अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
सुन्दरकाण्ड - सर्ग ३: जानकीजीसे भेंट, वाटिका-विध्वंस और ब्रह्मपाश-बन्धन
सर्ग ३] सुन्दरकाण्डम् २१३
तृतीय सर्ग
जानकीजीसे भेंट, वाटिका-विध्वंस और ब्रह्मपाश-बन्धन ।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! इस प्रकार रोते-रोते सीताजीने सोचा—"अच्छा तो, मैं फाँसी लगाकर ही अपना शरीर क्यों न छोड़ दूँ ? इन राक्षिसयोंके बीचमें रहकर रघुनाथजीके बिना जीनेसे लाभ ही क्या है ? ॥ १ ॥ फाँसी लगानेके लिये मेरी लम्बी वेणी पर्याप्त होगी।" जानकीजीको इस प्रकार मरनेका निश्चय करती देख सूक्ष्मरूपधारी श्रीहनुमान्जी हृदयमें कुछ विचारकर उनके कानोंमें पड़नेयोग्य धीमी वाणीसे शनैः-शनैः इस प्रकार कहने लगे ॥ २-३ ॥ "इक्ष्वाकु-वंशमें उत्पन्न हुए अयोध्यापति महाराज दशरथ बड़े प्रतापी थे। उनके त्रिलोकीमें विख्यात चार पुत्र हुए। वे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चारों ही देवताओंके समान शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं ॥ ४-५ ॥ उनमेंसे बड़े भाई राम भ्राता लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित अपने पिताकी आज्ञासे दण्डकारण्यमें आये थे। वे महामना वहाँ गौतमी नदीके तीरपर पञ्चवटी आश्रममें रहते थे। उस आश्रमसे श्रीरामचन्द्रजीकी अनुपस्थितिमें दुरात्मा रावण महाभागा जनकनन्दिनी सीताजीको ले गया। तब अति शोकाकुल भगवान् रामने जानकीजीको इधर-उधर ढूँढ़ते हुए पृथिवीपर पड़े पक्षिराज जटायुको देखा। उसे तुरन्त ही दिव्यधाम पहुँचाकर वे ऋष्यमूक-पर्वतपर आये ॥ ६-९ ॥ वहाँ आकर आत्मदर्शी भगवान् रामने सुग्रीवसे मित्रता की और उसकी स्त्रीका हरण करनेवाले दुष्ट वालीको मारकर उसे राज्यपदपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार श्रीरघुनन्दनने मित्रका कार्य सिद्ध किया। वानरराज सुग्रीवने भी समस्त वानरोंको बुलाकर सब ओर सीताजीकी खोज करनेके लिये भेजा। उन्हींमेंसे एक मैं भी सुग्रीवका मन्त्री वानर हूँ। मैं सम्पातिके कथनानुसार सौ योजन समुद्र लाँघकर तुरन्त लङ्कापुरीमें आया और यहाँ सर्वत्र शुभलक्षणा सीताजीको ढूँढ़ा। शनैः-शनैः अशोकवाटिका में ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैंने यह शिंशपा वृक्ष देखा और यहाँ रामचन्द्रजीकी महारानी देवी |
|---|---|
| उद्बन्धनेन वा मोक्ष्ये शरीरं राघवं विना ।<br>जीवितेन फलं किं स्यान्मम रक्षोऽधिमध्यतः ॥१॥<br>दीर्घा वेणी समात्यर्थमुद्बन्धाय भविष्यति ।<br>एवं निश्चितबुद्धिं तां मरणायाथ जानकीम् ॥ २ ॥<br>विलोक्य हनुमान्किञ्चिद्विचार्यैतदभाषत ।<br>शनैः शनैः सूक्ष्मरूपो जानक्याः श्रोत्रगं वचः ॥३॥<br>इक्ष्वाकुवंशसम्भूतॊ राजा दशरथो महान् ।<br>अयोध्याधिपतिस्तस्य चत्वारो लोकविश्रुताः ॥४॥<br>पुत्रा देवसमाः सर्वे लक्षणैरुपलक्षिताः ।<br>रामश्च लक्ष्मणश्चैव भरतश्चैव शत्रुहा ॥ ५ ॥<br>ज्येष्ठो रामः पितुर्वाक्याद्दण्डकारण्यमागतः ।<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया भार्यया सह ॥ ६ ॥<br>उवास गौतमीतीरे पञ्चवट्यां महामनाः ।<br>तत्र नीता महाभागा सीता जनकनन्दिनी ॥ ७ ॥<br>रहिते रामचन्द्रेण रावणेन दुरात्मना ।<br>ततो रामोऽतिदुःखार्तो मार्गमाणोऽथ जानकीम् ॥८॥<br>जटायुषं पक्षिराजमपश्यत्पतितं भुवि ।<br>तस्मै दत्त्वा दिवं शीघ्रमृष्यमूकमुपागमत् ॥ ९ ॥<br>सुग्रीवेण कृता मैत्री रामस्य विदितात्मनः ।<br>तद्भार्याहारिणं हत्वा वालिनं रघुनन्दनः ॥१०॥<br>राज्येऽभिषिच्य सुग्रीवं मित्रकार्यं चकार सः ।<br>सुग्रीवस्तु समानाय्य वानरान्वानरप्रभुः ॥११॥<br>प्रेषयामास परितो वानरान्परिमार्गणे ।<br>सीतायास्तत्र चैकोऽहं सुग्रीवसचिवो हरिः ॥१२॥<br>सम्पातिवचनाच्छीघ्रमुल्लङ्घ्य शतयोजनम् ।<br>समुद्रं नगरीं लङ्कां विचिन्वन् जानकीं शुभाम् ॥१३॥<br>शनैरशोकवनिकां विचिन्वन् शिंशपातरोः । |
| २१४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
|---|
अद्राक्षं जानकीमत्र शोचन्तीं दुःखसम्प्लुताम् ॥ १४ ॥
रामस्य महिषीं देवीं कृतकृत्योऽहमागतः ।
इत्युक्त्वोपररामाथ मारुतिर्बुद्धिमत्तरः ॥ १५ ॥
जानकीजीको अति क्लेशसे शोक करते पाया । इनके दर्शनसे मेरा यहाँ आना सफल हो गया ।” ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् श्रीहनुमान्जी मौन हो गये ॥ १०-१५ ॥
सीता क्रमेण तत्सर्वं श्रुत्वा विस्मयमाययौ ।
किमिदं मे श्रुतं व्योम्नि वायुना समुदीरितम् ॥ १६ ॥
स्वप्नो वा मे मनोभ्रान्तिर्यदि वा सत्यमेव तत् ।
निद्रा मे नास्ति दुःखेन जानाम्येतत्कुतो भ्रमः ॥ १७ ॥
येन मे कर्णपीयूषं वचनं समुदीरितम् ।
स दृश्यतां महाभागः प्रियवादी समाग्रतः ॥ १८ ॥
क्रमशः ये सब बातें सुनकर सीताजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे कहने लगीं, “मैने जो आकाशमें शब्द सुना है वह क्या वायुका उच्चारण किया हुआ है ? ॥ १६ ॥ अथवा स्वप्न या मेरे मनकी भ्रान्ति है ? अथवा यह सब सत्य ही तो नहीं है, क्योंकि दुःखके कारण नींद तो मुझे आती नहीं, (फिर स्वप्न कैसे हो सकता है ?) और मैं प्रत्यक्ष सुन रही हूँ इसलिये यह भ्रम भी कैसे हो सकता है ? (अतः निश्चय ही यह सब यथार्थ है) ॥ १७ ॥ सुतरां, जिसने मेरे कानोंको अमृतके समान प्रिय लगनेवाले ये वचन कहे हैं वह प्रियभाषी महाभाग मेरे सामने प्रकट हों” ॥ १८ ॥
श्रुत्वा तज्जानकीवाक्यं हनुमान्पत्रखण्डतः ।
अवतीर्य शनैः सीतापुरतः समवस्थितः ॥ १९ ॥
कलविङ्कप्रमाणाङ्गो रक्तास्यः पीतवानरः ।
ननाम शनकैः सीतां प्राञ्जलिः पुरतः स्थितः ॥ २० ॥
जानकीजीके ये वचन सुनकर हनुमान्जी शनैः-शनैः उस वृक्षके पत्र-भागसे उतरकर सीताजीके सामने खड़े हो गये ॥ १९ ॥ उस समय उन्होंने अरुण-वदन, पीतवर्ण और कलविंक (चटक) पक्षीके बराबर आकारवाले वानरके रूपसे धीमेसे सामने आकर सीताजीको हाथ जोड़कर प्रणाम किया ॥ २० ॥
दृष्ट्वा तं जानकी भीता रावणोऽयमुपागतः ।
मां मोहयितुमायातो मायया वानराकृतिः ॥ २१ ॥
इत्येवं चिन्तयित्वा सा तूष्णीमासीदधोमुखी ।
उसे देखकर जानकीजीको यह भय हुआ कि मुझे फँसानेके लिये मायासे वानररूप धारण कर यह रावण ही आया है ॥ २१ ॥ यह सोचकर वे चुपचाप नीचेको मुख किये बैठी रहीं ।
पुनरप्याह तां सीतां देवि यत्त्वं विशङ्कसे ॥ २२ ॥
नाहं तथाविधो मातस्त्यज शङ्कां मयि स्थिताम् ।
दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्य परमात्मनः ॥ २३ ॥
सचिवोऽहं हरीन्द्रस्य सुग्रीवस्य शुभप्रदे ।
वायोः पुत्रोऽहमखिलप्राणभृतस्य शोभने ॥ २४ ॥
तब हनुमान्जीने सीताजीसे फिर कहा— “देवि ! आप जैसी आशङ्का कर रही हैं मैं वह नहीं हूँ । हे मातः ! मेरे विषयमें आपको जो शङ्का हो रही है उसे दूर करें । हे शुभप्रदे ! मैं तो कोसलाधिपति परमात्मा रामका दास और वानरराज सुग्रीवका मन्त्री हूँ तथा हे शोभने ! सम्पूर्ण जगत्के प्राणस्वरूप पवनदेवका मैं पुत्र हूँ” ॥ २२-२४ ॥
तच्छ्रुत्वा जानकी प्राह हनूमन्तं कृताञ्जलिम् ।
वानराणां मनुष्याणां सङ्गतिर्घटते कथम् ॥ २५ ॥
यथा त्वं रामचन्द्रस्य दासोऽहमिति भाषसे ।
तामाह मारुतिः प्रीतो जानकीं पुरतः स्थितः ॥ २६ ॥
यह सुनकर श्रीजानकीजीने हाथ बाँधे खड़े हुए हनुमान्जीसे कहा—“तुम जो कहते हो कि मैं श्रीरामचन्द्रजीका दास हूँ, सो भला वानर और मनुष्योंकी मित्रता कैसे हो सकती है ?” तब सामने खड़े हुए हनुमान्जीने प्रसन्न होकर जानकीजीसे कहा ॥ २५-२६ ॥ “शबरीकी प्रेरणासे
सर्ग ३ ]
सुन्दरकाण्ड
२१५
| ऋष्यमूकमाद्रामः शबर्या नोदितः सुधीः।<br>सुग्रीवो ऋष्यमूकस्थो दृष्टवान् रामलक्ष्मणौ ॥२७॥ | परम बुद्धिमान् भगवान् राम ऋष्यमूक पर्वतपर आये । उस पर्वतपर बैठे हुए सुग्रीवने जब (दूरहीसे) राम और लक्ष्मणको आते देखा तो मनमें भय मानकर मुझे उनका आशय जाननेके लिये भेजा । तब मैं ब्रह्मचारीका वेष बनाकर रामजीके पास आया ॥ २७-२८ ॥ और उनका शुद्ध भाव जानकर उन्हें कन्धेपर चढ़ा सुग्रीवके पास ले गया तथा (राम और सुग्रीव) दोनोंकी मित्रता करा दी ॥ २९ ॥ सुग्रीवकी पत्नीको वालीने छीन लिया था । रघुनाथजीने उसे एक ही बाणसे मारकर सुग्रीवको वानरोंके राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया । तब सुग्रीवने आपकी खोजके लिये बड़े-बड़े वीर और पराक्रमी वानरोंको दिशा-विदिशाओंमें भेजा ॥ ३०-३१ ॥ उस समय मुझे चलता देख श्रीरघुनाथजीने मुझसे आदरपूर्वक कहा ॥ ३२॥ 'हे पवननन्दन ! मेरा सब काम तुम्हारे ऊपर निर्भर है । तुम सीताजीसे मेरी और लक्ष्मणकी सब कुशल कहना ॥ ३३ ॥ तथा अपनी पहचानके लिये मेरी यह उत्तम अँगूठी जिसपर मेरे नामके अक्षर खुदे हुए हैं, सीताजीको अति सावधानीसे दे देना' ॥ ३४ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने अपनी अँगुलीसे उतारकर वह अँगूठी मुझे दी । मैं उसे बड़ी सावधानीसे लाया हूँ । देवि ! आप यह अँगूठी देखिये" ॥ ३५ ॥ ऐसा कह हनुमान्जीने वह अँगूठी देवी जानकीजीको दे दी और नमस्कार कर हाथ जोड़े हुए दूर खड़े हो गये ॥ ३६ ॥ उस रामनामाङ्किता मुद्रिकाको देखकर सीताजी अति आनन्दित हुईं और उसे शिरसे लगाकर नेत्रोंसे आनन्दाश्रु बहाने लगीं ॥ ३७ ॥ |
| भीतो मां प्रेषयामास ज्ञातुं रामस्य हृद्गतम् ।<br>ब्रह्मचारिवपुर्धृत्वा गतोऽहं रामसन्निधिम् ॥२८॥ | |
| ज्ञात्वा रामस्य सद्भावं स्कन्धोपरि विधाय तौ ।<br>नीत्वा सुग्रीवसमीपर्य सख्यं चाकरवं तयोः ॥२९॥ | |
| सुग्रीवस्य हृता भार्या वालिना तं रघूत्तमः ।<br>जघानेकेन बाणेन ततो राज्येऽभ्यषेचयत् ॥३०॥ | |
| सुग्रीवं वानराणां स प्रेषयामास वानरान् ।<br>दिग्भ्यो महाबलान्वीरान् भवत्याः परिमार्गणे ॥३१॥ | |
| गच्छन्तं राघवो दृष्ट्वा मामभाषत सादरम् ॥३२॥ | |
| त्वयि कार्यमशेषं मे स्थितं मारुतनन्दन ।<br>ब्रूहि मे कुशलं सर्वं सीतायै लक्ष्मणस्य च ॥३३॥ | |
| अङ्गुलीयकमेतन्मे परिज्ञानार्थमुत्तमम् ।<br>सीतायै दीयतां साधु मन्नामाक्षरमुद्रितम् ॥३४॥ | |
| इत्युक्त्वा प्रददौ मह्यं कराग्रादङ्गुलीयकम् ।<br>प्रयत्नेन मयानीतं देवि पश्याङ्गुलीयकम् ॥३५॥ | |
| इत्युक्त्वा प्रददौ देव्यै मुद्रिकां मारुतात्मजः ।<br>नमस्कृत्यः स्थितो दूराद्बद्धाञ्जलिपुटो हरिः ॥३६॥ | |
| दृष्ट्वा सीता प्रमुदिता रामनामाङ्कितां तदा ।<br>मुद्रिकां शिरसा धृत्वा स्रवदानन्दनेत्रजा ॥३७॥ | |
| कपे मे प्राणदाता त्वं बुद्धिमानसि राघवे ।<br>भक्तोऽसि प्रियकारी त्वं विश्वासोऽस्ति तवैव हि ॥३८॥ | तदनन्तर वे कहने लगीं—"कपिवर ! तुम मेरे प्राणदाता हो ! तुम बड़े ही बुद्धिमान् और रघुनाथजीके भक्त तथा प्रियकारी हो । मुझे निश्चय है उनको भी तुम्हारा ही पूर्ण विश्वास है ॥ ३८ ॥ यदि ऐसा न होता तो तुम पर-पुरुषको वे मेरे पास क्यों भेजते ? हनूमन् ! मेरी सारी आपदाएँ तुमने देख ही ली हैं ॥ ३९ ॥ रामको ये सब बातें सुना देना जिससे उन्हें मुझपर दया |
| नो चेन्मत्सन्निधिं चान्यं पुरुषं प्रेषयेत्कथम् ।<br>हनूमन्दृष्टमखिलं मम दुःखादिकं त्वया ॥३९॥ | |
| सर्वं कथय रामाय यथा मे जायते दया ।<br>मासद्वयावधि प्राणाः स्थास्यन्ति मम सत्तम ॥४०॥ |
| २१६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ३ |
|---|
नागमिष्यति चेद्रामो भक्षयिष्यति मां खलः।<br>अतः शीघ्रं कपीन्द्रेण सुग्रीवेण समन्वितः ॥४१॥<br>वानरानीकपैरः सार्धं हत्वा रावणमाहवे।<br>सपुत्रं सबलं रामो यदि मां मोचयेत्प्रभुः ॥४२॥<br>तत्तस्य सदृशं वीर्यं वीर वर्ण्यं वर्णितम्।<br>यथा मां तारयेद्रामो हत्वा शीघ्रं दशाननम् ॥४३॥<br>तथा धत्स्व हनुमन्वाचा धर्ममवाप्नुहि। | उत्पन्न हो। हे साधुश्रेष्ठ ! अब मेरे प्राण दो ही मास और रहेंगे ॥४०॥ यदि इस बीचमें रघुनाथजी न आये तो यह दुष्ट मुझे खा जायगा। अतः यदि भगवान् राम वानरराज सुग्रीवके सहित अन्य वानर-यूथपोंको लेकर तुरन्त ही रावणको पुत्र और सेनाके सहित संग्राममें मारकर मुझे छुड़ायेंगे तो ही उनका यह पुरुषार्थ ठीक होगा। और तभी तुम इस वर्णन-किये पुरुषार्थका वर्णन करना। हे हनुमन् ! तुम भी ऐसी युक्तिसे उनसे सब बातें कहना जिससे वे शीघ्र ही रावणको मारकर मेरा उद्धार करें। ऐसा करके तुम भी वाचिक पुण्य प्राप्त करो।”
हनूमानपि तामाह देवि दृष्टो यथा मया ॥४४॥<br>रामः सलक्ष्मणः शीघ्रमागमिष्यति सायुधः।<br>सुग्रीवेण ससैन्येन हत्वा दशमुखं बलात् ॥४५॥<br>समानेष्यति देवि त्वामयोध्यां नात्र संशयः। | तब हनुमान्जीने उनसे कहा—“देवि ! मैंने जैसा कुछ देखा है उससे तो यही प्रतीत होता है कि लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही अस्त्र-शस्त्र लेकर सेनायुक्त सुग्रीवके सहित आयेंगे और रावणको बलपूर्वक मारकर तुम्हें अयोध्या ले जायेंगे। देवि ! इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है।”
तमाह जानकी रामः कथं वारिधिमाततम् ॥४६॥<br>तीर्त्वाऽऽयास्यत्यमेयात्मा वानरानीकपैरः सह। | इसपर जानकीजी कहने लगीं, “भगवान् राम् अमेयात्मा हैं, (उनके शरीरका कोई माप नहीं है, वे सर्वव्यापक हैं) किन्तु वानर-यूथपोंके साथ वे किस प्रकार समुद्रको पार करके यहाँ आयेंगे?”
हनूमानाह मे स्कन्धावारुह्य पुरुषर्षभौ ॥४७॥<br>आयास्यतः ससैन्यश्च सुग्रीवो वानरेश्वरः।<br>विहायसा क्षणेनैव तीर्त्वा वारिधिमाततम् ॥४८॥<br>निर्दहिष्यति रक्षौघांस्त्वत्कृते नात्र संशयः।<br>अनुज्ञां देहि मे देवि गच्छामि त्वरयान्वितः॥४९॥<br>द्रष्टुं रामं सह भ्रात्रा त्वरयामि तवान्तिकम्।<br>देवि किञ्चिदभिज्ञानं देहि मे येन राघवः ॥५०॥<br>विश्वसेन्मां प्रयत्नेन ततो गन्ता समुत्सुकः। | हनुमान्जी बोले—“वे दोनों नरश्रेष्ठ मेरे कन्धों-पर चढ़कर आयेंगे और वानरराज सुग्रीव सेनासहित इस विस्तीर्ण समुद्रको आकाश-मार्गसे एक क्षणमें पार-कर तुम्हें प्राप्त करनेके लिये सम्पूर्ण राक्षस-समूहको भस्म कर डालेंगे। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। हे देवि ! अब मुझे आज्ञा दो; मैं अभी-अभी अनुज-सहित भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये जाता हूँ और उन्हें तुरन्त तुम्हारे पास लानेका प्रयत्न करता हूँ। देवि ! मुझे कोई ऐसा चिह्न दो जिससे श्रीरघुनाथजी मेरा विश्वास करें। उसे लेकर मैं बड़ी सावधानीसे उत्सुकतापूर्वक उनके पास जाऊँगा।”
ततः किञ्चिद्विचार्याथ सीता कमललोचना ॥५१॥<br>विमुच्य केशपाशान्ते स्थितं चूडामणिं ददौ।<br>अनेन विश्वसेद्रामस्त्वां कपीन्द्र सलक्ष्मणः ॥५२॥<br>अभिज्ञानार्थमन्यच्च वदामि तव सुव्रत। | तब कमललोचना सीताजीने कुछ सोच-विचारकर अपने केशपाशमें स्थित चूडामणिको निकाला और उसे हनुमान्जीको देकर कहा—“हे कपिवर ! इससे भगवान् राम और लक्ष्मण तुम्हारा विश्वास करेंगे॥४१-५२॥ हे सुव्रत ! उनको विश्वास दिलानेके
सर्ग ३ ] | सुन्दरकाण्ड | २१७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्रकूटगिरौ पूर्वमेकदा रहसि स्थितः ।<br>मदङ्के शिर आधाय निद्राति रघुनन्दनः ॥५३॥<br>ऐन्द्रः काकस्तदाऽऽगत्य नखैस्तुण्डेन चासकृत् ।<br>मत्पादाङ्गुष्ठमारक्तं विददारामिषाशया ॥५४॥<br>ततो रामः प्रबुद्ध्याथ दृष्ट्वा पादं कृतव्रणम् ।<br>केन भद्रे कृतं चैतद्विप्रियं मे दुरात्मना ॥५५॥<br>इत्युक्त्वा पुरतोऽपश्यद्वायसं मां पुनः पुनः ।<br>अभिद्रवन्तं रक्ताक्तनखतुण्डं चुकोप ह ॥५६॥<br>तृणमेकमुपादाय दिव्यास्त्रेणाभियोज्य तत् ।<br>चिक्षेप लीलया रामो वायसोपरि तज्ज्वलन्॥५७॥<br>अभ्यद्रवद्वायसञ्च भीतो लोकान् भ्रमन्पुनः ।<br>इन्द्रब्रह्मादिभिश्चापि न शक्यो रक्षितुं तदा ॥५८॥<br>रामस्य पादयोरग्रेऽपतद्भीत्या दयानिधेः ।<br>शरणागतमालोक्य रामस्तमिदमब्रवीत् ॥५९॥<br>अमोघमेतदस्त्रं मे दत्त्वैकाक्षमतो व्रज ।<br>सव्यं दत्त्वा गतः काक एवं पौरुषवानपि ॥६०॥<br>उपेक्षते किमर्थं मामिदानीं सोऽपि राघवः । | लिये एक बात और बतलाती हूँ—एक दिन चित्रकूट पर्वतपर श्रीरघुनाथजी एकान्तमें मेरी गोदमें शिर रखे सो रहे थे ॥५३॥ इसी समय इन्द्रका पुत्र (जयन्त) काक-वेषमें वहाँ आया और मांसके लोभसे मेरे पैरके लाल-लाल अँगूठेको अपनी चोंच तथा पञ्जोंसे फाड़ डाला ॥५४॥ तदनन्तर जब श्रीरामचन्द्रजी जागे तो मेरे पैरमें घाव हुआ देखकर बोले—“प्रिये ! किस दुरात्माने मेरा यह अप्रिय किया है ?” ॥५५॥ वे यह कह ही रहे थे कि उन्होंने अपने सामने उस कौएको बारम्बार मेरी ओर आते देखा । उसकी चोंच और पञ्जे रुधिरसे सने हुए थे। उसे देखकर उन्हें बड़ा क्रोध हुआ ॥५६॥ उन्होंने तुरन्त ही एक तृण उठाकर उसपर दिव्यास्त्रका प्रयोग किया और उसे लीलासे ही उस कौएकी ओर फेंक दिया । उसके तापसे सन्तप्त हो वह काक भयभीत होकर त्रिलोकीमें भटकता फिरा किन्तु जब इन्द्र, ब्रह्मा आदिसे भी उसकी रक्षा न हो सकी तो बहुत ही डरता-डरता दयानिधान भगवान् रामके चरणोंमें गिरा । उसे शरणागत देख श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा—॥५७–५९॥ “मेरा यह अस्त्र अमोघ है। (यह कभी व्यर्थ नहीं जा सकता)। अतः तू केवल अपनी एक आँख देकर यहाँसे चला जा। तब वह काक अपनी बायीं आँख देकर चला गया। जो ऐसे पुरुषार्थी हैं वे ही श्रीरघुनाथजी न जाने इस समय क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ?” |
| हनूमानपि तामाह श्रुत्वा सीतानुभाषितम् ॥६१॥<br>देवि त्वां यदि जानाति स्थितामत्र रघूत्तमः ।<br>करिष्यति क्षणाद्भस्म लङ्कां राक्षसमण्डिताम्॥६२॥ | सीताजीका यह कथन सुनकर हनुमान्जीने कहा—<br>“देवि ! जिस समय श्रीरघुनाथजीको तुम्हारे यहाँ होनेका पता चलेगा उस समय इस राक्षस-मण्डल-मण्डिता लंकाको वे एक क्षणमें ही भस्म कर डालेंगे” ॥६०-६२॥ |
| जानकी प्राह तं वत्स कथं त्वं योत्स्यसेऽसुरैः ।<br>अतिसूक्ष्मवपुः सर्वे वानराश्च भवादृशाः ॥६३॥ | जानकीजीने कहा—"वत्स ! तुम अत्यन्त सूक्ष्म शरीरवाले हो, अतः राक्षसोंसे कैसे लड़ सकोगे ? और सब वानर भी तो तुम्हारे ही समान होंगे ? ॥६३॥ |
| श्रुत्वा तद्वचनं देव्यै पूर्वरूपमदर्शयत् ।<br>मेरुमन्दरसङ्काशं रक्षोगणविभीषणम् ॥६४॥<br>दृष्ट्वा सीता हनूमन्तं महापर्वतसन्निभम् । | देवी जानकीजीके ये वचन सुनकर हनुमान्जीने उन्हें अपना पूर्वरूप दिखलाया। जो मेरु और मन्दर पर्वतके समान अति विशाल और राक्षसोंको भय उत्पन्न करनेवाला था ॥६४॥ हनुमान्जीको महापर्वतके समान विशालकाय देखकर सीताजीको अपार |
| २१८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
|---|
| हर्षेण महताऽऽविष्टा प्राह तं कपिकुञ्जरम् ॥६५॥ | आनन्द हुआ और वे उन कपिश्रेष्ठसे कहने लगीं—॥ ६५ ॥ “हे महासत्त्व ! तुम बड़े ही सामर्थ्यवान् |
| समर्थोऽसि महासत्त्व द्रक्ष्यन्ति त्वां महाबलम् । | हो; अच्छा, अब तुम शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीके पास |
| राक्षस्यस्ते शुभः पन्था गच्छ रामान्तिकं द्रुतम् ॥६६॥ | जाओ । हे महावीर ! तुम्हें राक्षसियाँ देख लेंगी, (अतः अब तुम जाओ ) तुम्हारा मार्ग कल्याण- |
| बुभुक्षितः कपिः प्राह दर्शनात्पारणं मम । | मय हो ॥ ६६ ॥ हनुमान्जीको भूख लगी हुई थी । |
| भविष्यति फलैः सर्वैस्तव दृष्टौ स्थितैर्हि मे ॥६७॥ | वे बोले—“देवि ! आपका दर्शन कर अब मुझे आपके सामने लगे हुए फलोंसे पारण करनेकी इच्छा होती |
| तथेत्युक्तः स जानक्या भक्षयित्वा फलं कपिः । | है” ॥ ६७ ॥ तब जानकीजीके ‘बहुत अच्छा’ कहने- |
| ततः प्रस्थापितोऽगच्छज्जानकीं प्रणिपत्य सः । | पर कपिवरने वे फल खाये और उनके विदा करनेपर |
| किञ्चिद्दूरमथो गत्वा खात्मन्येवान्वचिन्तयत् ॥६८॥ | उन्हें प्रणाम करके चल दिये । फिर कुछ दूर चलनेपर उन्होंने अपने मनमें सोचा ॥ ६८ ॥ ‘जो दूत अपने |
| कार्यार्थमागतो दूतः स्वामिकार्याविरोधतः । | स्वामीके कार्यके लिये आकर उसमें किसी प्रकारका |
| अन्यत्किञ्चिदसम्पाद्य गच्छत्यधम एव सः ॥६९॥ | विघ्न न करनेवाला कोई और कार्य न करके यों ही चला जाता है वह अधम ही है ॥ ६९ ॥ अतः |
| अतोऽहं किञ्चिदन्यच्च कृत्वा दृष्ट्वाऽथ रावणम् । | मैं कुछ और भी करूँगा और रावणसे मिलकर |
| सम्भाष्य च ततो रामदर्शनार्थं व्रजाम्यहम् ॥७०॥ | तथा बातचीत कर फिर श्रीरघुनाथजीके दर्शनार्थ जाऊँगा” ॥ ७० ॥ |
| इति निश्चित्य मनसा वृक्षखण्डान्महाबलः । | मनमें ऐसा निश्चय कर महाबली हनुमान्जीने वृक्षों- |
| उत्पाट्याशोकवनिकां निर्वृक्षामकरोत्क्षणात् ॥७१॥ | को उखाड़कर अशोकवाटिकाको एक क्षणमें ही वृक्षहीन कर दिया ॥ ७१ ॥ जिसके नीचे श्रीसीताजी |
| सीताऽऽश्रयनगं त्यक्त्वा वनं शून्यं चकार सः । | बैठी थीं उस वृक्षको छोड़कर शेष समस्त वाटिकाको |
| उत्पाटयन्तं विपिनं दृष्ट्वा राक्षस्योषितः ॥७२॥ | उन्होंने उजाड़ डाला । उन्हें वन उजाड़ते देख |
| अपृच्छन् जानकीं कोऽसौ वानराकृतिरुद्भटः ॥७३॥ | राक्षसियोंने जानकीजीसे पूछा, “यह वानराकार विकट वीर कौन है ?” ॥ ७२-७३ ॥ |
| जानक्युवाच | जानकीजी बोलीं— इस राक्षसी मायाको आप ही |
| भवत्य एव जानन्ति मायां राक्षवनिर्मिताम् । | लोग जानें। दुःख और शोकसे आतुर मैं यह क्या जानूँ ? |
| नाहमेनं विजानामि दुःखशोकसमाकुला ॥७४॥ | ॥ ७४ ॥ जानकीजीके इस प्रकार कहनेपर भयपीडिता |
| इत्युक्तास्त्वरितं गत्वा राक्षस्यो भयपीडिताः । | राक्षसियोंने रावणके पास जा उसे हनुमान्जीकी सारी |
| हनूमता कृतं सर्वं रावणाय न्यवेदयन् ॥७५॥ | करतूत कह सुनायी ॥७५॥ वे कहने लगीं— “देव ! एक |
| देव कश्चिन्महासत्त्वो वानराकृतिदेहभृत् । | बड़े पराक्रमी वानराकार प्राणीने सीताजीसे सम्भाषण |
| सीतया सह सम्भाष्य ह्यशोकवनिकां क्षणात् । | कर एक क्षणमें ही सारी अशोकवाटिका उजाड़ दी |
| उत्पाट्य चैत्यप्रासादं बभञ्जामितविक्रमः ॥७६॥ | है। उस महापराक्रमीने मन्दिरके प्रासादको भी तोड़ डाला और उसके सब रक्षकोंको मारकर इस समय |
| प्रासादरक्षिणः सर्वान्हत्वा तत्रैव तस्थिवान् । | भी वह वहीं बैठा हुआ है ।” वनविध्वंसका यह महान् |
| तच्छ्रुत्वा तूर्णमुत्थाय वनभङ्गं महाऽप्रियम् ॥७७॥ | अप्रिय समाचार सुनकर राक्षसराज रावण तुरन्त उठा |
| सर्ग ३] | सुन्दरकाण्ड | २१९ |
|---|
| किङ्करान्प्रेषयामास नियुतं राक्षसाधिपः ।<br>निर्भयश्चैत्यप्रासादप्रथमन्तरसंस्थितः ॥७८॥<br>हनुमान्पर्वताकारो लोहस्तम्भकृतायुधः ।<br>किञ्चिल्लाङ्गूलचलनो रक्तास्यो भीषणाकृतिः ॥७९॥<br>आपतन्तं महासङ्घं राक्षसानां ददर्श सः ।<br>चकार सिंहनादं च श्रुत्वा ते मुमुहुर्भृशम् ॥८०॥<br>हनूमन्तमथो दृष्ट्वा राक्षसा भीषणाकृतिम् ।<br>निजघ्नुर्विविधास्त्रौधैः सर्वराक्षसघातिनम् ॥८१॥<br>तत उत्थाय हनुमान्मुद्गरेण समन्ततः ।<br>निष्पिपेप क्षणादेव मशकानिव यूथपः ॥८२॥<br>निहतान्किङ्करान् श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः।<br>पञ्च सेनापतींस्तत्र प्रेषयामास दुर्मदान् ॥८३॥<br>हनूमानपि तान्सर्वांल्लोहस्तम्भेन चाहनत् ।<br>ततः क्रुद्धो मन्त्रिसुतान्प्रेषयामास सप्त सः ॥८४॥<br>आगतानपि तान्सर्वान्पूर्ववद्वानरेश्वरः ।<br>क्षणान्निःशेषतः हत्वा लोहस्तम्भेन मारुतिः॥८५॥<br>पूर्वस्थानमुपाश्रित्य प्रतीक्षन् राक्षसान् स्थितः ।<br>ततो जगाम बलवान्कुमारोऽक्षः प्रतापवान् ॥८६॥<br>तमुत्पपात हनुमान् दृष्ट्वाऽऽकाशे समुद्गरः ।<br>गगनात्त्वरितो मूर्ध्नि मुद्गरेण व्यताडयत् ॥८७॥<br>हत्वा तमक्षं निःशेषं बलं सर्वं चकार सः ॥८८॥<br>ततः श्रुत्वा कुमारस्य वधं राक्षसपुङ्गवः ।<br>क्रोधेन महताऽऽविष्ट इन्द्रजेतारमब्रवीत् ॥८९॥<br>पुत्र गच्छाम्यहं तत्र यत्रास्ते पुत्रहा रिपुः ।<br>हत्वा तमथवा बद्ध्वा आनयिष्यामि तेऽन्तिकम् ॥<br>इन्द्रजित्पितरं प्राह त्यज शोकं महामते ।<br>मयि स्थिते किमर्थं त्वं भाषसे दुःखितं वचः ॥९१॥ | और उसने दश लाख सेवकोंको भेजा। इधर, पर्वताकार हनुमान्जी लोहेके खम्भको शस्त्ररूपसे लिये हुए उस टूटे-फूटे मन्दिरके प्रथम भागमें बैठे थे। उनकी पूँछ कुछ-कुछ हिल रही थी, तथा मुख अरुणवर्ण और आकृति भयानक थी॥ ७६-७९॥ राक्षसोंके समूहको आया देख उन्होंने घोर सिंहनाद किया, जिसे सुनकर वे सब अत्यन्त स्तब्ध हो गये॥ ८०॥ फिर सम्पूर्ण राक्षसोंको मारनेवाले भीषणाकार हनुमान्जीको देखकर राक्षसोंने उनपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र छोड़े ॥ ८१॥ तदनन्तर, यूथपति गजराज जैसे मच्छरोंको मसल डालता है वैसे ही हनुमान्जीने उठकर अपने मुद्गरसे एक क्षणमें ही सबको चारों ओरसे पीस डाला ॥ ८२॥<br><br>अपने किङ्करोंका मरण सुनकर रावण क्रोधसे पागल हो गया और उसने वहाँ पाँच बड़े बाँके सेनापतियोंको (अपनी सेनाके साथ) भेजा॥ ८३॥ हनुमान्जीने अपने लोह-स्तम्भसे तुरन्त ही उन सबको मार डाला। तब उसने अति क्रोधित होकर सात मन्त्रिपुत्रोंको भेजा॥ ८४॥ वानराधीश पवननन्दनने, वहाँ आनेपर उन सबको भी पहलेकी भाँति एक क्षणमें ही उस लोह-स्तम्भसे मार डाला॥ ८५॥ और अपने पूर्व-स्थानमें ही बैठकर अन्य राक्षसोंके आनेकी बाट देखने लगे। तब अति बलवान् और प्रतापशाली राजकुमार अक्ष आया॥ ८६॥ उसे देखकर हनुमान्जी अपना मुद्गर लेकर आकाशमें उड़ गये और बड़े वेगसे ऊपरसे ही उसके मस्तकपर मुद्गरका प्रहार किया। इस प्रकार अक्षको मारकर उसकी सेनाका भी नामो-निशान मिटा दिया॥ ८७-८८॥<br><br>राजकुमार अक्षके वधका वृत्तान्त पाकर राक्षसराज रावण अत्यन्त क्रोधमें भरकर इन्द्रजित्से बोला— "बेटा! जहाँ मेरे पुत्रका मारनेवाला मेरा शत्रु है मैं वहाँ जाता हूँ और उसे मारकर या बाँधकर तेरे पास लाता हूँ" ॥ ८९-९०॥ इन्द्रजित्ने पितासे कहा—"हे महामते! शोक न कीजिये; मेरे रहते हुए आप ऐसे दुःखमय वचन क्यों बोलते हैं?॥ ९१॥ मैं उस |