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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

युद्धकाण्ड - सर्ग १६: वानरोंकी विदा तथा ग्रन्थप्रशंसा

:३२२अध्यात्मरामायण[सर्ग १६
खे वाद्येषु ध्वनत्सु प्रमुदितहृदयै-<br>      र्देववृन्दैः स्तुवद्भि-<br>र्वर्षद्भिः पुष्पवृष्टिं दिवि मुनिनिकरै-<br>      रीड्यमानः समन्तात् ।<br>रामः श्यामः प्रसन्नस्मितरुचिरमुखः<br>      सूर्यकोटिप्रकाशः<br>सीतासौमित्रिवातात्मजमुनिहरिभिः<br>      सेव्यमानो विभाति ॥७५॥उस समय, जब कि आकाशमें बाजे बज रहे थे, देवताओंका वृन्द स्वर्गमें प्रसन्न हृदयसे स्तुति करता हुआ पुष्प बरसा रहा था तथा महर्षि-मण्डल चारों ओर स्थित होकर स्तुति कर रहा था, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान प्रसन्नतायुक्त मुसकानसे मनोहर मुखवाले श्यामसुन्दर भगवान् राम सीता, लक्ष्मण, हनुमान्, मुनिजन तथा वानरगणोंसे सेवित होकर अत्यन्त सुशोभित हुए ॥ ७५ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥


षोडश सर्ग

वानरोंकी विदा तथा ग्रन्थप्रशंसा।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
रामेऽभिषिक्ते राजेन्द्र सर्वलोकसुखावहे ।<br>वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तो महीरुहाः ॥ १ ॥हे पार्वति ! समस्त लोकोंको सुख देनेवाले राजाधिराज भगवान् रामके राज्याभिषिक्त होनेपर पृथिवी धन-धान्यसे पूर्ण हो गयी और वृक्ष फलयुक्त हो गये ॥ १ ॥
गन्धहीनानि पुष्पाणि गन्धवन्ति चकाशिरे ।<br>सहस्रशतसंख्यानां धेनूनां च गवां तथा ॥ २ ॥<br>ददौ शतवृषान्पूर्वं द्विजेभ्यो रघुनन्दनः ।<br>त्रिंशत्कोटिं सुवर्णस्य ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुनः ॥ ३ ॥तथा जो पुष्प गन्धहीन थे वे भी सुगन्धयुक्त होकर शोभा पाने लगे । श्रीरघुनाथजी-ने (राज्याभिषिक्त होकर) पहले एक लाख घोड़े, एक लाख दूध देनेवाली गौएँ और सैकड़ों बैल ब्राह्मणोंको दिये और फिर उन्हें तीस करोड़ सुवर्ण-मुद्रा दिये ॥ २-३ ॥
वस्त्राभरणरत्नानि ब्राह्मणेभ्यो मुदा तथा ।<br>सूर्यकान्तिसमप्रख्यां सर्वरत्नमयीं स्रजम् ॥ ४ ॥<br>सुग्रीवाय ददौ प्रीत्या राघवो भक्तवत्सलः ।<br>अङ्गदाय ददौ दिव्ये ह्यङ्गदे रघुनन्दनः ॥ ५ ॥तत्पश्चात् उन्होंने प्रसन्न होकर नाना प्रकारके वस्त्र, आभूषण और रत्नादि भी ब्राह्मणों-को दिये । फिर भक्तवत्सल रघुनाथजीने सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त एक सूर्यकी कान्तिके समान चमकती हुई माला अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सुग्रीवको दी और अंगदको दो दिव्य अंगद (भुजबन्ध) दिये ॥४-५॥
चन्द्रकोटिप्रतीकाशं मणिरत्नविभूषितम् ।<br>सीतायै प्रददौ हारं प्रीत्या रघुकुलोत्तमः ॥ ६ ॥तदनन्तर रघुकुल-तिलक श्रीरामचन्द्रजीने अति प्रेमभावसे करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान अमूल्य मणि और रत्नोंसे विभूषित एक हार श्रीजानकीजीको दिया ॥६॥
अवमुच्यात्मनः कण्ठाद्धारं जनकनन्दिनी ।<br>अवैक्षत हरीन्सर्वांन् भर्तारं च मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥<br>रामस्तामाह वैदेहीमिङ्गितज्ञो विलोकयन् ।श्रीजनकनन्दिनी उस हारको अपने गलेसे उतार-कर बारम्बार अपने पतिदेव और वानरोंकी ओर देखने लगीं ॥ ७ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीका संकेत समझ-कर उनकी ओर देखते हुए कहा—"हे सम्पत्ति

सर्ग १६ ] युद्धकाण्ड ३२३


वैदेहि यस्य तुष्टाऽसि देहि तस्मै वरानने ॥ ८ ॥
हनूमते ददौ हारं पश्यतो राघवस्य च ।
तेन हारेणं शुशुभे मारुतिर्गौरवेण च ॥ ९ ॥

रामोऽपि मारुतिं दृष्ट्वा कृताञ्जलिमुपस्थितम् ।
भक्त्या परमया तुष्ट इदं वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥

हनूमंस्ते प्रसन्नोऽस्मि वरं वरय काङ्क्षितम् ।
दास्यामि देवैरपि यद्दुर्लभं भुवनत्रये ॥ ११ ॥

हनूमानपि तं प्राह नत्वा रामं प्रहृष्टधीः ।
त्वन्नाम स्मरतो राम न तृप्यति मनो मम ॥ १२ ॥

अतस्त्वन्नाम सततं स्मरन् स्थास्यामि भूतले ।
यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम् ॥ १३ ॥

मम तिष्ठतु राजेन्द्र वरोऽयं मेऽभिकाङ्क्षितः ।
रामस्तथेति तं प्राह मुक्तस्तिष्ठ यथासुखम् ॥ १४ ॥

कल्पान्ते मम सायुज्यं प्राप्स्यसे नात्र संशयः ।
तमाह जानकी प्रीता यत्र कुत्रापि मारुते ॥ १५ ॥

स्थितं त्वामनुयास्यन्ति भोगाः सर्वे ममाज्ञया ।
इत्युक्तो मारुतिस्ताभ्यामीश्वराभ्यां प्रहृष्टधीः ॥ १६ ॥

आनन्दाश्रुपरीताक्षो भूयोभूयः प्रणम्य तौ ।
कृच्छ्राद्ययौ तपस्तप्तुं हिमवन्तं महामतिः ॥ १७ ॥

ततो गुहं समासाद्य रामः प्राञ्जलिमब्रवीत् ।
सखे गच्छ पुरं रम्यं शृङ्गवेरमनुत्तमम् ॥ १८ ॥

मामेव चिन्तयन्नित्यं भुङ्क्ष्व भोगान्निजार्जितान् ।
अन्ते ममैव सारूप्यं प्राप्स्यसे त्वं न संशयः ॥ १९ ॥

इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यान्याभरणानि च ।
राज्यं च विपुलं दत्त्वा विज्ञानं च ददौ विभुः ॥ २० ॥

रामेणालिङ्गितो हृष्टो ययौ स्वभवनं गुहः ।


जनकनन्दिनि ! तुम जिससे प्रसन्न हो उसे यह हार दे दो" ॥ ८ ॥ तब सीताजीने श्रीरामचन्द्रजीके सामने ही वह हार हनुमान्‌जीको दे दिया। उस हारको पहन और गौरवान्वित हो श्रीहनुमान्‌जी अत्यन्त शोभाको प्राप्त हुए ॥ ९ ॥

भगवान् रामने भी सामने हाथ जोड़े खड़े हुए हनुमान्‌जीसे उनकी भक्तिके कारण अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—॥ १०॥ "हनुमन् ! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो माँग लो। जो वर त्रिलोकीमें देवताओंको भी मिलना कठिन है वह भी मैं तुम्हें अवश्य दूँगा !" ॥ ११ ॥ तब हनुमान्‌जीने अत्यन्त हर्षित होकर उनसे कहा—"हे रामजी ! आपका नाम-स्मरण करते हुए मेरा चित्त तृप्त नहीं होता ॥ १२॥ अतः मैं निरन्तर आपका नाम-स्मरण करता हुआ पृथिवीपर रहूँ । हे राजेन्द्र ! मेरा मनोवाञ्छित वर यही है कि जबतक संसारमें आपका नाम रहे तबतक मेरा शरीर भी रहे।" श्रीरामचन्द्रजीने कहा—"ऐसा ही हो, तुम जीवन्मुक्त होकर संसारमें सुखपूर्वक रहो ॥ १३-१४॥ कल्पका अन्त होनेपर तुम मेरा सायुज्य प्राप्त करोगे, इसमें सन्देह नहीं।" फिर जानकीजीने उनसे कहा—"हे मारुते ! तुम जहाँ कहीं भी रहोगे वहीं मेरी आज्ञासे तुम्हारे पास सम्पूर्ण भोग उपस्थित हो जायँगे।" अपने प्रभु भगवान् राम और सीताजीके इस प्रकार कहनेपर महामति हनुमान्‌जी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ १५-१६ ॥ और फिर नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर उन्हें बारम्बार प्रणाम कर बड़ी कठिनतासे, तपस्या करनेके लिये हिमालयपर चले गये ॥ १७ ॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड़े खड़े हुए गुहके पास जाकर कहा—"मित्र ! अब तुम अपने परम रमणीय ग्राम श्रृंगवेरपुरको जाओ ॥ १८ ॥ वहाँ मेरा ही चिन्तन करते हुए अपने शुभकर्मोंसे प्राप्त हुए भोगों-को भोगो । इसमें सन्देह नहीं, अन्तमें तुम मेरा ही सारूप्य प्राप्त करोगे" ॥ १९ ॥ ऐसा कह भगवान् रामने उसे दिव्य आभूषण, बहुत-सा राज्य और तत्त्व-ज्ञानका उपदेश दिया ॥ २० ॥ फिर श्रीरघुनाथजीसे आलिंगित होकर गुह अपने घरको गया । और भी

३२४ अध्यात्मरामायण [सर्ग १६


ये चान्ये वानराः श्रेष्ठा अयोध्थां समुपागताः ॥२१॥<br>अमूल्याभरणैर्वस्त्रैः पूजयामास राघवः ।<br>सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे वानराः सविभीषणाः ॥२२॥<br>यथार्हं पूजितास्तेन रामेण परमात्मना ।<br>प्रहृष्टमनसः सर्वे जग्मुरेव यथागतम् ॥२३॥जो-जो वानरश्रेष्ठ अयोध्यामें आये थे श्रीरामचन्द्रजीने उन सबका भी अमूल्य वस्त्र और आभूषणोंसे सत्कार किया । इस प्रकार विभीषणके सहित सुग्रीव आदि समस्त वानरगण परमात्मा रामसे यथोचित सत्कार पाकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥२१-२३॥
सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे किष्किन्धां प्रययुर्मुदा ।<br>विभीषणस्तु सम्प्राप्य राज्यं निहतकण्टकम् ॥२४॥<br>रामेण पूजितः प्रीत्या ययौ लङ्कामनिन्दितः ।<br>राघवो राज्यमखिलं शशासाखिलवत्सलः ॥२५॥सुग्रीवादि समस्त वानरगण प्रसन्न-चित्तसे किष्किन्धाको गये और भगवान् रामसे सत्कृत हो अनिन्दित विभीषण अपना निष्कण्टक राज्य पाकर प्रीतिपूर्वक लंकाको गये तथा सबके ऊपर दया करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी अपने सम्पूर्ण राज्यका शासन करने लगे ॥२४-२५॥
अनिच्छन्नपि रामेण यौवराज्येऽभिषेचितः ।<br>लक्ष्मणः परया भक्त्या रामसेवापरोऽभवत् ॥२६॥भगवान् रामने श्रीलक्ष्मणजीको उनकी इच्छा न होनेपर भी युवराज-पदपर अभिषिक्त किया और वे भी अत्यन्त भक्तिपूर्वक रामजीकी सेवामें रहने लगे ॥२६॥
रामस्तु परमात्माऽपि कर्माध्यक्षोऽपि निर्मलः ।<br>कर्तृत्वदिविहीनोऽपि निर्विकारोऽपि सर्वदा ॥२७॥<br>आनन्देनापि तुष्टः सन् लोकानामुपदेशकॄत् ।<br>अश्वमेधादियज्ञैश्च सर्वैर्विपुलदक्षिणैः ॥२८॥<br>अयजतपरमानन्दो मानुषं वपुराश्रितः ।<br>न पर्यदेवन्विधवा न च व्यालकृतं भयम् ॥२९॥<br>न व्याधिजं भयं चासीद्रामे राज्यं प्रशासति ।<br>लोके दस्युभयं नासीदनर्थो नास्ति कश्चन ॥३०॥परमात्मा रामने समस्त कर्मोंके साक्षी, नित्य निर्मलस्वरूप, कर्तृत्वादिसे रहित, सर्वदा निर्विकार और आनन्दतृप्त होकर भी समस्त लोकोंको उपदेश करनेके लिये मनुष्यरूप धारण कर बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले अश्वमेधादि समस्त यज्ञोंका अनुष्ठान किया । महाराज रामके राज्य-शासन करते समय कभी विधवाओंका क्रन्दन नहीं हुआ; सर्पों, व्याधियों और लुटेरोंका भय नहीं था और न कोई अनर्थ ही होता था ॥२७-३०॥
वृद्धेषु सत्सु बालानां नासीन्मृत्युभयं तथा ।<br>रामपूजापराः सर्वे सर्वे राघवचिन्तकाः ॥३१॥वृद्धोंके रहते हुए बालकोंकी मृत्युका भय नहीं था, सब लोग भगवान् रामकी पूजा और उनका स्मरण करने-वाले थे ॥३१॥
ववर्षुर्जलदास्तोयं यथाकालं यथारुचि ।<br>प्रजाः स्वधर्मनिरता वर्णाश्रमगुणान्विताः ॥३२॥मेघ सर्वदा ठीक समयपर यथेष्ट जल बरसाते थे, प्रजा अपना-अपना धर्म पालन करने-वाली और वर्णाश्रमके गुणोंसे युक्त थी ॥३२॥
औरसानिव रामोऽपि जुगोप पितृवत्प्रजाः ।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वधर्मपरायणः ॥३३॥<br>दशवर्षसहस्राणि रामो राज्यमुपास्त सः ॥३४॥तथा श्रीरामचन्द्रजी भी अपनी प्रजाका सगे पुत्रोंके समान पितृवत् पालन करते थे, इस प्रकार सर्वलक्षणसम्पन्न, सर्वधर्मपरायण भगवान् रामने दश सहस्र वर्ष राज्य-शासन किया ॥३३-३४॥
इदं रहस्यं धनधान्यक्राद्धिम-<br>दीर्घायुरारोग्यकरं सुपुण्यदम् ।<br>पवित्रमाध्यात्मिकसंज्ञितं पुरा<br>रामायणं भाषितमादिशम्भुना ॥३५॥धन-धान्यादि समस्त वैभव देनेवाले तथा दीर्घायु, आरोग्य और पुण्यकी वृद्धि करनेवाले इस आध्यात्मिक रामायण नामक परम पवित्र और गोपनीय रहस्यको पूर्वकालमें श्रीआदिमहादेवने पार्वतीजीको सुनाया

| सर्ग १६ ] | युद्धकाण्ड | ३२५ |
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| शृणोति भक्त्या मनुजः समाहितो<br>भक्त्या पठेद्वा परितुष्टमानसः।<br>सर्वाः समाप्नोति मनोगताशिषो<br>विमुच्यते पातककोटिभिः क्षणात्॥३६॥<br><br>रामाभिषेकं प्रयतः शृणोति यो<br>धनाभिलाषी लभते महद्धनम्।<br>पुत्राभिलाषी सुतमार्यसम्मतं<br>प्राप्नोति रामायणमादितः पठन् ॥३७॥<br><br>शृणोति योऽध्यात्मिकरामसंहितां<br>प्राप्नोति राजा भुवमृद्धसम्पदम्।<br>शत्रून्विजित्यारिभिरप्रधर्षितो<br>व्यपेतदुःखो विजयी भवेन्नृपः ॥३८॥<br><br>स्त्रियोऽपि शृण्वन्त्यधिरामसंहितां<br>भवन्ति ता जीविसुताश्च पूजिताः।<br>वन्ध्यापि पुत्रं लभते सुरूपिणं<br>कथामिमां भक्तियुता शृणोति या॥३९॥<br><br>श्रद्धान्वितो यः शृणुयात्पठेन्नरो<br>विजित्य कोपं च तथा विमत्सरः।<br>दुर्गाणि सर्वाणि विजित्य निर्भयो<br>भवेत्सुखी राघवभक्तिसंयुतः ॥४०॥<br><br>सुराः समस्ता अपि यान्ति तुष्टतां<br>विघ्नाः समस्ता अपयान्ति शृण्वताम्।<br>अध्यात्मरामायणमादितो नृणां<br>भवन्ति सर्वा अपि सम्पदः पराः ॥४१॥<br><br>रजस्वला वा यदि रामतत्परा<br>शृणोति रामायणमेतदादितः।<br>पुत्रं प्रसूते ऋषभं चिरायुषं<br>पतिव्रता लोकसुपूजिता भवेत् ॥४२॥<br><br>पूजयित्वा तु ये भक्त्या नमस्कुर्वन्ति नित्यशः।<br>सर्वैः पापैर्विनिर्मुक्ता विष्णोर्यान्ति परं पदम्॥४३॥<br><br>अध्यात्मरामचरितं कृत्स्नं शृण्वन्ति भक्तितः।<br>पठन्ति वा स्वयं वक्त्रात्तेषां रामः प्रसीदति ॥४४॥<br><br>राम एव परं ब्रह्म तस्मिंस्तुष्टेऽखिलात्मनि। | था ॥ ३५ ॥ जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक समाहित-चित्तसे सुनता अथवा प्रसन्न-चित्तसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह अपने मनकी समस्त कामनाओंको प्राप्त करता है और एक क्षणमें ही करोड़ों पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३६ ॥ जो धनकी इच्छा रखनेवाला पुरुष इस रामाभिषेकका एकाग्र-चित्तसे श्रवण करता है वह महान् सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो पुत्राभिलाषी इस ग्रन्थका आरम्भसे ही पाठ करता है वह सत्पुरुषोंद्वारा सम्मान पानेयोग्य पुत्र पाता है ॥ ३७ ॥ जो राजा इस अध्यात्मरामायणका श्रवण करता है वह धन-धान्यसम्पन्न पृथिवी प्राप्त करता है और शत्रुओंसे अपमानित न होकर सब प्रकारके दुःखसे छूटकर विजय लाभ करता है ॥ ३८ ॥ स्त्रियोंमें भी जो कोई इस आध्यात्मिक रामसंहिताको सुनती हैं उनकी सन्तान चिरजीवी होती है और वे स्वयं उनसे सम्मानित होती हैं तथा जो वन्ध्या भी इस कथाका भक्तिपूर्वक श्रवण करती है वह सुन्दर रूपवान् पुत्र प्राप्त करती है ॥३९॥ जो मनुष्य क्रोधको जीतकर ईर्ष्यारहित हो इसे श्रद्धापूर्वक सुनता या पढ़ता है वह समस्त अवगुणोंको जीतकर निर्भय, सुखी और रामभक्तिसे सम्पन्न हो जाता है ॥ ४० ॥ इस अध्यात्मरामायणका आरम्भसे ही श्रवण करनेवाले पुरुषोंसे समस्त देवगण प्रसन्न हो जाते हैं, उनके सम्पूर्ण विघ्न दूर हो जाते हैं और उन्हें सब प्रकारकी उत्तम सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ ४१ ॥ यदि रजस्वला स्त्री भगवान् रामका स्मरण करती हुई आदिसे ही इस रामायणका श्रवण करे तो अति उत्तम और दीर्घायु पुत्र उत्पन्न करती है और वह स्वयं संसारसे सम्मानित पतिव्रता होती है ॥ ४२ ॥ जो लोग इसका भक्तिपूर्वक पूजन कर इसे नित्यप्रति नमस्कार करते हैं वे समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके परम धामको प्राप्त होते हैं ॥ ४३ ॥<br><br>जो पुरुष इस सम्पूर्ण अध्यात्मरामायणको भक्तिपूर्वक सुनते अथवा स्वयं अपने मुखसे ही पढ़ते हैं उनसे भगवान् राम प्रसन्न होते हैं ॥ ४४ ॥ भगवान् राम ही परब्रह्म हैं; अतः उन सर्वात्मा रामके प्रसन्न |

३२६अध्यात्मरामायण[ सर्ग १६

धर्मार्थकाममोक्षाणां यद्यदिच्छति तद्भवेत् ॥४५॥
श्रोतव्यं नियमेनैतद्रामायणमखण्डितम् ।
आयुष्यमारोग्यकरं कल्पकोट्यघनाशनम् ॥४६॥
देवाश्च सर्वे तुष्यन्ति ग्रहाः सर्वे महर्षयः ।
रामायणस्य श्रवणे तृप्यन्ति पितरस्तथा ॥४७॥
अध्यात्मरामायणमेतदद्भुतं
वैराग्यविज्ञानयुतं पुरातनम् ।
पठन्ति शृण्वन्ति लिखन्ति ये नरा-
स्तेषां भवेऽस्मिन्न पुनर्भवो भवेत् ॥४८॥
आलोड्याखिलवेदराशिमसकृ-
द्यत्तारकं ब्रह्म त-
द्रामो विष्णुरहस्यमूर्तिरिति यो
विज्ञाय भूतेश्वरः ।
उद्धृत्याखिलसारसङ्ग्रहामदं
सङ्क्षेपतः प्रस्फुटं
श्रीरामस्य निगूढतत्त्वमखिलं
प्राह प्रियायै भवः ॥४९॥ | होनेपर धर्म, अर्थ, काम, मोक्षमेंसे जिसकी इच्छा हो वही मिल सकता है ॥ ४५ ॥ इसलिये आयु और आरोग्यकी देनेवाली तथा करोड़ों कल्पोंके पापसमूहका नाश करनेवाली इस रामायणका निरन्तर नित्यप्रति नियमपूर्वक श्रवण करना चाहिये ॥४६॥ इसका श्रवण करनेसे समस्त देवगण, सम्पूर्ण ग्रह एवं महर्षिगण प्रसन्न हो जाते हैं तथा पितृगण भी तृप्ति लाभ करते हैं ॥४७॥ जो पुरुष ज्ञान-वैराग्यसे युक्त इस अति अद्भुत प्राचीन अध्यात्मरामायणको पढ़ते, लिखते अथवा सुनते हैं उनका इस संसारमें फिर जन्म नहीं होता ॥ ४८ ॥ भूतनाथ भगवान् शंकरने बारम्बार समस्त वेद-राशिका मन्थन करके यह निश्चय किया कि तारक मन्त्र 'राम' विष्णु-भगवान्की गुप्त मूर्ति है । अतः उन्होंने समस्त वेदों-के सार (उपनिषदों) का संग्रहरूप यह भगवान् रामका सम्पूर्ण गुप्त तत्त्व अपनी प्रिया श्रीपार्वतीजीको संक्षेपसे सुनाया ॥ ४९ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥


समाप्तमिदं युद्धकाण्डम् ।

उत्तरकाण्ड

श्रीसीतारामभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण

उत्तरकाण्ड

यद्रूपराकेशमयूखमालाऽनुरञ्जिता राजरमाऽपि रेजे ।
तं राघवेन्द्रं विबुधेन्द्रवन्द्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥

(इस पृष्ठ पर केवल श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी की मूर्ति/चित्र अंकित है, कोई पाठ्य सामग्री (Text) नहीं है।)

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क्रीडा-विपिनमें श्रीराम-सीता

लसत केलिवनबीच सिय-सियपिय-जोरी सुभग।
उमगत आनंद-वीचि उर-अम्बुधि छवि-ससि निरखि ॥