अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
अरण्यकाण्ड - सर्ग ९: कबन्धोद्धार
| १४० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ९ |
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| रविरिव जलपूरितोदपात्रे- <br> ष्वामरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे ॥५२॥ | आप ही विष्णु, ब्रह्मा और महादेवके रूपसे भासित होते हैं। हे ईश ! आप देवराज इन्द्रकी भी स्तुतिके पात्र हैं, मैं आपकी स्तुति करता हूँ ॥ ५२ ॥ |
| रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्गं <br> शतपथगोचरभावनाविदूरम् । <br> यतिपतिहृदये सदा विभातं <br> रघुपतिमार्तिहरं प्रभुं प्रपद्ये ॥५३॥ | आपका दिव्य शरीर करोड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर है, सैकड़ों मार्गोंमें फँसे हुए लोगोंसे आप अत्यन्त दूर हैं और योगिराजोंके हृदयमें आप सदा ही भासमान हैं। ऐसे आप आर्तिहर प्रभु रघुपतिकी मैं शरण लेता हूँ” ॥ ५३ ॥ |
| इत्येवं स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः । <br> उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्णोः परं पदम् ॥५४॥ | जटायुके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरघुनाथजी उसपर प्रसन्न होकर बोले, “जटायो ! तुम्हारा कल्याण हो तुम मेरे परमधाम विष्णुलोकको जाओ ॥ ५४ ॥ |
| शृणोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत् । <br> स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥५५॥ | जो पुरुष मेरे इस स्तोत्रको एकाग्रचित्तसे सुनता, लिखता अथवा पढ़ता है वह मेरा सारूप्य-पद प्राप्त करता है और मरते समय उसे मेरा स्मरण होता है” ॥५५॥ |
| इति राघवभाषितं तदा <br> श्रुतवान् हर्षसमाकुलो द्विजः । <br> रघुनन्दनसाम्यमास्थितः <br> प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं पदम् ॥५६॥ | पक्षिराज जटायुने रघुनाथजीका यह कथन बड़े हर्षसे सुना और उन्हींके समान रूप धारण कर ब्रह्मा आदि लोकपालोंसे पूजित परमधामको चला गया ॥ ५६ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
नवम सर्ग
कबन्धोद्धार ।
</div>| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— |
| ततो रामो लक्ष्मणेन जगाम विपिनान्तरम् । <br> पुनर्दुःखं समाश्रित्य सीतान्वेषणतत्परः ॥ १ ॥ | हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी दुःखित-चित्तसे सीताजीको खोजते हुए लक्ष्मणजीके साथ दूसरे वनको गये ॥ १ ॥ |
| तत्राद्भुतसमाकारो राक्षसः प्रत्यदृश्यत । <br> वक्षस्येव महावक्त्रश्चक्षुरादिविवर्जितः ॥ २ ॥ | वहाँ उन्होंने एक बड़े ही विचित्र आकारका राक्षस देखा, जिसके वक्षःस्थलमें ही नेत्रादिसे रहित एक बड़ा भारी मुख था ॥ २ ॥ |
| बाहू योजनमात्रेण व्यापृतौ तस्य रक्षसः । <br> कबन्धो नाम दैत्येन्द्रः सर्वसत्वविहिंसकः ॥ ३ ॥ | इस राक्षसकी भुजाएँ एक-एक योजन-तक फैली हुई थीं। यह सम्पूर्ण प्राणियोंकी हिंसा करनेवाला 'कबन्ध' नामक दैत्यराज था ॥ ३ ॥ |
| तद्बाहोर्मध्यदेशे तौ चरन्तौ रामलक्ष्मणौ । <br> ददर्शतुर्महासत्वं तद्बाहुपरिवेष्टितौ ॥ ४ ॥ | उसकी भुजाओंके बीचमें चलते हुए उनसे घिरे हुए राम और लक्ष्मणने उस महाबलवान् राक्षसको देखा ॥ ४ ॥ |
| रामः प्रोवाच विहसन्पश्य लक्ष्मण राक्षसम् । | तब रामचन्द्रजीने हँसते हुए कहा—“लक्ष्मण ! |
सर्ग ९ ] अरण्यकाण्ड १४१
| शिरःपादविहीनोऽयं यस्य वक्षसि चाननम् ॥ ५ ॥<br>बाहुभ्यां लभ्यते यद्यत्तत्तद्भक्षन् स्थितो ध्रुवम् ।<br>आवामप्येतयोर्बाह्वोर्मध्ये सङ्कलितौ ध्रुवम् ॥ ६ ॥<br>गन्तुमन्यत्र मार्गो न दृश्यते रघुनन्दन ।<br>किं कर्तव्यमितोऽस्माभिरिदानीं भक्षयेत्स नौ ॥७॥<br>लक्ष्मणस्तमुवाचेदं किं विचारेण राघव ।<br>आवामेकैकमन्यग्रौ छिन्द्यावास्य भुजौ ध्रुवम् ॥८॥<br>तथेति रामः खड्गेन भुजं दक्षिणमाच्छिनत् ।<br>तथैव लक्ष्मणो वामं चिच्छेद भुजमञ्जसा ॥ ९ ॥<br>ततोऽतिविस्मितो दैत्यः कौ युवां सुरपुङ्गवौ ।<br>मद्वाहुच्छेदकौ लोके दिवि देवेषु वा कुतः ॥१०॥ | इस राक्षसको देखो; यह शिर-पैरसे रहित है और इसकी छातीमें ही मुँह है ॥ ५ ॥ अपनी भुजाओंसे ही इसे जो कुछ मिल जाता है उसीको खाकर यह जीवित रहता है। हम भी निश्चय ही इसकी भुजाओंके बीचमें फँस गये हैं ॥ ६ ॥ हे रघुनन्दन ! इनके चंगुलमेंसे निकलनेका हमें कोई मार्ग दिखायी नहीं देता; अब हमें क्या करना चाहिये ? (जल्दी विचार करो नहीं तो) यह हमें अभी खा जायगा" ॥ ७ ॥<br>लक्ष्मणजीने कहा—"हे राघव ! इसमें अधिक विचारनेकी क्या बात है ? हम दोनों सावधान होकर अभी इसकी एक-एक भुजा काट डालें" ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजीने कहा 'बहुत ठीक', और खड्ग निकालकर उसकी दायीं भुजा काट डाली। वैसे ही लक्ष्मणजीने भी तुरन्त ही उसकी बायीं भुजा उड़ा दी ॥ ९ ॥<br>तब उस दैत्यराजने अति विस्मयपूर्वक कहा—"मेरी भुजाओंको काटनेवाले तुम कौन देवश्रेष्ठ हो ? इस लोकमें अथवा स्वर्गवासी देवताओंमें भी कोई ऐसा (समर्थ) होना सम्भव नहीं" ॥ १० ॥ |
| ततोऽब्रवीद्धसन्नेव रामो राजीवलोचनः ।<br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथो महान् ११<br>रामोऽहं तस्य पुत्रोऽसौ भ्राता मे लक्ष्मणः सुधीः ।<br>मम भार्या जनकजा सीता त्रैलोक्यसुन्दरी ॥१२॥<br>आवां मृगयया यातौ तदा केनापि रक्षसा ।<br>नीतां सीतां विचिन्वन्तौ चागतौ घोरकानने ॥१३॥<br>बाहुभ्यां वेष्टितावत्र तव प्राणरिरक्षया ।<br>छिन्नौ तव भुजौ त्वं च को वा विकटरूपधृक् ॥१४॥ | इसपर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीने हँसते हुए कहा—"श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्याके स्वामी थे ॥ ११ ॥ मैं उन्हींका पुत्र 'राम' हूँ और यह बुद्धिमान् मेरा छोटा भाई 'लक्ष्मण' है तथा त्रैलोक्यसुन्दरी जनकनन्दिनी सीता मेरी भार्या है ॥ १२ ॥ हम मृगया (शिकार) के लिये बाहर गये हुए थे कि किसी राक्षसने सीताको चुरा लिया, उसीको ढूँढ़ते हुए हम यहाँ इस घोर वनमें आ गये। इतनेहीमें तुमने हमें अपनी भुजाओंसे घेर लिया। तब हमने अपने प्राण बचानेके लिये तुम्हारी भुजाएँ काट डालीं। अब यह बताओ—ऐसे विकट रूपवाले तुम कौन हो ? ॥ १३-१४ ॥ |
| कबन्व उवाच<br>धन्योऽहं यदि रामस्त्वमागतोऽसि ममान्तिकम् ।<br>पुरा गन्धर्वराजोऽहं रूपयौवनदर्पितः ॥१५॥<br>विचरँल्लोकमखिलं वरनारीमनोहरः । | कबन्धनें कहा—"हे राम ! यदि आज आप स्वयं मेरे पास आये हैं तो मैं धन्य हूँ। पूर्वकालमें मैं रूप और यौवनके मदसे उन्मत्त एक गन्धर्वराज था ॥ १५ ॥ हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मैंने तपस्याद्वारा ब्रह्माजीसे अवध्यता (किसीसे भी न मारे जा सकनेकी योग्यता) प्राप्त कर ली थी और मैं अपनी रूपकान्तिसे सुन्दर |
| १४२ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ९ |
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तपसा ब्रह्मणो लब्धमवध्यत्वं रघूत्तम ॥१६॥
अष्टावक्रं मुनिं दृष्ट्वा कदाचिदहसं पुरा ।
क्रुद्धोऽसावाह दुष्ट त्वं राक्षसो भव दुर्मते ॥१७॥
अष्टावक्रः पुनः प्राह वन्दितो मे दयापरः ।
शापस्यान्तं च मे प्राह तपसा द्योतितप्रभः ॥१८॥
त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणः स्वयम् ।
आगमिष्यति ते वाहू च्छेद्येते योजनायतौ ॥१९॥
तेन शापाद्विनिर्मुक्तो भविष्यसि यथा पुरा ।
इति शप्तोऽहमद्राक्षं राक्षसीं तनुमात्मनः॥२०॥
कदाचिद्देवराजानमभ्याद्रवमहं रुषा ।
सोऽपि वज्रेण मां राम शिरोदेशेऽभ्यताडयत् ॥२१॥
तदा शिरो गतं कुक्षिं पादौ च रघुनन्दन ।
ब्रह्मदत्तवरान्मृत्युर्नाभून्मे वज्रताडनात् ॥२२॥
मुखाभावे कथं जीवेदियमित्ममराधिपम् ।
ऊचुः सर्वे दयाविष्टा मां विलोक्यास्यवर्जितम् २३
ततो मां प्राह मघवा जठरे ते मुखं भवेत् ।
वाहू ते योजनायामौ भविष्यत इतो व्रज ॥२४॥
इत्युक्तोऽत्र वसन्नित्यं बाहुभ्यां वनगोचरान् ।
भक्षयाम्यधुना वाहू खण्डितौ मे त्वयाऽनघ ॥२५॥
इतःपरं मां श्वभ्रास्ये निक्षिप्याग्नीन्धनावृते ।
अग्निना दह्यमानोऽहं त्वया रघुकुलोत्तम ॥२६॥
पूर्वरूपमनुप्राप्य भार्यामार्गं वदामि ते ।
इत्युक्ते लक्ष्मणेनाशु श्वभ्रं निर्माय तत्र तम् ॥२७॥
निक्षिप्य प्रादहत्काष्ठैस्ततो देहात्समुत्थितः ।
कन्दर्पसदृशाकारः सर्वाभरणभूषितः ॥२८॥
रामं प्रदक्षिणं कृत्वा साष्टाङ्गं प्रणिपत्य च ।
स्त्रियोंके चित्तोंको चुराता हुआ सम्पूर्ण लोकोंमें भ्रमा करता था ॥ १६ ॥ एक बार अष्टावक्र मुनिको देखकर मैं हँस पड़ा, अतः उन्होंने क्रोधित होकर कहा— "अरे दुर्बुद्धे ! तू बड़ा दुष्ट है, अतः तू राक्षस हो जा" ॥ १७ ॥ उनके शापसे भयभीत होकर जब मैंने उनकी बहुत कुछ अनुनय-विनय की तो तपके कारण परम तेजस्वी उन दयालु मुनीश्वरने मेरे शापका अन्त इस प्रकार बताया ॥ १८ ॥ वे बोले, "त्रेतायुगमें स्वयं नारायण दशरथके यहाँ अवतार लेकर तेरे पास आयेंगे और वे तेरी एक-एक योजन लम्बी भुजाओंको काट डालेंगे ॥ १९ ॥ तब तू शापसे छूटकर अपना पूर्वरूप धारण करेगा।" उनके इस प्रकार शाप देनेसे मैंने अपनेको राक्षसरूपमें देखा ॥ २० ॥
एक बार मैं रोषपूर्वक देवराज इन्द्रके पीछे दौड़ा। तब उसने क्रोधित होकर मेरे शिरपर अपना वज्र मारा ॥ २१ ॥ हे रघुनन्दन ! उस वज्रके आघातसे मेरे शिर और पैर पेटमें घुस गये किन्तु ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे मैं मरा नहीं ॥ २२ ॥ मुझे मुखहीन देखकर समस्त देवताओंने दयावश हो देवराजसे कहा— "यह बिना मुखके कैसे जीवित रह सकेगा ?" ॥ २३ ॥ तब इन्द्रने मुझसे कहा— "तेरे पेटमें ही मुख होगा और तेरी भुजाएँ एक-एक योजन लम्बी हो जायँगी, अब तू यहाँसे चला जा" ॥ २४ ॥ इन्द्रके ऐसा कहनेपर मैं यहीं रहकर नित्यप्रति अपनी भुजाओंसे वनके जीवोंको खींचकर खाता रहा हूँ। हे अनघ ! अब उन भुजाओंको आपने काट डाला ॥ २५ ॥ हे रघुकुलश्रेष्ठ ! अब आप मुझे एक अग्नि और ईंधनसे युक्त गड्ढेमें डाल दीजिये । आपके द्वारा अग्निसे दग्ध होनेपर अपना पूर्वरूप धारण कर मैं आपकी भार्याका पता बताऊँगा ।
उसके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे तुरन्त ही एक बड़ा गड्ढा तैयार कराया और उसे उसमें डालकर लकड़ियोंसे जला दिया। तब उसके शरीरसे एक सर्वालंकारविभूषित कामदेवके समान अति सुन्दर पुरुष प्रकट हुआ ॥ २६–२८ ॥ उसने रामचन्द्रजीकी परिक्रमा कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिसे
| सर्ग ९ ] | अरण्यकाण्ड | १४३ |
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| कृताञ्जलिरुवाचेदं भक्तिगद्गदया गिरा ॥२९॥ | गद्गद-कण्ठ हो हाथ जोड़कर कहने लगा ॥ २९ ॥ |
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| गन्धर्व उवाच | **गन्धर्व बोला—**हे राम ! आप अनन्त, आदि-अन्तसे रहित और मन-वाणीके अविषय हैं; तथापि आज मेरा मन आपकी स्तुति करनेको बड़े वेगसे उत्सुक हो रहा है ॥ ३० ॥ हे प्रभो ! आपके स्थूल और सूक्ष्म रूप (विराट् और हिरण्यगर्भ) से आपका वास्तविक ज्ञानस्वरूप अति सूक्ष्म और अदृश्य है । उससे अतिरिक्त जो कुछ है वह जड दृश्य और अनात्मा है । अतः आपसे भिन्न यह जड मन आपको कैसे जान सकता है ? बुद्धि और चिदाभासका अन्योन्याध्यासरूप ऐक्य ही जीव कहलाता है । इन बुद्धि आदि सबका साक्षी ब्रह्म ही है; वह मन-वाणी आदि किसीका भी विषय नहीं है, उसी निर्विकार सर्वात्मामें अज्ञानवश इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को आरोपित किया जाता है । हे राम ! आपका सूक्ष्म रूप हिरण्यगर्भ और स्थूल रूप विराट् कहलाता है । आपका भावनामय सूक्ष्म रूप जिसमें भूत, भविष्यत् और वर्तमान यह सम्पूर्ण जगत् दीख पड़ता है अपने ध्यान करनेवालोंका मंगल करनेवाला है ॥ ३१–३४ ॥ (एकसे एक दशगुण) महत्तत्त्वादि सात आवरणोंसे घिरे हुए आपके स्थूल ब्रह्माण्डशरीरमें ही धारणाका आश्रयरूप विराट् शरीर स्थित है ॥ ३५ ॥ आप ही एकमात्र मोक्षरूप हैं । सम्पूर्ण लोक आपहीके अवयव हैं । पाताल आपका चरणतल (तलुआ) है, महातल ऐँड़ी है ॥ ३६ ॥ हे राम ! रसातल गुल्फ (टखने) हैं, तलातल जानु हैं तथा सुतल और वितल आपकी जंघाएँ हैं ॥ ३७ ॥ अतलं और भूर्लोक आपकी जंघाओंके नीचे और ऊपरके भाग हैं, भुवर्लोक नाभि है, स्वर्लोक वक्षःस्थल है तथा महर्लोक आपकी ग्रीवा है ॥ ३८ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! जनःलोक आपका मुख है, तपःलोक ललाट है तथा हे प्रभो ! सत्यलोक आपका मस्तक है ॥ ३९ ॥ हे राम ! इन्द्रादि लोकपालगण आपकी भुजाएँ हैं, दिशाएँ कर्ण हैं, अश्विनीकुमार नासिका हैं और अग्नि आपका मुख बताया गया है ॥ ४० ॥ हे राम ! सूर्य आपके नेत्र हैं, चन्द्रमा मन है, काल भ्रूभंगी है और बृहस्पतिजी आपकी बुद्धि हैं ॥ ४१ ॥ रुद्र |
| स्तोतुमुत्सहते मेऽद्य मनो रामातिसम्भ्रमात् ।<br>त्वामनन्तमनाद्यन्तं मनोवाचामगोचरम् ॥३०॥ | |
| सूक्ष्मं ते रूपमव्यक्तं देहद्वयविलक्षणम् ।<br>दृग्रूपमितरत्सर्वं दृश्यं जडमनात्मकम् ।<br>तत्कथं त्वां विजानीयाद्व्यतिरिक्तं मनः प्रभो ३१ | |
| बुद्ध्यात्माभासयोरैक्यं जीव इत्यभिधीयते ।<br>बुद्ध्यादिसाक्षी ब्रह्मैव तस्मिन्निर्विषयेऽखिलम् ३२ | |
| आरोप्यतेऽज्ञानवशान्निर्विकारेऽखिलात्मनि ।<br>हिरण्यगर्भस्ते सूक्ष्मं देहं स्थूलं विराट् स्मृतम् ॥३३॥ | |
| भावनाविषयो राम सूक्ष्मं ते ध्यातृमङ्गलम् ।<br>भूतं भव्यं भविष्यच्च यत्रेदं दृश्यते जगत् ॥३४॥ | |
| स्थूलेऽण्डकोशे देहे ते महदादिभिरावृते ।<br>सप्तभिरुत्तरगुणैर्विराजो धारणाश्रयः ॥३५॥ | |
| त्वमेव सर्वकैवल्यं लोकास्तेऽवयवाः स्मृताः ।<br>पातालं ते पादमूलं पाष्णिस्तव महातलम् ॥३६॥ | |
| रसातलं ते गुल्फौ तु तलातलमितीर्यते ।<br>जानुनी सुतलं राम ऊरू ते वितलं तथा ॥३७॥ | |
| अतलं च मही राम जघनं नाभिंगं नभः ।<br>उरःस्थलं ते ज्योतींषि ग्रीवा ते मह उच्यते ॥३८॥ | |
| वदनं जनलोकस्ते तपस्ते शङ्खदेशगम् ।<br>सत्यलोको रघुश्रेष्ठ शीर्षण्यास्ते सदा प्रभो ॥३९॥ | |
| इन्द्रादयो लोकपाला बाहवस्ते दिशः श्रुती ।<br>अश्विनौ नासिके राम वक्त्रं तेऽग्निरुदाहृतः ॥४०॥ | |
| चक्षुस्ते सविता राम मनश्चन्द्र उदाहृतः ।<br>भ्रूभङ्ग एव कालस्ते बुद्धिस्ते वाक्पतिर्भवेत् ॥४१॥ |
| १४४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ९ |
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| रुद्रोऽहङ्काररूपस्ते वाचश्छन्दांसि तेऽव्यय ।<br>यमस्ते दंष्ट्रदेशस्थो नक्षत्राणि द्विजालयः ॥४२॥ | आपका अहंकार है, वेद आपकी अविनाशी वाणी है, यम आपकी दाढ़ें हैं और नक्षत्रगण आपकी दन्तावलि है ॥४२॥ |
| हासो मोहकरी माया सृष्टिस्तेऽपाङ्गमोक्षणम् ।<br>धर्मः पुरस्तेऽधर्मश्च पृष्ठभाग उदीरितः ॥४३॥ | सबको मोहित करनेवाली माया आपका हास्य है, सृष्टि आपका कटाक्ष है, धर्म आपका आगेका भाग है और अधर्म पीठिका भाग है ॥४३॥ |
| निमिषोन्मेषणे रात्रिर्दिवा चैव रघूत्तम ।<br>समुद्राः सप्त ते कुक्षिर्नाड्यो नद्यस्तव प्रभो ॥४४॥ | हे रघूत्तम ! रात्रि और दिन आपके निमेषोन्मेष हैं, हे प्रभो ! सातों समुद्र आपकी कुक्षि और नदियाँ नाड़ियाँ हैं ॥४४॥ |
| रोमाणि वृक्षौषधयो रेतो वृष्टिस्तव प्रभो ।<br>महिमा ज्ञानशक्तिस्ते एवं स्थूलं वपुस्तव ॥४५॥ | हे प्रभो ! वृक्ष और ओषधियाँ आपके रोम, वृष्टि आपका वीर्य और ज्ञानशक्ति आपकी महिमा है। यही आपका स्थूल शरीर है ॥४५॥ |
| यदस्मिन् स्थूलरूपे ते मनः सन्धार्यते नरैः ।<br>अनायासेन मुक्तिः स्यादतोऽन्यन्नहि किञ्चन ॥४६॥ | यदि पुरुष आपके इस स्थूल शरीरमें मन स्थिर करें तो वह अनायास ही मुक्त हो जाता है। हे राम ! आपके इस स्थूल रूपसे पृथक् और कोई पदार्थ नहीं है ॥४६॥ |
| अतोऽहं राम रूपं ते स्थूलमेवानुभावये ।<br>यस्मिन्ध्याते प्रेमरसः सरोमपुलको भवेत् ॥४७॥ | अतः हे राम ! मैं आपके उस स्थूल रूपका ही सदा चिन्तन करता हूँ जिसके ध्यानमात्रसे ही शरीरमें रोमाञ्चके सहित मनुष्यके हृदयमें प्रेम-रसका सञ्चार हो जाता है ॥४७॥ |
| तदैव मुक्तिः स्याद्राम यदा ते स्थूलभावकः ।<br>तदप्यास्तां तथैवाहमेतद्रूपं विचिन्तये ॥४८॥ | हे राम ! जब यह जीव आपके विराट् रूपका चिन्तन करता है तो तत्काल ही उसकी मुक्ति हो जाती है तो भी मुझे उसकी आवश्यकता नहीं। मैं तो आपके इस रामरूपका ही चिन्तन करूँगा ॥४८॥ |
| धनुर्बाणधरं श्यामं जटावल्कलभूषितम् ।<br>अपीच्यवयसं सीतां विचिन्वन्तं सलक्ष्मणम् ॥४९॥<br>इदमेव सदा मे स्यान्मानसे रघुनन्दन ।<br>सर्वज्ञः शङ्करः साक्षात्पार्वत्या सहितः सदा ॥५०॥<br>त्वद्रूपमेवं सततं ध्यायन्नास्ते रघूत्तम ।<br>मुमूर्षूणां तदा काश्यां तारकं ब्रह्मवाचकम् ॥५१॥<br>रामरामेत्युपदिशन्सदा सन्तुष्टमानसः ।<br>अतस्त्वं जानकीनाथ परमात्मा सुनिश्चितः ॥५२॥ | हे रघुनन्दन ! (मेरी यही प्रार्थना है कि) लक्ष्मणजीके सहित सीताको खोजता हुआ आपका यह जटा-वल्कल-विभूषित धनुषबाणधारी अति सुन्दर सुकुमार श्याम शरीर सदा मेरे मनमें विराजमान रहे। हे रघुश्रेष्ठ ! आपके इस दिव्य रूपका पार्वतीजीके सहित सर्वज्ञ श्रीशंकरभगवान् सर्वदा चिन्तन किया करते हैं और काशीमें मरनेवालोंको ब्रह्मवाचक रामनाम-रूप तारक-मन्त्रका उपदेश करते हुए सदा अति आनन्दमें मग्न रहते हैं। अतः हे जानकीनाथ ! आप निश्चय ही परमात्मा हैं ॥४९-५२॥ |
| सर्वे ते मायया मूढास्त्वां न जानन्ति तत्त्वतः ।<br>नमस्ते रामभद्राय वेधसे परमात्मने ॥५३॥ | आपकी मायासे मोहित होनेके कारण सब लोग आपका वास्तविक स्वरूप नहीं जानते। हे संसारकी रचना करनेवाले परमात्मा राम ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥५३॥ |
| अयोध्याधिपते तुभ्यं नमः सौमित्रिसेवित ।<br>त्राहि त्राहि जगन्नाथ मां माया नावृतोणुतु ते ॥५४॥ | हे सौमित्रिसेवित अयोध्यानाथ ! आपको नमस्कार है। हे जगन्नाथ ! आप मेरी रक्षा कीजिये, आपकी माया मुझे मोहित न करे ॥५४॥ |