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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

उत्तरकाण्ड - सर्ग ८: कालका आगमन, लक्ष्मणजीका परित्याग और स्वर्गगमन

सर्ग ८ ] | उत्तरकाण्ड | ३७५


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनोरथस्तु सम्प्राप्तो न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥३८॥<br><br>मत्सेवकानां देवानां सर्वकार्येषु वै मया ।<br>स्थातव्यं मायया पुत्र यथा चाह प्रजापतिः ॥३९॥पहुँच आऊँगा; मेरा सारा मनोरथ पूर्ण हो गया, इसमें मुझे कुछ विचारना नहीं है ॥३८॥ हे पुत्र ! देवगण मेरे सेवक हैं; मुझे, जैसा कि ब्रह्माजीने कहा है, मायासे उनके सब कार्योंमें अवश्य तत्पर रहना चाहिये" ॥३९॥
एवं तयोः कथयतोर्दुर्वासा मुनिरभ्यगात् ।<br>राजद्वारं राघवस्य दर्शनापेक्षया द्रुतम् ॥४०॥उनके इस प्रकार वार्तालाप करते समय मुनिवर दुर्वासाजी रघुनाथजीके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रताके साथ राजद्वारपर पहुँचे ॥४०॥
मुनिर्लक्ष्मणमासाद्य दुर्वासा वाक्यमब्रवीत् ।<br>शीघ्रं दर्शय रामं मे कार्यं मेऽत्यन्तमाहितम् ॥४१॥वहाँ दुर्वासा मुनिने लक्ष्मणजीके पास आकर कहा—"मुझे तुरन्त ही महाराज रामसे मिलाओ, मेरा उनसे एक अत्यन्त आवश्यक कार्य आ पड़ा है" ॥४१॥
तच्छ्रुत्वा प्राह सौमित्रिर्मुनिं ज्वलनतेजसम् ।<br>रामेण कार्यं किं तेऽद्य किं तेऽभीष्टं करोम्यहम् ॥४२॥यह सुन श्रीलक्ष्मणजीने उन अग्निके समान तेजस्वी मुनिसे कहा—"इस समय महाराज रामसे आपको क्या काम है ? आपकी क्या इच्छा है ? उसे मैं ही पूरा करूँगा ॥४२॥
राजा कार्यान्तरे व्यग्रो मुहूर्तं सम्प्रतीक्ष्यताम् ।<br>तच्छ्रुत्वा क्रोधसन्तप्तो मुनिः सौमित्रिमब्रवीत् ॥४३॥इस समय महाराज एक और कार्यमें संलग्न हैं, कुछ देर ठहरिये।" यह सुनते ही मुनिने क्रोधसे व्याकुल होकर लक्ष्मणजीसे कहा—॥४३॥
अस्मिन् क्षणे तु सौमित्रे न दर्शयसि चेद्दिदृक्षुम् ।<br>रामं सविषयं वंशं भस्मीकुर्यां न संशयः ॥४४॥"लक्ष्मण ! यदि इसी क्षण तुमने मुझे भगवान् रामसे न मिलाया, तो इसमें सन्देह नहीं, मैं देशके सहित तुम्हारे वंशको अभी भस्म कर डालूँगा' ॥४४॥
श्रुत्वा तद्वचनं घोरमृषेर्दुर्वाससो भृशम् ।<br>स्वरूपं तस्य वाक्यस्य चिन्तयित्वा स लक्ष्मणः ॥<br>सर्वनाशाद्वरं मेऽद्य नाशो ह्येकस्य कारणात् ।<br>निश्चित्यैवं ततो गत्वा रामाय प्राह लक्ष्मणः ॥४६॥दुर्वासा ऋषिका यह भयङ्कर वाक्य सुनकर लक्ष्मणजीने उसके स्वरूपका भलीभाँति विचार किया और यह निश्चय कर कि एकके कारण सबके नाशसे तो (अकेले) मेरा नष्ट होना ही अच्छा है, उन्होंने रामचन्द्रजीके पास जाकर सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥४५-४६॥
सौमित्रेर्वचनं श्रुत्वा रामः कालं व्यसर्जयत् ।<br>शीघ्रं निर्गम्य रामोऽपि ददर्शात्रेः सुतं मुनिम् ॥४७॥लक्ष्मणजीके वचन सुनकर रामचन्द्रजीने कालको विदा किया और शीघ्र ही बाहर आ अत्रिनन्दन दुर्वासाजीसे मिले ॥४७॥
रामोऽभिवाद्य सम्प्रीतो मुनिं पप्रच्छ सादरम् ।<br>किं कार्यं ते करोमीति मुनिमाह रघूत्तमः ॥४८॥रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने मुनिको प्रणाम कर चित्तमें प्रसन्न हो उनसे आदरपूर्वक पूछा । रामने मुनिसे कहा—"हे मुने ! मैं आपका क्या कार्य करूँ ?" ॥४८॥
तच्छ्रुत्वा रामवचनं दुर्वासा राममब्रवीत् ।<br>अद्य वर्षसहस्राणामुपवाससमापनम् ॥४९॥<br><br>अतो भोजनमिच्छामि सिद्धं यत्ते रघूत्तम ।श्रीरामके ये वचन सुनकर दुर्वासाजीने कहा—"आज मेरा एक हजार वर्षका उपवास समाप्त हुआ है ॥४९॥ इसलिये हे रघुश्रेष्ठ ! आपके यहाँ जो भोजन तैयार हो मुझे उसीकी इच्छा है।" मुनिके ये वचन सुन

३७६. अध्यात्मरामायण [ सर्ग ८


राम्रो मुनिवचः श्रुत्वा सन्तोषेण समन्वितः ॥५०॥
स सिद्धमन्नं मुनये यथावत्समुपाहरत् ।
मुनिर्भुक्त्वाऽन्नममृतं सन्तुष्टः पुनरभ्यगात् ॥५१॥
स्वमाश्रमं गते तस्मिन् रामः सस्मार भाषितम् ।
कालेन शोकदुःखार्तो विमनाश्चातिविह्वलः ॥५२॥
अवाङ्मुखो दीनमना न शशाकाभिभाषितुम् ।
मनसा लक्ष्मणं ज्ञात्वा हतप्रायं रघूद्वहः ॥५३॥
अवाङ्मुखो बभूवाथ तूष्णीमेवाखिलेश्वरः ।
ततो रामं विलोक्याह सौमित्रिर्दुःखसम्प्लुतम् ॥५४॥
तूष्णीम्भूतं चिन्तयन्तं गर्हन्तं स्नेहबन्धनम् ।
मत्कृते त्यज सन्तापं जहि मां रघुनन्दन ॥५५॥
गतिः कालस्य कलिता पूर्वमेवेदृशी प्रभो ।
त्वयि हीनप्रतिज्ञे तु नरको मे ध्रुवं भवेत् ॥५६॥
मयि प्रीतिर्यदि भवेद्यद्यनुग्राह्यता तव ।
त्यक्त्वा शङ्कां जहि प्राज्ञ मा मा धर्मं त्यज प्रभो ॥५७॥
सौमित्रिणोक्तं तच्छ्रुत्वा रामश्चलितमानसः ।
आहूय मन्त्रिणः सर्वान् वसिष्ठं चेदमब्रवीत् ॥५८॥
मुनेरागमनं यत्तु कालस्यापि हि भाषितम् ।
प्रतिज्ञामात्मनश्चैव सर्वमावेदयत्प्रभुः ॥५९॥
श्रुत्वा रामस्य वचनं मन्त्रिणः सपुरोहिताः ।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे राममक्लिष्टकारिणम् ॥६०॥
पूर्वमेव हि निर्दिष्टं तव भूभारहारिणः ।
लक्ष्मणेन वियोगस्ते ज्ञातो विज्ञानचक्षुषा ॥६१॥
त्यजाशु लक्ष्मणं राम मा प्रतिज्ञां त्यज प्रभो ।
प्रतिज्ञाते परित्यक्ते धर्मो भवति निष्फलः ॥६२॥


रामचन्द्रजीने सन्तुष्ट हो उन्हें विधिपूर्वक सिद्ध (पकाया हुआ) अन्न दिया और मुनि उस अमृततुल्य अन्नको खाकर तृप्त होकर चले गये ॥५०-५१॥

जब दुर्वासा मुनि अपने आश्रमको चले गये तो रघुनाथजीको कालके कहे हुए वचनोंका स्मरण हुआ। इससे वे शोक और दुःखसे आर्त्त तथा अति उदास और व्याकुल हो गये ॥५२॥ रघुकुल-भूषण रामने मन-ही-मन लक्ष्मणको मरा हुआ-सा मान लिया किन्तु वे दीन चित्तसे नीचेको मुख किये बैठे रहे, उनसे कुछ कह न सके ॥५३॥ सर्वेश्वर भगवान् राम नीचा मुख किये चुपचाप रह गये। तब रघुनाथजीको अत्यन्त दुःखातुर, मौन, चिन्तित और स्नेह-बन्धनकी निन्दा करते देख लक्ष्मणजीने कहा—"हे रघुनन्दन ! मेरे लिये सन्ताप न कीजिये, मुझे शीघ्र ही मार डालिये ॥५४-५५॥ प्रभो ! मैंने पहले ही निश्चय कर लिया था, कालकी गति ऐसी ही है। आपके प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेसे तो मुझे भी अवश्य नरक भोगना पड़ेगा ॥५६॥ अतः यदि आपकी मुझपर प्रीति है और यदि मैं अनुग्रह करनेयोग्य हूँ तो हे मतिमान् रामजी ! शङ्का छोड़कर मुझे मार डालिये। प्रभो ! धर्मका त्याग न कीजिये ॥५७॥

लक्ष्मणजीका यह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीका चित्त चञ्चल हो गया। उन्होंने सब मन्त्रियोंको बुलाकर यह सब वृत्तान्त वसिष्ठजीको सुनाया ॥५८॥ प्रभु रामने दुर्वासा मुनिका आगमन, कालका भाषण और अपनी प्रतिज्ञा ये सब बातें उनसे कह दीं ॥५९॥ रामचन्द्रजीका कथन सुन पुरोहित वसिष्ठजीके सहित समस्त मन्त्रियोंने सब कार्य लीलाहीसे करनेवाले भगवान् रामसे हाथ जोड़कर कहा—॥६०॥ "प्रभो! पृथिवीका भार उतारनेवाले आपका लक्ष्मणजीसे पहले ही वियोग होना निश्चित है—यह बात हमने ज्ञान-दृष्टिसे जान ली है ॥६१॥ अतः हे राम ! तुरन्त ही लक्ष्मणजीको त्याग दीजिये, प्रभो ! अपनी प्रतिज्ञा भङ्ग न कीजिये क्योंकि प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेसे सारा धर्म निष्फल हो जाता है ॥६२॥ और हे राम ! सम्पूर्ण धर्मका

सर्ग ८ ] उत्तरकाण्ड ३७७


धर्मे नष्टेऽखिले राम त्रैलोक्यं नश्यति ध्रुवम् ।<br>त्वं तु सर्वस्य लोकस्य पालकोऽसि रघूत्तम ।<br>त्यक्त्वा लक्ष्मणमेवैकं त्रैलोक्यं त्रातुमर्हसि ॥ ६३॥<br>रामो धर्मार्थसहितं वाक्यं तेषामनिन्दितम् ॥ ६४॥<br>...णमध्ये समाश्रुत्य प्राह सौमित्रिमञ्जसा ।<br>यथेष्टं गच्छ सौमित्रे माभूद्धर्मस्य संशयः ॥ ६५॥<br>परित्यागो वधो वापि सतामेवोभयं समम् ।<br>एवमुक्ते रघुश्रेष्ठे दुःखव्याकुलितेक्षणः ॥ ६६॥<br>रामं प्रणम्य सौमित्रिः शीघ्रं गृहमगात्स्वकम् ।<br>ततोऽगात्सरयूतीरमाचम्य स कृताञ्जलिः ॥ ६७॥<br>नव द्वाराणि संयम्य मूर्ध्नि प्राणमधारयत् ।<br>यदक्षरं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यमव्ययम् ॥ ६८॥<br>पदं तत्परमं धाम चेतसा सोऽभ्यचिन्तयत् ।<br>वायुरोधेन संयुक्तं सर्वे देवाः सहर्षयः ॥ ६९॥<br>साग्नयो लक्ष्मणं पुष्पैस्तुष्टुवुश्च समाकिरन् ।<br>अदृश्यं विबुधैः कैश्चित्सशरीरं स वासवः ॥ ७०॥<br>गृहीत्वा लक्ष्मणं शक्रः स्वर्गलोकमथागमत् ।<br>ततो विष्णोश्चतुर्भागं तं देवं सुरसत्तमाः ।<br>सर्वे देवर्षयो दृष्ट्वा लक्ष्मणं समपूजयन् ॥ ७१॥नाश हो जानेपर निश्चय ही त्रिलोकीका नाश हो जाता है । हे रघुश्रेष्ठ ! आप तो सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक हैं; अतः अकेले लक्ष्मणजीको ही त्यागकर आपको त्रिलोकीकी रक्षा करनी चाहिये" ॥ ६३॥<br><br>रघुनाथजीने सभामें उनके धर्मार्थयुक्त और निर्दोष वचन सुनकर तुरन्त ही लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जाओ, जिससे धर्ममें संशय उपस्थित न हो ॥ ६४-६५॥ सत्पुरुषोंके लिये त्याग और वध दोनों समान ही हैं।" रघुश्रेष्ठ भगवान् रामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणजीकी आँखें दुःखसे डबडबा आयीं और वे शीघ्र ही उन्हें प्रणाम कर अपने घर आये । वहाँसे वे सरयूतटपर पहुँचे और आचमन करनेके अनन्तर उन्होंने हाथ जोड़ अपने नवों इन्द्रियगोलकोंको रोककर प्राणोंको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थिर किया । फिर जो वासुदेव नामक अव्यय और अविनाशी परब्रह्म पद है, उस परमधामका चित्तमें ध्यान किया । इस प्रकार प्राणनिरोध करनेपर ऋषियों तथा अग्निके सहित समस्त देवताओंने लक्ष्मणजीपर पुष्प बरसाये और उनकी स्तुति की । इसी समय इन्द्र किसी भी देवताको दिखायी न देते हुए उन्हें सशरीर लेकर स्वर्गलोकमें चले आये । तब विष्णुभगवान्‌के चतुर्थांशरूप उन लक्ष्मणदेवको देखकर समस्त देवताओं और देवर्षियोंने उनका पूजन किया ६६-७१॥ भगवान्
लक्ष्मणे हि दिवमागते हरौ<br>$\hspace{2cm}$सिद्धलोकगतयोगिनस्तदा ।<br>ब्रह्मणा सह समागमन्मुदा<br>$\hspace{2cm}$द्रष्टुमाहितमहाहिरूपकम् ॥ ७२॥लक्ष्मणजीके स्वर्ग पधारनेपर ब्रह्माजीके सहित सिद्धलोकनिवासी समस्त योगीजन अति प्रसन्न होकर महासर्प (शेष) रूपधारी श्रीलक्ष्मणजीका दर्शन करनेके लिये आये ॥ ७२॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

३७८अध्यात्मरामायण[सर्ग ९]

नवम सर्ग

महाप्रयाण।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
लक्ष्मणं तु परित्यज्य रामो दुःखसमन्वितः ।<br>मन्त्रिणो नैगमांश्चैव वसिष्ठं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥हे पार्वति ! लक्ष्मणजीको त्याग देनेपर रघुनाथजीने अत्यन्त दुःखातुर हो मन्त्रियों, वेदवेत्ताओं और वसिष्ठजीसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
अभिषेक्ष्यामि भरतमधिराज्ये महामतिम् ।<br>अद्य चाहं गमिष्यामि लक्ष्मणस्य पदानुगः ॥ २ ॥“आज महामति भरतको राजतिलक कर मैं भी लक्ष्मणके मार्गका अनुसरण करूँगा” ॥ २ ॥
एवमुक्ते रघुश्रेष्ठे पौरजानपदास्तदा ।<br>द्रुमा इवच्छिन्नमूला दुःखार्ताः पतिता भुवि ॥ ३ ॥रघुनाथजीके इस प्रकार कहनेपर पुरवासी तथा देशवासी लोग दुःखातुर होकर जड़से कटे हुए वृक्षके समान पृथिवीपर गिर पड़े ॥ ३ ॥
मूर्च्छितो भरतो चापि श्रुत्वा रामाभिभाषितम् ।<br>गर्हयामास राज्यं स प्राहेदं रामसन्निधौ ॥ ४ ॥रामजीका कथन सुनकर भरतजीको भी मूर्च्छा आ गयी। उन्होंने रघुनाथजीके निकट राज्यकी निन्दा करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥
सत्येन च शपे नाहं त्वां विना दिवि वा भुवि ।<br>काङ्क्षे राज्यं रघुश्रेष्ठ शपे त्वत्पादयोः प्रभो ॥ ५ ॥“हे रघुश्रेष्ठ ! मैं सत्यकी शपथ करके कहता हूँ, हे प्रभो ! मुझे आपके चरणोंकी सौगन्ध है कि आपके बिना मुझे स्वर्ग-लोक या भूर्लोक कहींके भी राज्यकी इच्छा नहीं है ॥ ५ ॥
इमौ कुशलवौ राजन्नभिषिञ्चस्व राघव ।<br>कोशलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु लवं तथा ॥ ६ ॥हे महाराज राम ! इन कुश और लवको ही राजतिलक कीजिये—अवधमें वीरवर कुशको और उत्तरमें लवको राजा बनाइये ॥ ६ ॥
गच्छन्तु दूतास्त्वरितं शत्रुघ्नानयनाय हि ।<br>अस्माकमेतद्गमनं खर्वासय शृणोतु सः ॥ ७ ॥शीघ्र ही शत्रुघ्नको लानेके लिये दूत जाने चाहिये, जिससे वह भी हमारे स्वर्ग-वासके लिये जानेका वृत्तान्त सुन ले” ॥ ७ ॥
भरतेनोदितं श्रुत्वा पतितास्ताः समीक्ष्य तम् ।<br>प्रजाश्च भयसंविग्ना रामविश्लेषकातराः ॥ ८ ॥<br>वसिष्ठो भगवान् राममुवाच सदयं वचः ।<br>पश्य तातादरात्सर्वाः पतिता भूतले प्रजाः ॥ ९ ॥भरतजीका कथन सुन उनकी ओर देखकर सम्पूर्ण प्रजा भयभीत तथा रामजीके वियोगसे व्याकुल हो पृथिवीपर गिर पड़ी। तब भगवान् वसिष्ठजीने रघुनाथजीसे करुणायुक्त वचन कहा— “हे तात ! सारी प्रजा पृथिवीपर पड़ी हुई है उसे कृपा-दृष्टिसे देखो ॥ ८-९ ॥
तासां भावानुगं राम प्रसादं कर्तुमर्हसि ।<br>श्रुत्वा वसिष्ठवचनं ताः समुत्थाप्य पूज्य च ॥ १० ॥<br>सस्नेहो रघुनाथस्ताः किं करोमीति चाब्रवीत् ।<br>ततः प्राञ्जलयः प्रोचुः प्रजा भक्त्या रघूद्वहम् ॥ ११ ॥हे राम ! इनके प्रेम-भावानुसार तुम्हें भी इनपर कृपा करनी चाहिये।” वसिष्ठजीके ये वचन सुनकर रघुनाथजीने उन सबोंको उठाया और उनका सत्कार कर उनसे प्रेमपूर्वक पूछा— “कहो, मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ ?” तब प्रजाजन हाथ जोड़कर रघुनाथजीसे भक्तिपूर्वक बोले ॥ १०-११ ॥
गन्तुमिच्छसि यत्र त्वमनुगच्छामहे वयम् ।<br>अस्माकमेषा परमा प्रीतिर्धर्मोऽयमक्षयः ॥ १२ ॥“आप जहाँ जाना चाहते हैं हम भी वहीं आपका अनुगमन करेंगे। यही हमारी सबसे बड़ी प्रसन्नता और अक्षय धर्म है ॥ १२ ॥
तवानुगमने राम हृद्गता नो दृढा मतिः ।<br>पुत्रदारादिभिः सार्धमनुयामोऽद्य सर्वथा ॥ १३ ॥<br>तपोवनं वा स्वर्गं वा पुरं वा रघुनन्दन ।हे राम ! हमारे हृदयमें आपका अनुगमन करनेका ही दृढ़ विचार है। अतः हे रघुनन्दन ! आप तपोवन, नगर, स्वर्ग आदि कहीं

सर्ग ९ ]
उत्तरकाण्ड
३७९

ज्ञात्वा तेषां मनोदाढर्यं कालस्य वचनं तथा ॥१४॥
भक्तं पौरजनं चैव बाढमित्याह राघवः ।
कृत्वैवं निश्चयं रामस्तस्मिन्नेवाहनि प्रभुः ॥१५॥
अस्थापयामास च तौ रामभद्रः कुशीलवौ ।
अष्टौ रथसहस्राणि सहस्रं चैव दन्तिनाम् ॥१६॥
षष्टिं चाश्वसहस्राणामेकैकस्मै ददौ बलम् ।
बहुरत्नों बहुधनौ हृष्टपुष्टजनावृतौ ॥१७॥
अभिवाद्य गतौ रामं कृच्छ्रेण तु कुशीलवौ ।
शत्रुघ्नानयने दूतान्प्रेषयामास राघवः ॥१८॥
ते दूतास्त्वरितं गत्वा शत्रुघ्नाय न्यवेदयन् ।
कालस्यागमनं पश्चादत्रिपूत्रस्य चेष्टितम् ॥१९॥
लक्ष्मणस्य च निर्याणं प्रतिज्ञां राघवस्य च ।
पुत्राभिषेचनं चैव सर्वं रामचिकीर्षितम् ॥२०॥
श्रुत्वा तद्भूतवचनं शत्रुघ्नः कुलनाशनम् ।
व्यथितोऽपि धृतिं लब्ध्वा पुत्रावाहूय सत्वरः ।
अभिषिच्य सुबाहुं वै मथुरायां महाबलः ॥२१॥
यूपकेतुं च विदिशानगरे शत्रुसूदनः ।
अयोध्यां त्वरितं प्रागात्स्वयं रामदिदृक्षया ॥२२॥
ददर्श च महात्मानं तेजसा ज्वलनप्रभम् ।
दुकूलयुगसंवीतं ऋषिभिश्चाक्षयैर्वृतम् ॥२३॥
अभिवाद्य रमानांथं शत्रुघ्नो रघुपूङ्गवम् ।
प्राञ्जलिर्धर्मसहितं वाक्यं प्राह महामतिः ॥२४॥
अभिषिच्य सुतौ तत्र राज्ये राजीवलोचन ।
तवानुगमने राजन्विद्धि मां कृतनिश्चयम् ॥२५॥
त्यक्तुं नार्हसि मां वीर भक्तं तव विशेषतः ।
शत्रुघ्नस्य दृढां बुद्धिं विज्ञाय रघुनन्दनः ॥२६॥
सज्जीभवतु मध्याह्ने भवानित्यब्रवीद्वचः ।
अथ क्षणात्समुत्पेतुर्वानराः कामरूपिणः ॥२७॥
ऋक्षाश्च राक्षसाश्चैव गोपुच्छाश्च सहस्रशः ।
ऋषीणां देवतानां च पुत्रा रामस्य निर्गमम् ॥२८॥

भी जायें अब हम स्त्री-पुत्रादिके सहित सर्वथा आपका
ही अनुसरण करेंगे ।" तब रघुनाथजीने उनके मन
की दृढता और कालका वचन समझकर उन भक्त
पुरवासियोंसे 'बहुत अच्छा, ऐसा ही करो' यह कह
दिया । फिर, ऐसा निश्चय कर प्रभु रामने उसी दिन
कुश और लवको (अपने-अपने राज्यपर) भेजा । उनमेंसे
प्रत्येकको आठ हजार रथ, एक हजार हाथी और साठ
हजार घोड़े दिये तथा बहुत-से रत्न, धन और हृष्ट-पुष्ट
मनुष्योंको साथ कर दिया ॥१३-१७॥ कुश और लव
रामजीको प्रणाम करके बड़ी कठिनतासे चले । इसी समय
रघुनाथजीने शत्रुघ्नजीको लानेके लिये दूत भेजे ॥१८॥

उन दूतोंने तुरन्त ही जाकर कालका आगमन, दुर्वासा-
जीकी करतूत, लक्ष्मणजीका महाप्रयाण, रघुनाथजीकी
प्रतिज्ञा, पुत्रोंका अभिषेक और अब राम क्या करना
चाहते हैं- ये सब समाचार शत्रुघ्नजीसे निवेदन कर
दिये ॥१९-२०॥ इस प्रकार दूतोंके मुखसे अपने कुलके
नाशका समाचार सुनकर शत्रुघ्नजी अति व्याकुल
हुए, किन्तु फिर धैर्य धारण कर तुरन्त ही अपने
दोनों पुत्रोंको बुलाया; और उनमेंसे महाबली सुबाहुं-
को मथुराके और यूपकेतुको विदिशा नगरीके राज्य-
पर अभिषिक्त कर स्वयं बड़ी शीघ्रतासे रघुनाथेजीके
दर्शनके लिये अयोध्याको चले ॥ २१-२२ ॥

वहाँ पहुँचनेपर उन्होंने अपने तेजसे अग्निके
समान देदीप्यमान महात्मा रामको दो वस्त्र धारण किये
और चिरजीवी ऋषियोंसे घिरे हुए देखा ॥२३॥ महामति
शत्रुघ्नजीने लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया
और फिर हाथ जोड़कर ये धर्मयुक्त वाक्य कहे-॥२४॥
"हे कमलनयन ! मैं अपने राज्यपर दोनों पुत्रोंका
अभिषेक कर आया हूँ; हे राजन् ! अब मैंने भी आपही-
का अनुगमन करनेका निश्चय कर लिया है- ऐसा
आप जानें ॥२५॥ हे वीर ! मैं आपका भक्त हूँ, अतः
आपको मुझे छोड़ना न चाहिये ।" शत्रुघ्नका दृढ़ निश्चय
जान श्रीरघुनाथजीने कहा-'तुम आज दोपहरके समय
तैयार रहो ।'

इसी समय इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले
वानर, रीछ, राक्षस और गोपुच्छ वानर हजारोंकी
संख्यामें आ कूदे, तथा ऋषि और देवताओंके पुत्ररूप
वे समस्त वानर और राक्षसगण रघुनाथजीका निर्याण

३८०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ९

श्रुत्वा प्रोचु रघूश्रेष्ठं सर्वे वानरराक्षसाः ।
तवानुगमने विद्धि निश्चिताथीन्न्र्हिनः प्रभो ॥२९॥
एतस्मिन्नन्तरे रामं सुग्रीवोऽपि महाबलः ।
यथावदभिवाद्याह राघवं भक्तवत्सलम् ॥३०॥
अभिषिच्याङ्गदं राज्ये आगतोऽस्मि महाबलम् ।
तवानुगमने राम विद्धि मां कृतनिश्चयम् ॥३१॥
श्रुत्वा तेषां दृढं वाक्यं ऋक्षवानररक्षसाम् ।
विभीषणमुवाचेदं वचनं मृदु सादरम् ॥३२॥
धरिष्यति धरा यावत्प्रजास्तावत्प्रशाधि मे ।
वचनाद्राक्षसं राज्यं शापितोऽसि ममोपरि ॥३३॥
न किंचिदुत्तरं वाच्यं त्वया मत्कृतकारणात् ।
एवं विभीषणं तूक्त्वा हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥३४॥
मारुते त्वं चिरञ्जीव ममाज्ञां मा मृषा कृथाः ।
जाम्बवन्तमथ प्राह तिष्ठ त्वं द्वापरान्तरे ॥३५॥
मया सार्धं भवेद्युद्धं यत्किञ्चित्कारणान्तरे ।
ततस्तान् राघवः प्राह ऋक्षराक्षसवानरान् ।
सर्वानैव मया सार्धं प्रयातेति दयान्वितः ॥३६॥
उतः प्रयाते रघुवंशनाथो
विशालवक्षाः सितकञ्जनेत्रः ।
पुरोधसं प्राह वसिष्ठमार्यं
यान्त्वग्निहोत्राणि पुरो गुरो मे ॥३७॥
ततो वसिष्ठोऽपि चकार सर्वं
प्रास्थानिकं कर्म महद्विधानात् ।
क्षौमाम्बरो दर्भपवित्रपाणि-
र्महाप्रयाणाय गृहीतबुद्धिः ॥३८॥
निष्क्रम्य रामो नगरात्सिताभ्रा-
च्छशीव यातः शशिकोटिकान्तिः ।
रामस्य सव्ये सितपद्महस्ता
पद्मा गता पद्मविशालनेत्रा ॥३९॥
पार्श्वेऽथ दक्षेऽरुणकञ्जहस्ता
श्यामा ययौ भूरपि दीप्यमाना ।


[हिन्दी अनुवाद]

सुनकर उनसे कहने लगे—"प्रभो ! आप हमें भी अपने पीछे चलनेके लिये कटिबद्ध समझें" ॥२६—२९॥
इतनेहीमें महाबली सुग्रीवने भी यथावत् प्रणाम करके भक्तवत्सल रघुनाथजीसे कहा—॥३०॥ "हे राम ! मैं महाबली अंगदको राजतिलक कर आपके साथ चलने का निश्चय करके आया हूँ—ऐसा आप जानें" ॥३१॥

तब उन रीछ, वानर और राक्षसोंके ऐसे दृढ़ वाक्य सुनकर श्रीरघुनाथजीने विभीषणसे आदरपूर्वक इस प्रकार मधुर वचन कहा—॥३२॥ "मैं तुम्हें अपनी शपथ कराता हूँ, जबतक पृथिवी प्रजा धारण करे तबतक मेरे कहने- से तुम राक्षसोंका राज्य करो ॥३३॥ तुम मेरे लिये ऐसा करो, अब इस विषयमें कुछ और उत्तर न देना।
विभीषणसे इस प्रकार कह फिर वे हनुमान्जीसे बोले—॥३४॥ "हे मारुते ! तुम चिरकालतक जीवित रहो, मेरी (पूर्व) आज्ञाको मिथ्या मत करो।" फिर जाम्बवान्‌से कहा—"तुम द्वापरके अन्ततक रहो ॥३५॥ किसी कारणवश मेरे साथ तुम्हारा युद्ध होगा।" फिर श्रीरघुनाथजीने शेष सब रीछ, वानर और राक्षसोंसे दयापूर्वक कहा—"तुम सब लोग मेरे साथ चलो" ॥३६॥

दूसरे दिन सबेरे ही विशालहृदय कमलनयन भगवान् रामने पूज्य पुरोहित वसिष्ठजीसे कहा—"हे गुरो ! मेरे आगे अग्निहोत्रकी आहवनीयादि अग्नियाँ चलें" ॥३७॥ तब वसिष्ठजीने बड़े विधिपूर्वक समस्त प्रास्थानिक कर्म किये। उस समय करोड़ों चन्द्रमाओं- के समान कान्तिमान् भगवान् राम रेशमी वस्त्र धारण किये, कुशाकी पवित्री हाथमें पहने तथा महाप्रयाणमें चित्त लगाये नगरसे इस प्रकार निकले जैसे श्वेत बादलोंमेंसे चन्द्रमा निकलता हो। उनके बायीं ओर हाथमें श्वेत कमल लिये कमलके समान विशाल नेत्रवाली लक्ष्मीजी चलीं ॥३८-३९॥ तथा दायीं ओर हाथमें लाल कमल लिये अत्यन्त दीप्तिशालिनी श्यामवर्णा पृथिवी