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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद ९८

अकबर बीरबल विनोद ९८
बीरबल के कान में पहुँची। वह अपने पड़ोस के एक बढ़ई को
बुलाकर बोला- "तुम एक चारपाई अपने मस्तक पर रखकर
बादशाह के पास जाओ और कहो कि मैं-"आधी दूर धूप
आधी दूर छाया" में होकर आपके पास आया हूँ अतएव मुझे
पारितोषिक मिलनी चाहिये।"
बढ़ई बीरबल को पहचानता था इसलिये उसकी बात मान-
कर चारपाई सिरपर लेकर बादशाह के पास जा पहुँचा और
एक हजार का पुरस्कार पाने का उजुरदार हुआ। बादशाह
इस बात को बढ़ई के समझ से बाहर की समझ कर बोला-
"सचसच बतलाना होगा, कि तुम्हें यह सलाह किसने दी है"
बढ़ई बोला-"पृथिवीनाथ ! एक ब्राह्मण कुछ दिनों से हमारे
ग्राम में आ बसा है, उसे लोग बीरबल के नाम से पुकारते
हैं, उसीकी सम्मति से मैंने यह कार्य किया है। बादशाह
किसान से बीरबल का नाम सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ
और उसको एक हजार रुपये देकर बिदा किया। उसके
साथ अपना दो कर्मचारी बीरबल को लाने के लिये परवाने
के साथ भेजा। इतने यत्न के पश्चात् बीरबल फिर बादशाह
के हाथ लगा।

अधर महल
एक दिन दरबार के काम काजों से निश्चिन्त होकर
बादशाह बीरबल के साथ गप्पें मार रहा था। गप्प शप के
मानी मनोरंजन के हैं। उसी दिन उसको एक अधर महल