अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद ७४
अकबर बीरबल विनोद ७४
ही बता कि क्यों कर न रोकूँ ।” लोहार ने कहा-“वह धन
कहाँ और किस चीज़ में रक्खा हुआ है। तब सूमड़ा उँगली
से बगल की एक कोठरी दिखलाते हुए बोला-“उसी कोठरी
में एक काठ की पुरानी सन्दूक रक्खी हुई है जिसमें सात
लाख के जवाहरात बन्द हैं।” लोहार ने कहा-“यदि मैं उन
जवाहरातों को बाहर निकाल लाऊँगा तो अपने मन मानी
तुझे दूँँगा और बाकी मैं लूँगा ।” सर्वस जाता देख कंजूस
ने उसकी बात मान ली । लुहार अग्नि से बचने की तरकीब
जानता था इसलिये उस जलती हुई आग में साहस कर कूद
पड़ा और कोठरी में पहुँच कर उस सन्दूक को बाहर निकाल
लाया । इस प्रकार पिटारी को अपनी बगल में रखकर अग्नि-
काण्ड देखने लगा।
थोड़ी देर बाद जब अग्नि का वेग घट गया और लोगों के
हृदय में शान्ति आई तो पिटारी का मामला उपस्थित हुआ।
जिस वक्त लोहार और कंजूस में ऐसी शर्तें तय पाई थीं उस
समय लोहार ने एक और चालाकी की थी। उस जगह के
दो मनुष्यों को अपना गवाह बना लिया था। गवाहों के सामने
ही वह पिटारी खोली गई। पिटारी खुलते ही जवाहरातों
की चमक बाहर तक फैल गई। जैसे धन देखकर गँवारों की
दशा होती है वही दशा लुहार की भी हुई। उस अमुल्य
रत्नों की ढेरी को देखकर उसका मन फिर गया। वह
का सारा धन तो आप ले लिया और उस खाली
को विचारे कंजूस के हवाले किया। कंजूस लुहार
अनीति देखकर बहुत चकराया और गिडगिडा