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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद २०

अकबर बीरबल विनोद २०
से रोका। उसको निश्चय हो गया कि इसीने बालक का
वध किया है।
बीरबल ने सिपाहियों को उसे पीटने की आज्ञा दी।
उसका दोनों हाथ पाँव बाँध दिया गया और सिपाही मारने
को उद्यत हुए। अब तो दुष्टा स्त्री का होश ठिकाने आ गया
और उसने तुरत अपना कसूर स्वीकार कर लिया। बादशाह
को उस मक्कारा की काली करतूत पर बड़ा रंज हुआ इसलिये
उसे कारागार भुगतने की सजा दी और उस विनम्रा स्त्री को
पुरस्कार देकर बिदा किया।
गुलाम को मारडाल ।
सन्ध्या का समय था अकबर अपने बाग में दरबारियों
के साथ राजकीय विषयों पर विचार कर रहा था, इतने में
तानसेन ने अपनी सारंगी मिलानी शुरू की। सबका ध्यान
तानसेन के वाद्य की तरफ आकृष्ट हो गया। दरबार का शेष
कार्य स्थगित कर दिया गया। तानसेन ने एक मनहरन तान
सारंगी पर छेड़ी। चारोतरफ से वाह वाह की ध्वनि
आने लगी। बादशाह आनन्दमग्न तकिये के सहारे लेटा हुआ
सुन रहा था। चारो तरफ आनन्द छा रहा था। इसी समय
शहर का कोतवाल दो आदमियों को लिये हुए आया। उन
आदमियों के कपड़े खून से लथपथ हो रहे थे।
कोतवाल के अचानक आ पहुँचने से बड़ा रंग में भंग
होगया । बादशाह झल्ला गया और झिड़ककर कोतवाल

२१ अकबर बीरबल बिनोद
से बोला—"क्या तुमको इतनी भी तमीज न हुई कि
यह समय दरबार का नहीं है, ऐसे मनबहलाव के समय
बन्दियों का लाना कहाँ तक उचित था। ये कैदी रातभर
हवालात में रक्खे जा सकते थे। कल्ह दरबार लगने पर
इनके मामले पर विचार किया जा सकता था, फिर इतनी
आतुरता दिखलाने का क्या कारण है ?"
बादशाह की नाराजगी से कोतवाल सहम गया, परन्तु
बिना असलियत बतलाये भी काम नहीं चलते देखा। कुछ
सोच समझकर उसने कहा-“गरीबपरवर ! इसमें सन्देह नहीं
कि मैं इनको सुबह लेकर हाजिर हो सकता था परन्तु इनका
मामला बड़ा बेढंगा है जिस कारण मुझको विवश होकर
इसी समय आना पड़ा।" उससे ऐसा सुनकर बादशाह कुछ
शान्त होकर बोला-“अच्छी बात है ! इनका अभियोग
सुनाओ।” कोतवाल ने कहा-“आज जब मैं नगर में गस्त
लगाते हुए व्यापारियों की मंडी में पहुँचा तो क्या देखता हूँ
कि एक जगह बहुतेरे आदमियों की भीड़ लगी हुई है,
जब वहाँ गया तो इस अपरिचित मनुष्य को इस नगर
व्यापारी से मार पीट करते देखा। यह अपरिचित मनुष्य
नगर व्यापारी को झिड़क रहा था कि-“अरे दुष्ट ! आज से
पाँच सात वर्ष पहले तू मेरा दास था और वहाँ से छिप
कर भाग आया है। बड़े परिश्रम के बाद आज तुझे पकड़ लिया
है, अब मेरे रुपये अदा कर । इसको झिड़कते देख नगर
व्यापारी बोला-“नालायक ! दास तो मेरा तू है तुझे मैं
आज कितने ही वर्षों से ढूँढ़ रहा था, भाग्यवश इससमय हाथ