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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

१७० \hfill अकबर बीरबल विनोद

१७० \hfill अकबर बीरबल विनोद
शहर में टिककर निरर्थक समय खोना अच्छा नहीं समझती
थी। डेरे पर पहुँचकर तुरत स्वदेश लौटने की तैयारी कर
सिंहलद्वीप चली गई। पहुँचकर दिल्लीधीश्वर के दरबार
का सब समाचार यथातथ्य कहकर अपने राजा को सुनाया।
वहाँ के लोग बीरबल की बुद्धि की सराहना करने लगे।
झख मार रहे हैं
एक दिन जमुना किनारे एक मल्लाह मछलियों का शिकार
कर रहा था उसी समय बीरबल को लिये दिये बादशाह भी
वहीं पर जा पहुँचा “देखा-देखी पाप, देखा-देखी पुन्य।”
बादशाह को भी शौक हुआ और वह वहीं बैठकर मछलियाँ
मारने लगा। मछली मारते-मारते उसे कोई ऐसा काम स्मरण
हो आया कि उससे बीरबल को बेगम के पास भेजना पड़ा।
बीरबल हुक्म पाकर बेगम से जा मिला। कुशल भलाई के
बाद बेगम ने पूछा-“बादशाह क्या कर रहे हैं?” बीरबल ने
कहा-“कर क्या रहे हैं, जमुना जी के किनारे बैठे २ झख
मार रहे हैं।”
बीरबल के मुख से उपरोक्त उत्तर पाकर बेगम भीतर २
बड़ी नाराज हुई, परन्तु बीरबल से कुछ बोल न सकी। जब
रात्रि समय में बादशाह आया तो वह कुपित होकर बोली-
“पृथ्वीनाथ! बीरबल को आपने बहुत सिर चढ़ा लिया है जिस
कारण वह बड़ा ढीठ होता जा रहा है। वह आपके निस्वत पूछने
पर मुझसे कह गया है कि झख मार रहे हैं; आपको उचित है