हूँ, तो ऐसी बात नहीं है,] छोटा-सा
बिच्छू भी क्षणभरमें सिंहको मार डालता है। छोटा-सा
दीपक भी घनघोर अँधेरेको नष्ट कर देता है और एक
छोटे-से अंकुशसे मतवाला हाथी नियन्त्रित हो जाता है।
[वास्तवमें] जिसकी मृत्यु निकट होती है, वह इसी प्रकार
सन्निपातग्रस्तके सदृश भाषण करता है॥११-१२ १/२॥
ब्रह्माजी बोले—विनायकदेवकी ऐसी बातें सुनकर
दैत्यराज अत्यधिक भयसे काँप उठा [फिर उसने अपने
चित्तको सुस्थिर किया] और बादलोंके जैसी घोर गर्जना
करने लगा। वह अपने गर्जनघोषसे भूमण्डलको डराता,
रुलाता और कँपाता हुआ विनायकको मारनेकी इच्छासे
अतिशय आवेशमें आकर वैसे ही दौड़ा, जैसे कोई
पतंगा दीपककी लौको बुझानेके लिये शीघ्रतासे दौड़ने
लगे॥१३-१५॥
उसकी भृकुटी तीन स्थानोंपर टेढ़ी हो गयी थी और
वह मुखसे आग उगल रहा था। नरान्तकको इस प्रकारसे
आते देख काशिराजने त्वरापूर्वक अपने धनुषकी प्रत्यंचा
चढ़ायी और कानतक बाण खींचकर, बन्धनसे छुड़ाये गये
उस निर्लज्ज दैत्यसे शान्तिपूर्वक बोले—॥१६-१७॥
दैत्येन्द्र ! प्राणोंका त्याग मत करो। जीवित रहोगे
[दायाँ स्तम्भ]
तो अपना अभ्युदय देख सकोगे। तुम यहाँसे लौट जाओ,
अन्यथा मारे जाओगे॥१८॥
ब्रह्माजी बोले—राजाके इन वचनोंको सुनकर
क्रोधसे जलता हुआ दैत्य कहने लगा—'तुम जैसे
लोगोंका भक्षण करनेके कारण ही मुझे नरान्तक कहा
जाता है। यदि जीना चाहते हो तो इसी समय मेरी
शरणमें आ जाओ'॥१९ १/२॥
तब राजाने मरनेकी इच्छावाले उस नरान्तकसे फिर
कहा—'अरे मूढ़! विनाशकालमें बुद्धि विपरीत हो जाती
है। जब समय विपरीत होता है तो मित्र भी शत्रु बन
जाते हैं। वरप्राप्तिके अभिमानवश तुमने अनेकों बार
पापपूर्ण कृत्य किये हैं और वरदानके ही प्रभावसे तुमने
वज्रको भी कुछ नहीं समझा॥२०-२२॥
इस समय तुम जैसे पापियोंका वध करने और
प्रबल भूभारका हरण करनेके लिये ही ये कश्यपपुत्र
विनायक अवतीर्ण हुए हैं। तुम्हारी पापराशिके कारण
वरदानका जो पुण्यबल था, वह शिथिल हो चुका है।'
[राजाकी] ऐसी बात सुनकर दैत्यराज मन-ही-मन काँप
उठा॥२३-२४॥
[तदुपरान्त] उसने दौड़कर राजाके हाथसे धनुष-
बाण छीन लिया और बलपूर्वक भूतलपर पटक दिया,
जिससे उसके सैकड़ों खण्ड हो गये। फिर नरान्तकने
मुष्टिकासे राजापर प्रहार किया, जिससे वे वैसे ही
भूतलपर गिर पड़े, जैसे वज्रके प्रहारसे पर्वत गिर
जाता है॥ २५-२६॥
यह देखकर अपने गर्जनघोषसे सम्पूर्ण आकाश-
मण्डल एवं दसों दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए महाबली
विनायक अंकुश लेकर दौड़े। उस समय समस्त भूमण्डल
काँप उठा और सभीके नेत्रोंको दृष्टिहीन बना देनेवाले
परशुके तेजसे सारी दिशाएँ मानो धधकने लगीं। उन्होंने
उस परशुसे दैत्यके मस्तकपर वैसे ही तीव्र प्रहार किया,
जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्राघात करते हैं। उनके आघात करते
ही दैत्यराज भूतलपर गिर पड़ा॥२७-२९॥
जैसे शिलाके आघातसे मर्मस्थलके विदीर्ण होनेसे
क्री०ख०-अ०६० ] * भगवान् विनायक और नरान्तकका युद्ध * ४१७
व्यक्तिको मूर्च्छा होती है, वैसी ही प्रबल मूर्च्छा उसको
परशुके आघातसे हुई। कुछ कालके बाद वह दैत्य उठ
खड़ा हुआ और दोनों हाथोंमें दो पर्वतोंको उठाकर
विनायकको मारनेकी इच्छासे उनपर फेंक दिया। तब उन
विनायकने सुखपूर्वक पर्वतोंको परशुके आघातसे सैकड़ों
खण्डकर चूर-चूर कर दिया ॥ ३०-३१॥
इसके पश्चात् दैत्यराज मायासे विविध रूप धारण
करने लगा। वह जो-जो रूप धारण करता, विनायक भी
तत्काल उसी-उसी रूपमें प्रकट हो जाते और उन रूपोंके
द्वारा शीघ्रतासे महादैत्यके अहंकारको चूर्ण कर देते।
असुरके द्वारा प्रयुक्त शस्त्रोंका उन्हीं शस्त्रोंसे और
नानाविध अस्त्रोंका वैसे ही अस्त्रोंसे विनायकदेव निवारण
कर रहे थे ॥ ३२-३३ ॥
तदुपरान्त उन दोनोंमें परस्पर मल्लयुद्ध होने लगा।
वे चरणोंसे चरणोंको, हाथोंसे हाथोंको, घुटनोंसे घुटनोंको
और वक्षःस्थलसे वक्षःस्थलको आहत करते हुए [रक्तरंजित
हो गये और उस दशामें वे] फूलोंसे लदे पलाशवृक्ष-
से जान पड़ते थे। [इस प्रकार द्वन्द्वयुद्ध करते-करते] वे
भूतलपर गिर पड़े ॥ ३४-३५॥
तदुपरान्त वे दोनों बली योद्धा उठकर एक-दूसरेको
कोहनीसे मारने लगे। फिर रक्तसे लथपथ होकर उन्होंने
पृष्ठभागसे पृष्ठभागको, ललाटसे ललाटको और टखनोंसे
टखनोंको आहत किया ॥ ३६ १/२ ॥
इसके पश्चात् नरान्तकने भगवान् शिवका स्मरण
करके [पर्वतोंसहित] वृक्षोंकी [मायामयी] सृष्टि की
और वृक्षोंसे भरे वे पर्वत विनायकको मारनेकी इच्छासे
उनपर फेंके, किन्तु उनको समीप आनेसे पहले ही उन
विनायकने छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ३७-३८॥
[वृक्षोंसे युक्त] उन पर्वतोंको जब विनायकने
कमल, पाश, अंकुश और प्रचण्ड प्रहार करनेवाले
परशुसे ध्वस्त कर दिया तो उस दैत्यने एक दूसरी वैसी
ही पर्वत-वर्षा की। उसके निवारित होनेपर पुनः वर्षा की
और जब दैत्यने फिर [मायामयी पर्वत-] वर्षा की तो
विनायकने उसे भी निरस्त कर दिया। इधर काशिराज
विनायकको मरा जानकर दूर चले आये ॥ ३९-४० ॥
तब [लीलावश] विनायक व्यथित हो उठे और
मनमें सोचने लगे कि इस दैत्यके पराक्रमकी तो कोई
सीमा ही नहीं है तथा इसपर विजय पानेका कोई उपाय
भी नहीं दीखता ॥ ४१ ॥
कब देवगण शत्रुहीन होकर अपने-अपने लोकोंको
प्राप्त करेंगे। यह नरान्तक तो आज देवान्तक अर्थात्
देवताओंका भी विनाशक बना हुआ है। जब विनायक
इस प्रकार बारम्बार चिन्ता कर रहे थे, तभी उनके
तरकसमें [एकाएक] कालदण्डके समान प्रचण्ड बाण
आ-आकर गिरने लगे और उनके समक्ष स्वर्णनिर्मित
पिनाक नामक धनुष भी आ गिरा, जो अपने तेजसे
दिशाओं और विदिशाओं (ईशान आदि कोणों)-को
उद्भासित कर रहा था ॥ ४२-४४ ॥
छिटकती हुई कान्तिवाले उस शैव धनुषको देखकर
वे हर्षयुक्त हो गये और उन्होंने देवताओंके मनोरथको
सिद्ध तथा दैत्यको पराजित समझा। विनायकने उच्चस्वरसे
प्रचण्ड घोष करके धनुष और बाणोंको ग्रहण कर लिया
और पिनाकको [अपनी बहुरूपी तुलामें] तौला। तदुपरान्त
उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी ॥ ४५-४६॥
विनायकदेवने दोनों ओर [अपने कन्धोंमें] तरकस
व्यवस्थित किये और भूमिपर घुटने टिकाकर धनुषकी
टंकार [की, जिसे] सुनकर तीनों लोक काँप उठे।
अपने बायें और दायें दोनों हाथोंसे [धनुषपर बाण
रखकर] उन्होंने धनुषको खींचा और दैत्यको लक्ष्य
करके दोनों बाण छोड़ दिये। चिनगारियाँ बरसाते,
आकाशको चमकाते, प्राणिसमूहका संहार करते और
गरजते हुए वे बाण सहसा दैत्यकी भुजाओंके ऊपर
जा गिरे ॥ ४७-४९ ॥
उन बाणोंने दैत्यकी भुजाओंको वैसे ही गिरा दिया,
जैसे उल्काने वृक्षको गिराया हो अथवा इन्द्रने वज्रके
आघातसे पर्वतशिखरोंको ढहा दिया हो ॥ ५० ॥
उन विशाल भुजाओंमें-से एक तो नरान्तकके
दरवाजेपर जा गिरी और दूसरी बरतनोंको तोड़ती-
४१८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
फोड़ती उसके पिताके दरवाजेपर। [भुजाओंको काट
देनेके बाद] विनायकने दैत्यके दो और भुजाएँ देखीं।
फिर वह दैत्य मुँहको फैलाये हुए कालकी भाँति [उनकी
ओर] दौड़ा। उसने हाथों और पैरोंसे बहुत सारे वृक्ष
विनायकपर फेंके और बादमें तो वह घनघोर वृक्षवर्षा
ही करने लगा ॥ ५१-५३ ॥
उस समय सघन अन्धकार छा गया, जिसके
कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा रहा था। तब
दैत्यराजकी ऐसी शक्ति देख विनायक उससे कहने
लगे ॥ ५४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'विनायक और नरान्तकके युद्धका वर्णन'
नामक साठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥
इकसठवाँ अध्याय
भगवान् विनायकद्वारा नरान्तकका वध
विनायक बोले- [अहो दैत्य!] मैंने इससे पहले
इतना बलवान् योद्धा नहीं देखा, तुम तो परम पराक्रमी
हो। इस समय मुझ बालकके पराक्रमपूर्ण युद्धव्यापारका
अवलोकन करो ॥ १ ॥
ऐसा कहकर उन्होंने तरकससे एक बाण निकाला
और कानतक धनुष खींचकर उस बाणको नरान्तकपर
छोड़ दिया। वह बाण आकाशमण्डलको उद्भासित,
[ब्रह्माण्डको] कम्पित तथा [पृथ्वीके] वृक्षोंको गिराता
हुआ वैसे ही नरान्तकके पास आ पहुँचा, जैसे [ग्रहणकालमें]
सूर्य-चन्द्रमाके निकट [राहु] जा पहुँचता है ॥ २-३ ॥
उस बाणने नरान्तकके पैरोंको काट दिया, जिससे
वह गिर पड़ा। जब कटे हुए आधे शरीरवाला नरान्तक
गिरा तो विनायक गरजने लगे। नरान्तकके पैर आकाशमार्गसे
जाते और बहुत सारे लोगोंको कुचलते हुए देवान्तकके
विशाल भवनमें जा गिरे ॥ ४-५ ॥
आधे शरीरवाला वह दैत्यराज भयानक रूपसे मुख
फैलाकर बलपूर्वक विनायककी ओर दौड़ा। वह ऐसा
प्रतीत होता था, मानो तीनों लोकोंको ही निगल लेगा।
तदुपरान्त मायाके प्रभावसे दैत्यराजके चरण पूर्ववत् हो
गये और तब वह विनायकके निकट आकर कहने
लगा - ॥ ६-७ ॥
तुमने मेरे शरीर (हाथ-पैर)-को काटकर जैसा
पुरुषार्थ दिखलाया है, मैं भी वैसे ही तुम्हारे अंगोंको
काटने जा रहा हूँ, अब तुम मेरा पुरुषार्थ देखो ॥ ८ ॥
उसकी बात सुनकर उन विनायकने फिर गर्जना की
और दैत्यराजपर वे प्रचण्ड बाणवर्षा करने लगे ॥ ९ ॥
महाबली दैत्यराज उन असंख्य बाणोंको भी निगल
गया तो विनायकने एक विशाल बाणको अभिमन्त्रित
किया तथा कानतक [धनुषकी] प्रत्यंचाको खींचकर
अग्निसे युक्त अग्रभागवाले, सोनेके पंखोंवाले और
गरजते हुए उस भयानक बाणको दैत्यके मस्तकको
लक्ष्य करके छोड़ दिया। वह बाण वृक्षोंको गिराता,
पक्षियोंको मारता और पर्वतोंको विदीर्ण-सा करता हुआ
वायुवेगसे चल पड़ा ॥ १०-१२॥
उसके घोषको सुनकर सेना दसों दिशाओंमें पलायित
हो गयी। वह दैत्यके कण्ठमें वैसे ही गिरा, जैसे
पर्वतशिखरपर वज्र गिरता है। उसके आघातसे नरान्तकका
भयानक मस्तक [कटकर] पक्षीकी भाँति आकाशमें
उड़-सा गया और चीत्कार करता हुआ उसके पिताके
घरमें जा गिरा ॥ १३-१४॥
इसके पश्चात् नरान्तकके [कबन्धमें] पहलेके सिरकी
भाँति एक अन्य सिर उत्पन्न हो गया और ऐसा प्रतीत होता
था कि सिर कभी कटा ही नहीं। तदुपरान्त दैत्यराजने भी
क्रोधपूर्वक उच्च स्वरसे गर्जना की। उससे पक्षिगण, सभी
मनुष्य और देवता भयभीत हो उठे ॥ १५ १/२ ॥
नरान्तक पुनः विनायकपर पर्वतोंकी भयानक वर्षा
करने लगा, किन्तु विनायकने बड़ी सहजतासे बाणवर्षा
करके उस समस्त पर्वत-वर्षाको मध्यमें ही निरस्त कर
दिया। पर्वतों और बाणोंका यह अभिनव संग्राम एक
दिन-रात चलता रहा ॥ १६-१७॥
क्री०ख०-अ०६१ ] * भगवान् विनायकद्वारा नरान्तकका वध * ४१९
[इस युद्धके कारण लीलावश] वे विनायक
थकानका अनुभव करने लगे और वह महाबली दैत्य भी
थक गया। विनायकदेव अत्यधिक चिन्तित हो उठे और
[अमर्षजन्य] तेजसे जलने लगे ॥ १८ ॥
तदुपरान्त उन बलीने ज्वालावलीसे समन्वित परशु
उठा लिया और जब वे [भुजारूपी तराजूपर मानो]
तौलने लगे तो धरती काँप उठी। तब देवगण विमानोंमें
आरूढ़ होकर युद्ध देखने आ पहुँचे और रसातलमें
शेषनाग भयभीत होकर काँपने लगे ॥ १९-२० ॥
विनायकने दैत्यराजपर वह परशु छोड़ दिया और
उसने तत्काल नरान्तकका मस्तक काट डाला। [सिरके
कटते ही] फिरसे मुकुट-कुण्डलादिसे युक्त एक अन्य
सुन्दर सिर उत्पन्न हो गया। क्रुद्ध हुए विनायकने उसे
पुनः काट डाला। उसके कटते ही फिरसे सिर उत्पन्न
हो गया। वे बार-बार मस्तक काटते रहे और नरान्तकके
बार-बार मस्तक उत्पन्न होते रहे। इस प्रकार उन विभुने
सैकड़ों-हजारों मस्तक काट डाले। [जब सिरोंके उत्पन्न
होनेका क्रम नहीं रुका तो] फिर उन्होंने दैत्यकी मृत्युके
कारण अर्थात् उपायका अनुसन्धान किया ॥ २१-२३ ॥
[उपाय ज्ञात होते ही] उन्होंने शिवके वरदानसे
गर्वित बलशाली उस नरान्तकको सहसा मायासे मोहित
कर लिया। तब वह दैत्य अपने और परायेको जान पानेमें
असमर्थ हो गया। क्षणभरमें उसे [दिनमें] रात्रि जान
पड़ने लगी और दूसरे ही क्षण [रात्रिमें] वह दिन
समझने लगा ॥ २४-२५ ॥
वह क्षणभरमें कभी स्वर्ग, कभी पृथ्वीतल और
कभी पाताल देखने लगा। उसे क्षण-क्षणमें जाग्रत्,
स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीया (ब्रह्मीभूत पुरुषोंकी सहजावस्था)
दशाओंका आभास होने लगा ॥ २६ ॥
वह विनायकदेवको देखकर भ्रमवश निश्चय नहीं
कर पा रहा था कि वे देवता हैं, या मनुष्य हैं, नर हैं
या नारी हैं अथवा गुह्यक, सिद्ध, यक्ष या राक्षस हैं। वे
अपने हैं या पराये हैं। पिता हैं या माता हैं, सजीव हैं
अथवा निर्जीव हैं ॥ २७-२८ ॥
वह गहन चिन्तामें डूब गया और मनमें सोचने
लगा कि त्रिशूलधारी शंकरने मुझे कुछ ऐसा ही वर
प्रदान किया था [कि जब तुम्हें भ्रमवश विविध विकल्प
प्रतीत होने लगें तो समझना कि अब मृत्यु आ चुकी है।]
और वह समय उपस्थित है, अतः अब मेरी अवश्य ही
मृत्यु हो जायगी ॥ २९१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे नरान्तक सोच ही
रहा था कि तबतक उसने अपने समक्ष विराट्रूपधारी
विनायकको देखा। उनका मस्तक ऊपर आकाशको छू
रहा था, चरण पातालतक फैले थे, दिशाएँ ही कान थीं
और वृक्ष ही उनके रोंये थे। रोमकूपोंमें ब्रह्माण्ड भ्रमण
कर रहे थे और समुद्र ही उनके स्वेदबिन्दु थे। उनके
नखके अग्रभागमें तैंतीस कोटि देवगण विराजमान थे
और उनके उदरके एक भागमें चौदह भुवन अवस्थित
थे ॥ ३०-३२१/२ ॥
तदुपरान्त [विराड्रूपधारी उन] विनायकने अपने
चरणांगुष्ठके नखके अग्रभागसे तत्काल ही दैत्यको वैसे
ही मसल दिया, जैसे खटमलको कोई बालक मसल दे।
तब अत्यन्त हर्षित देवताओं और मुनियोंने बारम्बार
जयघोष करते हुए भक्तिपूर्वक उनका स्तवन किया और
फूल बरसाये ॥ ३३-३४१/२ ॥
जब उन विभुने अपने विराड्रूपको छिपा लिया तो
उसके अनन्तर पृथ्वीदेवी उन देवेश्वरके समीप आयीं
और प्रणामकर बोलीं- '[आपने] मेरा आधा भार तो
दूर कर दिया है। जब समग्र भार नष्ट हो जायगा तो
मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी। इसलिये आगे भी [आप
मेरा भारहरण] करते रहें' ॥ ३५-३६ ॥
जब [ऐसा कहकर] पृथ्वीदेवी अन्तर्धान हो गयीं
तो इसके अनन्तर विनयावनत काशिराजने विनायकदेवकी
पूजा की और प्रसन्न मनसे कहने लगे- 'हे विभो ! मैंने
अतिशय आश्चर्यजनक [आपके लीलाविलासका] दर्शन
किया है, जो न वाणीसे कहा जा सकता है और न ही
जिसे मनसे जाना जा सकता है। पृथिवीका भार हरण
करनेके लिये आप अवतीर्ण हुए और आपने वह सम्पन्न
भी किया है ॥ ३७-३८ ॥
तैंतीस कोटि देवताओंसे भी जो न मारा जा सका,
४२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ]
उसे आपने [अकेले ही] मार डाला। हे सुरेश्वर! हम
लोगोंके पुण्य अत्यधिक थे, इसीलिये हम आपके विराट्
स्वरूपको देख सके' ॥ ३९ ॥
ब्रह्माजी बोले—जब काशिराज इस प्रकार कह
रहे थे, तभी पुरवासी भी कहने लगे—'हे विभो! आप
धन्य हैं। अहो! आप बालकका रूप धारण करके हम
सभीको भ्रमित करते रहे। आपने अपनी कीर्तिका विस्तार
करनेके लिये ये सभी कृत्य किये हैं।' [ऐसा कहकर]
पुरवासियोंने परमभक्तिसे उन विभुका पूजन किया और
[दायाँ स्तम्भ]
इस प्रकार प्रार्थना करने लगे— ॥ ४०-४१ ॥
'हे देव! हमें आप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये
और कभी भी आपका हमसे वियोग न हो—ऐसा
कीजिये।' तदुपरान्त उन नागरिकों और काशिराजने
ब्राह्मणोंको भाँति-भाँतिके दान किये और उनसे प्रार्थना
की कि ऐसे ही हमारी विजय होती रहे। उस
समय नगरवासियोंने काशिराजको उपहार अर्पित किये
और काशिराजने भी उन्हें उपहारादिसे सन्तुष्ट
किया ॥ ४२-४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'दैत्यदमन एवं विराड्दर्शन'
नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥
बासठवाँ अध्याय
नरान्तकके सिरको लेकर उसके माता-पिताका देवान्तकके पास जाना और देवान्तकका
काशिराजकी नगरीपर आक्रमण करना
[बायाँ स्तम्भ]
ब्रह्माजी बोले—रौद्रकेतु विप्रकी भार्या, जिसका
नाम शारदा था, वह अपनी सखियोंके साथ कौतूहलपूर्वक
वितर्दी (आँगनमें बने चबूतरे)-पर बैठी हुई थी ॥ १ ॥
अचानक उन सबके साथ उसने आँगनमें गिरे हुए
नरान्तकके सिरको देखा, जिसके दोनों कानोंमें कुण्डल
सुशोभित हो रहे थे ॥ २ ॥
उस सिरके गिरनेसे वहाँ पर्वतशिखरके गिरनेके
सदृश ध्वनि हुई, जिससे वह सम्पूर्ण नगर गूँज उठा। वह
सिर उसी प्रकार श्यामल और शोभाहीन हो गया था,
जैसे हिमपातसे प्रभावित कमल ॥ ३ ॥
उस आघातसे व्याकुल शारदा और रौद्रकेतु दोनों
भयभीत हो गये, तदनन्तर सावधान होनेपर नरान्तकके
सिरको देखकर वे दोनों अत्यन्त रुदन करने लगे ॥ ४ ॥
वे दोनों अपनी छाती पीटते हुए धरतीपर लोटने
लगे और मूर्च्छित हो गये। तदनन्तर एक मुहूर्तके बाद
जब वे पुनः चेतनायुक्त हुए तो माता शारदा उस सिरको
अपने हृदयसे लगाकर अत्यन्त शोकाकुल हो उठी। वह
विह्वल होकर वैसे ही करुण क्रन्दन करने लगी, जैसे
मृतवत्सा गौ क्रन्दन करती है ॥ ५-६ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
शारदा कहने लगी— [हे पुत्र!] तुम्हारा शरीर
वीरोचित शोभासे परिपूर्ण रहता था, तुम सदैव युद्धके
लिये उत्सुक रहते थे। [युद्धमें जाते समय] तुमने मुझसे
कुछ कहा भी नहीं। अब तो कुछ बोलो ॥ ७ ॥
[हे वत्स!] तुम्हारा पूरा शरीर कहाँ गया ? तुम
तो केवल सिरमात्रसे ही आये हो। तुम अकेले क्यों आये
हो ? तुम्हारी महान् सेना कहाँ है ? तुम्हारे साथ जल
लेकर चलनेवाले और छत्र तथा चँवर धारण करनेवाले
कहाँ गये ? जिसे देखकर श्रेष्ठ सुन्दरियाँ विरहरूपी
अग्निसे [संतप्त होकर] म्लान हो जाया करती थीं;
तुम्हारा वह रूप अस्ताचलगामी सूर्यकी भाँति म्लान कैसे
हो गया ? ॥ ८-९ १/२ ॥
मेरे द्वारा अथवा तुम्हारे पुत्रवत्सल पिताद्वारा तुम्हारा
क्या अपराध किया गया है ? रुदन करते हुए हम दोनोंके
आँसुओंको पोंछकर तुम हमसे क्यों नहीं बोल रहे
हो ? ॥ १० १/२ ॥
हे पुत्र! तुम [कभी तो] अत्यन्त मूल्यवान्
बिस्तरसे युक्त पलंगपर शयन करते थे और इस समय
कहाँ सो रहे हो—यह देखकर मेरा मन अत्यन्त खिन्न
क्री०ख०-अ०६२ ] * नरान्तकके सिरको लेकर उसके माता-पिताका देवान्तकके पास जाना * ४२१
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हो रहा है। तुम्हारे बिना हम दोनों किसीको मुँह
दिखानेयोग्य भी नहीं रह गये हैं ॥ ११-१२ ॥
ब्रह्माजी बोले-शारदाके शोकपूर्ण वचनोंको
सुनकर रौद्रकेतु भी शोकाकुल हो उठे और कहने लगे-
'हे प्रिय पुत्र ! तुम अपने विषयमें कुछ बताये बिना कहाँ
चले गये ? ॥ १३ ॥
प्रतिदिन जो होता था और जो भविष्यकी योजना
होती थी-उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको तथा अपने स्थानके
विषयमें हमें तुम बताया करते थे; इस समय क्यों नहीं
बोल रहे हो ? ॥ १४॥
यदि तुम युद्धमें [शत्रुके] सम्मुख लड़ते हुए रक्त-
धाराओंसे पवित्र होकर स्वर्गलोकको चले गये हो तो
बिना मुझसे पूछे और मुझे त्यागकर क्यों चले गये ?
तुम्हारा तो अपने माता-पिताके प्रति पुत्रभाव था, उसे
शत्रुतामें कैसे परिणत कर दिया ? ॥ १५१/२ ॥
जब तुम सेवकके हाथसे अपने हाथमें तलवार
ग्रहण करते थे, तो पर्वतों और काननोंसहित पृथ्वी और
स्वर्ग काँपने लगते थे; ऐसे तुमको किसने [पृथ्वीपर]
गिरा दिया, कालकी इस विपरीत गतिको हम नहीं
जानते ॥ १६-१७ ॥
लोकमें प्रारब्ध ही बलवान् है, पुरुषार्थ निरर्थक है।
मेरे वंश और इस लोकका आभूषणरूप नरान्तक न जाने
कहाँ चला गया ? जो कालके लिये भी काल, शत्रुरूपी
हाथीके लिये सिंह और राजाओंरूपी रूईका दाह करनेके
लिये अग्निके समान था; जिसका प्रताप सूर्यके समान
था-ऐसे तुम दात्र (लकड़ी काटनेका उपकरण)-से
काटे गये वृक्षकी भाँति दो खण्डोंमें कैसे विभक्त हो
गये ?' ॥ १८-१९१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी !] इस तरह अनेक
प्रकारसे शोक करके रौद्रकेतु और शारदा नरान्तकके
सिरको लेकर देवान्तकके पास गये ॥ २०१/२ ॥
उन दोनों (माता-पिता)-को उस स्थितिमें देखकर
देवान्तक त्वरापूर्वक भद्रासनसे उठकर उनके गले लगकर
छोटे भाईकी मृत्युपर रुदन करने लगा। तब उसके
परिवारके जो काल और यमके समान [दुर्धर्ष] दैत्य थे,
वे भी नरान्तकके सिरको देखकर उच्च स्वरसे विलाप
करने लगे ॥ २१-२२१/२ ॥
देवान्तक माताके हाथसे नरान्तकका सिर लेकर
उसे अपने हृदयसे लगाकर भ्रातृस्नेहसे दुखी होकर कुररी
पक्षीके समान क्रन्दन करने लगा ॥ २३१/२ ॥
देवान्तक कहने लगा-हम दोनों साथ-साथ
भोजन करते थे, एक साथ जल पीते थे, साथ-साथ
खेलते थे और एक साथ सोते तथा एक साथ उठते थे।
हम दोनोंने साथ-साथ तप किया, साथ-साथ जप किया,
[अब] तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गये ? ॥ २४१/२ ॥
जिस तुम्हें देखकर मनुष्य और देवता दसों दिशाओंमें
पलायन कर जाते थे, वही तुम किस बलवान् दुष्टद्वारा
मार डाले गये ? मैंने तो पृथ्वी और रसातलका ही राज्य
तुम्हें निवेदित किया था, तो भी हे भ्रातृवत्सल (भाईके
प्रति प्रेम रखनेवाले) ! तुम मुझे छोड़कर स्वर्ग कैसे चले
गये ? ॥ २५-२६१/२ ॥
जिसके धनुषके टंकारकी ध्वनिसे सम्पूर्ण जड़-
चेतन काँपने लगते थे, असंख्य राजागण जिसके भवनके
द्वारदेशमें [किंकरोंकी भाँति] शोभा पाते थे; वही तुम
माता-पिता और सुन्दर स्त्रीको छोड़कर कैसे चले
गये ? ॥ २७-२८ ॥
देवान्तकका इस प्रकारका क्रन्दन श्रवणकर वीर
लोग वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने बलपूर्वक उसका हाथ
पकड़कर तर्कोंद्वारा समझाते हुए उसे क्रन्दन करनेसे
रोका ॥ २९ ॥
लोगोंने कहा-हे राजन् ! किसी वीरके युद्धमें
मारे जानेपर वीर लोग शोक नहीं करते हैं, अपितु वह
जिसके द्वारा मारा गया है, उसके पास जाकर उसका
बलपूर्वक वध करते हैं ॥ ३० ॥
सम्पूर्ण प्राणियोंके देहधारणके साथ ही उनकी
मृत्यु भी प्रादुर्भूत होती है। हे राजन् ! वह मृत्यु आज हो
या सौ वर्ष बाद; अपनी हो या दूसरेकी, परन्तु होगी
अवश्य, इसमें सन्देह नहीं है। फिर ऐसी स्थितिमें क्या
शोक करना है ? ॥ ३११/२ ॥
तब वह धर्मज्ञ असुर देवान्तक उन लोगोंके
४२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
प्रकारके] वचन सुनकर सावधानचित्त होकर माता-
पितासे बोला- 'आप दोनों शोक न करें। मैं अपने उस
शत्रुको ग्रास बनानेके लिये जा रहा हूँ। बताओ, जिसने
मेरे भाईको मारा है, वह कहाँ रहता है? या तो मैं उसको
मारकर सुखका अनुभव करूँगा अथवा स्वयं मरकर
भाईके पास चला जाऊँगा ॥ ३२-३४ ॥
हे माता ! हे पिता ! मेरी भौंहोंके टेढ़े होनेमात्रसे
त्रिभुवन कम्पायमान हो जाता है, फिर मेरे क्रोधित हो
जानेपर तीनों लोकोंकी रक्षा कौन कर सकता है?' ॥ ३५ ॥
ब्रह्माजी बोले- तब देवान्तककी बात सुनकर वे
दोनों (शारदा और रौद्रकेतु) आश्वस्त हो गये। शोकसागरमें
डूबे हुए उन दोनोंका उसके वचनोंसे उद्धार हो
गया ॥ ३६ ॥
ज्येष्ठ पुत्रके पूछनेपर रौद्रकेतुने विस्तारपूर्वक सारी
बात कही-काशिराज नामसे विख्यात एक परम धार्मिक
राजा है। उसके घरमें विवाह-सम्बन्धी महान् उत्सवका
आयोजन था। उसमें सभी लोगोंके साथ 'विनायक'
नामसे विख्यात कश्यपजीका पुत्र भी आमन्त्रित था। वह
बालक होते हुए भी अत्यन्त बलवान् माना जाता है। हे
पुत्र ! उसने रास्तेमें ही मेरे भाई धूम्राक्षको मार डाला।
उसका बदला लेनेके लिये मैंने पाँच सौ निशाचर वीरोंको
भेजा था, वे सब दौड़ते हुए वहाँ गये, परंतु उस सप्त-
वर्षीय मुनिपुत्र [विनायक]-द्वारा वे सभी मार डाले गये।
उनका प्रतिशोध लेनेके लिये नरान्तक स्वयं गया। उसके
साथ अनेक शस्त्रोंसे युक्त चतुरंगिणी सेना थी; किंतु
उनमेंसे एक भी वापस नहीं लौटा। अकस्मात् यह
नरान्तकका [कटा हुआ] सिर दिखायी दिया, तो हम
लोग शोकाकुल होकर उसके सिरको लेकर तुम्हारे
सम्मुख आये हैं ॥ ३७-४२१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले-रौद्रकेतुका इस प्रकारका वचन
सुनकर देवान्तक [क्रोधसे] काँपने लगा, उसके नेत्र
लाल हो गये। वह [अपने आसनसे] उठ खड़ा हुआ।
उस समय ऐसा लगता था, मानो वह तीनों लोकोंको
निगल जायगा। अहंकार और अज्ञानके वशवर्ती होकर
वह अपने पितासे कहने लगा- 'मैं सबको मारनेवाले
कालको भी मार डालूँगा, पृथ्वीको उलटकर अपनी
क्रोधपूर्ण दृष्टिसे क्षणभरमें ब्रह्माण्डको भस्म कर
डालूँगा' ॥ ४३-४५ ॥
इस प्रकार अपने क्रोधपूर्ण वचनोंसे पृथिवीको
कम्पित-सा करते हुए उसने उन सभी दैत्योंको बुलाया,
जो देवताओंके अधिकारोंपर प्रतिष्ठित थे ॥ ४६ ॥
तदनन्तर देवान्तकने माता-पिताको प्रणामकर कहा-
'अब मैं शीघ्र ही उस मुनिकुमार [विनायक]-को
लाऊँगा और उसके साथ ही [नरान्तकके इस] सिरका
अग्नि-संस्कार करूँगा' ॥ ४७१/२ ॥
ऐसा कहकर देवान्तक तथा उसके साथी असंख्य
दैत्योंने शीघ्रगामी पक्षियोंकी भाँति बलपूर्वक उड़कर और
काशिराजकी नगरीमें पहुँचकर उसे चारों ओरसे घेर
लिया ॥ ४८-४९ ॥
उस समय [काशीपुरीमें] महान् कोलाहल होने
लगा और दिशाएँ धूलसे भर गयीं; [जिससे] सूर्यका
प्रकाश भी वहाँ नहीं आ पा रहा था। [यह देखकर]
पुरवासी अत्यधिक चीत्कार करने लगे ॥ ५० ॥
[वे कहने लगे-] नरान्तकको मरे तो अभी दो-
तीन दिन भी नहीं हुए, तो फिर यह जनसंहारकारी प्रलय
पुनः कैसे आ गया ? ॥ ५१ ॥
यह देखनेमें अत्यन्त कठिन भयंकर शरीरवाला
कौन आ गया, यह तो कालको भी कवलित और तीनों
लोकोंको भक्षण कर जानेमें समर्थ है ॥ ५२ ॥
इससे पहले भेजे गये दैत्यवीरोंका तो उस विनायकने
वध कर डाला था, परंतु अब पुनः दैत्योंकी एक परिखा
(खाईं)-सी बन गयी है, जिसके कारण अब बाहर
जानेका मार्ग भी नहीं है ॥ ५३ ॥
जब पुरजन इस प्रकार कह रहे थे, तभी देवान्तकके
आने (आक्रमण)-का समाचार काशिराजको बतलाने
उसके दूत आ गये ॥ ५४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'नगरीनिरोध' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६२ ॥