अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
सुन्दरकाण्ड - सर्ग ४: हनुमान् और रावणका संवाद तथा लङ्कादहन
| २२० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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| बद्ध्वाऽऽनेष्ये द्रुतं तात वानरं ब्रह्मपाशतः ।<br>इत्युक्त्वा रथमारुह्य राक्षसैर्बहुभिर्वृतः ॥९२॥<br>जगाम वायुपुत्रस्य समीपं वीरविक्रमः ।<br>ततोऽतिगर्जितं श्रुत्वा स्तम्भमुद्यम्य वीर्यवान् ॥९३॥<br>उत्पपात नभोदेशं गरुत्मानिव मारुतिः ।<br>ततो भ्रमन्तं नभसि हनूमन्तं शिलीमुखैः ॥९४॥<br>विद्ध्वा तस्य शिरोभागमिषुभिश्चाष्टभिः पुनः ।<br>हृदयं पादयुगलं पद्भिरेकेन वालधिम् ॥९५॥<br>भेदयित्वा ततो घोरं सिंहनादमथाकरोत् ।<br>ततोऽतिहर्षाद्धनुमांस्तम्भमुद्यम्य वीर्यवान् ॥९६॥<br>जघान सारथिं सार्धं रथं चाचूर्णयत्क्षणात् ।<br>ततोऽन्यं रथमादाय मेघनादो महाबलः ॥९७॥<br>शीघ्रं ब्रह्मास्त्रमादाय बद्ध्वा वानरपुङ्गवम् ।<br>निनाय निकटं राज्ञो रावणस्य महाबलः ॥९८॥ | वानरको शीघ्र ही ब्रह्मपाशमें बाँधकर लिये आता हूँ।”<br>ऐसा कह वह महापराक्रमी वीर रथपर चढ़ा और<br>बहुत-से राक्षसोंके साथ पवनपुत्र हनुमान्के पास पहुँचा।<br>तब, वीर्यवान् हनुमान्जी भयङ्कर सिंहनाद सुन हाथमें<br>स्तम्भ लिये गरुड़के समान आकाशमें उड़ गये।<br>उन्हें आकाशमें उड़ते देख इन्द्रजित्ने आठ<br>बाणोंसे उनके शिरको बींधा, फिर छः बाणोंसे<br>उनके हृदय और दोनों चरणोंको तथा एकसे उनकी<br>पूँछको बींधकर वह घोर सिंहनाद करने लगा। तब महा-<br>बलवान् हनुमान्जीने भी अति प्रसन्नतासे स्तम्भ उठाकर<br>एक क्षणमें ही उसके सारथीको मार डाला और घोड़ोंके<br>सहित उसके रथको चूर्ण कर दिया। तब महाबली<br>मेघनाद (इन्द्रजित्) ने दूसरे रथपर चढ़कर तुरन्त<br>ही वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीको ब्रह्मपाशसे बाँध लिया और<br>उन्हें राक्षसराज रावणके पास ले गया ॥९२-९८॥ |
| यस्य नाम सततं जपन्ति ये-<br> ऽज्ञानकर्मकृतबन्धनं क्षणात् ।<br>सद्य एव परिमुच्य तत्पदं<br> यान्ति कोटिरविभासुरं शिवम् ॥९९॥<br>तस्यैव रामस्य पदाम्बुजं सदा<br> हृत्पद्ममध्ये सुनिधाय मारुतिः ।<br>सदैव निर्मुक्तसमस्तबन्धनः<br> किं तस्य पाशैरितरैश्च बन्धनैः ॥१००॥ | जिनके नामका निरन्तर जप करनेवाले भक्तजन<br>एक क्षणमें ही अज्ञानकृत बन्धनको काटकर करोड़ों<br>सूर्योंके समान प्रकाशमान उनके परम कल्याणमय<br>पदको तत्काल प्राप्त कर लेते हैं, उन्हीं भगवान् रामके<br>चरणकमलोंको सदा अपने हृदयकमलमें धारण करनेसे<br>हनुमान्जी सदा ही समस्त बन्धनोंसे छूटे हुए हैं।<br>उनका ब्रह्मपाश अथवा और किसी बन्धनसे क्या<br>हो सकता है ? ॥९९-१००॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
सुन्दरकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
चतुर्थ सर्ग
हनुमान् और रावणका संवाद तथा लङ्कादहन ।
</div>| श्रीमहादेव उवाच<br>यान्तं कपीन्द्रं धृतपाशबन्धनं<br> विलोकयन्तं नगरं बिभीतवत् ।<br>अताडयन्मुष्टितलैः सुकोपन्नाः<br> पौराः समन्तादनुयान्त ईक्षितुम् ॥ १ ॥ | श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! ब्रह्मपाशसे बँधे<br>हुए श्रीहनुमान्जी जब डरे हुएके समान नगर देखते जा<br>रहे थे, उस समय उन्हें देखनेके लिये इधर-उधरसे<br>इकट्ठे हुए पुरवासी उनके पीछे-पीछे चलते हुए<br>उन्हें क्रोधपूर्वक घूँसोंसे मारने लगे ॥ १ ॥ ब्रह्माजीके |
| सर्ग ४ ] | सुन्दरकाण्ड | २२१ |
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ब्रह्मास्त्रमेनं क्षणमात्रसङ्गमं<br>कृत्वा गतं ब्रह्मवरेण सत्वरम् ।<br>ज्ञात्वा हनूमानपि फल्गुरज्जुभि-<br>र्धृतो ययौ कार्यविशेषगौरवात् ॥ २ ॥<br>सभान्तरस्थस्य च रावणस्य तं<br>पुरो निधायाह बलारिजित्तदा ।<br>बद्धो मया ब्रह्मवरेण वानरः<br>समागतोऽनेन हता महासुराः ॥ ३ ॥<br>यद्युक्तमत्रार्य विचार्य मन्त्रिभि-<br>र्विधीयतामेष न लौकिको हरिः ।<br>ततो विलोक्याह स राक्षसेश्वरः<br>प्रहस्तमग्रे स्थितमञ्जनाद्रिभम् ॥ ४ ॥<br>प्रहस्त पृच्छैनमसौ किमागतः<br>किमत्र कार्यं कुत एव वानरः ।<br>वनं किमर्थं सकलं विनाशितं<br>हताः किमर्थं मम राक्षसा बलात् ॥ ५ ॥<br>ततः प्रहस्तो हनुमन्तमादरा-<br>त्पप्रच्छ केन प्रहितोऽसि वानर ।<br>भयं च ते माऽस्तु विमोक्ष्यसे मया<br>सत्यं वदस्वाखिलराजसन्निधौ ॥ ६ ॥ | वरके प्रभावसे ब्रह्मास्त्र हनुमान्जीके शरीरका क्षण-भरके लिये स्पर्श कर तुरन्त चला गया । यह बात जानकर भी श्रीहनुमान्जी विशेष कार्य सम्पादन करनेके लिये तुच्छ रस्सियोंसे ही बँधे हुए रावणके पास चले गये ॥ २ ॥ तब इन्द्रजित् उन्हें सभामें स्थित रावणके सामने ले गया और बोला—"मैं इस वानरको ब्रह्माके वरके प्रभावसे बाँध लाया हूँ; इसीने हमारे बड़े-बड़े वीर राक्षस मारे हैं ॥ ३ ॥ महाराज ! मन्त्रियोंके साथ विचारकर इसके लिये जैसा उचित समझें वैसा विधान करें। यह कोई साधारण वानर नहीं है।" तब राक्षसराज रावणने सामने बैठे हुए कज्जलगिरिके समान कृष्णवर्ण प्रहस्तसे कहा—॥ ४ ॥ "प्रहस्त ! इस बन्दरसे पूछो तो सही, यह यहाँ क्यों आया है ? इसका क्या कार्य है ? यह कहाँसे आया है ? इसने मेरा सारा वन क्यों उजाड़ डाला ? और मेरे राक्षस वीरोंको बलात्कारसे क्यों मारा ?" ॥ ५॥ तब प्रहस्तने हनुमान्जीसे आदरपूर्वक पूछा—"वानर ! तुम्हें किसने भेजा है ? तुम डरो मत; राजराजेश्वरके सामने सब बात सच-सच बतला दो; फिर मैं तुम्हें छुड़ा दूँगा ॥ ६ ॥
ततोऽतिहर्षात्पवनात्मजो रिपुं<br>निरीक्ष्य लोकत्रयकण्टकासुरम् ।<br>वक्तुं प्रचक्रे रघुनाथसत्कथां<br>क्रमेण रामं मनसा स्मरन्मुहुः ॥ ७ ॥<br>शृणु स्फुटं देवगणाद्यमित्र हे<br>रामस्य दूतोऽहमशेषहृत्स्थितेः ।<br>यस्याखिलेशस्य हृताऽधुना त्वया<br>भार्या स्वनाशाय शुनेव सद्गविः ॥ ८ ॥<br>स राघवोऽभ्येत्य मतङ्गपर्वतं<br>सुग्रीवमैत्रीमनलस्य सन्निधौ ।<br>कृत्वैकवाणेन निहत्य वालिनं<br>सुग्रीवमेवाधिपतिं चकार तम् ॥ ९ ॥<br>स वानराणामधिपो महाबली<br>महाबलैर्वानरयूथकोटिभिः ।<br>रामेण सार्धं सह लक्ष्मणेन भो<br>प्रवर्षणेऽमर्षयुतोऽवतिष्ठते ॥१०॥ | तब अपने शत्रु त्रिलोकीके कण्टकरूप राक्षसराज रावणको देखकर पवननन्दन हनुमान्जीने हृदयमें बार-म्बार श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण कर अति हर्षित हो क्रमसे रघुनाथजीकी सुन्दर कथा कहनी आरम्भ की ॥७॥ वे कहने लगे—"हे देवादिंके शत्रु रावण ! तुम साफ-साफ सुनो; कुत्ता जिसप्रकार हविको चुरा ले जाता है उसी प्रकार तुमने अपना नाश करानेके लिये जिन अखिलेश्वरकी साध्वी भार्याको हर लिया है मैं उन्हीं सर्वान्तर्यामी भगवान् रामका दूत हूँ ॥ ८ ॥ उन श्रीरघुनाथजीने मतङ्गपर्वतपर आकर अग्निके साक्ष्यमें सुग्रीवसे मित्रता की और एक ही बाणसे वालीको मारकर सुग्रीवको वानरोंका राजा बना दिया ॥ ९॥ हे रावण ! इस समय वे महाबली वानरराज और भी करोड़ों महाशूरवीर वानरयूथोंके साथ राम और लक्ष्मणके सहित अति क्रोधयुक्त हो प्रवर्षण पर्वतपर विराजमान हैं ॥ १० ॥ उन्होंने श्रीजानकीजीको ढूँढनेके लिये दशों
| २२२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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| सञ्चोदितास्तेन महाहरीश्वरा<br>धरासुतां मार्गयितुं दिशो दश ।<br>तत्राहमेकः पवनात्मजः कपिः<br>सीतां विचिन्वञ्छनकैः समागतः ॥११॥<br>दृष्टा मया पद्मपलाशलोचना<br>सीता कपित्वाद्विपिनं विनाशितम् ।<br>दृष्ट्वा ततोऽहं रभसा समागता-<br>न्मां हन्तुकामान् धृतचापसायकान् ॥१२॥<br>मया हतास्ते परिरक्षितं वपुः<br>प्रियो हि देहोऽखिलदेहिनां प्रभो ।<br>ब्रह्मास्त्रपाशेन निबध्य मां ततः<br>समागमन्मेघनिनादनामकः ॥१३॥<br>स्पृष्ट्वैव मां ब्रह्मवरप्रभावत-<br>स्त्यक्त्वा गतं सर्वमवैमि रावण ।<br>तथाप्यहं बद्ध इवागतो हितं<br>प्रवक्तुकामः करुणार्द्रधीः ॥१४॥<br>विचार्य लोकस्य विवेकतॊ गतिं<br>न राक्षसीं बुद्धिमुपैहि रावण ।<br>दैवीं गतिं संसृतिमोक्षहेतुकीं<br>समाश्रयात्यन्तहिताय देहिनः ॥१५॥<br>त्वं ब्रह्मणो ह्युत्तमवंशसम्भवः<br>पौलस्त्यपुत्रोऽसि कुबेरबान्धवः ।<br>देहात्मबुद्ध्यापि च पश्य राक्षसो<br>नास्यात्मबुद्ध्या किमु राक्षसो नहि ॥१६॥<br>शरीरबुद्धीन्द्रियदुःखसन्तति-<br>र्न ते न च त्वं तव निर्विकारतः ।<br>अज्ञानहेतोश्च तथैव सन्तते-<br>रसत्त्वमस्याः स्वपतो हि दृश्यवत् ॥१७॥<br>इदं तु सत्यं तव नास्ति विक्रिया<br>विकारहेतुर्न च तेऽद्वयत्वतः ।<br>यथा नभः सर्वगतं न लिप्यते<br>तथा भवान्देहगतोऽपि सूक्ष्मकः ।<br>देहेन्द्रियप्राणशरीरसङ्गत-<br>स्त्वात्मेति बुद्ध्वाऽखिलबन्धभागभवेत् ॥१८॥ | दिशाओंमें बड़े-बड़े वानरेश्वर भेजे हैं। उन्हींमेंसे एक वानर मैं वायुका पुत्र हूँ, मैं सीताजीको धीरे-धीरे ढूँढता हुआ यहाँ आया हूँ ॥ ११ ॥ मैं कमलदललोचना जानकीजीका दर्शन कर चुका हूँ, फिर अपने वानर-स्वभावसे मैंने वन उजाड़ दिया, और जब मैंने राक्षसोंको बड़े वेगसे धनुष-बाण आदि लेकर अपनेको मारनेके लिये आते देखा, तो उन्हें मारकर अपनी शरीर-रक्षा की, क्योंकि हे राजन् ! अपना शरीर तो सभी देहधारियोंको प्यारा होता है। फिर वह मेघनाद नामक राक्षस मुझे ब्रह्मपाशमें बाँधकर यहाँ ले आया ॥ १२-१३ ॥ हे रावण ! मैं यद्यपि यह जानता था कि ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे वह ब्रह्मपाश मुझे छूते ही चला गया, तथापि करुणावश तुम्हारे हितकी बात बतानेके लिये मैं बँधे हुएके समान यहाँ चला आया ॥ १४ ॥ हे रावण ! तुम विवेकपूर्वक संसारकी गतिका विचार करो; राक्षसी बुद्धिको अङ्गीकार मत करो और संसार-बन्धनसे छुटानेवाली प्राणियोंकी अत्यन्त हितकारिणी दैवी गतिका आश्रय लो ॥ १५ ॥ तुम ब्रह्माजीके अति उत्तम वंशमें उत्पन्न हुए हो तथा पुलस्त्यनन्दन विश्रवाके पुत्र और कुबेरके भाई हो; अतः देखो, तुम तो देहात्मबुद्धिसे भी राक्षस नहीं हो; फिर आत्मबुद्धिसे राक्षस नहीं हो—इसमें तो कहना ही क्या है ? ॥ १६ ॥ (तुम वास्तवमें कौन हो सो मैं बतलाता हूँ—) तुम सर्वथा निर्विकार हो; इसलिये शरीर, बुद्धि, इन्द्रियों और दुःखादि—ये न तुम्हारे (गुण) हैं और न तुम स्वयं हो। इन सबका कारण अज्ञान है और स्वप्नदृश्यके समान ये सब असत् हैं ॥ १७ ॥ यह बिलकुल सत्य है कि तुम्हारे आत्म-स्वरूपमें कोई विकार नहीं है क्योंकि अद्वितीय होनेसे उसमें कोई विकारका कारण ही नहीं है। जिस प्रकार आकाश सर्वत्र होनेसे भी (किसी पदार्थके गुण-दोषसे) लिप्त नहीं होता उसी प्रकार तुम देहमें रहते हुए भी सूक्ष्मरूप होनेसे उसके सुख-दुःखादि विकारोंसे लिप्त नहीं होते । 'आत्मा देह, इन्द्रिय, प्राण और शरीरसे मिला हुआ है' ऐसी बुद्धि ही सारे बन्धनोंका कारण होती है ॥ १८ ॥ और 'मैं चिन्मात्र अजन्मा अविनाशी |
| सर्ग ४ ] | सुन्दरकाण्ड | २२३ |
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चिन्मात्रमेवाहमजोऽहमक्षरो<br>ह्यानन्दभावोऽहमिति प्रमुच्यते ।<br>देहोऽप्यनात्मा पृथिवीविकारजो<br>न प्राण आत्माऽनिल एष एव सः ॥१९॥<br>मनोऽप्यहङ्कारविकार एव नो<br>न चापि बुद्धिः प्रकृतेर्विकारजा ।<br>आत्मा चिदानन्दमयोऽविकारवा-<br>न्देहादिसङ्घाद्व्यतिरिक्त ईश्वरः ॥२०॥<br>निरञ्जनो मुक्त उपाधितः सदा<br>ज्ञात्वैवमात्मानमितो विमुच्यते ।<br>अतोऽहमात्यन्तिकमोक्षसाधनं<br>वक्ष्ये शृणुष्वावहितो महामते ॥२१॥<br>विष्णोर्हि भक्तिः सुविशोधनं धिय-<br>स्ततो भवेज्ज्ञानमतीव निर्मलम् ।<br>विशुद्धतत्त्वानुभवो भवेत्ततः<br>सम्यग्विदित्वा परमं पदं व्रजेत् ॥२२॥<br>अतो भजस्वाद्य हरिं रमापतिं<br>रामं पुराणं प्रकृतेः परं विभुम् ।<br>विसृज्य मौर्ख्यं हृदि शत्रुभावनां<br>भजस्व रामं शरणागतप्रियम् ।<br>सीतां पुरस्कृत्य सपुत्रबान्धवो<br>रामं नमस्कृत्य विमुच्यसे भयात् ॥२३॥<br>रामं परात्मानमभावयन् जनो<br>भक्त्या हृदिस्थं सुखरूपमद्वयम् ।<br>कथं परं तीरमवाप्नुयाज्जनो<br>भवाम्बुधेर्दुःखतरङ्गमालिनः ॥२४॥<br>नो चेत्त्वमज्ञानमयेन वह्निना<br>ज्वलन्तमात्मानमरक्षिताऽरिवत् ।<br>नयस्यधोऽधः स्वकृतैश्च पातकै-<br>र्विमोक्षशङ्का न च ते भविष्यति ॥२५॥<br>श्रुत्वाऽमृतास्वादसमानभाषितं<br>तद्वायुसूनोर्दशकन्धरोऽसुरः ।<br>अमृष्यमाणोऽतिरुषा कपीश्वरं<br>जगाद रक्तान्तविलोचनो ज्वलन् ॥२६॥ | तथा आनन्दस्वरूप ही हूँ' इस बुद्धिसे जीव मुक्त हो जाता है। पृथिवीका विकार होनेसे देह भी अनात्मा है और प्राण वायुरूप ही है, अतः यह भी आत्मा नहीं है ॥ १९ ॥ अहंकारका कार्य मन अथवा प्रकृतिके विकारसे उत्पन्न हुई बुद्धि भी आत्मा नहीं है। आत्मा तो चिदानन्दस्वरूप, अविकारी तथा देहादि संघातसे पृथक् और उसका स्वामी है ॥२०॥ वह निर्मल और सर्वदा उपाधिरहित है; उसका इस प्रकार ज्ञान होते ही मनुष्य संसारसे मुक्त हो जाता है। अतः हे महामते ! मैं तुम्हें आत्यन्तिक मोक्षका साधन बतलाता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ २१ ॥ भगवान् विष्णुकी भक्ति, बुद्धिको अत्यन्त शुद्ध करनेवाली है, उसीसे अत्यन्त निर्मल आत्मज्ञान होता है। आत्मज्ञानसे शुद्ध आत्मतत्त्वका अनुभव होता है और उससे दृढबोध हो जानेसे मनुष्य परमपद प्राप्त करता है ॥ २२ ॥ इसलिये तुम प्रकृतिसे परे, पुराणपुरुष, सर्वव्यापक आदि-नारायण, लक्ष्मीपति, हरि भगवान् रामका भजन करो। अपने हृदयमें स्थित शत्रुभावरूप मूर्खताको छोड़ दो, और शरणागतवत्सल रामका भजन करो। सीताजीको आगेकर अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके सहित भगवान् रामकी शरण जाकर उन्हें नमस्कार करो। इससे तुम भयसे छूट जाओगे ॥ २३ ॥ जो पुरुष अपने हृदयमें स्थित अद्वितीय सुखरूप परमात्मा रामका भक्तिपूर्वक ध्यान नहीं करता वह दुःख-तरङ्गावलिसे पूर्ण इस संसार-समुद्रका पार कैसे पा सकता है ? ॥ २४ ॥ यदि तुम भगवान् रामका भजन न करोगे तो अज्ञानरूपी अग्निसे जलते हुए अपने-आपको शत्रुके समान सुरक्षित नहीं रख सकोगे और उसे अपने किये हुए पापोंसे उत्तरोत्तर नीचेकी ओर ही ले जाओगे; फिर तुम्हारे मोक्षकी कोई सम्भावना न रहेगी" ॥ २५ ॥<br>पवनसुतके इस अमृतसदृश मधुर भाषणको सुनकर राक्षसराज रावण उसे सहन न कर सका और अत्यन्त क्रोधसे नेत्र लाल कर मन-ही-मन जलता हुआ हनुमान्जी-से बोला—॥२६॥ "अरे दुष्टबुद्धे ! तू वानरोंमें अधम है। मेरे सामने इस प्रकार निर्भयके समान कैसे प्रलाप कर
| २२४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
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मूल श्लोक (संस्कृत):
कथं ममाग्रे विलपस्यभीतवत्
प्लवङ्गमानामधमोऽसि दुष्टधीः ।
क एष रामः कतमो वनेचरो
निहन्मि सुग्रीवयुतं नराधमम् ॥२७॥
त्वां चाद्य हत्वा जनकात्मजां ततो
निहन्मि रामं सहलक्ष्मणं ततः ।
सुग्रीवमग्रे बलिनं कपीश्वरं
सवानरं हन्म्यचिरेण वानर ।
श्रुत्वा दशग्रीववचः स मारुति-
श्चिंवृद्धकोपेन दहन्निवासुरम् ॥२८॥
न मे समा रावणकोटयोऽधम
रामस्य दासोऽहमपारविक्रमः ।
श्रुत्वाऽतिकोपेन हनूमतो वचो
दशाननो राक्षसमेवमब्रवीत् ॥२९॥
पार्श्वे स्थितं मारय खण्डशः कपिं
पश्यन्तु सर्वेऽसुरमित्रबान्धवाः ।
निवारयामास ततो विभीषणो
महासुरं सायुधमुद्यतं वधे ।
राजन्यधार्हो न भवेत्कथञ्चन
प्रतापयुक्तैः परराजवानरः ॥३०॥
हतेऽस्मिन्वानरे दूते वार्तां को वा निवेदयेत् ।
रामाय त्वं यमुद्दिश्य वधाय समुपस्थितः ॥३१॥
अतो वधसमं किञ्चिदन्यच्चिन्तय वानरे ।
सचिह्नो गच्छतु हरिर्यं दृष्ट्वाऽऽस्यास्यति द्रुतम् ॥३२॥
रामः सुग्रीवसहितस्ततो युद्धं भवेत्तव ।
विभीषणवचः श्रुत्वा रावणोऽप्येतदब्रवीत् ॥३३॥
वानराणां हि लाङ्गले महामानो भवेत्किल ।
अतो वस्त्रादिभिः पुच्छं वेष्टयित्वा प्रयत्नतः ॥३४॥
वह्निना योजयित्वैनं भ्रामयित्वा पुरेऽभितः ।
विसर्जयत पश्यन्तु सर्वे वानरयूथपाः ॥३५॥
तथेति शणपट्टैश्च वस्त्रैरन्यैरनेकंशः ।
तैलाक्तैर्वेष्टयामासुर्लाङ्गूलं मारुतेर्दृढम् ॥३६॥
पुच्छाग्रे किञ्चिदनलं दीपयित्वाऽथ राक्षसाः ।
रज्जुभिः सुदृढं बद्ध्वा धृत्वा तं बलिनोऽसुराः ॥३७॥
समन्ताद् भ्रामयामासुश्चोरोऽयमिति वादिनः ।
हिन्दी अनुवाद:
रहा है ? यह राम और वनचर सुग्रीव हैं क्या चीज़ ! उस नराधमको तो सुग्रीवके सहित मैं ही मार डालूँगा ॥ २७ ॥ ऐ वानर ! पहले तो आज तुझे ही मारूँगा, फिर जानकीका वध करूँगा, तदनन्तर लक्ष्मणके सहित रामको मारूँगा और उनसे पहले उस बड़े बली वानरराज सुग्रीवको उसकी वानरसेनाके सहित कुछ ही देरमें मार डालूँगा ।” रावणके ये वचन सुनकर हनुमान्जी अपने बढ़े हुए क्रोधसे उसे जलाते हुए-से बोले—॥२८॥ “अरे अधम ! मेरी समानता तो करोड़ रावण भी नहीं कर सकते; जानता नहीं, मैं भगवान् रामका दास हूँ, मेरे पराक्रमका कोई ठिकाना नहीं है ।” हनुमान्जीके ये वचन सुनकर रावणने अत्यन्त क्रोधपूर्वक अपनी बगलमें खड़े हुए एक राक्षससे कहा— “अरे ! इस वानरके टुकड़े-टुकड़े करके मार डाल, जिससे सब राक्षस, मित्र तथा बन्धुगण इस कौतुकको देखें ।” तब विभीषणने, हथियार लेकर मारनेके लिये तैयार हुए उस प्रचण्ड राक्षसको रोककर कहा— “राजन् ! प्रतापी पुरुषोंको अन्य राज्यके वानर-दूतको किसी प्रकार भी न मारना चाहिये ॥ २९-३० ॥ यदि यह वानर-दूत मारा गया तो जिनका वध करनेके लिये आप उद्यत हुए हैं उन रामको यह समाचार कौन सुनावेगा ? ॥ ३१ ॥ अतः, इस वानरके लिये वधके समान ही कोई और दण्ड निश्चय कीजिये, जिसका चिह्न लेकर यह वानर जाय और उसे देखकर सुग्रीवके सहित राम तुरन्त ही आयें और फिर उनसे आपका युद्ध हो ।” विभीषणका कथन सुनकर रावण भी यों बोला—॥३२-३३॥ “वानरोंको पूँछपर बड़ी ममता होती है । अतः इसकी पूँछको वस्त्रादिसे खूब लपेट दो और फिर उसमें आग लगाकर इसे नगरमें चारों ओर घुमाकर छोड़ दो, जिससे समस्त वानरयूथपति इसकी वह दुर्दशा देखें” ॥ ३४-३५ ॥
तब राक्षसोंने 'बहुत अच्छा' कह हनुमान्जीकी पूँछ सनके पट्टोंसे और तेलमें भीगे हुए नाना प्रकारके चिथड़ोंसे बड़ी दृढ़तासे लपेटी; और पूँछके सिरेपर थोड़ी-सी आग लगाकर उन्हें दृढ़तापूर्वक रस्सीसे बाँधकर कुछ बलवान् राक्षस उन्हें मारते और बारम्बार तुरही
सर्ग ४ ] सुन्दरकाण्ड २२५
तूर्यघोषैर्घोषयन्तस्ताडयन्तो मुहुर्मुहुः ॥३८॥
हनूमताऽपि तत्सर्वं सोढं किञ्चिच्चिकीर्षुणा ।
गत्वा तु पश्चिमद्वारसमीपं तत्र मारुतिः ॥३९॥
सूक्ष्मो बभूव बन्धेभ्यो निःसृतः पुनरप्यसौ ।
बभूव पर्वताकारस्तत उत्प्लुत्य गोपुरम् ॥४०॥
तत्रैकं स्तम्भमादाय हत्वा तान् रक्षिणः क्षणात् ।
विचार्य कार्यशेषं स प्रासादाग्राद्गृहद्गृहम् ॥४१॥
उत्प्लुत्योत्प्लुत्य सन्दीप्तपुच्छेन महता कपिः ।
ददाह लङ्कामखिलां साट्टप्रासादतोरणाम् ॥४२॥
हा तात पुत्र नाथेति क्रन्दमानाः समन्ततः ।
व्याप्ताःप्रासादशिखरेऽप्यारूढा दैत्ययोषितः॥४३॥
देवता इव दृश्यन्ते पतन्त्यः पावकेऽखिलाः ।
विभीषणगृहं त्यक्त्वा सर्वं भस्मीकृतं पुरम् ॥४४॥
तत उत्प्लुत्य जलधौ हनूमान्मारुतात्मजः ।
लाङ्गूलं मज्जयित्वान्तः स्वस्थचित्तो बभूव सः ॥४५॥
वायोः प्रियसखित्वाच्च सीतया प्रार्थितोऽनलः ।
न ददाह हरेः पुच्छं बभूवात्यन्तशीतलः ॥४६॥
यन्नामसंस्मरणधूतसमस्तपापा-
स्तापत्रयानलमपीह तरन्ति सद्यः ।
तस्यैव किं रघुवरस्य विशिष्टदूतः
सन्तप्यते कथमसौ प्रकृतानलेन ॥४७॥
बजाकर यह कहते हुए कि 'यह चोर है' नगरमें सब ओर घुमाने लगे ॥ ३६-३८ ॥ हनुमान्जीने भी कुछ कौतुक करनेकी इच्छासे यह सब सहन कर लिया । जिस समय वे पश्चिमद्वारपर पहुँचे उस समय तुरन्त ही सूक्ष्मरूप होकर उन बन्धनोंमेंसे निकल गये और फिर पर्वताकार हो उछलकर द्वारके कँगूरेपर चढ़ गये ॥ ३९-४० ॥ वहाँसे उन्होंने एक स्तम्भ उखाड़कर एक क्षणमें ही उन समस्त रक्षकोंको मार डाला और फिर अपना शेष कार्य निश्चय कर उस प्रासादके अग्रभागसे एक घरसे दूसरे घरपर छलाँग मारते हुए अपनी जलती हुई लम्बी पूँछसे महल, अटारी और बन्दनवारादिसे युक्त समस्त लंकापुरीमें आग लगा दी ॥ ४१-४२ ॥ उस समय 'हा तात ! हा पुत्र ! हा नाथ !' कहकर सब ओर फैली हुई, महलोंके ऊपर भी चढ़ी हुई तथा अग्निमें गिरती हुई समस्त दैत्यस्त्रियाँ देवताओंके समान मालूम होती थीं। इस प्रकार हनुमान्जीने विभीषणके घरको छोड़कर और सारा नगर भस्म कर डाला ॥ ४३-४४ ॥ तदनन्तर पवनात्मज हनुमान्जी उछलकर समुद्रमें कूद पड़े और अपनी पूँछ बुझाकर स्वस्थचित्त हो गये ॥ ४५ ॥ सीताजीकी प्रार्थनासे तथा वायुका प्रिय मित्र होनेके कारण अग्निने हनुमान्जीकी पूँछ नहीं जलायी । उनके लिये वह अत्यन्त शीतल हो गया ॥ ४६ ॥
जिनके नाम-स्मरणसे मनुष्य समस्त पापोंसे छूटकर तुरन्त ही तापत्रयरूप अग्निको पार कर जाते हैं उन्हीं श्रीरघुनाथजीके विशिष्ट दूतको यह प्राकृत अग्नि भला किस प्रकार ताप पहुँचा सकता था ? ॥ ४७ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
सुन्दरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥