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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद १५८

अकबर बीरबल विनोद १५८
गरीब की आह
एक दिन तुर्किस्तान के बादशाह को अकबर की परीक्षा
लेने का विचार हुआ। वह एक एलची को पत्र देकर कई और
सिपाहियोंके साथ दिल्ली भेजा। पत्रका आशय यह था-“अक-
बर शाह ! मुझे सुनने में आया है कि आपके भारतवर्ष में कोई
ऐसा वृक्ष उत्पन्न होता है कि जिसके पत्तों के खाने से मनुष्य
की आयु बड़ी होती है। यदि यह बात सच्ची है तो मेरे लिये
उस वृक्ष के थोड़े पत्ते भेज देना।” बादशाह इस पत्र को
पढ़कर विचारमग्न हो गया, फिर कुछ देर तक बीरबल से
राय मिलाकर सिपाहियों सहित उस एलची को कैद
कर एक सुदृढ़ किले में बन्द करा दिया। इस प्रकार कैद
हुए जब उनको कई दिन हो गये तो एक दिन बादशाह
बीरबल को साथ लेकर उन कैदियों को देखने गया।
बादशाह को देखकर उनको अपने मुक्त होने की आशा
हुई; परन्तु वह बात निर्मूल थी। बादशाह उनके पास पहुँच
कर बोला-“तुम्हारा बादशाह जिस वस्तु को चाहता है वह
मैं तबतक उसे न दे सकूँगा जबतक कि इस सुदृढ़ किले की
एक एक ईंट न ढह जाय। उसी वक्त तुम लोग आजाद
भी किये जावोगे। तुमको खाने पहनने की तकलीफ न होगी;
मैंने उसका यथोचित प्रबन्ध कर दिया है।” इतना कहकर
बादशाह चले गये, परन्तु उन कैदियों की चिन्ता और भी बढ़
गई। वे अपने मुक्त होने का उपाय सोचने लगे। उनको अपने
स्वदेश के सुखों का स्मरण कर बड़ा दुख होता था।