अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
सुन्दरकाण्ड - सर्ग ५: हनुमान्जीका सीताजीसे विदा होना और श्रीरामचन्द्रजीको सन्देश सुनाना
२२६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५
पञ्चम सर्ग
हनुमान्जीका सीताजीसे विदा होना और श्रीरामचन्द्रजीको उनका सन्देश सुनाना।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीहनुमान्जीने सीताजीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके कहा—"देवि ! आप मुझे आज्ञा दीजिये; अब मैं श्रीरघुनाथजीके पास जाता हूँ; वे शीघ्र ही भाई लक्ष्मणसहित आपसे मिलनेके लिये यहाँ आयेंगे।" ऐसा कह पवननन्दन हनुमान्जीने जानकीजीकी तीन परिक्रमाएँ कर उन्हें प्रणाम किया और जानेके लिये कुछ दूर चलकर बोले—"देवि ! मैं जाता हूँ, आपका शुभ हो, आप शीघ्र ही सुग्रीव और करोड़ों अन्य वानरोंके सहित भगवान् राम और लक्ष्मणको देखेंगी।" तब दुःखसे दुर्बल हुई जानकीने हनुमान्जीसे कहा—"तुम्हें देखकर मैं अपना दुःख भूल गयी थी। अब तुम जा रहे हो; अब, श्रीरामचन्द्रजीका समाचार सुने बिना मैं कैसे रहूँगी"? ॥ १-५ ॥ |
|---|---|
| ततः सीतां नमस्कृत्य हनुमानब्रवीद्वचः।<br>आज्ञापयतु मां देवि भवती रामसन्निधिम् ॥ १ ॥<br>गच्छामि रामस्त्वां द्रष्टुमागमिष्यति सानुजः।<br>इत्युक्त्वा त्रिःपरिक्रम्य जानकीं मारुतात्मजः॥२॥<br>प्रणम्य प्रस्थितो गन्तुमिदं वचनमब्रवीत् ।<br>देवि गच्छामि भद्रं ते तूर्णं द्रक्ष्यसि राघवम् ॥ ३ ॥<br>लक्ष्मणं च ससुग्रीवं वानरायुतकोटिभिः ।<br>ततः प्राह हनूमन्तं जानकी दुःखकर्शिता ॥ ४ ॥<br>त्वां दृष्ट्वा विस्मृतं दुःखमिदानीं त्वं गमिष्यसि ।<br>इतः परं कथं वर्ते रामवार्ताश्रुतिं विना ॥ ५ ॥ |
मारुतिरुवाच
| यद्येवं देवि मे स्कन्धमारोह क्षणमात्रतः ।<br>रामेण योजयिष्यामि मन्यसे यदि जानकि ॥ ६ ॥ | **हनुमान्जी बोले—**हे देवि ! यदि ऐसी बात है और आप स्वीकार करें तो हे जनकनन्दिनी ! आप मेरे कन्धेपर चढ़ लीजिये, मैं एक क्षणमें ही श्रीरामचन्द्रजीसे आपको मिला दूँगा ॥ ६ ॥ |
सीतोवाच
| रामः सागरमाशोष्य बद्ध्वा वा शरपञ्जरैः ।<br>आगत्य वानरैः सार्धं हत्वा रावणमाहवे ॥ ७ ॥<br>मां नयेद्यदि रामस्य कीर्तिर्भवति शाश्वती ।<br>अतो गच्छ कथं चापि प्राणान्सन्धारयाम्यहम् ॥८॥ | **सीताजीने कहा—**यदि श्रीरामचन्द्रजी समुद्रको सुखाकर या उसे बाणोंसे बाँधकर यहाँ वानरोंके साथ आयें और रावणको युद्धमें मारकर मुझे ले जायँ तो इससे उन्हें अमर कीर्ति प्राप्त होगी। इसलिये तुम जाओ, मैं जैसे-तैसे प्राण धारण करूँगी ॥ ७-८ ॥ |
| इति प्रस्थापितो वीरः सीतया प्रणिपत्य ताम् ।<br>जगाम पर्वतस्याग्रे गन्तुं पारं महोदधेः ॥ ९ ॥<br>तत्र गत्वा महासत्त्वः पादाभ्यां पीडयन् गिरिम् ।<br>जगाम वायुवेगेन पर्वतश्च महीतलम् ॥१०॥<br>गतो महीसमानत्वं त्रिंशद्योजनमुच्छ्रितः।<br>मारुतिर्गगनान्तस्थो महाशब्दं चकार सः ॥११॥<br>तं श्रुत्वा वानराः सर्वे ज्ञात्वा मारुतिमागतम् ।<br>हर्षेण महताऽऽविष्टाः शब्दं चक्रुर्महास्वनम् ॥१२॥ | सीताजीसे इस प्रकार विदा हो वीरवर हनुमान् उन्हें प्रणाम कर महासागरके पार जानेके लिये पर्वत-शिखरपर चढ़ गये ॥ ९ ॥ वहाँ पहुँचकर महावीर हनुमान्जी पर्वतको अपने पैरोंसे दबाकर वायुवेगसे चले और (उनके दबानेसे) वह तीस योजन ऊँचा पर्वत पृथिवीमें घुसकर समतल हो गया। हनुमान्जीने आकाशमें जाते समय बड़ा घोर शब्द किया ॥ १०-११ ॥ उसे सुनकर सब वानरगण, यह जानकर कि हनुमान्जी लौट रहे हैं, बड़े आनन्दमें भरकर घोर शब्द करने लगे ॥ १२ ॥ (वे आपसमें कहने लगे—) |
सर्ग ५ ] सुन्दरकाण्ड २२७
[संस्कृत श्लोक]
शब्देनैव विजानीमः कृतकार्यः समागतः ।
हनूमानेव पश्यध्वं वानरा वानरर्षभम् ॥१३॥
एवं ब्रुवत्सु वीरेषु वानरेषु स मारुतिः ।
अवतीर्य गिरेर्मूर्ध्नि वानरानिदमब्रवीत् ॥१४॥
दृष्टा सीता मया लङ्का धर्षिता च सकानना ।
सम्भाषितो दशग्रीवस्ततोऽहं पुनरागतः ॥१५॥
इदानीमेव गच्छामो रामसुग्रीवसन्निधिम् ।
इत्युक्ता वानराः सर्वे हर्षेणालिङ्ग्य मारुतिम् ॥१६॥
केचिच्चुचुम्बुर्लाङ्गूलं ननृतुः केचिदुत्सुकाः ।
हनूमता समेतास्ते जग्मुः प्रस्रवणं गिरिम् ॥१७॥
गच्छन्तो ददृशुर्वीरा वनं सुग्रीवरक्षितम् ।
मधुसंज्ञं तदा प्राहुरङ्गदं वानरर्षभाः ॥१८॥
क्षुधिताः स्मो वयं वीर देह्यनुज्ञां महामते ।
भक्षयामः फलान्यद्य पिवामोऽमृतवन्मधु ॥१९॥
सन्तुष्टा राघवं द्रष्टुं गच्छामोऽद्यैव सानुजम् ॥२०॥
अङ्गद उवाच
हनूमान्कृतकार्योऽयं पिवतैतत्प्रसादतः ।
जक्षध्वं फलमूलानि त्वरितं हरिसत्तमाः ॥२१॥
ततः प्रविश्य हरयः पातुमारभिरे मधु ।
रक्षिणस्ताननादृत्य दधिमुखेन नोदितान् ॥२२॥
पिवतस्ताडयामासुर्वानरान्वानरर्षभाः ।
ततस्तान्मुष्टिभिः पादैश्चूर्णयित्वा पपुर्मधु ॥२३॥
ततो दधिमुखः क्रुद्धः सुग्रीवस्य स मातुलः ।
जगाम रक्षिभिः सार्धं यत्र राजा कपीश्वरः ॥२४॥
गत्वा तमब्रवीद्देव चिरकालाभिरक्षितम् ।
नष्टं मधुवनं तेऽद्य कुमारेण हनूमता ॥२५॥
श्रुत्वा दधिमुखेनोक्तं सुग्रीवो हृष्टमानसः ।
[हिन्दी अनुवाद]
"इस सिंहनादसे ही मालूम होता है कि हनुमान्जी कार्य सिद्ध करके लौटे हैं । हे वानरगण ! देखो, देखो, ये कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी ही तो हैं" ॥१३॥ वानर वीरोंके इस प्रकार कहते-कहते हनुमान्जी उस गिरिशिखरपर उतर आये और उनसे यों कहने लगे ॥१४॥ "मैने सीताजीको देखा, अशोकवनसहित लंकाका विध्वंस किया और रावणसे भी बातचीत की । उसके पश्चात् मैं यहाँ आया हूँ ॥१५॥ अब हम इसी समय राम और सुग्रीवके पास चलेंगे ।" हनुमान्जीके इस प्रकार कहनेपर सब वानरोंने अत्यन्त हर्षसे उन्हें गले लगाया, किन्हींने उनकी पूँछ चूमीं और कोई अति उत्साहसे नाचने लगे । तदनन्तर हनुमान्जीके साथ वे सब प्रस्रवण पर्वतपर गये ॥१६-१७॥
जिस समय वे वीर वानरगण जा रहे थे उनकी दृष्टि सुग्रीवद्वारा सुरक्षित मधुवनपर पड़ी । उसे देखकर वे अंगदजीसे बोले ॥१८॥ "हे वीर ! हमें बड़ी भूख लगी है । अतः हे महामते ! हमें आज्ञा दीजिये जिससे आज हम इस वनके फल खाकर अमृततुल्य मधु पियें ॥१९॥ उसके पश्चात् हम तृप्त होकर भाई लक्ष्मणसहित रघुनाथजीके दर्शन करनेके लिये चलेंगे" ॥२०॥
अंगदजी बोले—हनुमान्जीने कार्य सिद्ध किया है, अतः हे वानरश्रेष्ठगण ! इनकी कृपासे तुम शीघ्र ही फल-मूल खाओ और मधु-पान करो ॥२१॥
अंगदजीकी आज्ञा पा वानरगण उस वनमें घुसकर दधिमुखके भेजे हुए वनरक्षकोंकी उपेक्षाकर मधु पीने लगे ॥२२॥ जब उन वानरोंने उन्हें मधुपान करते देखकर मारा तो वे उन्हें लात और घूँसोंसे कुचलकर मधु पीते रहे ॥२३॥ तब सुग्रीवका मामा दधिमुख अन्य वनरक्षकोंके साथ अति क्रुद्ध हो जहाँ वानरराज सुग्रीव थे वहाँ गया ॥२४॥ वहाँ पहुँचकर वह बोला—"राजन् ! तुमने चिरकालसे जिस मधुवनकी रक्षा की थी उसे आज युवराज अंगद और हनुमान्ने उजाड़ डाला" ॥२५॥ दधिमुखकी बात सुनकर सुग्रीव प्रसन्न होकर कहने लगे—"इसमें सन्देह नहीं पवनकुमार सीताजीको देख आये
२२८ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५
दृष्ट्वाऽऽगतो न सन्देहः सीतां पवननन्दनः ॥२६॥
नो चेन्मधुवनं द्रष्टुं समर्थः को भवेन्मम ।
तत्रापि वायुपुत्रेण कृतं कार्यं न संशयः ॥२७॥
श्रुत्वा सुग्रीववचनं हृष्टो रामस्तमब्रवीत् ।
किमुच्यते त्वया राजन्यचः सीताकथान्वितम् ॥२८॥
सुग्रीवस्त्वब्रवीद्वाक्यं देव दृष्टाऽवनीसुता ।
हनूमत्प्रमुखाः सर्वे प्रविष्टा मधुकाननम् ॥२९॥
भक्षयन्ति स्म सकलं ताडयन्ति स्म रक्षिणः ।
अकृत्वा देवकार्यं ते द्रष्टुं मधुवनं मम ॥३०॥
न समर्थास्ततो देवी दृष्टा सीतेति निश्चितम् ।
रक्षिणो वो भयं माऽस्तु गत्वा ब्रूत ममाज्ञया ॥३१॥
वानरानङ्गदप्रमुखानिनयध्वं ममान्तिकम् ।
श्रुत्वा सुग्रीववचनं गत्वा ते वायुवेगतः ॥३२॥
हनुमत्प्रमुखानुचुर्गच्छतेश्वरशासनात् ।
द्रष्टुमिच्छति सुग्रीवः सरामो लक्ष्मणान्वितः ॥३३॥
युष्मानतीव हृष्टास्ते त्वरयन्ति महाबलाः ।
तथेत्यम्बरमासाद्य ययुस्ते वानरोत्तमाः ॥३४॥
हनूमन्तं पुरस्कृत्य युवराजं तथाऽङ्गदम् ।
रामसुग्रीवयोग्रे निपेतुर्भुवि सत्वरम् ॥३५॥
हनूमान् राघवं प्राह दृष्टा सीता निरामया ।
साष्टाङ्गं प्रणिपत्याग्रे रामं पश्चाद्धरीश्वरम् ॥३६॥
कुशलं प्राह राजेन्द्र जानकी त्वां शुचान्विता ।
अशोकवनिकामध्ये शिंशपामूलमाश्रिता ॥३७॥
राक्षसीभिः परिवृता निराहारा कृशा प्रभो ।
हा राम राम रामेति शोचन्ती मलिनाम्बरा ॥३८॥
एकवेणी मया दृष्टा शनैराश्वासिता शुभा ।
हैं; नहीं तो, मेरे मधुवनकी ओर देखनेकी भला किसे सामर्थ्य थी ? और उनमें भी निस्सन्देह यह कार्य किया हनुमान्जीने ही है"॥ २६-२७ ॥
सुग्रीवके वचन सुनकर भगवान् रामने प्रसन्न हो उनसे पूछा—"राजन् ! यह सीता-सम्बन्धी तुम क्या बात कह रहे हो ?" ॥ २८ ॥ सुग्रीवने कहा—"भगवन् ! मालूम होता है भूमिसुता जानकीजीका पता लग गया है, क्योंकि हनुमान् आदि समस्त वानरगण मधुवनमें घुसकर उसके फल खा रहे हैं और उसके रक्षकोंको मारते हैं। बिना आपका कार्य किये तो वे मेरे मधुवनकी ओर देख भी नहीं सकते थे। अतः यह निश्चय होता है कि वे देवी जानकीजीसे मिल आये हैं। रक्षको ! तुम डरो मत, उन्हें जाकर मेरी आज्ञा सुनाओ और उन अंगदादि वानरोंको मेरे पास ले आओ।" सुग्रीवकी आज्ञा सुनकर वे वायुवेग से चले और हनुमान् आदिसे कहा—"महाराजकी आज्ञा है, आपलोग तुरन्त वहाँ जाइये क्योंकि राम और लक्ष्मणके सहित महाराज सुग्रीव आपलोगोंसे मिलना चाहते हैं। हे महावीरगण ! आपलोगोंसे प्रसन्न होकर वे आपको बहुत शीघ्र बुला रहे हैं।" तब वे वानरश्रेष्ठ 'बहुत अच्छा' कह आकाशमें चढ़कर चलने लगे। वे सब वानरगण हनुमान् और युवराज अंगदको आगे कर चले और तुरन्त ही राम और सुग्रीवके सामने पृथिवीपर उतर आये ॥ २९–३५ ॥
हनुमान्जीने पहले श्रीरघुनाथजीको और फिर वानरराज सुग्रीवको साष्टाङ्ग प्रणाम कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"मैं सीताजीको सकुशल देख आया हूँ ॥ ३६ ॥ हे राजेन्द्र ! शोकमग्ना जानकीजीने आपको अपना कुशल-समाचार सुनानेके लिये कहा है। वे अशोक-वाटिकाके बीचमें शिंशपा वृक्षके तले बैठी हैं, और हे प्रभो ! सदा राक्षसियोंसे घिरी रहती हैं, अन्न-जल छोड़ देनेके कारण वे अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं, और निरन्तर 'हा राम ! हा राम !' कहकर शोक करती रहती हैं, उनके वस्त्र मलिन हो गये हैं तथा बालोंकी मिलकर एक वेणी हो गयी है—ऐसी अवस्था-
सर्ग ५ ] सुन्दरकाण्ड २२९
[ संस्कृत मूल ]
वृक्षशाखान्तरे स्थित्वा सूक्ष्मरूपेण ते कथाम् ॥ ३९ ॥
जन्मारभ्य तदात्यर्थं दण्डकागमनं तथा ।
दशाननेन हरणं जानक्या रहिते त्वयि ॥ ४० ॥
सुग्रीवेण यथा मैत्री कृत्वा वालिनिबर्हणम् ।
मार्गणार्थं च वैदेह्याः सुग्रीवेण विसर्जिताः ॥ ४१ ॥
महाबला महासत्त्वा हरयो जितकाशिनः ।
गताः सर्वत्र सर्वे वै तत्रैकोऽहमिहागतः ॥ ४२ ॥
अहं सुग्रीवसचिवो दासोऽहं राघवस्य हि ।
दृष्टा यज्जानकी भाग्यात्प्रयासः फलितोऽद्य मे ॥ ४३ ॥
इत्युदीरितमाकर्ण्य सीता विस्फारितेक्षणा ।
केन वा कर्णपीयूषं श्रावितं मे शुभाक्षरम् ॥ ४४ ॥
यदि सत्यं तदायातु मदर्शनपथं तु सः ।
ततोऽहं वानराकारः सूक्ष्मरूपेण जानकीम् ॥ ४५ ॥
प्रणम्य प्राञ्जलिर्भूत्वा दूरादेव स्थितः प्रभो ।
पृष्टोऽहं सीतया कस्त्वमित्यादि बहुविस्तरम् ॥ ४६ ॥
मया सर्वं क्रमेणैव विज्ञापितमरिन्दम ।
पश्चान्मयार्पितं देव्यै भवद्दत्ताङ्गुलीयकम् ॥ ४७ ॥
तेन मामतिविश्वस्ता वचनं चेदमब्रवीत् ।
यथा दृष्टोऽस्मि हनुमन्पीड्यमाना दिवानिशम् ४८
राक्षसीनां तर्जनैस्तत्सर्वं कथय राघवे ।
मयोक्तं देवि रामोऽपि त्वच्चिन्तापरिनिष्ठितः ॥ ४९ ॥
परिशोचत्यहोरात्रं त्वद्वार्ता नाधिगम्य सः ।
इदानीमेव गत्वाऽहं स्थितिं रामाय ते ब्रुवे ॥ ५० ॥
रामः श्रवणमात्रेण सुग्रीवेण सलक्ष्मणः ।
वानरानीकपः सार्धमागमिष्यति तेऽन्तिकम् ॥ ५१ ॥
रावणं सकुलं हत्वा नेष्यति त्वां स्वकं पुरम् ।
अभिज्ञां देहि मे देवि यथा मां विश्वसेद्विभुः ॥ ५२ ॥
इत्युक्ता सा शिरोरत्नं चूडापाशे स्थितं प्रियम् ।
[ हिन्दी अनुवाद ]
में मैंने सीताजीको देखा और धीरे-धीरे उन्हें ढाँढ़स-बँधाया। वहाँ जाकर पहले मैंने सूक्ष्मरूपसे वृक्षके पत्तोंमें छिपे-छिपे संक्षेपमें आपकी सब कथा सुनायी, जिस प्रकार जन्मसे लेकर आपका दण्डकारण्यमें आना हुआ, आपकी अनुपस्थितिमें रावणने सीताजीको हरा, तथा जिस प्रकार सुग्रीवसे मित्रता कर आपने वालीको मारा— (वह सब सुनाकर फिर मैंने कहा कि) सुग्रीवद्वारा सीताजीकी खोजके लिये भेजे हुए बड़े बलवान्, पराक्रमी और विजयशाली वानरगण सब दिशाओंमें गये हैं और उनमेंसे एक मैं सुग्रीवका मन्त्री और रघुनाथजीका दास यहाँ आया हूँ। आज भाग्यवश मैने जानकीजीको देख लिया अतः मेरा प्रयास सफल हो गया ॥ ३७–४३ ॥
"मेरा यह कथन सुनकर सीताजीके नेत्र खिल गये और वे कहने लगीं— 'मुझे ये कर्णामृतरूप शुभ संवाद किसने सुनाया है? यदि यह सब सत्य है (—मुझे भ्रम नहीं हुआ है) तो इस संवादको सुनानेवाला मेरे सामने आवे।' हे प्रभो! तब मैं सूक्ष्मरूपसे बन्दरके आकारमें उनके सामने उपस्थित हुआ और दूरहीसे प्रणाम कर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब जानकीजीने मुझसे 'तुम कौन हो?' इत्यादि बहुत-सी बातें पूछीं ॥ ४४–४६ ॥ और हे शत्रुदमन! मैंने उन्हें क्रमशः सब बातें बतला दीं। इसके पश्चात् मैंने उन्हें आपकी दी हुई अँगूठी निवेदन की ॥ ४७ ॥ इससे उन्हें मुझपर पूर्ण विश्वास हो गया और वे मुझसे इस प्रकार कहने लगीं— 'हनुमन्! जिस प्रकार इन राक्षसियोंके त्राससे तुमने मुझे अहर्निश दुःख उठाते देखा है वह सब ज्यों-का-त्यों रघुनाथजीको सुना देना।' मैंने कहा— 'देवि! रघुनाथजी भी तुम्हारी ही चिन्तासे ग्रस्त रहते हैं, और तुम्हारा समाचार न मिलनेसे रात-दिन तुम्हारी ही चिन्ता करते रहते हैं। मैं अभी जाकर उन्हें तुम्हारी स्थिति सुनाऊँगा ॥ ४८–५० ॥ और रघुनाथजी उसे सुनते ही सुग्रीव, लक्ष्मण और अन्यान्य वानर सेनापतियोंके साथ तुम्हारे पास आयेंगे ॥ ५१ ॥ तथा रावणको कुटुम्बसहित मारकर तुम्हें अपनी राजधानी अयोध्याको ले जायेंगे। हे देवि! तुम मुझे कोई ऐसा चिह्न दो जिससे भगवान् मेरा विश्वास करें' ॥ ५२ ॥ मेरे इस प्रकार कहनेपर उन्होंने अपने केशपाशमें स्थित अपनी प्रिया चूडामणि दी और पहले
| २३० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
|---|
दत्त्वा काकेन यद्वृत्तं चित्रकूटगिरौ पुरा ॥५३॥
तदप्याहाश्रुपूर्णाक्षी कुशलं ब्रूहि राघवम् ।
लक्ष्मणं ब्रूहि मे किञ्चिद्दुरुक्तं भाषितं पुरा ॥५४॥
तत्क्षमस्वाज्ञभावेन भाषितं कुलनन्दन ।
तारयेन्मां यथा रामस्तथा कुरु कृपान्वितः ॥५५॥
इत्युक्त्वा रुदती सीता दुःखेन महताऽऽवृता ।
मयाऽप्याश्वासिता राम वदता सर्वमेव ते ॥५६॥
ततः प्रस्थापितो राम त्वत्समीपमिहागतः ।
तदागमनवेलायामशोकवनिकां प्रियाम् ॥५७॥
उत्पाट्य राक्षसांस्तत्र बहून्हत्वा क्षणादहम् ।
रावणस्य सुतं हत्वा रावणेनाभिभाष्य च ॥५८॥
लङ्कामशेषतो दग्ध्वा पुनरप्यगमं क्षणात् ।
श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं रामोऽत्यन्तप्रहृष्टधीः ॥५९॥
हनूमंस्ते कृतं कार्यं देवैरपि सुदुष्करम् ।
उपकारं न पश्यामि तव प्रत्युपकारिणः ॥६०॥
इदानीं ते प्रयच्छामि सर्वस्वं मम मारुते ।
इत्यालिङ्ग्य समाकृष्य गाढं वानरपुङ्गवम् ॥६१॥
सार्द्रनेत्रो रघुश्रेष्ठः परां प्रीतिमवाप सः ।
हनूमन्तमुवाचेदं राघवो भक्तवत्सलः ॥६२॥
परिरम्भो हि मे लोके दुर्लभः परमात्मनः ।
अतस्त्वं मम भक्तोऽसि प्रियोऽसि हरिपुङ्गव ॥६३॥
यत्पादपङ्कजयुगलं तुलसीदलाद्यैः
संपूज्य विष्णुपदवीमतुलां प्रयान्ति ।
तेनैव किं पुनरसौ परिरब्धमूर्तिं
रामेण वायुतनयः कृतपुण्यपुञ्जः ॥६४॥
चित्रकूट पर्वतपर काकके साथ जो कुछ हुआ था वह सब भी सुनाया तथा नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"रघुनाथजीसे मेरी कुशल कहना और लक्ष्मणजीसे कहना कि हे कुलन्दन ! मैंने पहले तुमसे जो कुछ कठोर वचन कहे थे उन अज्ञानवश कहे हुए वाक्योंके लिये मुझे क्षमा करें। इसके सिवा जिस प्रकार रघुनाथजी कृपा करके मेरा उद्धार करें वही चेष्टा करना" ॥५३–५५॥
"ऐसा कहकर सीताजी महान् दुःखमें भरकर रोने लगीं; मैंने भी उन्हें आपका सब वृत्तान्त सुनाकर ढाँढस बँधाया और फिर उनसे विदा होकर आपके पास चला आया। आती-बार मैंने रावणकी प्रिय अशोक वाटिका उजाड़ दी और एक क्षणमें ही बहुतसे राक्षस मार डाले। रावणके पुत्रको भी मारा और रावणसे वार्तालाप कर लंकाको सब ओरसे जलाकर फिर क्षणभरमें ही यहाँ चला आया।"
हनुमान्जीके ये वचन सुन श्रीरामचन्द्रजी अति प्रसन्न होकर कहने लगे–॥५६-५९॥ "हनुमन् ! तुमने जो कार्य किया है वह देवताओंसे भी होना कठिन है, मैं इसके बदलेमें तुम्हारा क्या उपकार करूँ—सो नहीं जानता ॥६०॥ लो, मैं अभी तुम्हें अपना सर्वस्व सौंपता हूँ।" ऐसा कह उन्होंने वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीको खींचकर गाढ़ आलिङ्गन किया ॥ ६१ ॥ उनके नेत्रोंमें जल भर आया और हृदयमें परम प्रेम उमड़ने लगा। तब भक्तवत्सल रघुनाथजीने हनुमान्जीसे कहा–॥ ६२ ॥ "संसारमें मुझ परमात्माका आलिङ्गन मिलना अत्यन्त दुर्लभ है, हे वानरश्रेष्ठ ! (तुम्हें यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है) अतः तुम मेरे परम भक्त और प्रिय हो" ॥ ६३ ॥
हे पार्वति ! जिनके चरणारविन्दयुगलका तुलसीदल आदिसे पूजन कर भक्तजन अतुलनीय विष्णुपद प्राप्त करते हैं उन्हीं रामने जिनके शरीरका आलिङ्गन किया उन पवित्र कर्म करनेवाले पवनपुत्रके विषयमें क्या कहा जाय ? ॥ ६४ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
सुन्दरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
समाप्तमिदं सुन्दरकाण्डम्
युद्धकाण्ड
श्रीसीतारामाभ्यां नमः
अध्यात्मरामायण
युद्धकाण्ड
यस्यातिवीर्याम्बुधिवीचिराजौ वंश्यैरहो वैश्रवणो विलीनः ।
तं बैरिविध्वंसनशीललीलं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥
॥ श्रीराम ॥
The provided image is completely blank and does not contain any text or scripture to transcribe. Please upload a clear image of the page you would like transcribed.
राम-रावण-युद्ध
ततः पावकसङ्काशैः शरैः काञ्चनभूषणैः। अभ्यवर्षद्रणे रामो दशग्रीवं समाहितः॥ (अ० रा० युद्ध० ११।१८)