अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद १६३
अकबर बीरबल विनोद १६३
भी करनी पड़ेगी। लोगों में तुमको मेरा छोटा भाई होना
विख्यात करना पड़ेगा, बल्कि यत्र तत्र इसका प्रचार भी
काफी तौर से करना होगा, वह लड़का बहुत प्रसन्न हुआ
और बीरबल का छोटा भाई बनना सहर्ष स्वीकार
किया। “मरत रहे एक चना के, पाय गये दो दाल।”
भला इस जमाने में ऐसा कौन होगा जिसको अपना विवाह
होना न भावे।
अब दोनों तरफ से विवाह की तय्यारी होने लगी। जब
अच्छा मुहूर्त आया तो बाजे गाजे के साथ उसका गठबन्धन
हो गया। लड़की के बिदाई की शायत शोधकर पुरोहित
फिर रामबाई से मिला और उसे कन्या के रुखसती का दिन
बतला कर बोला-“बाईजी! मैं चाहता हूँ कि आप जैसी
मिजाज की तेज हैं और अपने पति को दबाकर उसपर अपना
पूरा प्रभाव जमाये रहती हैं; उसी प्रकार आपकी लड़की आपसे
भी बढ़कर हो, तब तो तुम्हारा नाम, नहीं तो सब व्यर्थ होगा।”
इतना कहकर पुरोहितजी अपने घर चले गये। रामबाई
बड़े चिड़चिड़े मिजाज की औरत थी उसने अपनी लड़की
को बुलाकर समझाया-“देखना बेटी! तुम हमारे नाम को
कायम रखना; अपने पति को हर समय दबाये रहना, मैं तो
अपने पतिको प्रतिदिन दस ही जूते मारती हूँ, तुम पन्द्रह का
हिसाब रखना। अगर मेरे कहे अनुसार न चलेगी तो मैं
फिर आजन्म तेरा मुख नहीं देखूँगी।”
क्रमशः लड़की के बिदाई की घड़ी भी आ पहुँची।
रामबाई ने अपने पति को उसे ससुराल पहुँचाने के लिये