अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
२५१ अकबर बीरबल विनोद
२५१ अकबर बीरबल विनोद
रखवा दिया। उन्होंने सोचा कि शायद रुपयों के प्रलोभन में
आकर स्वामीजी फेर में आ जावेंगे परन्तु वे न कुछ आशी-
र्वाद दिये और न रुपयों की तरफ देखा ही।
बादशाहको स्वामीजी की ऐसी निष्ठुरता सहन न हो सकी
और वे झल्ला कर बोले—"अरे ऐसे अज्ञानियों से माथापच्ची
करना मूर्खता है। यह तो कोई अज्ञानी है, जो मनुष्य होकर
भी पशुवत व्योहार करता है।" बादशाह रुपयों की थैली
उठवाकर बीरबलके घर भेजवा दिये। उनका कस्द था कि दिये
दानको फिर वापस नहीं लेते थे। वे सबभाँतिसे हारकर अपने
महल को चले गये। दर्बार उठने के पश्चात् फिर जब
बादशाह और बीरबल का एकान्त में समागम हुआ तो बाद-
शाह ने स्वामी के पास जाने से लेकर लौटने तक का सारा
समाचार कह सुनाया। अन्त में बादशाह ने कहा- "अच्छा
बीरबल ! यदि किसी को मूर्ख का सामना करना पड़े तो
उस समय क्या करना चाहिये।" बीरबल ने तत्काल उत्तर
दिया- "पृथिवी नाथ ! एकदम चुप रह जाना चाहिये।"
बादशाह को उल्टी तोहमत लगी। पहले उनका विचार
था- "इस प्रकार समझा कर बीरबल के गुरु का मूर्ख होना
साबित करूँगा। लेकिन उनकी उस आशा पर एकदम पानी
फिर गया। बीरबल ने उन्हें ही मूर्ख बना दिया। बादशाहने कहा-
"सन्यासी को मैंने इतनी दौलत देकर बहुतेरा चाहा कि उससे कुछ
वार्तालापकरूँ, परन्तु उसने धनका कुछ भी लालच नहीं किया
बल्कि उल्टे मुझको ही मूर्ख बना चुप रह गया। आज से कस्द
करता हूँ कि अब भविष्यमें जब कभी किसी महात्मा से मिलने
जाऊँगा तो उससे मुलायमियत का व्योहार करूँगा।” बाद-
शाह को अपनी उच्छृंखलता पर बड़ा दुःख उत्पन्न हुआ और
अपनी तरफ से बीरबलको उसके गुरुसे क्षमाप्रार्थी होनेके लिये
भेजा। यह तो बीरबल की मनचाही बात थी। वह उसी क्षण
हनुमान जी के मन्दिर में जा पहुँचा। सूर्यास्त का समय था
और सब लोग वहाँ से चले गये थे। बीरबल लकड़हारे को
अपने घर लिवा ले गया और उसकी बहुत प्रशंसा कर
बोला-“सावधान ! यह बात कहीं प्रगट न करना, नहीं तो
जान के लाले पड़ जायँगे। उसे एक सौ रुपये अपनी तरफ से
और देकर बिदा किया। लकड़हारे ने इतना रुपया कभी नहीं
देखा था। वह बीरबल के सामने उस बात को आजन्म गुप्त
रखने की प्रतिज्ञा कर खुशी २ अपने घर चला गया।
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बादशाह का नाखून
किसी देशके बादशाहका लड़ाईमें पैरका अँगूठा कट गया
था। उस बादशाह के पास बहुतेरे हकीम इसी कामके लिये
नियुक्त किये गये थे कि जब कोई लड़ाई में आहत होता तो
हकीम लोग उसका इलाज किया करते थे। हकीमों ने बादशाह के
अँगूठे पर फिर से मांस आ जाने का बहुतेरा प्रयास किया
जिससे मांस तो बढ़ आया परन्तु नाखून नहीं उगा। इसलिये
बादशाह हकीमों पर चिढ़कर उन्हें कैदकर लिया और विचारोंको
जेलमें बन्द रहकर कैदकी यातना भुगतनी पड़ रही थी। बाद-
शाह इतना करके भी सन्तुष्ट नहीं हुआ। उसने बहुतेरे हकीमों को