अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद ।
- श्रीः *
अकबर बीरबल विनोद ।
शाहन्शाह अकबर कालीन दिवान बीरबल
के चुने हुए हास्यास्पद नीतिप्रद
सदुपदेश ।
संग्रहकर्त्ता—
पं० रामानन्द द्विवेदी,
जलालपुर माफी, चुनार ।
प्रकाशक—
फर्म—बाबू बैजनाथ प्रसाद बुकसेलर,
राजादरवाजा, बनारस ।
प्रथमबार २००० ] सन् १६३८
प्रकाशक—
फर्म बाबू बैजनाथ प्रसाद बुकसेलर,
राजादरवाजा, बनारस ।
मुद्रक—
बाबू राधेश्याम,
राधेश्याम प्रेस, नन्दनसाहु लेन,
बनारस सिटी ।
भूमिका
प्राचीनकाल के राजदरबारों में; जहाँ सब प्रकार के
गुणियों का आदर रहता था वहाँ एकाध ऐसे भी हास्यरस-
कुशल कुशाग्रबुद्धि पुरुषरत्नों, का प्रवेश रहता था जो समय
समय पर विलक्षण बुद्धि एवं वचनचातुरी से राजाओं को
मोह लेते थे और अपनी वचनचातुरी से स्वामी को वश में
कर लेते थे।
राजा बीरबल और बादशाह अकबर का ऐसा ही सम्बन्ध
रहा है। अकबर के दरबार में वा यों कहिये कि अकबरी
राजसभा के नौरत्नों में बीरबल कोहनूर हीरा थे। लड़कपन
से ही बीरबल अकबर के साथ थे और दोनों में ऐसा हँसी
मजाक हुआ करता था जैसा दो लँगोटिये यारों में होता है।
बीरबल जी केवल हँसोड़ थे सो नहीं वे अच्छे शूर,
सामन्त, कवि, पण्डित और सभाचातुर वीरनर थे। बीरबल
दानी भी बड़े थे और हाजिरजवाबी में तो अपना सानी
नहीं रखते थे। बादशाह अकबर बीरबल को प्राणों से भी
अधिक प्रिय मानते थे और क्षण भर भी पृथक रहना नहीं
चाहते थे। इसमें किंचितमात्र सन्देह नहीं कि अकबर
बीरबल के मजाक बड़े मौके मार्के के और गुदगुदाने वाले
होते थे। खेद है कि इनके प्रचलित मजाकों में कुछ मजाक
कल्पित सन्निवेशित कर दिये गये हैं। मुल्ला दोप्याजे का
नाम भी कल्पित ही सिद्ध हुआ है।
( ॥ )
राजा बीरबल को अकबर की आँखों से गिराने का कई
बार उनके प्रतिद्वन्द्वियों ने प्रयत्न किया पर वे अपने कौशल
से षड्यन्त्रकारियों को नीचा ही दिखाते रहे।
बीरबल की हाजिरजवाबी ऐसी थी जिससे अकबर को
भी सिर नीचा कर लेना पड़ता था। बीरबल को अकबर
बहुत मानता था। स्वात और बाजोर के युद्ध में बीरबल के
मारे जाने पर अकबर को घोर दुःख हुआ। कई रोज तक
वह एकान्त में बैठकर रोया किया।
अकबर को यदि बीरबल-सा साथी न मिला होता तो
उसका जीवन नीरस हो जाता।
हमारे इस संग्रहमें बीरबल और अकबर के वे ही मजाक
संग्रहीत हैं जो अधिक प्रचलित हैं और हास्यरस से भरे
हुए हैं। आशा है कि इसके पाठकों को इससे कुछ मनोरंजन
विशेष होगा। यदि ऐसा हुआ तो हम अपना श्रम सफल
समझेंगे।
हमने इसे कई प्रचलित प्रकाशित पुस्तकों से संग्रह
किया है। सम्भव है कि हमारी संग्रहीत भाषा में अनेक
अक्षम्य अशुद्धियाँ हों अतएव पाठकवृन्द उन अशुद्धियों पर
विशेष दृष्टि निक्षेप न करके हमारे प्रयास पर ही ध्यान देंगे
और उन्हें सुधार कर ही पठन पाठन करेंगे।
विनीत--
लेखक