अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
२४१ अकबर बीरबल विनोद
२४१ अकबर बीरबल विनोद
जाता है, इसलिये पानी पिलाते समय यह भिश्ती बन जाता
है। परदेश में जाने पर इसी के सर बोझ भी लादा जाता है
इसलिये ऐसा काम करने से खर भी कहा जा सकता है।"
केवल एक ब्राह्मण को नौकर रखने से ये चारों काम आसानी
से निकल आते हैं। पूजन के समय इसकी पैर पूजा कर पीर
बना लीजिये, समय पर रोटी बनवा कर बवर्ची बनाइये, प्यास
लगे तो इससे भिश्ती का काम कराइये यानी वह पानी भी
पिला देगा, और चाहे जब बोझा भी ढुलवा कर खर का काम
भी सुगमता से करा लीजिये। यानी यह उन समस्त चारों
कामों को भली भाँति कर सकता है।" बादशाह बीरबल का
उत्तर सुनकर मन में प्रसन्न हो मुसकरा दिये। बीरबल उस
गरीब ब्राह्मण को २५ रुपये पुरस्कार देकर विदा किया।
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बनस्पति का बीज
एक दिन ऐसा हुआ कि बादशाह के बहुतेरे दरबारी उस
पर चिढ़कर मौन धारण कर लिये। जब बादशाह स्वयं किसी
को छेड़कर कुछ पूछते तो वे थोड़े में उसका उत्तर देकर चुप
रह जाते। आज की सभा में बीरबल नहीं था। बादशाह अपने
दरबारियों की खपको को मन ही मन ताड़ गये और उनके ऐसे
मनमलीनता का कारण पूछा। तब एक वृद्ध दरबारी बादशाह
से विनती कर बोला—"पृथ्वीनाथ ! मुझे एक बात का
बड़ा खेद है, यदि आज्ञा पाऊँ तो कहूँ।" बादशाह ने उसकी
प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब बुड्ढा बोला—"मैं २५ वर्ष से
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