अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ८: भरतजीका वनको प्रस्थान, गुह और भरद्वाजजीसे भेंट तथा चित्रकूट-दर्शन
'सर्ग ८] अयोध्याकाण्ड ८७
अष्टम सर्ग
भरतजीका वनको प्रस्थान, मार्गमें गुह और भरद्वाजजीसे भेंट तथा चित्रकूटदर्शन ।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— |
|---|---|
| वसिष्ठो मुनिभिः सार्धं मन्त्रिभिः परिवारितः ।<br>राज्ञः सभां देवसभासन्निभामविशद्विभुः ॥ १॥ | हे पार्वति ! एक दिन गुनीश्वरोंके सहित मन्त्रियोंसे घिरे हुए भगवान् वसिष्ठजी देवसभाके सदृश राजसभामें आये ॥ १॥ |
| तत्रासने समासीनश्चतुर्मुख इवापरः ।<br>आनीय भरतं तत्र उपवेश्य सहानुजम् ॥ २॥ | वहाँ दूसरे ब्रह्माजीके समान आसनपर विराजमान श्रीवसिष्ठजीने भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजीको बुलाकर आसनपर बैठाया ॥ २ ॥ |
| अब्रवीद्वचनं देशकालोचितमरिन्दमम् ।<br>वत्स राज्येऽभिषेक्ष्यामस्त्वामद्य पितृशासनात् ॥ ३॥ | और उन शत्रुदमन भरतजीसे इस प्रकार देशकालोचित वाक्योंमें कहा—"वत्स ! तुम्हारे पिताके कथनानुसार आज हम तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त करेंगे ॥ ३॥ |
| कैकेय्या याचितं राज्यं त्वदर्थे पुरुषर्षभ ।<br>सत्यसन्धो दशरथः प्रतिज्ञाय ददौ किल ॥ ४॥ | हे पुरुषश्रेष्ठ ! कैकेयीने तुम्हारे लिये राजा दशरथसे राज्य माँगा था । राजा सत्यपरायण थे, इसलिये प्रतिज्ञा करनेके कारण उन्होंने उसे दे दिया ॥ ४॥ |
| अभिषेको भवत्वद्य मुनिभिर्मन्त्रपूर्वकम् । | अतः मुनिजनोंद्वारा मन्त्रोच्चारपूर्वक आज तुम्हारा अभिषेक होना चाहिये ।" |
| तच्छ्रुत्वा भरतोऽप्याह मम राज्येन किं मुने ॥ ५॥ | यह सुनकर भरतजी बोले—"हे मुनिनाथ ! राज्यसे मेरा क्या प्रयोजन है ? ॥ ५॥ |
| रामो राजाधिराजश्च वयं तस्यैव किङ्कराः ।<br>श्वःप्रभाते गमिष्यामो राममानेतुमञ्जसा ॥ ६॥ | महाराज राम ही राजाधिराज हैं, हम तो उन्हींके दास हैं । कल प्रातःकाल रामजीको लानेके लिये हम शीघ्र ही वनको जायँगे ॥ ६॥ |
| अहं यूयं मातरश्च कैकेयीं राक्षसीं विना ।<br>हनिष्याम्यधुनैवाहं कैकेयीं मातृगन्धिनीम् ॥ ७॥ | मैं, आप सबलोग और राक्षसी कैकेयीके सिवा अन्य सब माताएँ—ये सभी वनको चलेंगे । मैं क्या करूँ ? मैं तो इस नाममात्रकी माता कैकेयीको अभी मार डालता, |
| किन्तु मां नो रघुश्रेष्ठः स्त्रीहन्तारं सहिष्यते ।<br>तच्छ्वोभूते गमिष्यामि पादचारेण दण्डकान् ॥ ८॥ | किन्तु श्रीरघुनाथजी मुझ स्त्री-हत्यारेको क्षमा न करेंगे । अतः कुछ भी हो, कल प्रातःकाल होते ही, आप लोग चलें या न चलें, मैं तो शत्रुघ्नके सहित पैदल ही दण्डकारण्यको जाऊँगा । |
| शत्रुघ्नसहितस्तूर्णं यूयमायान्तु वा न वा ।<br>रामो यथा वने यातस्तथाऽहं वल्कलाम्बरः ॥ ९॥ | हे मुने ! जिस प्रकार रामजी गये हैं उसी प्रकार जबतक रामचन्द्रजी न लौटेंगे तबतक मैं भी, शत्रुघ्नके सहित वल्कल-वस्त्र और जटाजूट धारणकर कन्द-मूल-फलादिका भोजन करूँगा और पृथिवीपर शयन करूँगा" ॥ ७–१०॥ |
| फलमूलकृताहारः शत्रुघ्नसहितो मुने ।<br>भूमिशायी जटाधारी यावद्रामो निवर्तते ॥ १०॥ | |
| इति निश्चित्य भरतस्तूष्णीमेवावतस्थिवान् ।<br>साधुसाध्विति तं सर्वे प्रशंसुर्मुदान्विताः ॥ ११॥ | ऐसा निश्चयकर भरतजी मौन हो गये । तब सबलोग प्रसन्न होकर 'साधु-साधु' कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ११॥ |
| ततः प्रभाते भरतं गच्छन्तं सर्वसैनिकाः ।<br>अनुजग्मुः सुमन्त्रेण नोदिताः साश्वकुञ्जराः ॥ १२॥ | तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर भरतजीके कूच करते समय हाथी और घोड़ोंके सहित समस्त सैनिक सुमन्त्र- |
| ८८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८] |
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कौसल्याद्या राजदारा वसिष्ठप्रमुखा द्विजाः ।<br>छादयन्तो भुवं सर्वे पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः ॥१३॥<br>शृङ्गवेरपुरं गत्वा गङ्गाकूले समन्ततः ।<br>उवास महती सेना शत्रुघ्नपरिचोदिता ॥१४॥<br>आगतं भरतं श्रुत्वा गुहः शङ्कितमानसः ।<br>महत्या सेनया सार्धमागतो भरतः किल ॥१५॥<br>पापं कर्तुं न वा याति रामस्याविदितात्मनः ।<br>गत्वा तद्धृदयं ज्ञेयं यदि शुद्धस्तरिष्यति ॥१६॥<br>गङ्गां नोचेत्समाकृष्य नावास्तिष्ठन्तु सायुधाः ।<br>ज्ञातयो मे समात्ताः पश्यन्तः सर्वतोदिशम् ॥१७॥<br>इति सर्वान्समादिश्य गुहो भरतमागतः ।<br>उपायनानि संगृह्य विविधानि बहून्यपि ॥१८॥<br>प्रययौ ज्ञातिभिः सार्धं बहुभिर्विविधायुधैः ।<br>निवेश्योपायनान्यग्रे भरतस्य समन्ततः ॥१९॥<br>दृष्ट्वा भरतमासीनं सानुजं सह मन्त्रिभिः ।<br>चीराम्बरं घनश्यामं जटामुकुटधारिणम् ॥२०॥<br>राममेवानुशोचन्तं रामरामेति वादिनम् ।<br>ननाम शिरसा भूमौ गुहोऽहमिति चाब्रवीत् ॥२१॥<br>शीघ्रमुत्थाप्य भरतो गाढमालिङ्ग्य सादरम् ।<br>पृष्ट्वानामयमव्यग्रः सखायमिदमब्रवीत् ॥२२॥<br>भ्रातस्त्वं राघवेणात्र समेतः समवस्थितः ।<br>रामेणालिङ्गितः सार्द्रनयनेनामलात्मना ॥२३॥<br>धन्योऽसि कृतकृत्योसि यत्त्वया परिभाषितः ।<br>रामो राजीवपत्राक्षो लक्ष्मणेन च सीतया ॥२४॥<br>यत्र रामस्त्वया दृष्टस्तत्र मां नय सुव्रत ।<br>सीतया सहितो यत्र सुप्तस्तद्दर्शयस्व मे ॥२५॥<br>त्वं रामस्य प्रियतमो भक्तिमानसि भाग्यवान् ।<br>इति संस्मृत्य संस्मृत्य रामं साश्रुविलोचनः ॥२६॥ | की प्रेरणासे उनके साथ चले ॥ १२ ॥ कौसल्या आदि महारानियाँ तथा वसिष्ठ आदि द्विजगण पृथिवीको आच्छादन कर उनके आगे-पीछे और इधर-उधर यथा-योग्य रीतिसे चलने लगे॥ १३ ॥ इस प्रकार शृंगवेरपुर पहुँचनेपर वह महान् सेना शत्रुघ्नकी प्रेरणासे गंगातट-पर जहाँ-तहाँ ठहर गयी ॥ १४ ॥<br>भरतका आगमन सुन गुहको यह शंका हुई कि भरत बड़ी सेना लेकर आये हैं अतः ये रामके अनजान-में उनका कोई अनिष्ट करनेके लिये न जाते हों ? मुझे उनके पास जाकर उनका मर्म जानना चाहिये । यदि उनका भाव ठीक हो तब तो वे भले ही पार चले जायें ॥ १५-१६ ॥ नहीं तो ( इसके विपरीत उपाय करना पड़ेगा अतः ) मेरे जातिवाले अस्त्र-शस्त्र लेकर सावधानी-से सब ओर चौकस रहें और सब नावोंको खींचकर गंगाके बीचमें खड़ी कर दें ॥ १७ ॥<br>इस प्रकार सबको आज्ञा दे गुह नाना प्रकारकी बहुत-सी भेंटें लेकर अपने बहुत-से हथियारबन्द जाति-भाइयोंके साथ भरतजीके पास आया। वहाँ उनके सामने सब सामग्री रखकर इधर-उधर देखते हुए उसने देखा कि मेघश्याम भरत चीर-वस्त्र और जटाजूट धारण किये मन्त्रियोंके साथ बैठे हैं ॥ १८-२० ॥ वे राम-हीका स्मरण कर रहे हैं और 'राम-नाम' का ही जप कर रहे हैं। यह देखकर उसने पृथिवीपर शिर रखकर भरतजीको प्रणाम किया और बोला 'मैं गुह हूँ' ॥ २१ ॥<br>भरतजीने उसे शीघ्र ही उठाकर आदरपूर्वक गाढ़ आलिंगन किया और प्रसन्न-मुखसे उसकी कुशल पूछ-कर उससे सखा-भावसे इस प्रकार बोले—॥ २२ ॥ "भैया ! तुम यहाँ श्रीरामचन्द्रजीके साथ रहे थे और निर्मलहृदय श्रीरामने नेत्रोंमें जल भरकर तुम्हारा आलिंगन किया था ॥ २३ ॥ तुमसे सीता और लक्ष्मण-के सहित कमल-नयन रामने वार्तालाप की अतः तुम धन्य हो, तुम्हारा जीवन सफल है ॥ २४ ॥ हे सुव्रत ! तुमने श्रीरामचन्द्रजीको जहाँ देखा था मुझे वहीं ले चलो, जहाँ वे सीताके सहित सोये थे वह स्थान मुझे दिखाओ ॥ २५ ॥ तुम रामके प्रियतम सखा और भाग्यवान् भक्त हो ।” इस प्रकार पुनः-पुनः रामका स्मरण करनेसे भरतजीके नेत्रोंमें जल भर आया ॥२६॥
| सर्ग ८ ] | अयोध्याकाण्ड | ८९ |
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| गुहेन सहितस्तत्र यत्र रामः स्थितो निशि ।<br>ययौ ददर्श शयनस्थलं कुशसमास्तृतम् ॥२७॥<br>सीताऽऽभरणसंलग्नस्वर्णबिन्दुभिरञ्चितम् ।<br>दुःखसन्तप्तहृदयो भरतः पर्यदेवयत् ॥२८॥<br>अहोऽतिसुकुमारी या सीता जनकनन्दिनी ।<br>प्रासादे रत्नपर्यङ्के कोमलास्तरणे शुभे ॥२९॥<br>रामेण सहिता शेते सा कथं कुशविष्टरे ।<br>सीता रामेण सहिता दुःखेन मम दोषतः ॥३०॥<br>धिङ् मां जातोऽस्मि कैकेय्यां पापराशिसमानतः।<br>मन्निमित्तमिदं क्लेशं रामस्य परमात्मनः ॥३१॥<br>अहोऽतिसफलं जन्म लक्ष्मणस्य महात्मनः।<br>राममेव सदान्वेति वनस्थमपि हृष्टधीः ॥३२॥<br>अहं रामस्य दासा ये तेषां दासस्य किङ्करः।<br>यदि स्यां सफलं जन्म मम भूयान्न संशयः ॥३३॥<br>भ्रातर्जानासि यदि तत्कथयस्व ममाखिलम्।<br>यत्र तिष्ठति तत्राहं गच्छाम्यानेतुमञ्जसा ॥३४॥ | इस प्रकार विरहव्याकुल हुए वे गुहके साथ उस स्थानपर पहुँचे जहाँ रात्रिके समय श्रीरामने निवास किया था। वहाँ जाकर उन्होंने उस कुशा बिछे हुए शयन-स्थानको देखा ॥ २७॥ वह सीताजीके आभूषणोंसे झड़े हुए सुवर्णकणोंसे सुशोभित था। उसे देखकर भरतजीका हृदय दुःखसे भर आया और वे इस प्रकार विलाप करने लगे—॥ २८ ॥ “अहो ! जो अति सुकुमारी जनकदुलारी सीता राजमहलमें कोमल बिछौनेसे युक्त अति सुन्दर रत्नपर्यङ्कपर श्रीरघुनाथजीके साथ शयन किया करती थीं वे ही मेरे दोषसे श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस कुशाओंकी साथरीपर किस प्रकार क्लेशपूर्वक सोती होंगी ? ॥ २९-३० ॥ मुझे धिक्कार है ! जो मैं मूर्त्तिमान् पापपुञ्जके समान कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ । हाय ! मेरेलिये ही परमात्मा रामको यह क्लेश उठाना पड़ा ! ! ॥ ३१ ॥ अहा ! महात्मा लक्ष्मणका जन्म अत्यन्त सफल है जो भगवान् रामके वनमें रहते समय भी सदा प्रसन्नमनसे उन्हींका अनुसरण करते हैं ॥३२॥ जो लोग रामके दास हैं उनके दासोंका दास भी यदि मैं हो जाऊँ तो मेरा जन्म सफल हो जाय—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥ भाई ! यदि तुम्हें मालूम हो तो मुझे यह सब बताओ कि राम कहाँ हैं ? वे जहाँ कहीं भी होंगे, मैं उन्हें तुरन्त लानेके लिये वहीं जाऊँगा” ॥३४॥ |
| गुहस्तं शुद्धहृदयं ज्ञात्वा सस्नेहमब्रवीत् ।<br>देव त्वमेव धन्योऽसि यस्य ते भक्तिरीदृशी ॥३५॥<br>रामे राजीवपत्राक्षे सीतायां लक्ष्मणे तथा।<br>चित्रकूटाद्रिनिकटे मन्दाकिन्यविदूरतः ॥३६॥<br>मुनीनामा श्रमपदे रामस्तिष्ठति सानुजः।<br>जानक्या सहितो नन्दन्सुखमास्ते किल प्रभुः॥३७॥<br>तत्र गच्छामहे शीघ्रं गङ्गां तर्तुमिहार्हसि ।<br>इत्युक्त्वा त्वरितं गत्वा नावः पञ्चशतानि ह ॥३८॥<br>समानयत्तत्सैन्यस्य तर्तुं गङ्गां महानदीम् ।<br>स्वयमवानिनायैकां राजनावं गुहस्तदा ॥३९॥<br>आरोप्य भरतं तत्र शत्रुघ्नं राममातरम् ।<br>वसिष्ठं च तथान्यत्र कैकेयीं चान्ययोषितः ॥४०॥<br>तीर्त्वा गङ्गां ययौ शीघ्रं भरद्वाजाश्रमं प्रति। | गुहने उनका चित्त शुद्ध देखकर स्नेहपूर्वक कहा—“स्वामिन् ! आपकी कमलनयन राम, सीता और लक्ष्मणमें ऐसी विशुद्ध भक्ति है, अतः आप ही धन्य हैं। छोटे भाई लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्र चित्रकूट-पर्वतके पास मन्दाकिनी नदीके समीप मुनियोंके आश्रममें रहते हैं। वहाँ जानकीके सहित भगवान् राम आनन्द और सुखपूर्वक विराजमान हैं ॥ ३५—३७॥ चलिये, शीघ्र ही हमलोग वहाँ चलें। पहले आपलोग यहाँ गङ्गाजी पार कर लें।” ऐसा कहकर उसने तुरन्त ही सेनाके सहित भरतजीको गङ्गाजीसे पार करनेके लिये पाँच सौ नावें मँगवायीं और स्वयं एक राजनौका ले आया ॥ ३८-३९ ॥ उसमें भरत, शत्रुघ्न, रामकी माता कौसल्या और वसिष्ठजीको चढ़ाया तथा एक दूसरी नावमें कैकेयी आदि अन्य राजमहिलाओंको सवार किया ॥४०॥<br><br>इस प्रकार शीघ्र ही गङ्गाजीको पार कर वे भरद्वाज |
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| ९० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दूरे स्थाप्य महासैन्यं भरतः सानुजो ययौ ॥४१॥<br>आश्रमे मुनिमासीनं ज्वलन्तमिव पावकम् ।<br>दृष्ट्वा ननाम भरतः साष्टाङ्गमतिमक्तितः ॥४२॥ | मुनिके आश्रमकी ओर चले। वहाँ अपनी महान् सेनाको आश्रमसे दूर छोड़कर भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजी आश्रमपर गये ॥४१॥ और प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी मुनिवर भरद्वाजको आश्रममें बैठे देख उन्हें अति भक्तिपूर्वक साष्टांग प्रणाम किया ॥ ४२ ॥ |
| ज्ञात्वा दाशरथिं प्रीत्या पूजयामास मौनिराट् ।<br>पप्रच्छ कुशलं दृष्ट्वा जटावल्कलधारिणम् ॥४३॥<br>राज्यं प्रशासत्तस्तेऽद्य किमेतद्वल्कलादिकम् ।<br>आगतोऽसि किमर्थं त्वं विपिनं मुनिसेवितम् ॥४४॥ | मुनीश्वरको जब मालूम हुआ कि वे दशरथनन्दन भरत हैं तो उन्होंने प्रीतिपूर्वक उनकी पूजा की और उन्हें जटा-वल्कलादि धारण किये देख कुशल-प्रश्नके अनन्तर पूछा—॥४३॥ "भाई भरत ! राज्य-शासन करते हुए तुमने आज यह वल्कलादि कैसे धारण कर लिये और इस मुनिजनसेवित तपोवनमें तुम किसलिये आये हो ?" ॥४४॥ |
| भरद्वाजवचः श्रुत्वा भरतः साश्रुलोचनः ।<br>सर्वं जानासि भगवन् सर्वभूताशयस्थितः ॥४५॥<br>तथापि पृच्छसे किञ्चित्तदनुग्रह एव मे ।<br>कैकेय्या यत्कृतं कर्म रामराज्यविघातनम् ॥४६॥<br>वनवासादिकं वापि नाहि जानामि किञ्चन ।<br>भवत्पादयुगं मेऽद्य प्रमाणं मुनिसत्तम ॥४७॥ | भरद्वाजके ये वचन सुनकर भरतने नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"भगवन् ! आप सब जानते हैं, क्योंकि आप सर्वान्तर्यामी हैं ॥४५॥ फिर भी आप जो पूछ रहे हैं वह मेरे ऊपर आपकी कुछ कृपा ही है। कैकेयीने श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न उपस्थित करनेवाला और वनवासादि-विषयक जो कुछ कार्य किया है, हे मुनिश्रेष्ठ ! आपके चरणोंकी साक्षी करके कहता हूँ; मुझे उसके विषयमें कुछ भी पता नहीं था" ॥४६-४७॥ |
| इत्युक्त्वा पादयुगलं मुनेः स्पृष्ट्वाऽऽर्त्तमानसः ।<br>ज्ञातुमर्हसि मां देव शुद्धो वाऽशुद्ध एव वा ॥४८॥ | ऐसा कह उन्होंने अति आर्त्तचित्त हो मुनिके चरण-युगल पकड़कर कहा—"भगवन् ! आप स्वयं जान सकते हैं कि मैं दोषी हूँ या निर्दोष ॥४८॥ |
| मम राज्येन किं स्वामिन् रामे तिष्ठति राजनि।<br>किङ्करोऽहं मुनिश्रेष्ठ रामचन्द्रस्य शाश्वतः ॥४९॥ | हे स्वामिन् ! महाराज रामके रहते हुए मुझे राज्यसे क्या प्रयोजन है ? हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं तो सदासे ही श्रीरामचन्द्रका दास हूँ ॥४९॥ |
| अतो गत्वा मुनिश्रेष्ठ रामस्य चरणान्तिके ।<br>पतित्वा राज्यसम्भारान् समर्प्यैत्रैव राघवम्॥५०॥<br>अभिषेक्ष्ये वसिष्ठाद्यैः पौरजानपदैः सह ।<br>नेष्येऽयोध्यां रमानाथं दासः सेवेऽतिनीचवत् ॥५१॥ | अतः हे मुनिनाथ ! मैं श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर उनके चरण-कमलोंमें पड़कर यह सारी राजपाटकी सामग्री उन्हें यहीं सौंप दूँगा ॥५०॥ तथा वसिष्ठ आदि पुरजन और जनपदवासियोंके साथ मिलकर उनका राज्याभिषेक कर अयोध्या ले जाऊँगा और अति तुच्छ दासके समान उन लक्ष्मीपतिकी सेवा करूँगा" ॥५१॥ |
| इत्युदीरितमाकर्ण्य भरतस्य वचो मुनिः ।<br>आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय प्रशंस सविस्मयः॥५२॥ | मुनीश्वरने भरतके ये उद्गार सुनकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और विस्मयपूर्वक शिर सूँघकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥५२॥ |
| वत्स ज्ञातं पुरैवैतद्भवष्यिं ज्ञानचक्षुषा ।<br>मा शुचस्त्वं परो भक्तः श्रीरामे लक्ष्मणादपि ॥५३॥ | वे बोले—"बेटा ! अपने ज्ञानचक्षुओंसे मैंने पहले ही ये होनेवाली बातें जान ली थीं। तुम शोक न करो; तुम तो लक्ष्मणकी अपेक्षा भी रामके परम भक्त हो ॥५३॥ हे अनघ ! मैं सेनाके |
सर्ग ८ ] अयोध्याकाण्ड ९१
| आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि ससैन्यस्य तवानघ ।<br>अद्य भुक्त्वा ससैन्यस्त्वं श्वो गन्ता रामसन्निधिम् ॥५४॥ | सहित तुम्हारा आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ । आज सेनासहित तुम यहीं भोजन करो, कल रामके पास जाना" ॥५४॥ |
| यथाऽऽज्ञापयति भवांस्तथेति भरतोऽब्रवीत् ।<br>भरद्वाजस्त्वपः स्पृष्ट्वा मौनी होमगृहे स्थितः ॥५५॥ | भरतजीने कहा—"आपकी जैसी आज्ञा होगी, वही होगा।" तब मुनिवर भरद्वाज आचमन कर मौन होकर यज्ञशालामें बैठे ॥५५॥ |
| दध्यौ कामदुघां कामवर्षिणीं कामदो मुनिः ।<br>असृजत्कामधुक् सर्वं यथाकाममलौकिकम् ॥५६॥ | वहाँ बैठकर उन कामप्रद मुनीश्वरने समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली कामधेनुका स्मरण किया । तब उस कामधेनुने इच्छानुसार सम्पूर्ण अलौकिक भोग प्रस्तुत कर दिये ॥ ५६ ॥ |
| भरतस्य ससैन्यस्य यथेष्टं च मनोरथम् ।<br>यथा ववर्ष सकलं तृप्तांस्ते सर्वसैनिकाः ॥५७॥ | उसने सेनाके सहित भरतजीके सम्पूर्ण मनोरथोंको इस प्रकार पूर्ण किया जिससे वे समस्त सैनिक सन्तुष्ट हो गये ॥५७॥ |
| वसिष्ठं पूजयित्वाग्रे शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ।<br>पश्चात्ससैन्यं भरतं तर्पयामास योगिराट् ॥५८॥ | फिर उन योगिराजने शास्त्रानुकूल प्रथम वसिष्ठजीकी पूजा की और तदनन्तर सेनाके सहित भरतजीको तृप्त किया ॥५८॥ |
| उषित्वा दिनमेकं तु आश्रमे स्वर्गसन्निभे ।<br>अभिवाद्य पुनः प्रातर्भरद्वाजं सहानुजः ।<br>भरतस्तु कृतानुज्ञः प्रययौ रामसन्निधिम् ॥५९॥ | इस प्रकार उस स्वर्ग-सदृश आश्रममें एक दिन रहकर प्रातःकाल मुनिवरको प्रणाम कर उनकी आज्ञा ले भाईके सहित भरतजी रामचन्द्रजीके पास चले ॥५९॥ |
| चित्रकूटमनुप्राप्य दूरे संस्थाप्य सैनिकान् ।<br>रामसंदर्शनाकाङ्क्षी प्रययौ भरतः स्वयम् ॥६०॥ | चित्रकूटके निकट पहुँचनेपर उन्होंने सैनिकोंको दूर खड़ा कर दिया और स्वयं राम-दर्शनकी लालसासे आगे बढ़े ॥६०॥ |
| शत्रुघ्नेन सुमन्त्रेण गुहेन च परन्तपः ।<br>तपस्विमण्डलं सर्वं विचिन्वानो न्यवर्तत ॥६१॥ | परंतप भरतजी शत्रुघ्न, सुमन्त्र और गुहके साथ समस्त तपस्वियोंके आश्रमोंमें खोजते-खोजते फिर आये ॥६१॥ |
| अदृष्ट्वा रामभवनमपृच्छदृषिमण्डलम् ।<br>कुत्रास्ते सीतया सार्धं लक्ष्मणेन रघूत्तमः ॥६२॥ | किन्तु उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी कुटी कहीं न मिली। तब उन्होंने ऋषि-मण्डलीसे पूछा—"सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजी कहाँ रहते हैं?" ॥६२॥ |
| ऊचुरग्रे गिरेः पश्चाद्गङ्गाया उत्तरे तटे ।<br>विविक्तं रामसदनं रम्यं काननमण्डितम् ॥६३॥ | उन्होंने कहा—"सामनेवाले पर्वतके उस ओर श्रीमन्दाकिनीके उत्तरीय तटपर वनावलीसे सुशोभित रामकी परम रमणीक एकान्त कुटी है ॥६३॥ |
| सफलैराम्रपनसैः कदलीखण्डसंवृतम् ।<br>चम्पकैः कोविदारैश्च पुन्नागैर्विपुलैस्तथा ॥६४॥ | वह फलयुक्त आम्रवृक्ष, पनस और कदलीखण्ड (केलेकी क्यारियों) से घिरी हुई है। तथा उसके चारों ओर बहुत-से चम्पक, कोविदार और पुन्नाग आदिके भी वृक्ष सुशोभित हैं" ॥६४॥ |
| एवं दर्शितमालोक्य मुनिभिर्भरतोऽग्रतः ।<br>हर्षाययौ रघुश्रेष्ठभवनं मन्त्रिणा सह ॥६५॥ | मुनियोंके इस प्रकार बतलानेपर भरतजी प्रसन्नतापूर्वक मन्त्रियोंको साथ ले सबसे आगे रघुनाथजीके निवास-स्थानको चले ॥६५॥ आगे बढ़नेपर उन्होंने दूरहीसे रामका |