अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
उत्तरकाण्ड - सर्ग २: राक्षसोंके राज्यस्थापनका विवरण
सर्ग २] उत्तरकाण्ड ३३७
इत्युक्तो रावणः प्राह नार्हस्येवं प्रभाषितुम् ॥ २८ ॥
वित्तेशो गुरुरस्माकमेवं श्रुत्वा तमब्रवीत् ।
प्रहस्तः प्रश्रितं वाक्यं रावणं दशकन्धरम् ॥ २९ ॥
शृणु रावण यत्नेन नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ।
नाधीता राजधर्मास्ते नीतिशास्त्रं तथैव च ॥ ३० ॥
शूराणां नहि सौभ्रात्रं शृणु मे वदतः प्रभो ।
कश्यपस्य सुता देवा राक्षसाश्च महाबलाः ॥ ३१ ॥
परस्परमयुध्यन्त त्यक्त्वा सौहृदमायुधैः ।
नैवेदानीन्तनं राजन् वैरं देवैरनुष्ठितम् ॥ ३२ ॥
सुमालीके ऐसा कहनेपर रावणने कहा—"आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥ धनपति कुबेर हमारे बड़े हैं।" यह सुनकर प्रहस्तने रावणसे अति नम्रतापूर्वक कहा—॥ २९ ॥ "हे रावण ! मैं जो कुछ कहता हूँ सावधान होकर सुनो । तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। अभी तुमने राजधर्म और नीतिशास्त्रका अध्ययन नहीं किया है ॥ ३० ॥ शूरवीरोंमें भ्रातृत्व नहीं हुआ करता । हे समर्थ ! इस विषयमें मैं जो कुछ निवेदन करता हूँ सुनिये । महर्षि कश्यपजीकी सन्तान देवता और राक्षस बड़े शूरवीर थे ॥ ३१ ॥ इसलिये वे बन्धुत्वको तिलाञ्जलि देकर परस्पर अस्त्र-शस्त्रोंसे लड़ने लगे । हे राजन् ! देवताओंके साथ हमारा वैर कुछ हालहीका नहीं है ( यह तो आरम्भसे ही चला आता है )" ॥ ३२ ॥
प्रहस्तस्य वचः श्रुत्वा दशग्रीवो दुरात्मनः ।
तथेति क्रोधताम्राक्षस्त्रिकूटाचलमन्वगात् ॥ ३३ ॥
दूतं प्रहस्तं सम्प्रेष्य निष्कास्य धनदेश्वरम् ।
लङ्कामाक्रम्य सचिवै राक्षसैः सुखमास्थितः ॥ ३४ ॥
धनदः पितृवाक्येन त्यक्त्वा लङ्कां महायशाः ।
गत्वा कैलासशिखरं तपसाऽतोषयच्छिवम् ॥ ३५ ॥
तेन सख्यमनुप्राप्य तेनैव परिपालितः ।
अलकां नगरीं तत्र निर्ममे विश्वकर्मणा ॥ ३६ ॥
दिक्पालत्वं चकारात्र शिवेन परिपालितः ।
दुरात्मा प्रहस्तके ये वचन सुनकर रावणने कहा—'तो ठीक है।' उस समय उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह तुरन्त ही त्रिकूट पर्वतपर पहुँचा ॥ ३३ ॥ उसने प्रहस्तको अपना दूत बनाकर भेजा और कुबेरको लंकापुरीसे निकालकर उसपर अपना अधिकार किया तथा अपने राक्षस-मन्त्रियोंके सहित वहाँ सुखपूर्वक रहने लगा ॥ ३४ ॥ महायशस्वी कुबेरने लंकापुरीको छोड़कर पिताके कहनेसे कैलास-पर्वतपर जाकर तपस्याद्वारा श्रीमहादेवजीको प्रसन्न किया ॥ ३५ ॥ तथा उनसे मित्रता स्थापित कर उन्हींसे सुरक्षित हो वहाँ विश्वकर्मासे अलका नामकी नगरी बनवायी ॥ ३६ ॥ वहाँ वे भगवान् शंकरकी रक्षामें रहकर दिक्पालत्व ( एक दिशाका अधिकार ) भोगने लगे ।
रावणो राक्षसैः सार्धमभिषिक्तः सहानुजैः ॥ ३७ ॥
राज्यं चकारासुराणां त्रिलोकीं बाधयन्खलः ।
भगिनीं कालखञ्जाय ददौ विकटरूपिणीम् ॥ ३८ ॥
विद्युज्जिह्वाय नाम्नासौ महामायी निशाचरः ।
ततो मयो विश्वकर्मा राक्षसानां दितेः सुतः ॥ ३९ ॥
सुतां मन्दोदरीं नाम्ना ददौ लोकैकसुन्दरीम् ।
इधर, महादुष्ट रावण राक्षसोंसे अभिषिक्त हो अपने भाइयोंके सहित तीनों लोकोंको कष्ट देता हुआ राक्षसोंका राज्य करने लगा । उस महामायावी राक्षसने अपनी विकरालबदना बहिन कालखञ्जके वंशमें उत्पन्न हुए विद्युज्जिह्व नामक राक्षसको विवाह दी। इसी समय, राक्षसोंके विश्वकर्मा दितिपुत्र मयने अपनी त्रिलोकसुन्दरी कन्या मन्दोदरी रावणको दी, और फिर उसे प्रसन्न-चित्तसे एक अमोघ
४३
| .३३८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
|---|
रावणाय पुनः शक्तिममोघां प्रीतमानसः ॥४०॥
वैरोचनस्य दौहित्रीं वृत्रज्वालेति विश्रुताम् ।
स्वयन्दत्तामुद्वहत्कुम्भकर्णाय रावणः ॥४१॥
गन्धर्वराजस्य सुतां शैलूषस्य महात्मनः ।
विभीषणस्य भार्यार्थे धर्मज्ञां समुदवहत् ॥४२॥
सरमां नाम सुभगां सर्वलक्षणसंयुताम् ।
ततो मन्दोदरी पुत्रं मेघनादमजीजनत् ॥४३॥
जातमात्रस्तु यो नादं मेघवत्समुमोच ह ।
ततः सर्वेऽब्रुवन्मेघनादोऽयमिति चासकृत् ॥४४॥
कुम्भकर्णस्ततः प्राह निद्रा मां बाधते प्रभो ।
ततश्च कारयामास गुहां दीर्घा सुविस्तराम् ॥४५॥
तत्र सुष्वाप मूढात्मा कुम्भकर्णो विघूर्णितः ।
निद्रिते कुम्भकर्णे तु रावणो लोकरावणः ॥४६॥
ब्राह्मणान् ऋषिमुख्यांश्च देवदानवकिन्नरान् ।
देवश्रियो मनुष्यांश्च निजघ्ने समहोरगान् ॥४७॥
धनदोऽपि ततः श्रुत्वा रावणस्याक्रमं प्रभुः ।
अधर्मं मा कुरुष्वेति दूतवाक्यैर्न्यवारयत् ॥४८॥
ततः क्रुद्धो दशग्रीवो जगाम धनदालयम् ।
विनिर्जित्य धनाध्यक्षं जहारोत्तमपुष्पकम् ॥४९॥
ततो यमं च वरुणं निर्जित्य समरेऽसुरः ।
स्वर्गलोकमगात्तूर्णं देवराजजिघांसया ॥५०॥
ततोऽभवन्महद्युद्धमिन्द्रेण सह दैवतैः ।
ततो रावणमभ्येत्य बबन्ध त्रिदशेश्वरः ॥५१॥
तच्छ्रुत्वा सहसाऽऽगत्य मेघनादः प्रतापवान् ।
कृत्वा घोरं महद्युद्धं जित्वा त्रिदशपुङ्गवान् ॥५२॥
इन्द्रं गृहीत्वा बद्ध्वाऽसौ मेघनादो महाबलः ।
मोचयित्वा तु पितरं गृहीत्वेन्द्रं ययौ पुरम् ॥५३॥
ब्रह्मा तु मोचयामास देवेन्द्रं मेघनादतः ।
दत्त्वा वरान्वहूस्तस्मै ब्रह्मा स्वभवनं ययौ ॥५४॥ | शक्ति भी दी ॥ ३७-४० ॥ तदनन्तर रावणने, स्वयं लाकर दी हुई वैरोचनकी धेवती वृत्रज्वालाके साथ कुम्भकर्णका विवाह किया ॥ ४१ ॥ तथा गन्धर्वराज महात्मा शैलूषकी पुत्री सरमाको, जो अति सुन्दरी सर्व-सुलक्षणसम्पन्ना और सुसन्न धर्मको जाननेवाली थी, उसने पत्नीरूपसे विभीषणको विवाह दिया । तत्पश्चात् मन्दोदरीने मेघनाद नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥४२-४३॥ जिसने उत्पन्न होते ही मेघके समान शब्द किया । इसलिये सबने बारम्बार यही कहा कि 'यह मेघनाद है' ॥ ४४ ॥ तदनन्तर कुम्भकर्ण बोला— "प्रभो ! मुझे निद्रा सता रही है !" (उसके सुख-पूर्वक सोनेयोग्य कोई स्थान नहीं था इसलिये) फिर उसने एक बड़ी लम्बी-चौड़ी गुहा बनवायी ॥४५॥ वहाँ मन्दमति कुम्भकर्ण खुर्राटे लेता हुआ सो गया । कुम्भकर्णके सो जानेपर सकल लोकोंको रुलानेवाले रावणने ब्राह्मण, मुख्य-मुख्य ऋषि, देवता, दानव, किन्नर, सर्प और मनुष्य सभीको मारा तथा देवताओंकी सम्पत्ति नष्ट कर दी ॥ ४६-४७ ॥<br><br>भगवान् कुबेरने जब रावणकी उच्छृङ्खलताका समाचार सुना तो उन्होंने दूतके मुखसे यह संदेश भेजकर कि 'अधर्म मत करो' उसे रोका ॥ ४८ ॥ इसपर रावण क्रोधित होकर कुबेरकी पुरीपर चढ़ आया और उन्हें परास्त कर उनका अति उत्तम पुष्पक विमान छीन लाया ॥ ४९ ॥ तदनन्तर वह राक्षस युद्धमें यम और वरुणको भी जीतकर इन्द्रका वध करनेकी इच्छासे तुरन्त ही स्वर्गलोकपर चढ़ आया ॥ ५० ॥ वहाँ इन्द्र और अन्य देवताओंके साथ उसका बड़ा घमासान युद्ध हुआ । इस समय देवराज इन्द्रने आगे बढ़कर रावणको बाँध लिया ॥ ५१ ॥ जब यह समाचार महाप्रतापी मेघनादने सुना तो उसने अकस्मात् आकर देवताओंसे घोर युद्ध किया और उन्हें जीतकर इन्द्रको पकड़कर बाँध लिया । फिर महाबली मेघनादने अपने पिताको छुड़ाया और इन्द्रको अपने साथ लेकर लंकापुरीमें लौट आया ॥ ५२-५३ ॥ फिर ब्रह्माजीने जाकर इन्द्रको मेघनादसे छुड़ाया और उसे बहुतसे वर देकर वे अपने लोकको चले गये ॥ ५४ ॥
| सर्ग २ ] | उत्तरकाण्ड | ३३९ |
|---|
| रावणो विजयी लोकान्सर्वान् जित्वा क्रमेण तु ।<br>कैलासं तोलयामास बाहुभिः परिघोपमैः ॥५५॥<br>तत्र नन्दीश्वरेणैव शप्तोऽयं राक्षसेश्वरः ।<br>वानरैर्मानुषैश्चैव नाशं गच्छेति कोपिना ॥५६॥<br>ततोऽप्यगणयन् वाक्यं ययौ हैहयपत्तनम् ।<br>तेन बद्धो दशग्रीवः पुलस्त्येन विमोचितः ॥५७॥<br>ततोऽतिबलमासाद्य जिघांसुर्हरिपुङ्गवम् ।<br>धृतस्तेनैव कक्षेण वालिना दशकन्धरः ॥५८॥<br>भ्रामयित्वा तु चतुरः समुद्रान् रावणं हरिः ।<br>विसर्जयामास ततस्तेन सख्यं चकार सः ॥५९॥<br>रावणः परमप्रीत एवं लोकान्महाबलः ।<br>चकार स्ववशे राम बुभुजे स्वयमेव तान् ॥६०॥<br>एवम्प्रभावो राजेन्द्र दशग्रीवः सहेन्द्रजित् ।<br>त्वया विनिहतः सङ्ख्ये रावणो लोकरावणः ॥६१॥<br>मेघनादश्च निहतो लक्ष्मणेन महात्मना ।<br>कुम्भकर्णश्च निहतस्त्वया पर्वतसन्निभः ॥६२॥<br>भवान्नारायणः साक्षाज्जगतामादिकृद्विभुः ।<br>त्वत्स्वरूपमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥६३॥<br>त्वन्नाभिकमलोत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामहः ।<br>अग्निस्ते मुखतो जातो वाचा सह रघूत्तम ॥६४॥<br>बाहुभ्यां लोकपालांश्चाद्यश्चक्षुर्भ्यां चन्द्रभास्करौ ।<br>दिशश्च विदिशश्चैव कर्णाभ्यां ते समुत्थिताः ॥६५॥<br>घ्राणात्प्राणः समुत्पन्नश्चाश्विनौ देवसत्तमौ ।<br>जङ्घाजानूरुजघनाद्भूवर्लोकादयोऽभवन् ॥६६॥<br>कुक्षिदेशात्समुत्पन्नाश्चत्वारः सागरा हरे ।<br>स्तनाभ्यामिन्द्रवरुणौ वालखिल्याश्च रेतसः ॥६७॥<br>मेढ्राद्यमो गुदान्मृत्युर्मन्यो रुद्रस्त्रिलोचनः । | विजयी रावणने क्रमसे सब लोकोंको जीतकर अपनी परिघके समान बड़ी-बड़ी भुजाओंसे कैलास पर्वतको उठा लिया ॥५५॥ वहाँ नन्दीश्वरने क्रोधित होकर राक्षसराज रावणको शाप दिया कि 'तू मनुष्य और वानरोंके हाथसे मारा जायगा' ॥५६॥ किन्तु रावणने इस शापको कुछ भी न गिना और तुरन्त ही हैहयराज (सहस्रार्जुन) की राजधानीको चल दिया । वहाँ सहस्रार्जुनने रावणको बाँध लिया । तब उसे पुलस्त्यजीने जाकर छुड़ाया ॥५७॥ फिर वह अत्यन्त बली वानरराज वालीको मारनेके लिये उद्यत हुआ, किन्तु उल्टे उन्होंने रावणको अपनी काँखमें दबा लिया ॥५८॥ और फिर चारों समुद्रोंपर घुमाकर उसे छोड़ दिया । तब रावणने उनसे मित्रता कर ली ॥५९॥ हे राम ! इस प्रकार महाबली रावण सम्पूर्ण लोकोंको अपने अधीन कर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक स्वयं ही भोगने लगा ॥६०॥<br>हे राजेन्द्र ! ये दशानन और इन्द्रजित् ऐसे प्रभावशाली थे । (उनमेंसे) लोकोंको रुलानेवाले रावणको आपने मारा और मेघनादका वध महात्मा लक्ष्मणजीने किया तथा पर्वतके समान दीर्घकाय कुम्भकर्णका भी आपनेही संहार किया ॥६१-६२॥ आप सब लोकोंके रचनेवाले साक्षात् सर्वव्यापक नारायणदेव हैं । यह सारा चराचर जगत् आपहीका स्वरूप है ॥६३॥ लोकपितामह ब्रह्माजी आपकी नाभिसे प्रकट हुए कमलसे उत्पन्न हुए हैं तथा हे रघुश्रेष्ठ ! वाणीके सहित अग्निदेवने आपके मुखसे जन्म लिया है ॥६४॥ आपकी भुजाओंसे लोकपालोंके समूह, नेत्रोंसे चन्द्रमा और सूर्य तथा कानोंसे दिशा-विदिशाएँ उत्पन्न हुई हैं ॥६५॥ इसी प्रकार आपकी घ्राणेन्द्रियसे प्राण और देवताओंमें श्रेष्ठ अश्विनीकुमार प्रकट हुए हैं तथा जङ्घा, जानु, उरु और जघनादि अङ्गोंसे भुवर्लोक आदि हुए हैं ॥६६॥ हे हरे ! आपकी कुक्षिसे चार समुद्र, स्तनोंसे इन्द्र और वरुण तथा वीर्यसे बालखिल्यादि मुनीश्वर हुए हैं ॥६७॥ आपकी उपस्थेन्द्रियसे यम, गुदासे मृत्यु, क्रोधसे त्रिनयन |
३४० अध्यात्मरामायण [सर्ग २
अस्थिभ्यः पर्वता जाताः केशेभ्यो मेघसंहतिः॥६८॥
ओषध्यस्तव रोमेभ्यो नखेभ्यश्च खरादयः।
त्वं विश्वरूपः पुरुषो मायाशक्तिसमन्वितः ॥६९॥
नानारूप इवाभासि गुणव्यतिकरे सति।
त्वामाश्रित्यैव विबुधाः पिबन्त्यमृतमध्वरे ॥७०॥
त्वया सृष्टमिदं सर्वं विश्वं स्थावरजङ्गमम्।
त्वामाश्रित्यैव जीवन्ति सर्वे स्थावरजङ्गमाः ॥७१॥
त्वद्भक्तमखिलं वस्तु व्यवहारेऽपि राघव।
क्षीरमध्यगतं सर्पिर्यथा व्याप्याखिलं पयः ॥७२॥
त्वद्भासा भासतेऽर्कादि न त्वं तेनावभाससे।
सर्वगं नित्यमेकं त्वां ज्ञानचक्षुर्विलोकयेत् ॥७३॥
नाज्ञानचक्षुस्त्वां पश्येदन्धदृग्भास्करं यथा।
योगिनस्त्वां विचिन्वन्ति स्वदेहे परमेश्वरम्॥७४॥
अतन्निरसनमुखैर्वेदशीर्षैरहर्निशम् ।
त्वत्पादभक्तिलेशेन गृहीता यदि योगिनः ॥७५॥
विचिन्वन्तो हि पश्यन्ति चिन्मात्रं त्वां न चान्यथा।
मया प्रलपितं किञ्चित्सर्वज्ञस्य तवाग्रतः।
क्षन्तुमर्हसि देवेश तवानुग्रहभागहम् ॥७६॥
दिग्देशकालपरिहीनमनन्यमेकं
चिन्मात्रमक्षरमजं चलनादिहीनम्।
सर्वज्ञमीश्वरमनन्तगुणं व्युदस्त-
मायं भजे रघुपतिं भजतामभिन्नम् ॥७७॥
महादेवजी, अस्थियोंसे पर्वतसमूह, केशोंसे मेघ, रोमोंसे ओषधियाँ तथा नखोंसे गधे आदि उत्पन्न हुए हैं। अपनी मायाशक्तिसे युक्त आप ही विश्वरूप परम पुरुष हैं॥६८-६९॥ प्रकृतिके गुणोंके युक्त होनेपर आप ही नानारूप-से दिखायी देने लगते हैं; आपहीके आश्रयमें देवगण यज्ञोंमें अमृतपान करते हैं॥७०॥ यह सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत् आपनेही रचा है और समस्त चराचर प्राणी आपहीके आश्रयमें जीवित रहते हैं॥७१॥ हे रघुनाथजी ! जिस प्रकार दूधमें मिला हुआ घी उसमें सर्वत्र व्याप्त रहता है उसी प्रकार व्यवहारकालमें भी सम्पूर्ण वस्तुएँ आपहीसे व्याप्त रहती हैं॥७२॥ सूर्य-चन्द्रादि भी सब आपहीके प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं किन्तु आप उनसे प्रकाशित नहीं होते। आप सर्वगत, नित्य और एक हैं, जिस पुरुषको ज्ञानदृष्टि प्राप्त हो जाती है वही आपको देख सकता है॥७३॥ जिस प्रकार अन्धेको सूर्य नहीं दिखायी दे सकता उसी प्रकार जो ज्ञाननेत्रसे रहित हैं वह आपका दर्शन नहीं कर सकता। योगिजन अनात्म-पदार्थोंका बाध करनेवाले उपनिषद्वाक्योंद्वारा अहर्निश आप परमात्माको अपने शरीरमें ही खोजते हैं। यदि उन योगियोंपर आपके चरणोंकी भक्तिका लेशमात्र भी प्रभाव होता है तभी वे खोजते-खोजते अन्तमें चिन्मात्रस्वरूप आपको देख पाते हैं, और किसी प्रकार नहीं। मैंने आप सर्वज्ञके सामने कुछ प्रलाप (बकवाद) किया है, सो आप क्षमा करें, क्योंकि हे देवेश्वर! मैं आपकी कृपाका पात्र हूँ॥७४—७६॥ जो दिशा, देश और कालसे रहित तथा अनन्य, एक, चिन्मात्र, अविनाशी, अजन्मा और चलनादि क्रियासे रहित हैं उन सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, अनन्तगुणसम्पन्न, मायाहीन और अपने भक्तजनोंसे सदा अभिन्न रहनेवाले रघुनाथजीको मैं भजता हूँ॥७७॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥२॥
सगे ३ ] उत्तरकाण्ड ३४१
तृतीय सर्ग
वाली और सुग्रीवका पूर्वचरित्र तथा रावण-सनत्कुमार-संवाद ।
| श्रीराम उवाच | श्रीरामचन्द्रजी बोले—हे मुने ! मैं वाली और सुग्रीवके जन्मका यथावत् वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ। मैंने सुना है कि ये इन्द्र और सूर्य ही वानररूपसे उत्पन्न हुए थे ॥१॥ |
|---|---|
| वालिसुग्रीवयोजन्म श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।<br>रवीन्द्रौ वानराकारौ सञ्जात इति नः श्रुतम् ॥ १ ॥ | |
| अगस्त्य उवाच | अगस्त्यजी बोले—हे राम ! मेरु पर्वतके मणिके समान प्रकाशमान सुवर्णमय मध्यशिखरपर ब्रह्माजीकी सौ योजन विस्तारवाली सभा है ॥२॥ उसमें चतुर्मुख ब्रह्माजी किसी समय ध्यानस्थ हुए बैठे थे, उस समय उनके नेत्रोंसे बहुत-से दिव्य आनन्दाश्रु गिरे ॥३॥ उन्हें अपने हाथमें लेकर ब्रह्माजीने कुछ चिन्तन कर पृथिवीपर डाल दिया। पृथिवीपर गिरते ही उनसे एक बहुत बड़ा वानर उत्पन्न हुआ ॥४॥ उससे ब्रह्माजीने कहा "वत्स ! तू कुछ समय यहाँ मेरे पास इस सर्वशोभासम्पन्न स्थानमें रह, इससे तेरा कल्याण होगा" ॥५॥ ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर वह वानरश्रेष्ठ वहीं रहने लगा । इस प्रकार बहुत समय बीत जानेपर एक दिन उस परमबुद्धिमान् ऋक्षराजने* फल-मूलादिके लिये घूमते-घूमते एक दिव्य जलपूर्ण और रत्नजटित शिलाओंसे सुशोभित बावड़ी देखी ॥६-७॥ जब वह वहाँ पानी पीनेके लिये गया तो उसने जलमें एक छायामय वानर देखा। उसे अपना प्रतिद्वन्द्वी वानर समझकर वह जलमें कूद पड़ा ॥८॥ किन्तु वहाँ कोई भी वानर न मिलनेपर वह तुरन्त ही उछलकर बाहर निकल आया और अपनेको एक अति सुन्दरी रमणीके रूपमें देखकर बड़ा ही चकित हुआ ॥९॥ |
| मेरोः स्वर्णमयस्याद्रेर्मध्यशृङ्गे मणिप्रभे ।<br>तस्मिन्सभाऽऽस्ते विस्तीर्णा ब्रह्मणः शतयोजना ॥ २॥ | |
| तस्यां चतुर्मुखः साक्षात्कदाचिद्योगमास्थितः ।<br>नेत्राभ्यां पतितं दिव्यमानन्दसलिलं बहु ॥ ३ ॥ | |
| तद्गृहीत्वा करे ब्रह्मा ध्यात्वा किञ्चित्तदत्यजत् ।<br>भूमौ पतितमात्रेण तस्माज्जातो महाकपिः ॥ ४ ॥ | |
| तमाह द्रुहिणो वत्स किञ्चित्कालं वसत्र मे ।<br>समीपे सर्वशोभाढ्ये ततः श्रेयो भविष्यति ॥ ५ ॥ | |
| इत्युक्तो न्यवसत्तत्र ब्रह्मणा वानरोत्तमः ।<br>एवं बहुतिथे काले गते ऋक्षांधिपः सुधीः ॥ ६ ॥ | |
| कदाचित्पर्यटन्नद्रौ फलमूलार्थमुद्यतः ।<br>अपश्यद्दिव्यसलिलां वापीं मणिशिलान्विताम् ॥ ७ ॥ | |
| पानीयं पातुमागच्छत्तत्र छायामयं कपिम् ।<br>दृष्ट्वा प्रतिकपिं मत्वा निपपात जलान्तरे ॥ ८ ॥ | |
| तत्रादृष्ट्वा हरिं शीघ्रं पुनरुत्प्लुत्य वानरः ।<br>अपश्यत्सुन्दरीं रामामात्मानं विस्मयं गतः ॥ ९ ॥ | |
| ततः सुरेशो देवेशं पूजयित्वा चतुर्मुखम् ।<br>गच्छन्मध्याह्नसमये दृष्ट्वा नारीं मनोरमाम् ॥ १० ॥ | उस समय देवराज इन्द्र मध्याह्न कालमें ब्रह्माजीकी पूजा करके लौट रहे थे । उस परमसुन्दरी स्त्रीको देखकर वे कामदेवके बाणोंसे बिंध गये और उनका उत्तम वीर्य स्खलित हो गया । वह वीर्य उस स्त्रीको प्राप्त न होकर उसके बालोंको छूता हुआ पृथिवीपर गिर पड़ा ॥१०-११॥ उससे इन्द्रके समान पराक्रमी वालीका जन्म हुआ । देवराज इन्द्र उसे एक सुवर्णमयी माला देकर स्वर्गलोकको चले गये ॥१२॥ |
| कन्दर्पशरविद्धाङ्गस्त्यक्तवान्वीर्यमुत्तमम् ।<br>तामप्राप्यैव तद्वीजं वालदेशेऽपतद्भुवि ॥ ११ ॥ | |
| वाली समभवत्तत्र शक्रतुल्यपराक्रमः ।<br>तस्य दत्त्वा सुरेशानः स्वर्णमालां दिवं गतः ॥ १२॥ |
* यह उस वानरका नाम था ।
| ३४२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
|---|
भानुरप्यागतस्तत्र तदानीमेव भामिनीम् ।
दृष्ट्वा कामवशो भूत्वा ग्रीवादेशेऽसृजन्महत् ॥ १३ ॥
बीजं तस्यास्ततः सद्यो महाकायोऽभवद्धरिः ।
तस्य दत्त्वा हनूमन्तं सहायार्थं गतो रविः ॥ १४ ॥
पुत्रद्वयं समादाय गत्वा सा निद्रिता क्वचित् ।
प्रभातेऽपश्यदात्मानं पूर्ववद्वानराकृतिम् ॥ १५ ॥
फलमूलादिभिः सार्धं पुत्राभ्यां सहितः कपिः ।
नत्वा चतुर्मुखस्याग्रे ऋक्षराजः स्थितः सुधीः ॥ १६ ॥
ततोऽब्रवीत्समाश्वास्य बहुशः कपिकुञ्जरम् ।
तत्रैकं देवदूतमाहूयामरसन्निभम् ॥ १७ ॥
गच्छ दूत मयाऽऽदिष्टो गृहीत्वा वानरोत्तमम् ।
किष्किन्धां दिव्यनगरीं निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ १८ ॥
सर्वसौभाग्यवलितां देवैरपि दुरासदाम् ।
तस्यां सिंहानेने वीरं राजानमभिषेचय ॥ १९ ॥
सप्तद्वीपगता ये ये वानराः सन्ति दुर्जयाः ।
सर्वे ते ऋक्षराजस्य भविष्यन्ति वशेऽनुगाः ॥ २० ॥
यदा नारायणः साक्षाद्रामो भूत्वा सनातनः ।
भूभारासुरनाशाय सम्भविष्यति भूतले ॥ २१ ॥
तदा सर्वे सहायार्थं तस्य गच्छन्तु वानराः ।
इत्युक्तो ब्रह्मणा दूतो देवानां स महामतिः ॥ २२ ॥
यथाऽऽज्ञप्तस्तथा चक्रे ब्रह्मणा तं हरीश्वरम् ।
देवदूतस्ततो गत्वा ब्रह्मणे तन्न्यवेदयत् ॥ २३ ॥
तदादि वानराणां सा किष्किन्धाऽभून्नृपाश्रयः । २४ ।
सर्वेश्वरस्त्वमेवासीरिदानीं ब्रह्मणाऽर्थितः ।
भूमेर्भारो हृतः कृत्स्नस्त्वया लीलानृदेहिना ।
सर्वभूतान्तरस्थस्य नित्यमुक्तचिदात्मनः ॥ २५ ॥
अखण्डानन्तरूपस्य कियानेष पराक्रमः ।
उसी समय वहाँ सूर्यदेव भी आये। उस सुन्दरीको देखकर वे कामवश हो गये तथा उसकी ग्रीवापर अपना उग्र वीर्य छोड़ा। उससे उसी समय एक बहुत बड़े शरीरवाला वानर उत्पन्न हुआ। सूर्यदेव उसकी सहायताके लिये उसको हनुमान्जी देकर चले गये ॥१३-१४॥
उन दोनों पुत्रोंको लेकर वह स्त्री कहीं जाकर सो गयी। दूसरे दिन सबेरे (उठनेपर) उसने पहलेके समान अपनेको फिर वानररूप ही देखा ॥१५॥ फिर वह परम बुद्धिमान् ऋक्षराज फल-मूलादि लेकर अपने पुत्रोंके सहित ब्रह्माजीकी सभामें आया और उन्हें नमस्कार कर उनके आगे खड़ा हो गया ॥१६॥ तब ब्रह्माजीने उस वानर-वीरको बहुत कुछ समझाया और एक देवतुल्य देवदूतको बुलाकर उससे कहा—॥१७॥ 'हे दूत ! तू मेरी आज्ञासे इन वानरश्रेष्ठको लेकर विश्वकर्माकी बनायी हुई किष्किन्धा नामकी दिव्य पुरीको जा ॥१८॥ वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न है और देवताओंके लिये भी दुर्जय है। उसके सिंहासनपर इस वीरका राज्याभिषेक कर दे ॥१९॥ सातों द्वीपोंमें जो-जो बड़े दुर्जय वानर-वीर हैं वे सब ऋक्षराजके अधीन रहेंगे ॥२०॥ जिस समय साक्षात् सनातन पुरुष नारायणदेव पृथिवीका भार उतारनेके लिये भूलोकमें रामरूपसे अवतीर्ण हों उस समय समस्त वानरगण उनकी सहायताके लिये जायें।' ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर उस महाबुद्धिमान् देवदूतने जिस प्रकार उनकी आज्ञा हुई थी उसी प्रकार उस वानरराजकी सब व्यवस्था कर दी और फिर ब्रह्माजीके पास जाकर उन्हें सब समाचार सुना दिया। तबसे वह किष्किन्धापुरी वानरोंकी राजधानी हो गयी ॥२१-२४॥
हे राम ! आप सबके स्वामी हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे अब माया-मानव-रूप धारणकर आपने पृथिवीका सब भार उतार दिया। जो सब भूतोंके भीतर विराजमान नित्यमुक्त और चेतनस्वरूप हैं उन अखण्ड और अनन्तरूप आपके लिये यह ऐसा कौन बड़ा पराक्रम है ? तथापि सम्पूर्ण लोकोंके
| सर्ग ३ ] | उत्तरकाण्ड | ३४३ |
|---|
तथाऽपि वर्ण्यते सद्भिर्लीलामानुषरूपिणः ॥२६॥
यशस्ते सर्वलोकानां पापहर्त्यै सुखाय च ।
य इदं कीर्तयेन्मर्त्यो वालिसुग्रीवयौर्महत् ॥२७॥
जन्म त्वदाश्रयत्वात्स मुच्यते सर्वपातकैः ॥२८॥
...न्यां सम्प्रवक्ष्यामि कथां राम त्वदाश्रयाम्।
सीता हृता यदर्थं सा रावणेन दुरात्मना ॥२९॥
पुरा कृतयुगे राम प्रजापतिसुतं विभुम् ।
सनत्कुमारमेकान्ते समासीनं दशाननः ।
विनयावनतो भूत्वा ह्यभिवाद्येदमब्रवीत् ॥३०॥
को न्वस्मिन्प्रवरो लोके देवानां बलवत्तरः ।
देवाश्च यं समाश्रित्य युद्धे शत्रुं जयन्ति हि ॥३१॥
कं यजन्ति द्विजा नित्यं कं ध्यायन्ति च योगिनः।
एतन्मे शंस भगवन् प्रश्नं प्रश्नविदांवर ॥३२॥
ज्ञात्वा तस्य हृदिस्थं यत्तदशेषेण योगदृक् ।
दशाननमुवाचेदं शृणु वक्ष्यामि पुत्रक ॥३३॥
भर्ता यो जगतां नित्यं यस्य जन्मादिकं नहि ।
सुरासुरैर्नुतो नित्यं हरिर्नारायणोऽव्ययः ॥३४॥
यन्नाभिपङ्कजाज्जातो ब्रह्मा विश्वसृजां पतिः ।
सृष्टं येनैव सकलं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥३५॥
तं समाश्रित्य विबुधा जयन्ति समरे रिपून् ।
योगिनो ध्यानयोगेन तमेवानुजपन्ति हि ॥३६॥
महर्षेर्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच दशाननः ।
दैत्यदानवरक्षांसि विष्णुना निहतानि च ॥३७॥
कां वा गतिं प्रपद्यन्ते प्रेत्य ते मुनिपुङ्गव ।
तमुवाच मुनिश्रेष्ठो रावणं राक्षसाधिपम् ॥३८॥
दैवतैर्निहता नित्यं गत्वा स्वर्गमनुत्तमम् ।
भोगक्षये पुनस्तस्माद्भ्रष्टा भूमौ भवन्ति ते ॥३९॥
पापोंका नाश करनेके लिये और उन्हें सुख देनेके लिये साधुजन आप माया-मानुष-रूप भगवान्का सुयश वर्णन करते ही हैं। जो मनुष्य वाली और सुग्रीवके इस महान् चरित्रका कीर्तन करेगा वह आपके आश्रित होनेके कारण सब पापोंसे छूट जायगा ॥२५—२८॥
हे राम ! अब आपसे सम्बन्ध रखनेवाली एक वह कथा और सुनाता हूँ जिस कारण कि दुरात्मा रावणने सीताजीको हरा था ॥ २९॥ पहले एक बार रावणने एकान्तमें बैठे हुए ब्रह्माजीके पुत्र श्रीसनत्कुमारजीसे अति नम्रतापूर्वक प्रणाम करके कहा—॥३०॥ “जिसका आश्रय पाकर देवगण संग्राममें शत्रु-को जीतते हैं इस संसारमें सब देवताओंमें श्रेष्ठ और अधिक बलवान् वह कौन देव है ? ॥३१॥ ब्राह्मणगण किसका पूजन करते हैं और योगीगण किसका ध्यान धरते हैं ? भगवन् ! आप सब प्रकारके प्रश्नोंका उत्तर जाननेवालोंमें श्रेष्ठ हैं, अतः मेरे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये” ॥३२॥ भगवान् सनत्कुमारने योगदृष्टिसे रावणके अन्तःकरणकी सब बात जानकर उससे कहा--“वत्स ! मैं तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ, सुनो ॥३३॥ जो सर्वदा सम्पूर्ण संसारका पोषण करनेवाले हैं, जिनके जन्म-मृत्यु आदि नहीं होते, जो देवता और दैत्योंसे सदा वन्दित अविनाशी नारायण श्रीहरि कहलाते हैं ॥ ३४॥ सृष्टि-कर्त्ताओंके स्वामी श्रीब्रह्माजी भी जिनके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं, तथा जिन्होंने यह स्थावर-जङ्गम-रूप संसार भी रचा है उन्हींके आश्रयसे देवगण संग्राममें शत्रुओंको जीतते हैं तथा योगिजन भी ध्यानयोगके द्वारा उन्हींका जप करते हैं” ॥३५-३६॥
महर्षि सनत्कुमारके ये वचन सुनकर रावणने फिर पूछा—“हे मुनिश्रेष्ठ ! उन विष्णुभगवान्द्वारा मारे हुए दैत्य, दानव और राक्षसगण मरकर किस गतिको प्राप्त होते हैं ?” तब मुनिवर सनत्कुमारने राक्षसराज रावणसे कहा—॥३७-३८॥ “अन्य साधारण देवताओं-के हाथसे मरकर तो वे अति उत्तम स्वर्गलोकको ही जाते हैं और अपना भोग क्षीण होनेपर वहाँसे गिरकर फिर भूर्लोकमें उत्पन्न होते हैं ॥३९॥ फिर पूर्व-जन्मोंमें किये हुए