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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

अट्ठावनवाँ अध्याय

उ०ख०-अ०५८ ] * संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके प्रसंगमें भृशुण्डीमुनिके पितरोंके उद्धारकी कथा * १८७
अट्ठावनवाँ अध्याय
संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके प्रसंगमें भृशुण्डीमुनिके पितरोंके उद्धारकी कथा
ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी! मरुत्वान् इन्द्रके इस
प्रकारके उत्तम वचन सुनकर और उस [भृशुण्डि
मुनिकी] अमृतोपम कथाका श्रवणकर प्रसन्न हुए राजा
शूरसेनने उनसे पुनः पूछा—॥ १॥
शूरसेन बोले— हे देवेन्द्र! किस उपायसे आपका
विमान आकाशमें जा सकेगा? हे विभो! उस उपायको
कीजिये अथवा बताइये कि मैं आपके लिये क्या करूँ? ॥ २ ॥
ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी! इस प्रकारसे पुनः
प्रश्न करनेवाले राजा शूरसेनसे सभी लोगोंके सुनते हुए
देवशत्रुओंका वध करनेवाले इन्द्रने हँसते हुए-से यह
वचन कहा— ॥ ३ ॥
इन्द्र बोले—हे नृपश्रेष्ठ! यदि आपके नगरमें कोई
ब्राह्मण या क्षत्रिय भी संकष्टचतुर्थीका व्रत करनेवाला हो
तो उसके द्वारा एक वर्षतक किये गये उस व्रतके पुण्यका
सम्यक् प्रकारसे दान दिये जानेपर ही यह गमन कर
सकेगा; अन्यथा हे राजन्! यह अयुत (दस हजार)
पुरुषोंके प्रयत्न करनेपर भी नहीं चल सकता ॥ ४-५ ॥
राजा बोले—[हे विभो!] मुझे बताइये कि वह
मंगलकर संकष्टचतुर्थीव्रत कैसा है? उसका क्या पुण्य
है? उसका क्या फल है? उसकी विधि क्या है और
उसमें किस देवताका पूजन किया जाता है? ॥ ६ ॥
यहाँ प्राचीनकालमें किसने इस व्रतको किया था,
जिसे करनेसे सिद्धि प्राप्त हुई हो। हे इन्द्र! कृपया यह
सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ७ ॥
इन्द्र बोले—[हे राजन्!] इस सन्दर्भमें एक
प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसमें
कृतवीर्य[के पिता] और नारदजीका संवाद है ॥ ८ ॥
इस पृथ्वीतलपर कृतवीर्य नामक एक बलवान्
राजा हुआ था। जो सत्यवादी, शीलसम्पन्न, दानी,
यज्ञकर्ता, मानी, महारथी, जितेन्द्रिय, अल्पाहारी और
देव-ब्राह्मण-पूजक था। उसके अश्वारोही, गजारोही
योद्धाओं, रथियों और धनुर्धारियोंकी संख्याकी गणना
नहीं हो सकती थी। हे राजन्! वे सभी सह्याद्रिक्षेत्रके
निवासी थे॥ ९-१०१/२ ॥
उसके राजभवनमें सभी पलँग और पात्र सोनेके ही
थे। उनके यहाँ भोजन पकानेके लिये भी कभी ताम्रपात्रका
प्रयोग नहीं होता था। उसके यहाँ बारह हजार ब्राह्मण
पंक्तिबद्ध होकर भोजन करते थे ॥ ११-१२ ॥
त्रैलोक्यसुन्दरी सुगन्धा उसकी पत्नी थी, जो
धार्मिक स्वभाववाली, पतिव्रता और पतिको प्राणोंसे भी
अधिक प्रिय माननेवाली थी। वह अनेक प्रकारके
अलंकारोंसे अलंकृत, सौभाग्यवती और ब्राह्मणों, देवताओं
एवं अतिथियोंके पूजनमें रुचि रखनेवाली थी। हे राजन्!
वे दम्पती (राजा-रानी) इस प्रकारके अर्थात् सर्वगुणसम्पन्न
होते हुए भी पुत्रहीन थे ॥ १३-१४ ॥
पुत्रप्राप्तिहेतु उन दोनोंने सभी प्रकारके दान, व्रत
और तप किये तथा अन्य नियमोंका पालन किया
एवं प्रभूत दक्षिणावाले यज्ञ किये। पुत्र-प्राप्तिकी
लालसासे उन्होंने अनेक तीर्थों एवं [पुण्य] क्षेत्रोंकी
यात्रा की, फिर भी जन्मान्तरमें किये हुए पापोंके
कारण उन्हें पुत्र नहीं हुआ ॥ १५-१६ ॥
[तब] दुखी होकर राजाने एक बार मन्त्रियोंको
बुलाकर राज्य, राजमुद्रा, कोश, प्रजा और जनपद—सब
कुछ उन्हें दे दिया और रानीसहित [किसी] श्रेष्ठ वनको
चले गये। [वहाँ पहुँचकर] वे दम्पती वल्कल और
मृगचर्म धारणकर तपमें स्थित हो गये ॥ १७-१८ ॥
केवल सूखे पत्तों तथा वायुमात्रका आहार करते
हुए उन दोनोंने इन्द्रियों एवं आहारपर नियन्त्रण कर
लिया था। [समस्त शरीरके वल्मीक और लताजालोंसे
आवृत हो जानेके कारण] उन दोनोंके मात्र नेत्र ही
परिलक्षित होते थे। उन्हें इस अवस्थामें देखकर नारद
मुनिने पितृलोकमें स्थित कृतवीर्यके पितासे कहा—
'मृत्युलोक (पृथ्वी)-में तुम्हारा पुत्र कृतवीर्य पुत्रहीन
होनेके कारण प्रायोपवेशन (अनशन)-पर बैठा है, वह
कल या परसों मर सकता है। यदि उसे स्वर्गलोककी
प्राप्ति करानेवाला पुत्र प्राप्त हो जाय, तभी वह कृतवीर्य

१८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ - ऊपर]
जीवित रह सकेगा या मरनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त
करेगा-इस प्रकार कहकर नारदजी [वहाँसे] चल दिये,
तभी उन्होंने पृथ्वीलोकमें [भृशुण्डीमुनिके गणेशजीसे
सारूप्य-सम्बन्धी] अद्भुत घटना देखी ॥ १९-२२॥
[उधर] भृशुण्डीके माता-पिता, उनके दोनों पुत्र
और पुत्रीसहित पत्नी-ये सभी अग्निकी ज्वालाओंसे
परिपूर्ण कुम्भीपाक नामक भयंकर नरकमें नीचेकी ओर
मुख करके लटक रहे थे। यमदूतोंके द्वारा पीटे जानेपर
वे अनेक प्रकारसे चीख-पुकार करते हुए क्रन्दन कर रहे
थे। उनके क्रन्दनको सुनकर दयानिधान नारदजीने आकर
भृशुण्डीसे उनके दुःखको कहा ॥ २३-२४१/२॥
नारदजीने कहा-हे महामुने! गणेशजीके
सारूप्यको प्राप्त हुए जिन आपका दर्शन करनेके लिये
इन्द्र आदि देवगण तथा कपिल आदि मुनिगण आते हैं,
उन आपके माता, पिता, पत्नी, पुत्र, पुत्री और सेवक
आपके दोषसे यमलोकस्थ कुम्भीपाक नरकमें क्यों
पकाये जा रहे हैं? आप स्वयं भी ज्ञानसम्पन्न हैं, फिर
इस बातको क्यों नहीं जानते? आप अपने पूर्वजोंके
उद्धारका प्रयत्न कीजिये ॥ २५-२७१/२॥
इन्द्र बोले- [हे राजा शूरसेन!] मुनिके द्वारा कहे
गये वचनोंको सुनकर भृशुण्डी अत्यन्त दुखित हो गये।
अपने पितरोंके दुःखसे दुखी होकर वे प्रज्वलित अग्निकी
भाँति सन्तप्त हो उठे। तब उन्होंने उनके उद्धारका उपाय
सोचा ॥ २८-२९॥
तदनन्तर परोक्ष तत्त्वके ज्ञाता भृशुण्डीने ध्यानद्वारा

[दायाँ स्तम्भ - ऊपर]
[अपने पितरोंकी स्थिति] देखकर भगवान् गजाननका
ध्यान करते हुए हाथमें पवित्र जल लेकर संकष्टचतुर्थीव्रत-
जनित पुण्यफल अपने पितरोंको प्रदान किया। तदनन्तर
पितरोंके उद्देश्यसे भगवान् गणेशसे प्रार्थना करते हुए
कहा- ॥ ३०-३१॥
भृशुण्डी बोले-हे गणपति गणेशजी ! यदि मैंने
भक्तिपूर्वक आपका व्रत किया हो, तो उसके प्रभावसे
आप शीघ्र ही मेरे पूर्वजोंका उद्धार कीजिये ॥ ३२॥
ऐसा कहकर उन्होंने उस जलको गजानन गणेशजीके
हाथमें डाल दिया। तब उस जलके डालते ही गणेशजीकी
कृपासे उनके सभी पितर देवताओंके-से स्वरूपवाले
होकर विमानोंमें आरूढ़ हो भगवान् गणेशजीके धामको
चले गये। उस समय अप्सराएँ उनकी सेवा कर रही थीं,
चारण उनकी स्तुति कर रहे थे और गन्धर्व उनका
यशोगान कर रहे थे ॥ ३३-३४१/२॥
कुम्भीपाक नरकमें जो दूसरे भी पापी मनुष्य थे, वे
भी विमानोंमें आरूढ़ होकर गणेशजीके धामको चले
गये। इस प्रकार मैंने तुमसे इस व्रतकी महिमाका वर्णन
कर दिया ॥ ३५-३६ ॥
जबकि उस व्रतका मात्र एक दिनका पुण्य प्रदान
करनेसे वे सब सद्गतिको प्राप्त हो गये तो जिसने
जन्मभर आदरपूर्वक संकष्टचतुर्थीका व्रत किया है,
उसके पुण्यकी गणना करनेमें शेषजी भी सक्षम नहीं हैं।
इसलिये उस व्यक्तिद्वारा दिये गये पुण्यके प्रभावसे मेरा
विमान गतिमान् हो जायगा ॥ ३७-३८ ॥

[मध्य भाग]
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रत-माहात्म्य-कथन'
नामक अठ्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥

उनसठवाँ अध्याय
कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा

[बायाँ स्तम्भ - नीचे]
राजा बोले-[हे देवेन्द्र !] भृशुण्डीमुनिके उन
पितरोंके कुम्भीपाक नरकसे निकलकर दिव्य लोक
(गणेशजीके धाम)-में चले जानेपर कृतवीर्यके पिताने
[अपनी वंश-परम्पराको बचाये रखनेके लिये] कौन-
सा उपाय किया? ॥ १ ॥
इन्द्र बोले- [हे राजन् !] अपने वंश-विच्छेदकी

[दायाँ स्तम्भ - नीचे]
सम्भावना सुनकर दुखी हुए कृतवीर्यके पिता शीघ्र ही
ब्रह्मलोकको गये और वहाँ कमलपर आसीन ब्रह्माजीका
दर्शन किया ॥ २ ॥
उन्होंने उन्हें प्रणाम करके उनसे अपने वंशके
विच्छेदका कारण पूछते हुए कहा-'हे विधाता! मेरा
पुत्र अत्यन्त धर्मात्मा, दानी, यज्ञकर्ता, देवताओं और

उ०ख०-अ०५९] * कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा * १८९
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[बायाँ स्तम्भ]
अतिथियोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाला तथा मान्यजनोंका
अतिशय सम्मान करनेवाला है। उसने पुत्र-प्राप्तिके लिये
अनेक प्रकारके प्रयत्न भी किये हैं॥ ३-४॥
हे सुरेश्वर! फिर भी उसके पुत्र क्यों नहीं हुआ?
अपना राज्य मन्त्रियोंको सौंपकर [इस समय] वह मात्र
वायुका आहार करते हुए वनमें स्थित है॥ ५॥
उसके शरीरमें मात्र हड्डियाँ ही रह गयी हैं और
वह आज या कल ही मर सकता है। हे प्रभो! जिससे
उसके जन्मान्तरीय पापका नाश हो जाय—उस उपायको
आप मुझसे दयाकर कहिये। हे कमलासन! अपने वंशकी
वृद्धिके लिये मैं उस उपायको अपने पुत्रको प्राप्त करा
दूँगा। तब उनकी इस प्रकारकी मधुर वाणीको सुनकर
ब्रह्माजीने भी वैसी ही मधुर वाणीमें कहा कि मेरे द्वारा
कथित अपने पुत्रके पूर्वजन्मके वृत्तान्तको सुनो॥ ६-८॥
[कृतवीर्य जिस नगरका राजा है,] उसी नगरमें
पूर्वकालमें साम नामका एक अन्त्यज रहता था। वह इतना
अधिक पापी था कि उसको देख लेनेमात्रसे पुण्योंका नाश
हो जाता था। एक बार उस [पापी]-ने लोभवश रास्तेमें
[जाते हुए] सांसारिक विषय-वासनाओंके प्रति तटस्थ
भाव रखनेवाले बारह ब्राह्मणोंको मार डाला और उन्हें
एक गुफाके अन्दर फेंक दिया॥ ९-१०॥
हे राजन्! तदनन्तर उनका सब कुछ लेकर वह माघ
कृष्ण चतुर्थीकी रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेपर अपने घर
आ गया। [वहाँ आकर] उसने 'गणेश! गणेश!' कहकर
शीघ्रतापूर्वक अपने पुत्रको बुलाया। उस दिन पूरे दिन उसे
अन्न-जल नहीं प्राप्त हुआ था, अतः उसने उसीके साथ
प्रसन्नतापूर्वक भोजन किया। हे राजन्! बहुत-सा समय
बीत जानेके बाद कृष्णपक्षकी चतुर्थीको ही रात्रिमें चन्द्रमाके
उदय होनेके बाद उसकी मृत्यु हो गयी॥ ११-१३॥
अज्ञानपूर्वक किये गये संकष्टचतुर्थीव्रतजनित पुण्यके
प्रभावसे वह श्रेष्ठ विमानमें आरूढ़ होकर भगवान्
गणेशके सुखदायी धाममें चला गया। उस समय
अप्सराओंके समूह उसपर पंखा डुला रहे थे तथा
विमानस्थित [चारण और गन्धर्व आदि] दिव्य पुष्पोंसे
अर्चनाकर उसकी स्तुति कर रहे थे॥ १४-१५॥

[दायाँ स्तम्भ]
उसी पुण्यके शेष रह जानेके कारण वह पृथ्वीपर
तुम्हारे पुत्र राजा कृतवीर्यके नामसे उत्पन्न हुआ, जो
[पूर्वजन्मकृत ब्रह्महत्याके पापके कारण] अभीतक
पुत्रहीनताको प्राप्त है। हे अनघ! उस महापापका क्षय
हो जानेपर ही उसे पुत्र उत्पन्न हो सकता है॥ १६ १/२॥
हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीके इस प्रकारके वचन सुनकर
वे काँपने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने पुनः पापनाशका उपाय
पूछा— ॥ १७ १/२॥
कृतवीर्यके पिता बोले—हे विधाता! उसके
द्वारा किया गया ब्रह्महत्याजनित पाप कैसे नष्ट होगा?
हे करुणासिन्धु! यद्यपि वह उपाय अत्यन्त दुष्कर होगा,
फिर भी उसे बताइये॥ १८ १/२॥
ब्रह्माजी बोले—यदि तुम्हारा पुत्र संकष्टचतुर्थी
नामक व्रतको सम्यक् रूपसे करेगा, तो वह पापसे मुक्त
हो जायगा॥ १९ १/२॥
राजा (कृतवीर्यके पिता) बोले—हे ब्रह्मन्!
उस व्रतको कैसे और किस शुभ मासमें किया जाता है?
हे स्वामिन्! वह सब मुझसे कहिये, जिससे वह पाप नष्ट
हो सके॥ २० १/२॥
ब्रह्माजी बोले—माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी
यदि मंगलवारको पड़े तो चन्द्रमाके अनुकूल होनेपर शुभ
मुहूर्तमें इस व्रतका प्रारम्भ करे। पहले दातून करे, फिर
इक्कीस बार [किसी पवित्र नदी या सरोवरमें डुबकी
लगाकर] स्नान करे॥ २१-२२॥
तत्पश्चात् नित्य कर्मोंका सम्पादनकर [गणेशजीके]
श्रेष्ठ मन्त्रका जप करे। निराहार और मौन रहते हुए
परनिन्दासे दूर रहे। नियमोंका पालन करे, दुष्कर्म न करे।
ताम्बूल-सेवन, जलपान, परद्रोह तथा चुगली न करे।
दिनके अन्तमें अर्थात् सायंकाल तिल और आँवलेके चूर्णको
शरीरमें लगाकर स्नान करे [गणेशजीके] एकाक्षर, षडक्षर
अथवा वैदिक मन्त्रका जप करे॥ २३-२५॥
गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये उनके नाम-मन्त्रका
यथाविधि जप करे तथा स्थिरचित्त होकर देवाधिदेव
गजानन गणेशजीका ध्यान करे। तदनन्तर एक मुहूर्तके
पश्चात् गणपति गणेशजीका षोडश उपचारों और अनेक

१९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
प्रकारके नैवेद्योंसे भी पूजन करे ॥ २६-२७ ॥
[नैवेद्यके रूपमें] पूड़ी, मोदक, पुआ, लड्डू, बड़ा,
खीर, विविध प्रकारके अन्नोंसे बने हुए अनेक प्रकारके
लेह्य और चोष्य व्यंजनोंसे भोग लगाये ॥ २८ ॥
[तत्पश्चात्] अनेक प्रकारके फलों, ताम्बूल, पूगीफल
(सुपारी), दक्षिणा, इक्कीस दूर्वाओं, दीपकों और
पुष्पोंसे उनका अर्चन करे ॥ २९ ॥
चन्द्रमाके उदय होनेके समय पहले मन्त्रपूर्वक
चतुर्थी तिथिको अर्घ्य दे, फिर गजानन गणेशजीको
तत्पश्चात् चन्द्रमाके लिये अर्घ्य प्रदान करे ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् [किये गये] पूजनको गणेशजीको
निवेदितकर उन्हें प्रणाम और क्षमायाचना करके भक्तिपूर्वक
इक्कीस ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भोजन कराये। आर्थिक
रूपसे अशक्त होनेकी स्थितिमें दस या बारह ब्राह्मणोंको
भोजन कराये और उन्हें दक्षिणाएँ देकर भली-भाँति
सन्तुष्ट करे। तदनन्तर सम्यक् रूपसे गणेशजीकी कथाका
श्रवणकर स्वयं मौन होकर भोजन करे ॥ ३१-३२ ॥
तत्पश्चात् शेष रात्रिको गायन-वादन एवं जयघोष
कर [जागरण करते हुए] व्यतीत करे। हे राजन् ! इस
प्रकार प्रयत्नपूर्वक एक वर्षतक यह व्रत करनेपर [तुम्हारे
पुत्रके] सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जानेसे उसे उत्तम पुत्रकी
प्राप्ति होगी। इस व्रतके करनेवाले मनुष्यकी अन्य भी
जो-जो कामनाएँ होंगी, वे पूर्ण होंगी। इसके करनेसे
सम्पूर्ण संकटोंका नाश होता है और शत्रुओंकी सेनासे
कोई भय नहीं रहता ॥ ३३-३४ १/२ ॥
शमीवृक्षके मूल भागमें बैठकर उपवास करते हुए
चन्द्रमाके उदय होनेतक गणेशजीके मन्त्रका जप करते
हुए इस व्रतको भलीभाँति करे। इस व्रतको करनेसे
अन्धा, गूँगा, मूर्ख, लँगड़ा भी अपने अभीष्टको प्राप्त कर
लेता है। इस व्रतको करनेवाला स्त्री, पुत्र, धन और
राज्यको प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं है। व्रतीको
श्रावण आदि पृथक्-पृथक् मासोंमें घृत, लड्डू आदि
पृथक्-पृथक् भोज्य पदार्थोंका भोजन करना चाहिये।
वर्षपर्यन्त ऐसा करनेवालेको अत्यन्त उत्तम सिद्धिकी
प्राप्ति होती है ॥ ३५-३७ १/२ ॥
[व्रतीको व्रतके दिन] श्रावणमासमें सात लड्डू,
भाद्रपदमासमें दहीका भोजन करना चाहिये। आश्विनमासमें
उपवास और कार्तिकमासमें दुग्धपान करना चाहिये।
मार्गशीर्षमासमें उसे निराहार रहना चाहिये और पौषमासमें
गोमूत्रका पान करना चाहिये। माघमासमें उसे तिलोंका
भक्षण करना चाहिये तथा फाल्गुनमासमें शर्करायुक्त घृत
खाना चाहिये। चैत्रमासमें उसे पंचगव्यका पान करना
चाहिये और वैशाखमासमें शतपत्रिकाका भोजन करना
चाहिये। ज्येष्ठमासमें उसे घृतका भोजन तथा आषाढ़मासमें
मधुका भक्षण करना चाहिये ॥ ३८-४० १/२ ॥
कृतवीर्यके पिता बोले- हे ब्रह्मन्! अंगारक
चतुर्थीका विशेष विधान क्यों कहा गया है? आपके प्रति
आदरका भाव रखनेवाले मुझ विनम्र शरणागतसे यह सब
कृपापूर्वक कहिये। गजानन गणेशजीकी मंगलमयी कथाको
सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ४१-४२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकटचतुर्थीव्रतकथन' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥
साठवाँ अध्याय
भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा, उसकी उग्र तपस्यासे गणेशजीका
प्रसन्न होकर वर देना, अंगारकचतुर्थीव्रतकी महिमा
ब्रह्माजी बोले- हे राजन् ! मैं अंगारक चतुर्थीकी
महिमाको संक्षेपमें कहता हूँ, तुम इसे सावधान होकर
श्रवण करो ॥ १ ॥
हे राजन्! अवन्तीनगरमें भारद्वाज नामके एक
महान् मुनि थे। वे वेद-वेदांगके विद्वान्, अत्यन्त बुद्धिमान्,
सर्वशास्त्रविशारद, अग्निहोत्रपरायण और नित्य शिष्योंके
अध्यापनमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ २ १/२ ॥
एक समय वे मुनि नदीके किनारे बैठकर अनुष्ठानमें
रत थे, तभी उन्होंने एक सुन्दर अप्सराको देखा। उसे देखकर
उन्होंने उसके साथ रमण करनेका मन बनाया ॥ ३-४ ॥