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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

अरण्यकाण्ड - सर्ग ४: पञ्चवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश

११६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४

चतुर्थ सर्ग

पञ्चवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश।

श्रीमहादेव उवाच
मार्गे व्रजन्ददर्शाथ शैलशृङ्गमिव स्थितम् ।<br>वृद्धं जटायुषं रामः किमेतदिति विस्मितः ॥१॥श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! मार्गमें जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीने पर्वत-शिखरके समान बैठे हुए वृद्ध जटायुको देखा। उसे देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ कि 'यह क्या है ?' ॥ १ ॥ तब वे लक्ष्मणजीसे बोले—"सौमित्रे ! मेरा धनुष लाओ। देखो, सामने यह राक्षस बैठा है; मैं ऋषियोंको भक्षण करनेवाले इस दुष्टको अभी मारे डालता हूँ" ॥ २ ॥
धनुरानय सौमित्रे राक्षसोऽयं पुरः स्थितः ।<br>इत्याह लक्ष्मणं रामो हनिष्याम्यृषिभक्षकम् ॥२॥
तच्छ्रुत्वा रामवचनं गृध्रराड् भयपीडितः ।<br>वधार्होऽहं न ते राम पितुस्तेऽहं प्रियः सखा ॥३॥रामका यह वचन सुन गृध्रराजने भयसे व्यथित होकर कहा—"राम ! मैं तुम्हारेद्वारा मारे जाने योग्य नहीं हूँ । मैं तुम्हारे पिताका प्रिय सखा जटायु नामक गृध्र हूँ । तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो तुम्हारा हितकारी हूँ ॥ ३-४ ॥ तुम्हारी ही हित-कामनासे मैं पञ्चवटीमें रहूँगा। किसी समय जब आपके साथ लक्ष्मणजी भी मृगयाके लिये वनमें चले जायँगे तो मैं जनकनन्दिनी सीताजीकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करूँगा।" गृध्रराजके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने स्नेहपूर्वक कहा— ॥५-६॥ "हे गृध्रराज महाराज ! ठीक है, इस पासके वनमें ही रहते हुए आप समीपवर्ती होकर अवश्य हमारा हित-साधन करें" ॥ ७ ॥
जटायुर्नाम भद्रं ते गृध्रोऽहं प्रियकृत्तव ॥४॥
पञ्चवट्यामहं वत्स्ये तवैव प्रियकाम्यया ।<br>मृगयायां कदाचित्तु प्रयाते लक्ष्मणेऽपि च ॥५॥
सीता जनककन्या मे रक्षितव्या प्रयत्नतः ।<br>श्रुत्वा तद्गृध्रवचनं रामः सस्नेहमब्रवीत् ॥६॥
साधु गृध्र महाराज तथैव कुरु मे प्रियम् ।<br>अत्रैव मे समीपस्थो नातिदूरे वने वसन् ॥७॥
इत्यामन्त्रितमालिङ्ग्य ययौ पञ्चवटीं प्रभुः ।<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया रघुनन्दनः ॥८॥इस प्रकार अपनी सम्मति दे भगवान् राम जटायुको आलिङ्गनकर भाई लक्ष्मण और सीताके सहित पञ्चवटीको गये ॥ ८ ॥ गौतमीके तटपर पहुँचकर उन्होंने बुद्धिमान् लक्ष्मणजीसे पञ्चवटीमें एक विशाल कुटी बनवायी ॥ ९ ॥ वहाँ वे सब गङ्गाके उत्तर तटपर कदम्ब, पनस और आम्र आदि फलवाले वृक्षोंसे युक्त एक रोग-रहित जन्य-शून्य एकान्त स्थानमें बस गये। श्रीरामचन्द्रजी बुद्धिमान् लक्ष्मणके सहित जनकात्मजा सीताका मनोरंजन करते हुए उस देवलोकके समान सुरम्य स्थानमें दूसरे इन्द्रके समान सुखपूर्वक रहने लगे। राम-सेवामें जिनका चित्त लगा हुआ है वे लक्ष्मणजी नित्यप्रति उन्हें कन्द-मूल-फल लाकर देते और रात्रिके समय धनुष-बाण लेकर चारों ओर घूमकर रक्षा करते हुए जागा करते ॥१०-१३॥ वे
गत्वा ते गौतमीतीरं पञ्चवट्यां सुविस्तरम् ।<br>मन्दिरं कारयामास लक्ष्मणेन सुबुद्धिना ॥९॥
तत्र ते न्यवसन्सर्वे गङ्गाया उत्तरे तटे ।<br>कदम्बपनसाम्रादिफलवृक्षसमाकुले ॥१०॥
विविक्ते जनसम्बाधवर्जिते नीरुजस्थले ।<br>विनोदयन् जनकजां लक्ष्मणेन विपश्चिता ॥११॥
अध्युवास सुखं रामो देवलोक इवापरः ।<br>कन्दमूलफलादीनि लक्ष्मणेाऽनुदिनं तयोः ॥१२॥
आनीय प्रददौ रामसेवातातपरमानसः ।<br>धनुर्बाणधरो नित्यं रात्रौ जागर्ति सर्वतः ॥१३॥

सर्ग ४ ] अरण्यकाण्डे ११७


स्नानं कुर्वन्त्यनुदिनं त्रयस्ते गौतमीजले ।<br>उभयोर्मध्यगा सीता कुरुते च गमागमौ ॥ १४ ॥तीनों ही नित्यप्रति गौतमीमें स्नान किया करते थे । उस समय सीताजी उन दोनोंके बीचमें रहकर आया-जाया करती थीं ॥ १४ ॥
आनीय सलिलं नित्यं लक्ष्मणः प्रीतमानसः ।<br>सेवृतेऽहरहः प्रीत्या एवमासन् सुखं त्रयः ॥ १५ ॥लक्ष्मणजी प्रसन्नचित्तसे नित्यप्रति जल लाकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा किया करते थे। इस प्रकार वे तीनों वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १५॥
एकदा लक्ष्मणो राममेकान्ते समुपास्थितम् ।<br>विनयावनतो भूत्वा पप्रच्छ परमेश्वरम् ॥ १६ ॥एक दिन लक्ष्मणजीने एकान्तमें बैठे हुए परमात्मा श्रीरामके पास जाकर नम्रतापूर्वक पूछा-॥ १६ ॥
भगवन् श्रोतुमिच्छामि मोक्षस्यैकान्तिकीं गतिम् ।<br>त्वत्तः कमलपत्राक्ष सङ्क्षेपाद्वक्तुमर्हसि ॥ १७ ॥"भगवन् ! मैं आपके मुखारविन्दसे मोक्षका अन्यभिचारी निश्चित साधन सुनना चाहता हूँ; अतः हे कमलनयन ! आप उसका संक्षेपसे वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥
ज्ञानं विज्ञानसहितं भक्तिवैराग्यवृंहितम् ।<br>आचक्ष्व मे रघुश्रेष्ठ वक्ता नान्योऽस्ति भूतले ॥ १८ ॥हे रघुश्रेष्ठ ! आप मुझे भक्ति और वैराग्यसे सना हुआ विज्ञानयुक्त ज्ञान सुनाइये; संसारमें आपके अतिरिक्त इस विषयका सुनानेवाला और कोई नहीं है ॥" ॥ १८॥
श्रीराम उवाचश्रीरामजी बोले—
शृणु वक्ष्यामि ते वत्स गुह्याद्गुह्यतरं परम् ।<br>यद्विज्ञाय नरो जहात्सद्यो वैकल्पिकं भ्रमम् ॥ १९ ॥वत्स ! सुन, मैं तुझे गुह्यसे भी गुह्य परम रहस्य सुनाता हूँ जिसके जान लेनेपर मनुष्य तुरन्त ही विकल्पजनित ( संसाररूप ) भ्रमसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥
आदौ मायास्वरूपं ते वक्ष्यामि तदनन्तरम् ।<br>ज्ञानस्य साधनं पश्चाज्ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् ॥ २० ॥प्रथम मैं तुमसे मायाका स्वरूप कहूँगा, तत्पश्चात् ज्ञानका साधन बताऊँगा और फिर विज्ञानके सहित ज्ञानका वर्णन करूँगा ॥ २० ॥
ज्ञेयं च परमात्मानं यज्ज्ञात्वा मुच्यते भयात् ।<br>अनात्मनि शरीरादावात्मबुद्धिस्तु या भवेत् ॥ २१ ॥इनके अतिरिक्त ज्ञेय परमात्माका भी स्वरूप बतलाऊँगा जिसके जान लेनेपर मनुष्य संसार-भयसे मुक्त हो जाता है । शरीरादि अनात्मपदार्थोंमें जो आत्मबुद्धि होती है उसीको माया कहते हैं ।
सैव माया तयैवासौ संसारः परिकल्प्यते ।<br>रूपे द्वे निश्चिते पूर्वं मायायाः कुलन्दन ॥ २२ ॥उसीके द्वारा इस संसारकी कल्पना हुई है । हे कुलन्दन ! मायाके पहले-पहल दो रूप माने गये हैं ॥ २१-२२ ॥
विक्षेपावरणे तत्र प्रथमं कल्पयेज्जगत् ।<br>लिङ्गाद्यद्ब्रह्मपर्यन्तं स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥ २३ ॥एक विक्षेप, दूसरा आवरण। इनमेंसे पहली विक्षेप-शक्ति ही महत्तत्त्वसे लेकर ब्रह्मातक समस्त संसारकी स्थूल और सूक्ष्म भेदसे कल्पना करती है ॥ २३ ॥
अपरं त्वखिलं ज्ञानरूपमावृत्य तिष्ठति ।<br>मायया कल्पितं विश्वं परमात्मनि केवले ॥ २४ ॥और दूसरी आवरण-शक्ति सम्पूर्ण ज्ञानको आवरण करके स्थित रहती है । यह सम्पूर्ण विश्व रज्जुमें सर्प-भ्रमके समान शुद्ध परमात्मामें मायासे कल्पित है; विचार करनेपर यह कुछ भी नहीं ठहरता ।
रज्जौ भुजङ्गवद् भ्रान्त्या विचारे नास्ति किञ्चन ।<br>श्रूयते दृश्यते यद्यत्स्मर्यते वा नरैः सदा ॥ २५ ॥मनुष्य जो कुछ सर्वदा सुनते, देखते और स्मरण करते हैं, वह सब स्वप्न और मनोरथोंके समान असत्य हैं।
असदेव हि तत्सर्वं यथा स्वप्नमनोरथौ ।<br>देह एव हि संसारवृक्षमूलं दृढं स्मृतम् ॥ २६ ॥शरीर ही इस संसाररूप वृक्षकी दृढ़ मूल है ॥ २४-२६ ॥ उसीके कारण पुत्र-
११८अध्यात्मरामायणं[ सर्ग ४

तन्मूलः पुत्रदारादिबन्धः किं तेऽन्यथात्मनः॥२७॥
देहस्तु स्थूलभूतानां पञ्च तन्मात्रपञ्चकम् ।
अहंकारश्च बुद्धिश्च इन्द्रियाणि तथा दश ॥२८॥
चिदाभासो मनश्चैव मूलप्रकृतिरेव च ।
एतत्क्षेत्रमिति ज्ञेयं देह इत्यभिधीयते ॥२९॥
एतैर्विलक्षणो जीवः परमात्मा निरामयः ।
तस्य जीवस्य विज्ञाने साधनान्यपि मे शृणु ॥३०॥
जीवश्च परमात्मा च पर्यायो नात्र भेदधीः ।
मानाभावस्तथा दम्भहिंसादिपरिवर्जनम् ॥३१॥
पराक्षेपादिसहनं सर्वत्रावक्रता तथा ।
मनोवाक्कायसद्भक्त्या सद्गुरोः परिसेवनम् ॥३२॥
बाह्याभ्यन्तरसंशुद्धिः स्थिरता सत्क्रियादिषु ।
मनोवाक्कायदण्डश्च विषयेषु निरीहता ॥३३॥
निरहङ्कारता जन्मजराद्यालोचनं तथा ।
असक्तिः स्नेहशून्यत्वं पुत्रदारधनादिषु ॥३४॥
इष्टानिष्टागमे नित्यं चित्तस्य समता तथा ।
मयि सर्वात्मके रामे ह्यनन्यविषया मतिः ॥३५॥
जनसम्बाधरहितशुद्धदेशनिषेवणम् ।
प्राकृतैर्जनसङ्गैश्च ह्यरतिः सर्वदा भवेत् ॥३६॥
आत्मज्ञाने सदोद्योगो वेदान्तार्थालोकनम् ।
उक्तैरेतैर्भवेज्ज्ञानं विपरीतैर्विपर्ययः ॥३७॥
बुद्धिप्राणमनोदेहाहंकृतिभ्यो विलक्षणः ।
चिदात्माऽहं नित्यशुद्धो बुद्ध एवेति निश्चयम्॥३८॥
येन ज्ञानेन संवित्ते तज्ज्ञानं निश्चितं च मे ।
विज्ञानं च तदैवैतत्साक्षादनुभवेद्यदा ॥३९॥
आत्मा सर्वत्र पूर्णः स्याच्चिदानन्दात्मकोऽव्ययः ।
बुद्ध्याद्युपाधिरहितः परिणामादिवर्जितः ॥४०॥

कलत्रादिका बन्धन है, नहीं तो आत्माका इनसे क्या सम्बन्ध है ॥ २७ ॥ पाँच स्थूल भूत, पञ्च तन्मात्राएँ, अहंकार, बुद्धि, दश-इन्द्रियाँ, चिदाभास, मन और मूल-प्रकृति इन सबके समूहको क्षेत्र समझना चाहिये; इसीको शरीर भी कहते हैं ॥ २८-२९ ॥ निरामय परमात्मा-रूप जीव इन सबसे पृथक् है । अब मैं उस जीवको जाननेके कुछ साधन भी बताता हूँ ( सावधान होकर ) सुनो ॥ ३० ॥

जीव और परमात्मा यह पर्याय शब्द हैं—दोनोंका अभिप्राय एक ही है; अतः इसमें भेद-बुद्धि नहीं करनी चाहिये । अभिमानसे दूर रहना, दम्भ और हिंसा आदिका त्याग करना ॥ ३१ ॥ दूसरोंके किये हुए आक्षेपादिको सहन करना, सर्वत्र सरल भाव रखना, मन, वचन और शरीरके द्वारा सच्ची भक्तिसे सद्गुरुकी सेवा करना ॥ ३२ ॥ बाह्य और आन्तरिक शुद्धि रखना, सत्कर्मोंमें तत्पर रहना, मन, वाणी और शरीरका संयम करना, विषयोंमें प्रवृत्त न होना ॥ ३३ ॥ अहंकारशून्य रहना, जन्म, मृत्यु, रोग और बुढ़ापे आदिके कष्टोंका विचार करना, पुत्र, स्त्री और धन आदिमें राग तथा स्नेह न करना ॥ ३४ ॥ इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें चित्तको सदा समान रखना, मुझ सर्वात्मा राममें अनन्य बुद्धि रखना ॥ ३५॥ जनसमूहसे शून्य पवित्र देशमें रहना, संसारी लोगोंसे सर्वदा उदासीन रहना ॥ ३६ ॥ आत्मज्ञानका सदा उद्योग करना तथा वेदान्तके अर्थका विचार करना—इन उक्त साधनोंसे तो ज्ञान प्राप्त होता है और इनके विपरीत आचरण करनेसे विपरीत फल ( अज्ञान ) मिलता है ॥ ३७ ॥

जिस शुद्ध ज्ञानसे ऐसा बोध होता है कि मैं बुद्धि, प्राण, मन, देह और अहंकार आदिसें विलक्षण नित्य शुद्ध बुद्ध चेतन आत्मा हूँ वही मेरे मतसे निश्चित ज्ञान है । जिस समय इसका साक्षात् अनुभव होता है उस समय इसीको विज्ञान कहते हैं ॥ ३८-३९ ॥ आत्मा सर्वत्र पूर्ण, चिदानन्दस्वरूप, अविनाशी, बुद्धि आदि उपाधियोंसे शून्य तथा परिणामादि विकारोंसे रहित है ॥ ४० ॥ यह अपने प्रकाशसे देह आदि

सर्ग ४ ] अरण्यकाण्ड १११


स्वप्रकाशेन देहादीन् भासयन्ननपावृतः ।
एक एवाद्वितीयश्च सत्यज्ञानादिलक्षणः ॥४१॥
असङ्गः स्वप्रभो द्रष्टा विज्ञानेनावगम्यते ।
आचार्यशास्त्रोपदेशादैक्यज्ञानं यदा भवेत् ॥४२॥
आत्मनोर्जीवपरयोर्मूलाविद्या तदैव हि ।
लीयते कार्यकारणैः सहैव परमात्मनि ॥४३॥
साऽवस्था मुक्तिरित्युक्ता ह्युपचारोऽयमात्मनि ।
इदं मोक्षस्वरूपं ते कथितं रघुनन्दन ॥४४॥
ज्ञानविज्ञानवैराग्यसहितं मे परात्मनः ।
किन्त्वेतद्दुर्लभं मन्ये मद्भक्तिविमुखात्मनाम् ॥४५॥
चक्षुष्मतामपि यथा रात्रौ सम्यङ् न दृश्यते ।
पदं दीपसमेतानां दृश्यते सम्यगेव हि ॥४६॥
एवं मद्भक्तियुक्तानामात्मा सम्यक् प्रकाशते ।
मद्भक्तेः कारणं किञ्चिद्वक्ष्यामि शृणु तत्त्वतः ॥४७॥

मद्भक्तसङ्गो मत्सेवा मद्भक्तानां निरन्तरम् ।
एकादश्युपवासादि मम पर्वानुमोदनम् ॥४८॥
मत्कथाश्रवणे पाठे व्याख्याने सर्वदा रतिः ।
मत्पूजापरिनिष्ठा च मम नामानुकीर्तनम् ॥४९॥
एवं सततयुक्तानां भक्तिरव्यभिचारिणी ।
मयि सञ्जायते नित्यं ततः किमवशिष्यते ॥५०॥
अतो मद्भक्तियुक्तस्य ज्ञानं विज्ञानमेव च ।
वैराग्यं च भवेच्छीघ्रं ततो मुक्तिमवाप्नुयात् ॥५१॥

कथितं सर्वमेतत्ते तव प्रश्नानुसारतः ।
अस्मिन्मनः समाधाय यस्तिष्ठेत्स तु मुक्तिभाक् ॥५२॥
न वक्तव्यमिदं यत्नान्मद्भक्तिविमुखाय हि ।


उपाधियोंको प्रकाशित करता हुआ भी स्वयं आवरण-शून्य, एक, अद्वितीय और सत्य ज्ञान आदि लक्षणोंवाला तथा संगरहित, स्वप्रकाश और सबका साक्षी है—ऐसा विज्ञानसे जाना जाता है। जिस समय मनुष्यको आचार्य और शास्त्रके उपदेशसे जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान होता है उसी समय मूला अविद्या अपने कार्य और साधनोंके सहित परमात्मामें लीन हो जाती है ॥ ४१-४३ ॥ अविद्याकी इस लयावस्थाको ही मोक्ष कहते हैं, आत्मामें यह (बन्ध और मोक्ष) केवल उपचारमात्र है (वास्तवमें आत्माकी बन्धावस्था और मुक्तावस्था नहीं है वह तो सदा ही मुक्त है) हे रघुनन्दन लक्ष्मण ! तुम्हें मैंने यह ज्ञान, विज्ञान और वैराग्यके सहित परमात्मारूप अपना मोक्षस्वरूप सुनाया । किन्तु जो लोग मेरी भक्तिसे विमुख हैं उनके लिये मैं इसे अत्यन्त दुर्लभ मानता हूँ ॥ ४४-४५ ॥

जिस प्रकार नेत्र होते हुए भी लोग रात्रिके समय अन्धकारमें भली प्रकार नहीं देख सकते, दीपक होनेपर ही उस समय मार्ग दिखायी देता है, उसी प्रकार मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषोंको ही आत्माका सम्यक् साक्षात्कार होता है । अब मैं अपनी भक्तिके कुछ वास्तविक उपाय बताता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ४६-४७ ॥

"मेरे भक्तका संग करना, निरन्तर मेरी और मेरे भक्तोंकी सेवा करना, एकादशी आदिका व्रत करना, मेरे पर्व दिनोंको मनाना ॥ ४८ ॥ मेरी कथाके सुनने, पढ़ने और उसकी व्याख्या करनेमें सदा प्रेम करना, मेरी पूजामें तत्पर रहना, मेरा नाम-कीर्तन करना" ॥ ४९ ॥ इस प्रकार जो निरन्तर मुझमें लगे रहते हैं उनकी मुझमें अविचल भक्ति हो जाती है। फिर बाकी ही क्या रहता है ? ॥ ५० ॥ अतः ( यह निश्चित बात है कि) मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषको ज्ञान, विज्ञान और वैराग्य आदिकी शीघ्र प्राप्ति होती है और फिर वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५१ ॥

इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रश्नानुसार यह सम्पूर्ण रहस्य तुम्हें सुना दिया । जो व्यक्ति अपने चित्तको इसमें समाहित करके रहता है वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५२ ॥ अतः हे लक्ष्मण ! मेरी भक्तिसे विमुख पुरुषोंसे