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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

उत्तरकाण्ड - सर्ग ६: लवण-वध, वाल्मीकिका पधारना और कुशको परमार्थोपदेश

सर्ग ६ ]उत्तरकाण्ड३६३

| नाज्ञासीद्गीतवाद्यगरिमा नादर्शि नांश्रावि च ॥ | न कभी जानी, न देखी और न सुनी ही है” ॥३२॥ |
| एवं स्तुवद्भिरखिलैर्मुनिभिः प्रतिवासरम् । | इसप्रकार प्रतिदिन प्रशंसा करनेवाले समस्त मुनियोंके साथ वे दोनों बालक बहुत समयतक श्रीवाल्मीकिजीके एकान्त आश्रममें सुखपूर्वक रहे ॥ ३३ ॥ |
| आसाते सुखमेकान्ते वाल्मीकेराश्रमे चिरम् ॥३३॥ | |
| अथ रामोऽश्वमेधादींश्चकार बहुदक्षिणान् । | . इधर परम तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने सुवर्णकी सीता बनाकर अश्वमेध आदि बहुत-से बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं-वाले यज्ञ किये ॥३४॥ उस यज्ञशालामें यज्ञोत्सव देखनेके लिये सभी ऋषि, राजर्षि, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आदि आये थे ॥ ३५ ॥ मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजी भी गान् करते हुए कुश और लवको साथ ले वहाँ आये और जहाँ मुनियोंके ठहरनेका स्थान था वहाँ उतरे ॥ ३६ ॥ वहाँ एक दिन एकान्तमें शान्तभावसे बैठे हुए वाल्मीकि मुनिसे उनकी समाधि खुलनेपर कुशने कथाके बीचमें ही ज्ञानशास्त्रके विषयमें पूछा ॥ ३७ ॥ |
| यज्ञान् स्वर्णमयीं सीतां विधाय विपुलद्युतिः॥३४॥ | |
| तस्मिन्विताने ऋषयः सर्वे राजर्षयस्तथा । | |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः समाजग्मुर्दिदृक्षवः॥३५॥ | |
| वाल्मीकिरपि सङ्गृह्य गायन्तौ तौ कुशीलवौ । | |
| जगाम ऋषियाटस्य समीपं मुनिपुङ्गवः ॥३६॥ | |
| तत्रैकान्ते स्थितं शान्तं समाधिविरमे मुनिम् । | |
| कुशः पप्रच्छ वाल्मीकिं ज्ञानशास्त्रं कथान्तरे॥३७॥ | |
| भगवन् श्रोतुमिच्छामि सङ्क्षेपान्नृपतोऽखिलम् । | (वह बोला—) “भगवन् ! मैं आपके मुखारविन्दसे संक्षेप-में यह बात सुनना चाहता हूँ कि जीवको यह सुदृढ संसारबन्धन किस प्रकार प्राप्त होता है ? ॥ ३८ ॥ और फिर इस संसार नामक दृढ बन्धनसे उसे छुटकारा कैसे मिलता है ? हे मुने ! आप सर्वज्ञ हैं, मुझ प्रणत शिष्यसे आप यह सम्पूर्ण रहस्य कहिये” ॥ ३९ ॥ |
| देहिनः संसृतिर्बन्धः कथमुत्पद्यते दृढः ॥३८॥ | |
| कथं विमुच्यते देही दृढबन्धाह्वयान्मिथात् । | |
| वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ मह्यं शिष्याय ते मुने ॥३९॥ | |
| वाल्मीकिरुवाच | **वाल्मीकिजी बोले—**सुन, मैं तुझे संक्षेपसे साधन-के सहित बन्ध और मोक्षका सम्पूर्ण स्वरूप सुनाता हूँ। मैं जैसा कहूँ वह सब सुनकर तू उसी प्रकार आचरण कर । इससे तेरा कल्याण होगा और तू जीवन्मुक्त हो जायगा । देहहीन चेतन आत्माका यह देह ही बड़ा भारी घर है ॥ ४०-४१ ॥ इसमें उसने अहंकारको ही अपना मन्त्री बना रक्खा है। यह अहंकाररूप मन्त्री देहगेहाभिमानरूप अपने आपको चेतन आत्मामें आरोपितकर उससे एकरूप होकर अपनी सारी चेष्टाओं-का आरोप उस चिदानन्दरूप आत्मामें ही करता है। उस अहंकारसे व्याप्त हुआ देही (जीव ) उसीके संकल्प-से प्रेरित होकर संकल्परूपी बेड़ियोंसे बँधता है और फिर रात-दिन पुत्र, स्त्री और गृह आदिके लिये संकल्प-विकल्प करता रहता है ॥ ४२-४४ ॥ इस प्रकार |
| शृणु वक्ष्यामि ते सर्वं सङ्क्षेपाद्बन्धमोक्षयोः । | |
| स्वरूपं साधनं चापि मत्तः श्रुत्वा यथोदितम्॥४०॥ | |
| तथैवाचर भद्रं ते जीवन्मुक्तो भविष्यसि । | |
| देह एव महागेहमदेहस्य चिदात्मनः ॥४१॥ | |
| तस्याहङ्कार एवास्मिन्मन्त्री तेनैव कल्पितः । | |
| देहगेहाभिमानं स्वं समारोप्य चिदात्मनि ॥४२॥ | |
| तेन तादात्म्यमापन्नः स्वचेष्टितमशेषतः । | |
| विदधाति चिदानन्दे तद्वासितवपुः स्वयम् ॥४३॥ | |
| तेन सङ्कल्पितो देही सङ्कल्पनिगडावृतः । | |
| पुत्रदारगृहादीनि सङ्कल्पयति चानिशम् ॥४४॥ | |

३६४अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

संकल्पयन्स्वयं देही परिशोचति सर्वदा ।<br>त्रयस्तस्याहमो देहा अधमोत्तममध्यमाः ॥४५॥<br>तमःसत्त्वरजःसंज्ञा जगतः कारणं स्थितेः ।<br>तमोरूपाद्धि सङ्कल्पाश्नित्यं तामसचेष्टया ॥४६॥<br>अत्यन्तं तामसो भूत्वा कृमिकीटत्वमाप्नुयात् ।<br>सत्त्वरूपो हि सङ्कल्पो धर्मज्ञानपरायणः ॥४७॥<br>अदूरमोक्षसाम्राज्यः सुखरूपो हि तिष्ठति ।<br>रजोरूपो हि सङ्कल्पो लोके संव्यवहारवान् ॥४८॥<br>परितिष्ठति संसारे पुत्रदारानुरञ्जितः ।<br>त्रिविधं तु परित्यज्य रूपमेतन्महामते ॥४९॥<br>सङ्कल्पं परमाप्नोति पदमात्मपरिक्षये ।<br>दृष्टीः सर्वाः परित्यज्य नियम्य मनसा मनः॥५०॥<br>सबाह्याभ्यन्तरार्थस्य सङ्कल्पस्य क्षयं कुरु ।<br>यदि वर्षसहस्राणि तपश्चरसि दारुणम् ॥५१॥<br>पातालस्थस्य भूस्थस्य स्वर्गस्थस्यापि तेऽनघ ।<br>नान्यः कश्चिदुपायोऽस्ति सङ्कल्पोपशमादृते ॥५२॥<br>अनाबाधेऽविकारे स्वे सुखे परमपावने ।<br>सङ्कल्पोपशमे यत्नं पौरुषेण परं कुरु ॥५३॥<br>सङ्कल्पतन्तौ निखिला भावाः प्रोताः कलानघ ।<br>छिन्ने तन्तौ न जानीमः क्व यान्ति विभवाः पराः ॥<br>निःसङ्कल्पो यथाप्राप्तव्यवहारपरो भव ।<br>क्षये सङ्कल्पजालस्य जीवो ब्रह्मत्वमाप्नुयात् ॥५५॥<br>अधिगतपरमार्थतामुपेत्य<br>प्रसभमपास्य विकल्पजालमुच्चैः ।<br>अधिगमय पदन्तदद्वितीयं<br>विततसुखाय समुन्नचित्तवृत्तिः ॥५६॥ | संकल्प करनेसे जीव स्वयं ही सदा शोक करता है।<br>इस अहंकारके सत्त्व, रज, तम नामक उत्तम, अधम और मध्यम तीन प्रकारके देह हैं। ये ही तीनों संसारकी स्थितिके कारण हैं। इनमेंसे तामस संकल्पसे नित्यप्रति तामसिक चेष्टाएँ करनेसे ही जीव अत्यन्त तमोगुणी होकर कीड़े-मकोड़े आदि योनियोंको प्राप्त होता है। जो सात्त्विक संकल्पवाला होता है वह धर्म और ज्ञानमें ही तत्पर रहनेके कारण मोक्ष-साम्राज्यके पास ही सुखपूर्वक रहता है। तथा राजस संकल्प होनेसे लोकव्यवहार करता हुआ संसारमें पुत्र, स्त्री आदिमें अनुरक्त रहता है। हे महामते ! जो पुरुष इन तीनों प्रकारके संकल्पोंको छोड़ देता है वह चित्तके लीन होनेपर परमपद प्राप्त कर लेता है। इसलिये तू समस्त विचारोंको छोड़कर और अपने मनसे ही मनका संयम- कर बाहर-भीतरके सम्पूर्ण संकल्पोंका क्षय कर दे। हे अनघ ! यदि तू पाताल, पृथिवी अथवा स्वर्ग आदिमें कहीं भी रहकर हजारों वर्ष कठोर तपस्या भी करे तो भी (संसार-बन्धनसे मुक्त होनेका तो) संकल्पनाशके अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं ॥ ४५–५२ ॥ इसलिये जो दुःखहीन, विकारहीन, स्वानन्दस्वरूप और परम पवित्र है उस संकल्पशान्तिके लिये तू पुरुषार्थपूर्वक पूर्ण प्रयत्न कर ॥५३॥ हे अनघ ! ये जितने भाव-पदार्थ हैं वे सब संकल्पके तागेमें पिरोये हुए हैं; जिस समय वह तागा टूट जाता है उस समय पता भी नहीं चलता कि संसारके ये परम वैभव कहाँ चले जाते हैं ? ॥ ५४ ॥ अतः संकल्प-विकल्पको छोड़कर प्रारब्ध-प्रवाहसे प्राप्त हुए व्यवहारमें तत्पर रह । संकल्पजालके क्षीण हो जानेपर जीवको ब्रह्मत्व प्राप्त हो जाता है ॥ ५५ ॥ परमार्थज्ञानसे सम्पन्न होकर तू हठपूर्वक सम्पूर्ण विकल्पजालको त्याग दे और पूर्ण आनन्दकी प्राप्तिके लिये चित्तवृत्तिको लीन करके उस अद्वितीय पदको प्राप्त कर ले ॥ ५६ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

सर्ग ७ ] उत्तरकाण्ड ३६५


सप्तम सर्ग

भगवान् रामके यज्ञमें कुश और लवका गान, सीताजीका पृथिवी-प्रवेश,
रामचन्द्रजीका माताको उपदेश।


श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! वाल्मीकि मुनि-
वाल्मीकिना बोधितोऽसौ कुशः सद्योगतभ्रमः।<br>अन्तर्मुक्तो बहिः सर्वमनुकुर्वंश्चचार सः ॥ १ ॥के इस प्रकार समझानेपर तुरन्त ही कुशका सारा भ्रम जाता रहा और वह अपने अन्तःकरणसे मुक्त होकर बाहरसे सम्पूर्ण क्रियाएँ करते हुए विचरने लगा ॥ १ ॥
वाल्मीकिरपि तौ प्राह सीतापुत्रौ महाधियौ।<br>यत्र तत्र च गायन्तौ पुरे वीथिषु सर्वतः ॥ २ ॥तत्र वाल्मीकिजीने जहाँ-तहाँ नगरकी गलियोंमें सब ओर गाते हुए उन दोनों महाबुद्धिमान् सीता-पुत्रोंसे कहा—॥ २ ॥
तस्याग्रे प्रगायेतां शुश्रूषुर्यदि राघवः।<br>न ग्राह्यं वै युवाभ्यां तद्यदि किञ्चित्प्रदास्यति ॥३॥“यदि महाराज रामकी सुननेकी इच्छा हो तो उनके सामने भी गाओ, परन्तु वे कुछ देने लगें तो लेना मत” ॥ ३ ॥
इति तौ चोदितौ तत्र गायमानौ विचेरतुः।<br>यथोक्तं ऋषिणा पूर्वं तत्र तत्राभ्यगायताम् ॥ ४ ॥मुनिकी ऐसी आज्ञा होनेपर वे गाते हुए विचरने लगे। ऋषिने जहाँ-जहाँ गान करनेको पहले कहा था उन्हीं-उन्हीं स्थानोंपर उन्होंने गान किया।
तं स शुश्राव काकुत्स्थः पूर्वचर्यां ततस्ततः।<br>अपूर्वपाठजातिं च गेयेन समभिप्लुताम् ॥ ५ ॥तब ककुत्स्थनन्दन रघुनाथजीने जहाँ-तहाँ अपने पूर्व-चरित्रके गाये जानेका समाचार सुना।
बाल्यो राघवः श्रुत्वा कौतूहलमुपेयिवान्।<br>अथ कर्मान्तरे राजा समाहूय महामुनीन् ॥६॥भगवान् रामको यह सुनकर कि, उन बालकोंकी गान-विधि निराले ही ढंगकी और स्वर-ताल-सम्पन्न है, बड़ा ही कुतूहल हुआ।
राज्ञश्चैव नरव्याघ्रः पण्डितांश्चैव नैगमान्।<br>पौराणिकाञ् शब्दविदो ये च वृद्धा द्विजातयः ॥७॥अतः नरशार्दूल महाराज रामने यज्ञकर्मके विश्राम-समयमें सम्पूर्ण मुनीश्वरों, राजाओं, पण्डितों, शास्त्रज्ञों, पौराणिकों, शब्दशास्त्रियों, बड़े-बूढ़ों और द्विजातियोंको बुलाया ॥ ४-७ ॥
एतान्सर्वान्समाहूय गायकौ समवेशयत्।<br>ते सर्वे हृष्टमनसो राजानो ब्राह्मणादयः ॥ ८ ॥इन सबको बुला चुकनेपर उन्होंने गानेवाले बालकोंको बुलाया। वे सब राजा और ब्राह्मण आदि प्रसन्न-चित्तसे महाराज राम और उन
रामं तौ दारको दृष्ट्वा विस्मिता ह्यनिमेषणाः।<br>अवोचन् सर्व एवेते परस्परमथागताः ॥ ९ ॥दोनों बालकोंको देखकर आश्चर्यचकित हो गये और उनकी टकटकी बँध गयी। तब वहाँ एकत्रित हुए वे सब लोग आपसमें कहने लगे—॥ ८-९॥
इमौ रामस्य सदृशौ बिम्बाद्विम्बमिवोदितौ।<br>जटिलौ यदि न स्यातां न च वल्कलधारिणौ ॥१०॥“ये दोनों तो, बिम्बसे प्रकट हुए प्रतिबिम्बके समान, श्रीरामचन्द्रजीके समान ही दिखायी देते हैं। यदि ये जटाजूट और वल्कल धारण किये न होते तो इनमें और रघुनाथजीमें कोई
विशेषं नाधिगच्छामो राघवस्यानयोस्तदा।<br>एवं संवदतां तेषां विस्मितानां परस्परम् ॥११॥अन्तर ही न जान पड़ता।” इस प्रकार, जब वे सब लोग आश्चर्यचकित होकर आपसमें विवाद कर रहे थे
उपनद्धमभूत्तूर्णं तावुभौ मुनिदारकौ।<br>ततः प्रवृत्तं मधुरं गान्धर्वमतिमानुषम् ॥१२॥उन दोनों मुनिकुमारोंने गानेकी तैयारी की और (कुछ ही देरमें) वहाँ अत्यन्त मधुर एवं अलौकिक गान होने लगा ॥ १०--१२ ॥
३६६अध्यात्मरामायण[ सर्गः ७

श्रुत्वा तन्मधुरं गीतमपराह्ने रघूत्तमः ।<br>उवाच भरतं चाभ्यां दीयतामयुतं वसु ॥१३॥<br>दीयमानं सुवर्णं तु न तज्जगृहतुस्तदा ।<br>किमनेन सुवर्णेन राजनौ वन्यभोजनौ ॥१४॥<br>इति सन्त्यज्य सन्दत्तं जग्मतुर्मु निसन्निधिम् ।<br>एवं श्रुत्वा तु चरितं रामः स्वस्यैव विस्मितः ॥१५॥<br>ज्ञात्वा सीताकुमारौ तौ शत्रुघ्नं चेदमब्रवीत् ।<br>हनूमन्तं सुषेणं च विभीषणमथाङ्गदम् ॥१६॥<br>भगवन्तं महात्मानं वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् ।<br>आनयध्वं मुनिवरं ससीतं देवसम्मितम् ॥१७॥<br>अस्यास्तु पर्षदो मध्ये प्रत्ययं जनकात्मजा ।<br>करोतु शपथं सर्वे जानन्तु गतकल्मषाम् ॥१८॥<br>सीतां तद्वचनं श्रुत्वा गताः सर्वेऽतिविस्मिताः ।<br>ऊचुर्यथोक्तं रामेण वाल्मीकिं रामपार्षदाः ॥१९॥<br>रामस्य हृद्गतं सर्वं ज्ञात्वा वाल्मीकिरब्रवीत् ।<br>श्वः करिष्यति वै सीता शपथं जनसंसदि ॥२०॥<br>योषितां परमं दैवं पतिरेव न संशयः ।<br>तच्छ्रुत्वा सहसा गत्वा सर्वे प्रोचुर्मुनेर्वचः ॥२१॥<br>राघवस्यापि रामोऽपि श्रुत्वा मुनिवचस्तथा ।<br>राजानो मुनयः सर्वे शृणुध्वमिति चाब्रवीत् ॥२२॥<br>सीतायाः शपथं लोका विजानन्तु शुभाशुभम् ।<br>इत्युक्ता राघवेणाथ लोकाः सर्वे दिदृक्षवः ॥२३॥<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव महर्षयः ।<br>वानराश्च समाजग्मुः कौतूहलसमन्विताः ॥२४॥<br>ततो मुनिवरस्तूर्णं ससीतः समुपागमत् ।<br>अग्रतस्तमृषिं कृत्वाऽऽयान्ती किञ्चिदवाङ्मुखी २५<br>कृताञ्जलिर्बाष्पकण्ठा सीता यज्ञं विवेश तम् ।<br>दृष्ट्वा लक्ष्मीमिवायान्तीं ब्रह्माणमनुयायिनीम् ॥२६॥ | वह मधुर गान सुनकर श्रीरघुनाथजीने दिन ढलने-पर भरतजीसे कहा—"इन्हें दश सहस्र सुवर्ण-मुद्रा दो" ॥ १३ ॥ किन्तु उन बालकोंने उस दिये हुए सुवर्णको ग्रहण न किया । वे ऐसा कहकर कि 'हे राजन् ! हम तो वनके कन्द-मूल-फलादि खानेवाले हैं, हम यह द्रव्य लेकर क्या करेंगे' उस दिये हुए सुवर्णको वहीं छोड़कर मुनिके निकट चले आये । इस प्रकार भगवान् राम अपना ही चरित्र सुनकर विस्मित हो गये ॥ १४-१५ ॥ और उन्हें सीताजीके पुत्र जानकर शत्रुघ्न, हनुमान, सुषेण, विभीषण और अंगदादिसे कहा— ॥ १६ ॥ "देवंतुल्य महानुभाव मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीवाल्मीकि मुनिको सीताजीके सहित लाओ ॥ १७ ॥ इस सभामें जानकीजी सबको विश्वास करानेके लिये शपथ करें, जिससे सब लोग सीताको निष्कलंक जान जायँ ।" भगवान् रामके ये वचन सुनकर उनके वे सब दूत अति आश्चर्यचकित हो वाल्मीकिजीके पास गये और जैसा श्रीरामचन्द्रजीने कहा था वह सब उनसे कह दिया ॥ १८-१९ ॥ इससे भगवान् रामका आशय जानकर श्रीवाल्मीकिजीने कहा-"सीताजी कल जनसाधारणमें शपथ करेंगी ॥ २० ॥ इसमें सन्देह नहीं, स्त्रियोंके लिये सबसे बड़ा देव पति ही है।" मुनिके ये वचन सुनकर उन सबने सहसा जाकर वे सब बातें रघुनाथजीसे कह दीं। तब श्रीरामचन्द्रजीने मुनिका सन्देश सुनकर कहा—"हे नृपतिगण और मुनिजन ! अब आप सब लोग सीताजीकी शपथ सुनें; और उससे उनका शुभाशुभ जान लें ।"<br><br>भगवान् रामके इस प्रकार कहनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, महर्षि और वानर आदि सभी लोग कुतूहलवश सीताजीकी शपथ देखनेके लिये आये॥ २१-२४ ॥ तब तुरन्त ही सीताजीके सहित मुनीश्वर भी आये । श्रीसीताजीने वाल्मीकि मुनिको आगे कर (उनके पीछे-पीछे) मुख कुछ नीचेको किये हाथ जोड़े गद्गद-कण्ठसे यज्ञशालामें प्रवेश किया । ब्रह्माजीके पीछे आती हुई लक्ष्मीजीके समान सीताजीको वाल्मीकि मुनिके पीछे आती |


[ सर्ग ९७ ] | उत्तरकाण्ड | ३६७


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वाल्मीकेः पृष्ठतः सीतां साधुवादो महानभूत् ।<br>तदा मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः ॥२७॥<br><br>सीतासहायो वाल्मीकिरिति प्राह च राघवम् ।<br>इयं दाशरथे सीता सुव्रता धर्मचारिणी ॥२८॥<br><br>अपापा ते पुरा त्यक्ता ममाश्रमसमीपतः ।<br>लोकापवादभीतेन त्वया राम महावने ॥२९॥<br><br>प्रत्ययं दास्यते सीता तदनुज्ञातुमर्हसि ।<br>इमौ तु सीतातनयाविमौ यमलजातको ॥३०॥<br><br>सुतौ तु तव दुर्धर्षो तथ्यमेतद्ब्रवीमि ते ।<br>प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो रघुकुलोद्वह ॥३१॥<br><br>अनृतं न स्मराम्युक्तं यथेमौ तव पुत्रकौ ।<br>बहून्वर्षगणान् सम्यक्तपश्चर्या मया कृता ॥३२॥<br><br>नोपाश्नीयां फलं तस्या दुष्टेयं यदि मैथिली ।<br>वाल्मीकिनैवमुक्तस्तु राघवः प्रत्यभाषत ॥३३॥<br><br>एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि सुव्रत ।<br>प्रत्ययो जनितो मह्यं तव वाक्यैरकिल्विषैः ॥३४॥<br><br>लङ्कायामपि दत्तो मे वैदेह्या प्रत्ययो महान् ।<br>देवानां पुरतस्तेन मन्दिरे सम्प्रवेशिता ॥३५॥<br><br>सेयं लोकभयाद्ब्रह्मन्नपापाऽपि सती पुरा ।<br>सीता मया परित्यक्ता भवांस्तत्क्षन्तुमर्हति ॥३६॥<br><br>ममैव जातौ जानामि पुत्रावेतौ कुशीलवौ ।<br>शुद्धायां जगतीमध्ये सीतायां प्रीतिरस्तु मे ॥३७॥<br><br>देवाः सर्वे परिज्ञाय रामाभिप्रायमुत्सुकाः ।<br>ब्राह्मणमग्रतः कृत्वा समाजग्मुः सहस्रशः ॥३८॥<br><br>प्रजाः समागमन्हृष्टाः सीता कौशेयवासिनी ।<br>उदङ्मुखी ह्यधोदृष्टिः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥३९॥देख उस जन-समाजमें बड़ा भारी साधुवाद (धन्य है, धन्य है—ऐसा शब्द) होने लगा । तब सीताजीके सहित मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिने उस जन-समूहमें घुसकर श्रीरघुनाथजीसे कहा—"हे दशरथनन्दन ! इस पतिव्रता धर्मपरायणा निष्कलङ्का सीताको तुमने कुछ समय हुआ लोकापवादसे डरकर भयंकर वनमें मेरे आश्रमके पास छोड़ दिया था ॥ २५--२९ ॥ अब वह अपना विश्वास देना चाहती है, आप उसे आज्ञा दीजिये । ये दोनों (कुश और लव) सीताके एक साथ उत्पन्न हुए पुत्र हैं ॥ ३० ॥ मैं सच कहता हूँ, ये दोनों दुर्जय-वीर आपकी ही सन्तान हैं। हे राघव ! मैं प्रजापति प्रचेता-का दशवाँ पुत्र हूँ ॥ ३१ ॥ मैंने कभी मिथ्या भाषण किया हो—ऐसा मुझे स्मरण नहीं है; वही मैं आपसे कहता हूँ कि ये बालक आपकीके पुत्र हैं। मैंने अनेकों वर्षतक खूब तपस्या की है ॥३२॥ यदि इस मिथिलेश-कुमारीमें कोई दोष हो तो मुझे उस तपस्याका कोई फल न मिले ।"<br><br>वाल्मीकिजीके इस प्रकार कहनेपर श्रीरघुनाथजी बोले—॥ ३३ ॥ "हे महाप्राज्ञ ! हे सुव्रत ! आप जैसा कहते हैं, बात ऐसी ही है । आपके निर्दोष वाक्योंसे ही मुझे तो पूर्ण विश्वास हो गया ॥ ३४ ॥ जानकी-जीने लंकामें भी देवताओंके सामने बड़ी विकट परीक्षा दी थी, इसीलिये मैंने उन्हें अपने घरमें रख लिया था ॥ ३५ ॥ किन्तु हे ब्रह्मन् ! उन्हीं सती सीताजीको, सर्वथा निर्दोष होते हुए भी, मैंने लोकनिन्दाके भयसे कुछ दिन हुए छोड़ दिया, सो आप मेरा यह अपराध क्षमा करें ॥ ३६ ॥ मैं यह भी जानता हूँ कि ये दोनों पुत्र कुश और लव मुझसेही उत्पन्न हुए हैं; संसारमें परम साध्वी सीतामें मेरी प्रीति हो" ॥ ३७ ॥<br><br>उस समय, रामजीका अभिप्राय जानकर समस्त देवगण अति उत्सुक हो ब्रह्माजीको आगे कर सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ आये ॥ ३८ ॥ तथा बहुत-से प्रजाजन भी प्रसन्नचित्तसे वहाँ एकत्रित हो गये । तब रेशमी वस्त्र धारण किये उत्तरकी ओर मुख और नीचेको नेत्र किये खड़ी हुई श्रीसीताजीने हाथ जोड़कर कहा—