अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद ६६
अकबर बीरबल विनोद ६६
उसका शोक मनाया करता था। बादशाह की उदासी मिटाने के
लिये लोगों ने बड़ी बड़ी तरकीबें निकालीं, पर दिल की
लगन बुरी होती है। जब उपायों से कार्य्य-सिद्धि न हुई तो
दरबारियों ने अष्टकौशल कर एक नई युक्ति सोच निकाली
और कितने नागरिकों से कानों कान कहलाया कि अभी
बीरबल जीवित है। जब इस हौवा से भी बादशाह को
सन्तोष नहीं हुआ तो दूर दूर के शहरों तथा दिहातों से
बीरबल के जीवित रहने का समाचार आने लगा। लोग कहते
थे कि वह लड़ाई से बचकर एक दूसरे शहर में छिप कर
बैठा है।
एक बार ऐसी घटना घटी कि किसी मनुष्य ने अपने
को बीरबल कहकर घोषित किया, परन्तु उसका बादशाह
से साक्षात न हो सका, वह आते २ बीच मार्ग में स्वर्गवासी हो
गया। बादशाह का मन्तव्य पूरा नहीं हुआ। जीवनपर्यन्त
उसे अपने प्रिय मंत्री बीरबल से फिर साक्षात न हो सका।
एक गाँव सीड़ी था उसमें इस घटना के दो तीन वर्ष
बाद एक द्विजाति कुलोद्भव ने अपने को बीरबल कहकर
घोषित किया और लोगों में इस बात का खूब प्रचार किया कि
मैं ही बीरबल हूँ। जब पठानों का युद्ध छिड़ा था तो मैं लड़ाई
में आहत होकर एक महात्मा की कृपा से जीता-जागता निकल
आया। महात्मा ने मेरी बड़ी शुश्रूषा की। जब मैं एक दम
चंगा हो गया तो उस साधु से आज्ञा लेकर इस गाँव
में आ बसा। उस आदमी की सूरत भी बीरबल से बहुत
कुछ मिलती जुलती थी। वह बीरबल के जीवनकाल की सारी