सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ९: समुद्रोलङ्घनकी मन्त्रणा

सर्ग ९ ]किष्किन्धाकाण्ड१९७

आगमिष्यन्ति जलधेस्तीरं तत्र समागमः।
त्वया तैः कारणवशाद्भविष्यति न संशयः ॥५१॥
तदा सीतास्थितिं तेभ्यः कथयस्व यथार्थतः।
तदैव तव पक्षौ द्वावुत्पत्स्येते पुनर्नवौ ॥५२॥

सम्पातिरुवाच
बोधयामास मां चन्द्रनामा मुनिकुलेश्वरः।
पश्यन्तु पक्षौ मे जातौ नूतनावतिकोमलौ ॥५३॥
स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि सीतान्द्रक्ष्यथ निश्चयम्।
यत्नं कुरुध्वं दुर्लङ्घ्यसमुद्रस्य विलङ्घने ॥५४॥
यन्नामस्मृतिमात्रतोऽपरिमितं संसारवारान्निधिं
तीर्त्वा गच्छति दुर्जनोऽपि परमं विष्णोः पदं शाश्वतम्।
तस्यैव स्थितिकारिणस्त्रिजगतां रामस्य भक्ताः प्रिया
यूयं किं न समुद्रमात्रतरणे शक्ताः कथं वानराः ॥५५॥

किसी कारण-विशेषसे तेरे साथ उनका समागम होगा—इसमें सन्देह नहीं ॥४९-५१॥ तब तू उन्हें सीताजीका ठीक-ठीक पता बतला देना। बस, उसी समय तेरे फिर नये पंख उत्पन्न हो जायेंगे” ॥५२॥

सम्पाति बोला—हे वानरेश्वरगण ! इस प्रकार मुझे चन्द्र नामक मुनीश्वरने समझाया। (इससे मैं शान्त होकर इस समयकी प्रतीक्षामें रहने लगा।) देखिये, अब मेरे यह अति कोमल नवीन पंख निकल आये हैं ॥५३॥ आपलोगोंका कल्याण हो, अब मैं जाना चाहता हूँ। इसमें सन्देह नहीं आपलोग सीताजीको अवश्य देखेंगे। केवल इस दुर्लङ्घ्य समुद्रके लाँघनेका प्रयत्न कीजिये ॥५४॥ हे वानरगण ! जिनके नामके स्मरणमात्रसे बड़े दुष्टजन भी इस अपार संसार-सागरको पार करके भगवान् विष्णुके सनातन परमपदको प्राप्त कर लेते हैं, आपलोग तो, त्रिलोकीकी स्थिति करनेवाले उन्हीं भगवान् रामके प्रिय भक्तगण हैं। फिर इस क्षुद्र समुद्रमात्रको पार करनेमें आप क्यों समर्थ न होंगे ? ॥५५॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥८॥


नवम सर्ग

समुद्रोल्लङ्घनकी मन्त्रणा।

श्रीमहादेव उवाच
गते विहायसा गृध्रराजे वानरपुङ्गवाः।
हर्षेण महताऽऽविष्टाः सीतादर्शनलालसाः ॥१॥
ऊचुः समुद्रं पश्यन्तो नक्रचक्रभयङ्करम्।
तरङ्गादिभिरुन्नद्धमाकाशमिव दुर्ग्रहम् ॥२॥
परस्परमवोचंस्ते कथमेनं तरामहे।
उवाच चाङ्गदस्तत्र शृणुध्वं वानरोत्तमाः ॥३॥
भवन्तोऽत्यन्तबलिनः शूराश्च कृतविक्रमाः।

श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! गृध्रराज सम्पातिके आकाश-मार्गसे चले जानेपर सीताजीके दर्शनोंके लिये अति उत्कण्ठित वानरगण (उनका पता लग जानेके कारण) अत्यन्त हर्षित हुए ॥१॥ किन्तु जब उन्होंने नाकों और भँवर आदिके कारण अत्यन्त भयङ्कर, उत्ताल तरङ्गोंसे उछलते हुए तथा आकाशके समान दुर्लङ्घ्य समुद्रकी ओर देखा तो वे आपसमें कहने लगे कि हम इसे किस प्रकार पार कर सकेंगे। तब अंगदजीने कहा—"हे वानरश्रेष्ठगण ! सुनिये—॥२-३॥ आपलोग सभी अत्यन्त बलवान्, शूरवीर और पराक्रमी हैं। अतः आपमेंसे ऐसा कौन है जो समुद्र लाँघकर

१९८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ९

को वाऽत्र वारिधिं तीर्त्वा राजकार्यं करिष्यति ॥४॥
एतेषां वानराणां स प्राणदाता न संशयः ।
तदुत्तिष्ठतु मे शीघ्रं पुरतो यो महाबलः ॥५॥
वानराणां च सर्वेषां रामसुग्रीवयोरपि ।
स एव पालको भूयान्नात्र कार्या विचारणा ॥६॥
इत्युक्ते युवराजेन तूष्णीं वानरसैनिकाः ।
आसन्नोचुः किञ्चिदपि परस्परविलोकिनः ॥७॥

अङ्गद उवाच
उच्यतां वै बलं सर्वैः प्रत्येकं कार्यसिद्धये ।
केन वा साध्यते कार्यं जानीमस्तदनन्तरम् ॥८॥
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा प्रोचुर्वीरा बलं पृथक् ।
योजनानां दशारभ्य दशोत्तरगुणं जगुः ॥९॥
शतादर्वाग्जाम्बवांस्तु प्राह मध्ये वनौकसाम् ।
पुरा त्रिविक्रमे देवे पादं भूमानलक्षणम् ॥१०॥
त्रिःसप्तकृत्वोऽहमगां प्रदक्षिणविधानतः ।
इदानीं वार्धकग्रस्तो न शक्नोमि विलङ्घितुम् ॥११॥

अङ्गदोऽप्याह मे गन्तुं शक्यं पारं महोदधेः ।
पुनर्लङ्घनसामर्थ्यं न जानाम्यस्ति वा न वा ॥१२॥
तमाह जाम्बवान्वीरस्त्वं राजा नो नियामकः ।
न युक्तं त्वां नियोक्तुं मे त्वं समर्थोऽसि यद्यपि ॥१३॥

अङ्गद उवाच
एवं चेत्पूर्ववत्सर्वे स्वप्स्यामो दर्भविष्टरे ।
केनापि न कृतं कार्यं जीवितुं च न शक्यते ॥१४॥
तमाह जाम्बवान्वीरो दर्शयिष्यामि ते सुत ।
येनासाकं कार्यसिद्धिर्भविष्यत्यचिरेण च ॥१५॥

| राजकार्य सम्पन्न करे ॥४॥ वह निःसन्देह इन समस्त वानरोंको प्राण-दान करनेवाला होगा । अतः जो महाबलवान् वीर ऐसा हो वह शीघ्र ही मेरे सामने आवे ॥५॥ इसमें कोई सन्देह नहीं, वही सम्पूर्ण वानरोंकी, सुग्रीवकी और स्वयं भगवान् रामकी भी रक्षा करनेवाला होगा" ॥६॥
<br>युवराज अंगदके इस प्रकार कहनेपर समस्त वानर-सेनापति चुपचाप बैठे रहे, किसीके मुखसे एक शब्द भी न निकला, परस्पर एक-दूसरेका मुख ताकते रह गये ॥७॥
<br>अंगद बोले—अच्छा, इस कार्यको सिद्ध करनेके लिये सब लोग अपनी शक्तिका वर्णन करो। तब इस बातका पता चल जायगा कि इसे कौन साध सकेगा ॥८॥
<br>अंगदजीकी यह बात सुनकर सब वानर-वीर पृथक्-पृथक् अपना बल बतलाने लगे । उनमेंसे एक-एकने दश योजनसे लेकर क्रमशः दश-दश योजन अधिक जानेतककी अपनी सामर्थ्य बतायी ॥९॥ अन्तमें, उन सब वनचरोंमेंसे जाम्बवान्ने अपनी शक्ति सौ योजनके भीतरतक जानेकी बतायी। वे बोले—"पूर्वकालमें जब भगवान्‌ने त्रिविक्रम अवतार लिया था तो मैं, उनके पृथिवीके बराबर परिमाणवाले चरणके चारों ओर परिक्रमा करनेके लिये, इक्कीस बार फिरा था। किन्तु अब मुझे वृद्धावस्थाने दबा लिया है इसलिये मैं समुद्रको नहीं लाँघ सकता" ॥१०-११॥
<br>अंगदजीने भी कहा—"मैं इस महासागरके पार तो जा सकता हूँ, किन्तु फिर लौटनेकी सामर्थ्य है या नहीं यह नहीं जानता" ॥१२॥ तब वीरवर जाम्बवान्‌ने उनसे कहा—"अंगदजी ! इस कार्यके करनेमें यद्यपि आप सर्वथा समर्थ हैं तथापि आपको इस कार्यमें नियुक्त करना हमें ठीक नहीं जँचता, क्योंकि आप हमारे नायक और नियामक हैं" ॥१३॥
<br>अंगद बोले—"यदि ऐसी बात है, तो हम सबको (प्रायोपवेशनका संकल्प करके) फिर पूर्ववत् कुशासनों पर ही पड़ रहना चाहिये; क्योंकि यह काम तो किसीसे हुआ नहीं, फिर जीवन भी कैसे रह सकता है ?"॥१४॥
<br>तब वीरवर जाम्बवान्‌ने कहा—"बेटा ! जिसके हाथसे हमारा यह कार्य बहुत शीघ्र ही सिद्ध होगा उस वीरको मैं तुझे दिखलाता हूँ" ॥१५॥

| सर्ग ९ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १९९ |
| :--- | :--- |


इत्युक्त्वा जाम्बवान्प्राह हनूमन्तमवस्थितम्।<br>हनूमन्किं रहस्तूष्णीं स्थीयते कार्यगौरवे ॥१६॥<br>प्राप्तेऽज्ञेनेव सांमर्थ्यं दर्शयाद्य महाबल।<br>त्वं साक्षाद्वायुतनयो वायुतुल्यपराक्रमः ॥१७॥<br>रामकार्यार्थमेव त्वं जनितोऽसि महात्मना।<br>जातमात्रेण ते पूर्वं दृष्ट्वोद्यन्तं विभावसुम् ॥१८॥<br>पक्वं फलं जिघृक्षामीत्युत्प्लुतं बालचेष्टया।<br>योजनानां पञ्चशतं पतितोऽसि ततो भुवि ॥१९॥<br>अतस्त्वद्बलमाहात्म्यं को वा शक्नोति वर्णितुम्।<br>उत्तिष्ठ कुरु रामस्य कार्यं नः पाहि सुव्रत ॥२०॥यों कहकर जाम्बवान्ने वहाँ बैठे हुए हनूमान्‌जीसे कहा—"हे हनूमन् ! इस महान् कार्यके उपस्थित होनेपर आप इस प्रकार अनजानके समान चुपचाप एकान्तमें क्यों बैठे हैं? हे महावीर! आप साक्षात् पवनदेवके पुत्र हैं और उन्हींके समान पराक्रमी हैं, अतः आज अपनी सामर्थ्य दिखलाइये ॥१६-१७॥ महात्मा वायुने राम-कार्यके लिये ही आपको उत्पन्न किया है। जिस समय आपका जन्म हुआ था उसी समय आप सूर्यको उदय हुआ देखकर 'इस पके फलको लेना चाहिये' इस इच्छासे बाललीलासे ही पाँच सौ योजन ऊँचे उछलकर पृथिवीपर गिरे थे ॥१८-१९॥ अतः, ऐसा कौन है जो आपके बलका माहात्म्य वर्णन कर सके। हे सुव्रत! आप खड़े हो जाइये और यह राम-कार्य करके हम सबकी रक्षा कीजिये" ॥२०॥
श्रुत्वा जाम्बवतो वाक्यं हनूमानतिहर्षितः।<br>चकार नादं सिंहस्य ब्रह्माण्डं स्फोटयन्निव ॥२१॥<br>बभूव पर्वताकारस्त्रिविक्रम इवापरः।<br>लङ्घयित्वा जलनिधिं कृत्वा लङ्कां च भस्मसात् ॥२२॥<br>रावणं सकुलं हत्वाऽऽनेष्ये जनकनन्दिनीम्।<br>यद्वा बध्वा गले रज्ज्वा रावणं वामपाणिना ॥२३॥<br>लङ्कां सपर्वतां धृत्वा रामस्याग्रे क्षिपाम्यहम्।<br>यद्वा दृष्ट्वैव यास्यामि जानकीं शुभलक्षणाम् ॥२४॥जाम्बवान्‌के ये वचन सुनकर हनूमान्‌जी अति प्रसन्न हुए और उन्होंने समस्त ब्रह्माण्डको मानो कम्पायमान करते हुए घोर सिंहनाद किया॥२१॥ दूसरे त्रिविक्रम भगवान्‌के समान वे पर्वताकार हो गये, (और कहने लगे) "हे वानरो! मैं समुद्रको लाँघकर लंकाको भस्म कर डालूँगा और रावणको उसके कुलसहित मारकर श्रीजानकीजीको ले आऊँगा; अथवा कहो तो, रावणके गलेमें रस्सी डालकर और लंकाको त्रिकूट-पर्वतसहित बायें हाथपर उठाकर भगवान् रामके आगे ले जाकर डाल दूँ, या केवल शुभलक्षणा जानकीजीको देखकर ही चला आऊँ" ॥२२-२४॥
श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं जाम्बवानिदमब्रवीत्।<br>दृष्ट्वावागच्छ भद्रं ते जीवन्तीं जानकीं शुभाम्॥२५॥<br>पश्चाद्रामेण सहितो दर्शयिष्यसि पौरुषम्।<br>कल्याणं भवताद्भद्र गच्छतस्ते विहायसा ॥२६॥<br>गच्छन्तं रामकार्यार्थं वायुस्त्वामनुगच्छतु।हनूमान्‌जीके ये वचन सुनकर जाम्बवान्‌ने कहा— "हे वीर ! तुम्हारा शुभ हो, तुम केवल शुभलक्षणा जानकीजीको जीती-जागती देखकर ही चले आओ ॥२५॥ फिर रामचन्द्रजीके साथ जाकर अपना पुरुषार्थ दिखलाना। हे भद्र! आकाशमार्गसे जाते हुए तुम्हारा कल्याण हो ॥२६॥ रामकार्यके लिये जाते समय वायु तुम्हारा अनुगमन करें।"
इत्याशीर्भिः समामन्त्र्य विसृष्टः प्लवगाधिपैः॥२७॥<br>महेन्द्राद्रिशिरो गत्वा बभूवाद्भुतदर्शनः ॥२८॥इस प्रकार आशीर्वादोंसे अभिनन्दन करते हुए वानर-यूथपोंके विदा करनेपर हनुमान्‌जी महेन्द्रपर्वतके शिखरपर चढ़ गये। वहाँ उन्होंने अद्भुत रूप धारण
२००अध्यात्मरामायण[ सर्ग ९

महानगेन्द्रप्रतिमो महात्मा सुवर्णवर्णोऽरुणचारुवक्त्रः ।<br>महाफणीन्द्राभसुदीर्घबाहु-र्वातात्मजोऽदृश्यत सर्वभूतैः ॥२९॥ | किया ॥ २७-२८ ॥ उस समय समस्त प्राणियोंको वायुपुत्र महात्मा हनूमान्‌जी महान् पर्वतराजके समान विशालकाय, सुवर्णवर्ण अरुण (बालसूर्य) के समान मनोहर मुखवाले और महान्‌ सर्पराजके समान दीर्घ भुजाओंवाले दिखलायी देने लगे ॥ २९ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


समाप्तमिदं किष्किन्धाकाण्डम्

सुन्दरकाण्ड

श्रीसीतारामाभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण


सुन्दरकाण्ड

यद्ध्याननिर्धूतवियोगवह्रिर्विदेहबाला विबुधारिवन्याम् ।
प्राणान्दधे प्राणमयं प्रभुं तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥


२६

text
श्रीराम विजय

The provided image is completely blank and contains no text to transcribe. Please upload a clear image containing the scripture page.

अशोक-वाटिकामें सीता

ततः सीतां नमस्कृत्य हनूमानब्रवीद्वचः ।
आज्ञापयतु मां देवि भवती रामसन्निधिम् ॥ (अ० रा० सु० ५ । १)