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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

उत्तरकाण्ड - सर्ग ७: कुश-लवका गान, सीताजीका पृथिवी-प्रवेश, माताको उपदेश

३६८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

रामादन्यं यथाऽहं वै मनसापि न चिन्तये ।<br>तथा मे धरणी देवी विवरं दातुमर्हति ॥४०॥ | ॥ ३९ ॥ "यदि मैं भगवान् रामके अतिरिक्त अन्य पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं करती तो पृथिवीदेवी मुझे आश्रय दें" ॥ ४० ॥
तथा शपन्त्याः सीतायाः प्रादुरासीन्महाद्भुतम् ।<br>भूतलाद्दिव्यमत्यर्थं सिंहासनमनुत्तमम् ॥४१॥<br>नागेन्द्रैर्ध्रियमाणं च दिव्यदेहै रविप्रभम् ।<br>भूदेवी जानकीं दोर्भ्यां गृहीत्वा स्नेहसंयुता ॥४२॥<br>स्वागतं तासुवाचैनामासने संन्यवेशयत् ।<br>सिंहासनस्थां वैदेहीं प्रविशन्तीं रसातलम् ॥४३॥<br>निरन्तरा पुष्पवृष्टिर्दिव्या सीतामवाकिरत् ।<br>साधुवादश्च सुमहान् देवानां परमाद्भुतः ॥४४॥<br>ऊचुश्च बहुधा वाचो ह्यन्तरिक्षगताः सुराः ।<br>अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वे स्थावरजङ्गमाः ॥४५॥<br>वानराश्च महाकायाः सीताशपथकारणात् ।<br>केचिच्चिन्तापरास्तस्य केचिद्ध्यानपरायणाः॥४६॥<br>केचिद्रामं निरीक्षन्तः केचित्सीतामचेतसः ।<br>मुहूर्तमात्रं तत्सर्वं तूष्णीं भूतमचेतनम् ॥४७॥ | श्रीसीताजीके इस प्रकार शपथ करते ही भूमितलसे एक अति अद्भुत, परम दिव्य और अत्यन्त श्रेष्ठ सिंहासन प्रकट हुआ ॥ ४१ ॥ उस सूर्यके समान् तेजस्वी सिंहासनको दिव्यशरीरधारी नागराजोंने धारण किया हुआ था। तब पृथिवीदेवीने जानकीजीको अपनी दोनों भुजाओंसे प्रेमपूर्वक ग्रहण कर उनका स्वागत किया और उन्हें आसनपर बिठा लिया। जब श्रीसीताजी सिंहासनपर बैठकर रसातलको जाने लगीं तो उनपर दिव्य पुष्पोंकी निरन्तर वर्षा होने लगी और देवताओंके मुखसे साधुवादका अति अद्भुत और महान् घोष होने लगा ॥ ४२--४४ ॥ आकाशमें स्थित देवगण नाना प्रकारके वचन बोलने लगे । सीताजीके शपथ करनेसे आकाश और पृथिवीतलके समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों और बड़े-बड़े डीलवाले वानरोंमेंसे कोई चिन्ता करने लगे, कोई ध्यानस्थ हो गये ॥ ४५-४६ ॥ तथा कोई रामजीकी और कोई सीताजीकी ओर देखकर अचेत हो गये । एक मुहूर्तके लिये वह सारा समाज स्तब्ध और चेतनाशून्य हो गया ॥ ४७॥
सीताप्रवेशनं दृष्ट्वा सर्वं संमोहितं जगत् ।<br>रामस्तु सर्वं ज्ञात्वैव भविष्यत्कार्यगौरवम् ॥४८॥<br>अजानन्निव दुःखेन शुशोच जनकात्मजाम् ।<br>ब्रह्मणा ऋषिभिः सार्धं बोधितो रघुनन्दनः ॥४९॥<br>प्रतिबुद्ध इव स्वप्नाच्चकारानन्तराः क्रियाः ।<br>विससर्ज ऋषीन् सर्वानृत्विजो ये समागताः॥५०॥<br>तान् सर्वान् धनरत्नाद्यैस्तोषयामास भूरिशः ।<br>उपादाय कुमारौ तावयोध्यागमत्प्रभुः ॥५१॥<br>तदादि निःस्पृहो रामः सर्वभोगेषु सर्वदा ।<br>आत्मचिन्तापरो नित्यमेकान्ते समुपस्थितः॥५२॥<br>एकान्ते ध्याननिरते एकदा राघवे सति ।<br>ज्ञात्वा नारायणं साक्षात्कौसल्या प्रियवादिनी ॥५३॥ | सीताजीका पृथिवी-प्रवेश देखकर सारा संसार मोहित हो गया । भगवान् राम आगामी कार्यका सम्पूर्ण महत्व जानते थे तथापि अनजानके समान सीताजीके लिये शोक करने लगे । तब ऋषियोंके सहित ब्रह्माजीने रघुनाथजीको समझाया ॥ ४८-४९ ॥ तदनन्तर उन्होंने सोकर उठे हुएके समान यज्ञका अवशेष कर्म समाप्त किया और यज्ञके ऋत्विक् होकर जो ऋषिगण आये थे उन सबको रत्न और धन आदिसे भली प्रकार सन्तुष्टकर विदा किया। फिर प्रभु राम उन दोनों कुमारोंको साथ लेकर अयोध्यापुरीमें आये ॥ ५०-५१ ॥ तबसे श्रीरामचन्द्रजी सब भोगोंसे विरक्त होकर निरन्तर आत्मचिन्तन करते हुए एकान्तमें रहने लगे ॥ ५२ ॥<br>एक दिन जब श्रीरघुनाथजी एकान्तमें ध्यानमग्न थे, प्रियभाषिणी श्रीकौसल्याजीने उन्हें साक्षात् नारायण

सर्ग ७ ]उत्तरकाण्ड३६९
भक्त्याऽऽगत्य प्रसन्नं तं प्रणता प्राह हृष्टधीः ।<br>राम त्वं जगतामादिरादिमध्यान्तवर्जितः ॥५४॥जानकर अति भक्तिभावसे उनके पास आ उन्हें प्रसन्न जान अति हर्षसे विनयपूर्वक कहा—“हे राम ! तुम संसारके आदिकारण हो, तथा स्वयं आदि, अन्त और मध्यसे रहित हो ॥ ५३-५४॥
परमात्मा परानन्दः पूर्णः पुरुष ईश्वरः ।<br>जातोऽसि मे गर्भगृहे मम पुण्यातिरेकतः ॥५५॥तुम परमात्मा, परानन्दस्वरूप, सर्वत्र पूर्ण, जीवरूपसे शरीररूप पुरमें शयन करनेवाले और सबके स्वामी हो; मेरे प्रबल पुण्यके उदय होनेसे ही तुमने मेरे गर्भसे जन्म लिया है ॥५५॥
अवसाने ममाप्यद्य समयोऽभूद्रघूत्तम ।<br>नाद्याप्यबोधजः कृत्स्नो भवबन्धो निवर्तते ॥५६॥हे रघुश्रेष्ठ ! अब अन्त-समयमें मुझे आज ही (आपसे कुछ पूछनेका) समय मिला है, अभीतक मेरा अज्ञानजन्य संसार-बन्धन पूर्णतया नहीं टूटा ॥५६॥
इदानीमपि मे ज्ञानं भवबन्धनिर्वर्तकम् ।<br>यथा संक्षेपतो भूयात्तथा बोधय मां विभो ॥५७॥हे विभो! मुझे संक्षेपमें कोई ऐसा उपदेश दीजिये जिससे अब भी मुझे भवबन्धनका काटनेवाला ज्ञान हो जाय” ॥५७॥
निर्वेदवादिनीमेवं मातरं मातृवत्सलः ।<br>दयालुः प्राह धर्मात्मा जराजर्जरितां शुभाम् ॥५८॥माताके इस प्रकार वैराग्यपूर्ण वचन कहनेपर मातृ-भक्त, दयामय, धर्मपरायण भगवान् रामने जराजर्जरित शुभलक्षणा कौसल्याजीसे कहा—॥ ५८ ॥
मार्गास्त्रयो मया प्रोक्ताः पुरा मोक्षाप्तिसाधकाः।<br>कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्वतः ॥५९॥“मैंने पूर्व-कालमें मोक्षप्राप्तिके साधनरूप तीन मार्ग बतलाये हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और सनातन भक्तियोग ॥ ५९ ॥
भक्तिर्विभिद्यते मातस्त्रिविधा गुणभेदतः ।<br>स्वभावो यस्य यस्तेन तस्य भक्तिर्विभिद्यते ॥६०॥हे मातः ! (साधकके) गुणानुसार भक्तिके तीन भेद हैं। जिसका जैसा स्वभाव होता है उसकी भक्ति भी वैसे ही भेदवाली होती है ॥६०॥
यस्तु हिंसां समुद्दिश्य दम्भं मात्सर्यमेव वा ।<br>भेददृष्टिश्च संरम्भी भक्तो मे तामसः स्मृतः ॥६१॥जो पुरुष हिंसा, दम्भ या मात्सर्यके उद्देश्यसे भक्ति करता है, तथा जो भेददृष्टिवाला और क्रोधी होता है वह तामस भक्त कहा गया है ॥ ६१ ॥
फलाभिसन्धिर्भोगाथीं धनकामो यशस्तथा ।<br>अर्चादौ भेदबुद्ध्या मां पूजयेत्स तु राजसः॥६२॥जो फलकी इच्छावाला, भोग चाहनेवाला तथा धन और यशकी कामनावाला होता है और भेदबुद्धिसे प्रतिमा आदिमें मेरी पूजा करता है वह रजोगुणी होता है ॥ ६२ ॥
परस्मिन्नर्पितं यस्तु कर्मनिर्हरणाय वा ।<br>कर्तव्यमिति वा कुर्याद्भेदबुद्ध्या स सात्त्विकः । ६३।तथा जो पुरुष परमात्माको अर्पण किये हुए कर्म-सम्पादन करनेके लिये अथवा 'करना चाहिये' इसलिये भेदबुद्धिसे कर्म करता है वह सात्त्विक है ॥ ६३ ॥
मद्गुणाश्रयणादेव मय्यनन्तगुणालये ।<br>अविच्छिन्ना मनोवृत्तिर्यथा गङ्गाम्बुनोऽम्बुधौ ।<br>तदेव भक्तियोगस्य लक्षणं निर्गुणस्य हि ॥६४॥जिस प्रकार गङ्गाजीका जल समुद्रमें अविच्छिन्न-भावसे लीन रहता है उसी प्रकार मनोवृत्तिका मेरे गुणों-के आश्रयसे मुझ अनन्त-गुणधाममें निरन्तर लीन हो जाना ही मेरे निर्गुण-भक्तियोगका लक्षण है ॥ ६४ ॥
अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिर्मयि जायते ।मेरे प्रति जो निष्काम और अखण्ड भक्ति उत्पन्न होती है
३७०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सा मे सालोक्यसामीप्यसार्ष्ट्रिसायुज्यमेव वा ॥६५॥<br>ददात्यपि न गृह्णन्ति भक्ता मत्सेवनं विना ।<br>स एवात्यन्तको योगो भक्तिमार्गस्य भामिनि ६६<br>मद्भावं प्राप्नुयात्तेन अतिक्रम्य गुणत्रयम् ॥६७॥<br><br>महता कामहीनेन स्वधर्माचरणेन च ।<br>कर्मयोगेन शस्तेन वर्जितेन विहिंसनात् ।<br>मद्दर्शनस्तुतिमहापूजाभिः स्मृतिवन्दनैः ॥६८॥<br>भूतेषु मद्भावनया सङ्गेनासत्यवर्जनैः ।<br>बहुमानेन महतां दुःखिनाम नुकम्पया ॥६९॥<br>स्वसमानेषु मैत्र्या च यमादीनां निषेवया ।<br>वेदान्तवाक्यश्रवणान्मम नामानुकीर्तनात् ॥७०॥<br>सत्सङ्गेनाऽऽर्जवेनैव ह्यहमः परिवर्जनात् ।<br>काङ्क्षया मम धर्मस्य परिशुद्धान्तरो जनः ॥७१॥<br>मद्गुणश्रवणादेव याति मामञ्जसा जनः ॥७२॥<br>यथा वायुवशाद्गन्धः स्वाश्रयाद्घ्राणमाविशेत् ।<br>योगाभ्यासरतं चित्तमेवमात्मानमाविशेत् ।<br>सर्वेषु प्राणिजातेषु ह्यहमात्मा व्यवस्थितः ॥७३॥<br>तमज्ञात्वा विमूढात्मा कुरुते केवलं बहिः ।<br>क्रियोत्पन्नैरनेकभेदैर्द्रव्यैर्ने माम्ब तोषणम् ॥७४॥<br>भूतावमानिनाऽर्चाय्यामर्चितोऽहं न पूजितः॥७५॥<br>तावन्मामर्चयेद्देवं प्रतिमादौ स्वकर्मभिः ।<br>यावत्सर्वेषु भूतेषु स्थितं चात्मनि न स्मरेत् ॥७६॥<br>यस्तु भेदं प्रकुरुते स्वात्मनश्च परस्य च ।<br>भिन्नदृष्टेर्भयं मृत्युस्तस्य कुर्यान्न संशयः ॥७७॥वह साधकको सालोक्य, सामीप्य, सार्ष्टि और सायुज्य* चार प्रकारकी मुक्ति देती है; किन्तु उसके देनेपर भी वे भक्तजन मेरी सेवाके अतिरिक्त और कुछ ग्रहण नहीं करते । हे मात: ! भक्तिमार्गका आत्यन्तिक योग यही है ॥ ६५-६६ ॥ इसके द्वारा भक्त तीनों गुणोंको पार कर मेरा ही रूप हो जाता है ॥ ६७ ॥<br><br>(अब इस निर्गुण भक्तिका साधन बतलाता हूँ-)<br>अपने धर्मका अत्यन्त निष्काम भावसे आचरण करनेसे, अत्युत्तम हिंसारहित कर्म-योगसे, मेरे दर्शन, स्तुति, महापूजा, स्मरण और वन्दनसे ॥६८॥ प्राणियोंमें मेरी भावना करनेसे, असत्यके त्याग और सत्सङ्गसे, महापुरुषोंका अत्यन्त मान करनेसे, दुःखियोंपर दया करनेसे ॥६९॥ अपने समान पुरुषोंसे मैत्री करनेसे यम-नियमादिका सेवन करनेसे, वेदान्तवाक्योंका श्रवण करनेसे, मेरा नाम-सङ्कीर्तन करनेसे ॥७०॥ सत्सङ्ग और कोमलतासे, अहङ्कारका त्याग करनेसे और मेरे भागवत-धर्मोंकी इच्छा करनेसे जिसका चित्त शुद्ध हो गया है, वह पुरुष मेरे गुणोंका श्रवण करनेसे ही अति सुगमतासे मुझे प्राप्त कर लेता है ॥७१-७२॥ जिस प्रकार वायुके द्वारा गन्ध अपने आश्रयको छोड़कर घ्राणेन्द्रियमें प्रविष्ट होता है उसी प्रकार योगाभ्यासमें लगा हुआ चित्त आत्मामें लीन हो जाता है । समस्त प्राणियोंमें आत्मारूपसे मैं ही स्थित हूँ ॥७३॥ हे मात: ! उसे न जानकर मूढ-पुरुष बाह्य भावना करता है, किन्तु क्रियासे उत्पन्न हुए अनेक पदार्थोंसे भी मेरा सन्तोष नहीं होता ॥ ७४ ॥ अन्य जीवोंका तिरस्कार करनेवाले प्राणियोंसे प्रतिमामें पूजित होकर भी मैं वास्तवमें पूजित नहीं होता ॥७५॥ मुझ परमात्मदेवका अपने कर्मोंद्वारा प्रतिमा आदिमें तभीतक पूजन करना चाहिये जबतक कि समस्त प्राणियोंमें और अपने आपमें मुझे स्थित न जाने ॥७६॥ जो अपने आत्मा और परमात्मामें भेद-बुद्धि करता है उस भेददर्शीको मृत्यु अवश्य भय उत्पन्न करती है, इसमें सन्देह नहीं ॥७७॥ इस-

* वैकुण्ठादि भगवान्‌के लोकोंको प्राप्त करना 'सालोक्य' मुक्ति है। हर समय भगवान्‌हीके निकट रहना 'सामीप्य' है, भगवान्‌के समान ऐश्वर्य लाभ करना 'सार्ष्टि' है और भगवान्‌में लीन हो जाना 'सायुज्य' है।

सर्ग ७] — उत्तरकाण्ड — ३७१


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मामन्तः सर्वभूतेषु परिच्छिन्नेषु संस्थितम् ।<br>एकं ज्ञानेन मानेन मैत्र्या चार्चेदभिन्नधीः ॥७८॥लिये अभेददर्शी भक्त समस्त परिच्छिन्न प्राणियोंमें स्थित मुझ एकमात्र परमात्माका ज्ञान, मान और मैत्री आदिसे पूजन करे ॥७८॥
चेतसैवानिशं सर्वभूतानि प्रणमेत्सुधीः ।<br>ज्ञात्वा मां चेतनं शुद्धं जीवरूपेण संस्थितम् ॥७९॥इस प्रकार मुझ शुद्ध चेतनको ही जीवरूपसे स्थित जानकर बुद्धिमान् पुरुष अहर्निश सब प्राणियोंको चित्तसे ही प्रणाम करे ॥७९॥
तस्मात्कदाचिन्नैक्षेत भेदमीश्वरजीवयोः ।<br>भक्तियोगो ज्ञानयोगो मया मातरुदीरितः ॥८०॥<br>आलम्ब्यैकतरं वापि पुरुषः शुभमृच्छति ।इसलिये जीव और ईश्वरका भेद कभी न देखे । हे मातः ! मैंने तुमसे यह भक्तियोग और ज्ञानयोगका वर्णन किया ॥८०॥ इनमेंसे एकका भी अवलम्बन करनेसे पुरुष आत्यन्तिक शुभ प्राप्त कर लेता है ।
ततो मां भक्तियोगेन मातः सर्वहृदि स्थितम् ।<br>पुत्ररूपेण वा नित्यं स्मृत्वा शान्तिमवाप्स्यसि ॥८१॥अतः हे मातः ! मुझे सब प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित जानते हुए अथवा पुत्ररूपसे भक्तियोगके द्वारा नित्यप्रति स्मरण करते रहनेसे तुम शान्ति प्राप्त करोगी” ॥८१॥
श्रुत्वा रामस्य वचनं कौसल्याऽऽनन्दसंयुता ॥८२॥<br>रामं सदा हृदि ध्यात्वा छित्त्वा संसारबन्धनम् ।<br>अतिक्रम्य गतीस्तिस्रोऽप्यवाप परमां गतिम् ॥८३॥भगवान् रामके ये वचन सुनकर कौसल्याजी आनन्दसे भर गयीं ॥८२॥ और हृदयमें निरन्तर श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करती हुई संसार-बन्धनको काटकर (जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति) तीनों प्रकारकी अवस्थाओंको पारकर परम गतिको प्राप्त हुईं ॥८३॥
कैकेयी चापि योगं रघुपतिगदितं पूर्वमेवाधिगम्य<br>श्रद्धाभक्तिप्रशान्ता हृदि रघुतिलकं भावयन्ती गतासुः ।<br>गत्वा स्वर्गं स्फुरन्ती दशरथसहिता मोदमानावतस्थे<br>माता श्रीलक्ष्मणस्याप्यतिविमलमतिः प्राप भर्तुः समीपम् ॥८४॥कैकेयीने भी रघुनाथजीद्वारा पहले (चित्रकूट पर्वतपर) कहे हुए योगको हृदयंगम कर श्रद्धा और भक्ति-भावसे शान्तिपूर्वक हृदयमें रघुकुलतिलक भगवान् रामका ध्यान करते हुए प्राणत्याग किया और स्वर्गलोकमें जाकर दशरथजीके साथ सुशोभित हो आनन्दपूर्वक रहने लगीं । इसी प्रकार श्रीलक्ष्मणजीकी माता अत्यन्त विमल बुद्धिवाली सुमित्राने भी अपने पतिका सामीप्य प्राप्त किया ॥ ८४ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

३७२ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८]


अष्टम सर्ग

कालका आगमन, लक्ष्मणजीका परित्याग और उनका स्वर्गगमन।


श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
अथ काले गते कस्मिन् भरतो भीमविक्रमः ।<br>युधाजिता मातुलेन ह्याहूतोऽगात्ससैनिकः ॥ १ ॥<br><br>रामाज्ञया गतस्तत्र हत्वा गन्धर्वनायकान् ।<br>तिस्रः कोटीः पुरे द्वे तु निवेश्य रघुनन्दनः ॥ २ ॥<br><br>पुष्करं पुष्करावत्यां तक्षं तक्षशिलाह्वये ।<br>अभिषिच्य सुतौ तत्र धनधान्यसुहृद्वृतौ ॥ ३ ॥<br><br>पुनरागत्य भरतो रामसेवापरोऽभवत् ।<br>ततः प्रीतो रघुश्रेष्ठो लक्ष्मणं प्राह सादरम् ॥ ४ ॥<br><br>उभौ कुमारौ सौमित्रे गृहीत्वा पश्चिमां दिशम् ।<br>तत्र भिल्लान्विनिर्जित्य दुष्टान् सर्वापकारिणः ॥ ५ ॥<br><br>अङ्गदश्चित्रकेतुश्च महासत्त्वपराक्रमौ ।<br>द्वयोर्द्वे नगरे कृत्वा गजाश्वधनरत्नकैः ॥ ६ ॥<br><br>अभिषिच्य सुतौ तत्र शीघ्रमागच्छ मां पुनः ।<br>रामस्याज्ञां पुरस्कृत्य गजाश्वबलवाहनः ॥ ७ ॥<br><br>गत्वा हत्वा रिपून् सर्वान् स्थापयित्वा कुमारकौ ।<br>सौमित्रिः पुनरागत्य रामसेवापरोऽभवत् ॥ ८ ॥हे पार्वति ! कुछ काल बीतनेपर उग्रपराक्रमी भरतजी अपने मामा युधाजित्-द्वारा बुलाये जानेपर भगवान् रामकी आज्ञा लेकर सेनासहित उनके यहाँ गये। वहाँ पहुँचकर रघुकुलनन्दन भरतजीने तीन करोड़ प्रमुख गन्धर्वोंको मार कर दो नगर बसाये ॥१-२॥ उन्होंने पुष्करावतीमें पुष्कर और तक्षशिलामें तक्ष नामक अपने दोनों पुत्रोंको अभिषिक्त कर और उन्हें धन-धान्य तथा मित्र-मण्डलसे सम्पन्न कर वे लौट आये और भगवान् रामकी सेवामें तत्पर हो गये। तब रघुनाथजीने प्रसन्न होकर आदरपूर्वक लक्ष्मणजीसे कहा—॥३-४॥ "हे सुमित्रानन्दन ! तुम अपने दोनों कुमारोंको लेकर पश्चिम दिशामें जाओ और वहाँ सबका अपकार करनेवाले दुष्ट भिल्लोंको जीतकर दोनोंके लिये दो नगर बसाओ और उनमें महाबलवान् और पराक्रमी अङ्गद तथा चित्रकेतुका हाथी, घोड़े, धन और रत्नादि उपकरणोंसे राजतिलक कर फिर तुरन्त ही मेरे पास लौट आओ।" भगवान् रामकी इस आज्ञाको शिरोधार्य कर लक्ष्मणजी हाथी-घोड़े आदि दल-बलके सहित गये और समस्त शत्रुओंको मारकर दोनों कुमारोंको राजपदपर नियुक्त कर लौट आये तथा फिर रामसेवामें तत्पर हो गये ॥५-८॥
ततस्तु काले महति प्रयाते<br>रामं सदा धर्मपथे स्थितं हरिम् ।<br>द्रष्टुं समागादृषिवेषधारी<br>कालस्ततो लक्ष्मणमित्युवाच ॥ ९ ॥<br><br>निवेदयस्वातिबलस्य दूतं<br>मां द्रष्टुकामं पुरुषोत्तमाय ।<br>रामाय विज्ञापनमस्ति तस्य<br>महर्षिमुख्यस्य चिराय धीमन् ॥ १० ॥<br><br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सौमित्रिस्त्वरयान्वितः ।<br>आचचक्षेऽथ रामाय स सम्प्राप्तं तपोधनम् ॥ ११ ॥<br><br>एवं ब्रुवन्तं प्रोवाच लक्ष्मणं राघवो वचः ।<br>शीघ्रं प्रवेश्यतां तात मुनिः सत्कारपूर्वकम् ॥ १२ ॥तदनन्तर बहुत-सा काल व्यतीत होनेपर सर्वदा धर्ममार्गका अवलम्बन करनेवाले भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये ऋषिवेष धारण कर काल आया और लक्ष्मणजीसे यों बोला—॥९॥ "हे बुद्धिमान् ! तुम पुरुषोत्तम महाराज रामसे निवेदन करो कि महर्षि अतिबलका दूत आपके दर्शनकी इच्छासे आया है। मुझे उन्हें बहुत देरतक उन महर्षिश्रेष्ठका सन्देश सुनाना है" ॥१०॥ उसके ये वचन सुनकर लक्ष्मणजीने तुरन्त ही श्रीरघुनाथजीसे कहा कि 'एक तपोधन आये हैं' ॥११॥ लक्ष्मणजीके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने उनसे कहा—"भैया, मुनिराजको तुरन्त ही बड़े सत्कारपूर्वक भीतर ले आओ" ॥१२॥

सर्ग ८ ] उत्तरकाण्ड [ ३७३


लक्ष्मणस्तु तथेत्युक्त्वा प्रावेशयत तापसम्।<br>स्वतेजसा ज्वलन्तं तं घृतसिक्तं यथाऽनलम् ॥१३॥तब लक्ष्मणजी 'बहुत अच्छा' कह घृताहुतिसे प्रज्वलित हुए अग्निके समान अपने तेजसे देदीप्यमान उस तपस्वीको भीतर ले आये ॥१३॥
सोऽभिगम्य रघुश्रेष्ठं दीप्यमानः स्वतेजसा।<br>मुनिर्मधुरवाक्येन वर्धस्वेत्याह राघवम् ॥१४॥अपनी कान्तिसे प्रकाशमान उस मुनिने श्रीरघुनाथजीके पास पहुँचनेपर उनसे अति मधुर वाणीमें 'आपका अभ्युदय हो' इस प्रकार कहा ॥१४॥
तस्मै स मुनये रामः पूजां कृत्वा यथाविधि।<br>पृष्ट्वाऽनामयमव्यग्रो रामः पृष्टोऽथ तेन सः ॥१५॥तब श्रीरामचन्द्रजीने उस मुनिकी विधिपूर्वक पूजा की और फिर शान्त भावसे रामचन्द्रजीने मुनिसे और मुनिने रामचन्द्रजीसे कुशल पूछी ॥१५॥
दिव्यासने समासीनो रामः प्रोवाच तापसम्।<br>यदर्थमागतोऽसि त्वमिह तत्प्रापयस्व मे ॥१६॥तदनन्तर दिव्यासनपर विराजमान महाराज रामने मुनिसे कहा—"आप जिसलिये यहाँ पधारे हैं वह (सन्देश) मुझसे कहिये" ॥१६॥
वाक्येन चोदितस्तेन रामेणाह मुनिर्वचः।<br>द्वन्द्वमेव प्रयोक्तव्यमनालक्ष्यं तु तद्वचः ॥१७॥भगवान् रामके इस वाक्यसे प्रेरित होकर मुनिने कहा—"यह बात हम दोनोंके बीच ही कही जा सकती है और किसीको प्रकट न होनी चाहिये ॥१७॥
नान्येन चैतच्छ्रोतव्यं नाख्यातव्यं च कस्यचित्।<br>शृणुयाद्वा निरीक्षेत यः स वध्यस्त्वया प्रभो ॥१८॥उसे न तो कोई सुने और न वह किसीसे कही जाय। यदि उसे कोई सुने अथवा देखे तो हे प्रभो ! आपको उसे मारना होगा" ॥ १८ ॥
तथेति च प्रतिज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।<br>तिष्ठ त्वं द्वारि सौमित्रे नायात्वत्र जनो रहः ॥१९॥तब रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! तुम द्वारपर रहो, इस एकान्त स्थानमें मेरे पास कोई न आवे ॥१९॥
यद्यागच्छति को वापि स वध्यो मे न संशयः।<br>ततः प्राह मुनिं रामो येन वा त्वं विसर्जितः ॥२०॥<br><br>यत्ते सनीप्सितं वाक्यं तद्वदस्व समाग्रतः ॥२१॥यदि यहाँ कोई भी आया तो इसमें सन्देह नहीं, वह अवश्य मेरे हाथसे मारा जायगा।" फिर उन्होंने मुनिसे कहा—"तुम्हें जिसने भेजा है और तुम्हारे मनमें जो बात है वह सब मुझसे कहो" ॥२०-२१॥
ततः प्राह मुनिर्वाक्यं शृणु राम यथातथम्।<br>ब्रह्मणा प्रेषितोऽस्मीश कार्यार्थे तेऽन्तिकं प्रभो।<br><br>अहं हि पूर्वजो देव तव पुत्रः परन्तप ॥२२॥तब मुनिने कहा—"हे राम ! जो वास्तविक बात है सो सुनिये। हे ईश ! हे प्रभो ! मुझे एक कार्यके लिये ब्रह्माजीने आपके पास भेजा है। हे देव ! हे शत्रुदमन ! मैं आपका ज्येष्ठ पुत्र हूँ ॥२२॥
मायासङ्गमजो वीर कालः सर्वहरः स्मृतः।<br>ब्रह्मा त्वामाह भगवान् सर्वदेवर्षिपूजितः ॥२३॥<br><br>रक्षितुं स्वर्गलोकस्य समयस्ते महामते।<br>पुरा त्वमेक एवासीर्लोकान् संहृत्य मायया ॥२४॥हे वीर ! मायाके साथ आपका सङ्गम होनेपर मैं प्रकट हुआ था। मैं सबका नाश करनेवाला हूँ और काल नामसे प्रसिद्ध हूँ। समस्त देवर्षियोंसे पूजित भगवान् ब्रह्माजीने आपके लिये कहा है कि 'हे महामते ! अब आपका स्वर्गलोककी रक्षा करनेका समय है। पूर्वकालमें समस्त लोकोंका संहार कर एकमात्र आप ही रह गये थे ॥ २३-२४ ॥
भार्यया सहितस्त्वं मामादौ पुत्रमजीजनः।फिर आपने अपनी भार्या मायाके संयोगसे सबसे पहले अपने
३७४अध्यात्मरामायण[सर्ग ८

तथा भोगवतं नागमनन्तमुदकेशयम् ॥२५॥
मायया जनयित्वा त्वं द्वौ ससत्त्वौ महाबलौ ।
मधुकैटभौ दैत्यौ हत्वा मेदोऽस्थिसञ्चयम् ॥२६॥
इमां पर्वतसम्बद्धां मेदिनीं पुरुषर्षभ ।
पद्मे दिव्यार्कसङ्काशे नाभ्यामुत्पाद्य मामपि ॥२७॥
क्षां विधाय प्रजाध्यक्षं मयि सर्वं न्यवेदयत् ।
सोऽहं संयुक्तसम्भारस्त्वामवोचं जगत्पते ॥२८॥
रक्षां विधत्स्व भूतेभ्यो ये मे वीर्यापहारिणः ।
ततस्त्वं कश्यपाज्जातो विष्णुर्वामनरूपधृक् ॥२९॥
हतवानसि भूभारं वधाद्रक्षोगणस्य च ।
सर्वांस्तूत्सार्यमाणासु प्रजासु धरणीधर ॥३०॥
रावणस्य वधाकाङ्क्षी मर्त्यलोकमुपागतः ।
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ॥३१॥
कृत्वा वासस्य समयं त्रिदशेष्वात्मनः पुरा ।
स ते मनोरथः पूर्णः पूर्णे चायुषि ते नृषु ॥३२॥
कालस्तापसरूपेण त्वत्समीपमुपागमत् ।
ततो भूयश्च ते बुद्धिर्यदि राज्यमुपासितुम् ॥३३॥
तत्तथा भव भद्रं ते एवमाह पितामहः ।
यदि ते गमने बुद्धिर्देवलोकं जितेन्द्रिय ॥३४॥
सनाथा विष्णुना देवा भवन्तु विगतज्वराः ॥३५॥

चतुर्मुखस्य तद्वाक्यं श्रुत्वा कालेन भाषितम् ।
हसन् रामस्तदा वाक्यं कृत्स्नस्यान्तकमब्रवीत् ।
श्रुतं तव वचो मेऽद्य ममापीष्टतरं तु तत् ॥३६॥
सन्तोषः परमो ज्ञेयस्त्वदागमनकारणात् ।
त्रयाणामपि लोकानां कार्यार्थं मम सम्भवः॥३७॥
भद्रं तेऽस्त्वगमिष्यामि यत एवाहमागतः ।


पुत्र मुझको तथा जलमें शयन करनेवाले अनन्त नामक फणधारी शेषनागको रचा ॥२५॥ इस प्रकार मायासे हमें उत्पन्न कर आपने महाबली और बड़े शूरवीर दो मधुकैटभ नामक दैत्योंको मारा तथा उनके मेद और अस्थियोंके समूहरूप इस पर्वतादिसे युक्त पृथिवीको रचा। हे पुरुषश्रेष्ठ ! फिर अपनी नाभिसे प्रकट हुए दिव्य सूर्यके समान तेजस्वी कमलसे मुझे उत्पन्न कर और मुझे ही प्रजापति बनाकर सृष्टि-रचनाका सारा भार मुझे ही सौंप दिया । हे जगत्पते ! इस प्रकार भार ग्रहण करनेपर मैं आपसे बोला-॥२६-२८॥ “जो प्राणी मेरे वीर्य (प्रजा) का नाश करनेवाले हैं उनसे रक्षा कीजिये।” तब आप कश्यपजीके यहाँ वामनरूपधारी विष्णुभगवान् होकर प्रकट हुए ॥२९॥ और राक्षसोंका नाश करके आपने पृथिवीका भार उतारा । हे धरणीधर ! (इस समय भी) सारी प्रजा-को उच्छिन्न होते देख आप रावणका वध करनेके लिये मर्त्यलोकमें पधारे थे। यहाँ रहनेके लिये आपने पूर्वकालमें देवताओंमें ग्यारह सहस्र वर्षका समय निश्चित किया था, सो आपकी मानव-शरीरकी आयु पूर्ण होनेके साथ ही आपका वह मनोरथ पूर्ण हो चुका है ॥३०-३२॥ अब, तापसरूपसे काल आपके पास आया है। यदि अभी आपका विचार कुछ दिन और राज्य करनेका हो तो आपका शुभ हो, वैसा ही कीजिये'-ऐसा पितामह ब्रह्माजीने कहा है। हे जितेन्द्रिय ! यदि आपका विचार भी देवलोक चलनेका हो तो (आप) विष्णुभगवान्‌से सनाथ होकर देवगण निश्चिन्त हो जायें” ॥३३-३५॥

कालके मुखसे ब्रह्माजीके ये वचन सुनकर रामजी हँसे और सबका अन्त करनेवाले कालसे बोले- “मैंने तुम्हारी सब बातें सुन लीं । वे मुझे भी अत्यन्त इष्ट हैं ॥ ३६ ॥ तुम्हारे आनेके कारण मुझे बड़ा सन्तोष हुआ है। मेरा अवतार तीनों लोकोंका कार्य करनेके लिये ही हुआ करता है ॥३७॥ तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जहाँसे आया था वहीं फिर