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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ८: सम्पातीकी आत्मकथा

सर्ग ८ ]
किष्किन्धाकाण्ड
१९३

अष्टम सर्ग
सम्पातिकी आत्मकथा।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहान्देवजी बोले—हे पार्वति ! यह सुनकर उन सब वानरोंने बड़े कुतूहल में भरकर सम्पातिसे पूछा—"भगवन् ! आप आरम्भसे ही अपना वृत्तान्त सुनाइये" ॥ १ ॥ तब सम्पातिने पहले जैसा-जैसा किया था वह सब वृत्तान्त सुनाते हुए कहा— पूर्वकालमें मैं और भाई जटायु जिस समय पूर्ण युवा थे बलके गर्वसे उन्मत्त होकर यह जाननेके लिये कि हममें कितना बल है, बड़े घमण्डसे आकाशमें सूर्यमण्डलपर्यन्त जानेको उड़े ॥ २-३ ॥ जब हम कई सहस्र योजन ऊँचे चले गये तो जटायु ( सूर्यके तेजसे ) जलने लगा। मैं उसकी रक्षाके लिये मोहवश उसे अपने पंखोंसे ढँककर चलने लगा और अन्तमें सूर्यकी किरणोंसे पंख जल जानेके कारण यहाँ विन्ध्याचलके शिखरपर गिर पड़ा और हे कपीश्वरो ! बहुत ऊँचेसे गिरनेके कारण मूर्च्छित हो गया ॥ ४-५ ॥ जब तीन दिन पश्चात् मुझे चेत हुआ तो पंख जल जानेसे मेरा चित्त भ्रममें पड़ गया और मैं यह कुछ भी न जान सका कि यह कौन-सा देश अथवा गिरिशिखर है ॥ ६ ॥
अथ ते कौतुकाविष्टाः सम्पातिं सर्ववानराः।<br>पप्रच्छुर्भगवन् ब्रूहि स्वमुदन्तं त्वमादितः॥ १ ॥
सम्पातिः कथयामास स्ववृत्तान्तं पुरा कृतम्।<br>अहं पुरा जटायुश्च भ्रातरौ रूढयौवनौ॥ २ ॥
बलेन दर्पितावावां बलजिज्ञासया खगौ।<br>सूर्यमण्डलपर्यन्तं गन्तुमुत्पतितौ मदात्॥ ३॥
बहुयोजनसाहस्रं गतौ तत्र प्रतापिताः।<br>जटायुस्तं परित्रातुं पक्षैराच्छाद्य मोहतः ॥ ४ ॥
स्थितोऽहं रश्मिभिर्दग्धपक्षोऽस्मिन्विन्ध्यमूर्धनि।<br>पतितो दूरपतनान्मूर्च्छितोऽहं कपीश्वराः॥ ५ ॥
दिनत्रयात्पुनः प्राणसहितो दग्धपक्षतः।<br>देशं वा गिरिकूटान्वा न जाने भ्रान्तमानसः॥ ६ ॥
शनैरून्मील्य नयने दृष्ट्वा तत्राश्रमं शुभम्।<br>शनैः शनैराश्रमस्य समीपं गतवानहम् ॥ ७ ॥फिर धीरे-धीरे नेत्र खोलनेपर मुझे वहाँ एक सुन्दर आश्रम दिखायी दिया। तब मैं शनैः-शनैः उस आश्रमके पास गया ॥ ७ ॥ वहाँ चन्द्रमा नामक मुनीश्वर रहते थे। उन्होंने मुझे देखकर विस्मयपूर्वक कहा—"सम्पाते ! यह क्या, तुम्हें आज इस प्रकार विरूप किसने कर दिया ? ॥ ८ ॥ मैं तुम्हें पहलेसे ही जानता हूँ; तुम तो बड़े बलवान् हो, फिर तुम्हारे पंख कैसे जल गये ? यदि तुम ठीक समझो तो अपना सब वृत्तान्त कहो" ॥ ९ ॥
चन्द्रमा नाम मुनिराड् दृष्ट्वा मां विस्मितोऽवदत्।<br>सम्पाते किमिदं तेऽद्य विरूपं केन वा कृतम् ॥ ८ ॥
जानामि त्वामहं पूर्वमत्यन्तं बलवानसि।<br>दग्धौ किमर्थं ते पक्षौ कथयतां यदि मन्यसे ॥ ९ ॥
ततः स्वचेष्टितं सर्वं कथयित्वातिदुःखितः।<br>अब्रवं मुनिशार्दूलं दग्धोऽहं दाववह्निना ॥१०॥तब मैंने उन मुनिश्रेष्ठको अपनी सब करतूत सुनायी और फिर अति दुःखित होकर उनसे कहा—"अब मैं दावाग्निमें जल मरूँगा ॥ १० ॥ क्योंकि हे प्रभो ! बिना पंखोंके मैं किस प्रकार जीवन धारणकर सकता हूँ ?"
कथं धारयितुं शक्तो विपक्षो जीवितं प्रभो।
इत्युक्तोऽथ मुनिर्वीक्ष्य मां दयार्द्रविलोचनः॥११॥मेरे इस प्रकार कहनेपर मुनिवर दयावश नेत्रोंमें

२५

१९४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ८

शृणु वत्स वचो मेऽद्य श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् ।<br>देहमूलमिदं दुःखं देहः कर्मसमुद्भवः ॥१२॥ | जल भरकर मेरी ओर देखते हुए बोले—॥ ११ ॥<br>“वत्स ! अब तुम मेरी बात सुनो । उसे सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करना । इस दुःखका आश्रय देह ही है और देह कर्मजन्य है ॥ १२ ॥
कर्म प्रवर्तते देहेऽहंबुद्ध्या पुरुषस्य हि ।<br>अहङ्कारस्त्वनादिः स्यादाविद्यासम्भवो जडः॥१३॥ | पुरुष जब देहमें अहं-बुद्धि करता है तभी कर्मकी प्रवृत्ति होती है; और यह अविद्या-जनित जड अहंकार अनादि है ॥ १३ ॥
चिच्छायाया सदा युक्तस्तप्तायःपिण्डवत्सदा ।<br>तेन देहस्य तादात्म्याद्देहश्चेतनवान्भवेत् ॥१४॥ | ( अग्निसे व्याप्त ) तप्त लोहपिण्डके समान यह अहंकार सर्वदा चिदाभाससे व्याप्त है । उस चिदाभासविशिष्ट अहंकारका देहसे तादात्म्य (ऐक्य) होनेके कारण देह चेतनायुक्त होता है ॥ १४ ॥
देहोऽहमिति बुद्धिः स्यादात्मनोऽहङ्कृतेर्बलात् ।<br>तन्मूल एष संसारः सुखदुःखादिसाधकः ॥१५॥ | अहंकारके कारण ही आत्माको ‘मैं देह हूँ’ यह बुद्धि होती है और उसके कारण यह सुख-दुःखादिका देनेवाला जन्म-मरणरूप संसार प्राप्त होता है ॥ १५ ॥
आत्मनो निर्विकारस्य मिथ्या तादात्म्यतः सदा ।<br>देहोऽहं कर्मकर्ताहमिति सङ्कल्प्य सर्वदा ॥१६॥<br>जीवः करोति कर्माणि तत्फलैर्बद्ध्यतेऽवशः ।<br>ऊर्ध्वाधो भ्रमते नित्यं पापपुण्यात्मकः स्वयम् ॥१७॥ | निर्विकार आत्माके साथ देहके इस मिथ्या तादात्म्यसे ही जीव सर्वदा यह संकल्प करके कि ‘मैं देह हूँ और कर्मोंका करनेवाला हूँ’ नाना प्रकारके कर्म करता है तथा विवश होकर उनके फलोंसे बँधता है । और इस प्रकार पाप-पुण्यके वशीभूत होकर सदा ऊँची-नीची योनियोंमें भ्रमता रहता है ॥ १६-१७ ॥
कृतं मयाऽधिकं पुण्यं यज्ञदानादि निश्चितम् ।<br>स्वर्गं गत्वा सुखं भोक्ष्य इति सङ्कल्पवान्भवेत्॥१८॥ | वह ऐसे संकल्प करने लगता है कि मैंने यज्ञ, दान आदि बहुत-से पुण्य-कर्म किये हैं अतः मैं निश्चय ही स्वर्गमें जाकर सुख भोगूँगा ॥ १८ ॥
तथैवाध्यासतस्तत्र चिरं भुक्त्वा सुखं महत् ।<br>क्षीणपुण्यः पतत्यर्वागनिच्छन्कर्मचोदितः ॥१९॥ | ऐसे अध्याससे वह वहाँ ( जाकर ) चिरकालतक महान् सुख भोगता है और अन्तमें पुण्यक्षय हो जानेपर प्रारब्धकी प्रेरणासे, इच्छा न रहते हुए भी, नीचे गिरता है ॥ १९ ॥
पतित्वा मण्डले चेन्दोस्ततो नीहारसंयुतः ।<br>भूमौ पतित्वा व्रीह्यादौ तत्र स्थित्वा चिरं पुनः॥२०॥ | “पहले वह चन्द्रमण्डलपर गिरता है । वहाँसे (चन्द्र-रश्मियोंके द्वारा) कुहरेके रूपमें पृथ्वीपर आकर बहुत दिनोंतक व्रीहि आदि धान्योंमें रहता है ॥२०॥
भूत्वा चतुर्विधं भोज्यं पुरुषैर्भुज्यते ततः ।<br>रेतो भूत्वा पुनस्तेन ऋतौ स्त्रीयोनिसिञ्चितः॥२१॥ | फिर वह (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य) चार प्रकारके अन्न रूपसे पुरुषोंद्वारा खाया जाता है और वीर्यरूपमें परिणत हो जाता है तदनन्तर वह उसके द्वारा ऋतुकालमें स्त्रीकी योनिमें डाला जाता है ॥ २१ ॥
योनिरक्तेन संयुक्तं जरायुपरिवेष्टितम् ।<br>दिनेनैकेन कललं भूत्वा रूढत्वमाप्नुयात् ॥२२॥ | योनिमें स्थित रजसे मिलकर वह एक दिनमें ही झिल्लीसे लिपटे हुए कललके रूपमें परिणत होकर कुछ कठिन-सा हो जाता है ॥ २२ ॥
तत्पुनः पञ्चरात्रेण बुद्बुदाकारतामियात् ।<br>सप्तरात्रेण तदपि मांसपेशित्वमाप्नुयात् ॥२३॥ | फिर पाँच रात्रिमें वह बुद्बुदाकार हो जाता है और सात रात्रि बीतनेपर मांसपेशीके समान ( अण्डाकार ) हो जाता है ॥ २३ ॥ पन्द्रह दिनके

सर्ग ८ ] किष्किन्धाकाण्ड १९५


पक्षमात्रेण सा पेशी रुधिरेण परिप्लुता ।
तस्या एवाङ्कुरोत्पत्तिः पञ्चविंशतिरात्रिषु ॥२४॥
भीतर उस पेशीमें रुधिर भर जाता है और पच्चीस रात्रिके पश्चात् उसमें अंकुर उत्पन्न होने लगते हैं ॥ २४ ॥

ग्रीवा शिरश्च स्कन्धश्च पृष्ठवंशस्तथोदरम् ।
पञ्चधाङ्गानि चैकैकं जायन्ते मासतः क्रमात् ॥२५॥
एक मास हो जानेपर उसमें एक-एक करके क्रमशः ग्रीवा, शिर, कन्धे, रीढ़की हड्डी और पेट ये पाँच अङ्ग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २५ ॥

पाणिपादौ तथा पार्श्वः कटिर्जङ्घे तथैव च ।
मासद्वयात्प्रजायन्ते क्रमेणैव न चान्यथा ॥२६॥
फिर दो महीनेमें क्रमशः हाथ, पाँव, पसलियाँ, कमर और घुटने बन जाते हैं। इस क्रममें कभी भेद नहीं पड़ता ॥ २६ ॥

त्रिभिर्मासैः प्रजायन्ते अङ्गानां सन्धयः क्रमात् ।
सर्वाङ्गुल्यः प्रजायन्ते क्रमान्मासचतुष्टये ॥२७॥
इसी क्रमसे तीन महीनेमें उसमें अङ्गोंकी सन्धियाँ तथा चार महीनेमें समस्त अङ्गुलियाँ उत्पन्न हो जाती हैं ॥ २७ ॥

नासा कर्णौ च नेत्रे च जायन्ते पञ्चमासतः ।
दन्तपङ्क्तिर्नखा गुह्यं पञ्चमे जायते तथा ॥२८॥
पाँच मास होनेपर नाक, कान और नेत्र बनते हैं तथा पाँचवें मासमें ही दन्तावली, नख और गुह्य स्थान भी उत्पन्न होते हैं ॥ २८ ॥

अर्वाक्पण्मासतश्छिद्रं कर्णयोर्भवति स्फुटम् ।
पायुर्मेढ्रमुपस्थं च नाभिश्चापि भवेन्नृणाम् ॥२९॥
छठे मासके आरम्भमें ही कानोंके छिद्र स्पष्ट हो जाते हैं तथा इसी समय गुदा, स्त्री-पुरुषके भेदसे योनि अथवा लिंग तथा नाभि उत्पन्न होते हैं ॥ २९ ॥

सप्तमे मासि रोमाणि शिरः केशास्तथैव च ।
विभक्तावयवत्वं च सर्वं सम्पद्यतेऽष्टमे ॥३०॥
सातवें महीनेमें रोम और शिरके केश प्रकट होते हैं तथा आठवें महीनेमें सब अङ्गोपांग अलग-अलग स्पष्ट हो जाते हैं ॥ ३० ॥

जठरे वर्धते गर्भः स्त्रिया एवं विहङ्गम ।
पञ्चमे मासि चैतन्यं जीवः प्राप्नोति सर्वशः ॥३१॥
"हे पक्षिन् ! इस प्रकार स्त्रीके गर्भाशयमें गर्भ बढ़ता है। जिस समय पाँचवाँ महीना होता है उसी समय जीवको चेतना-शक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ ३१ ॥

नाभिद्युन्नालपरन्ध्रेण मातृभुक्तान्नसारतः ।
वर्धते गर्भंगः पिण्डो न म्रियेत स्वकर्मतः ॥३२॥
गर्भस्थित पिण्ड अपनी नाभिमें लगे हुए नालके सूक्ष्म छिद्रसे प्राप्त माताके खाये हुए अन्नके रससे बढ़ता है और अपने कर्म-वश मरता नहीं है ॥ ३२ ॥

स्मृत्वा सर्वाणि जन्मानि पूर्वकर्माणि सर्वशः ।
जठरानलतप्तोऽयमिदं वचनमब्रवीत् ॥३३॥
उस समय अपने सम्पूर्ण पूर्व-जन्मोंका और कर्मोंका स्मरण करके जठरानलसे सन्तप्त हुआ यह जीव इस प्रकार कहता है—॥ ३३ ॥

नानायोनिसहस्रेषु जायमानोऽनुभूतवान् ।
पुत्रदारादिसम्बन्धं कोटिशः पशुबान्धवान् ॥३४॥
"पहले कई सहस्र योनियोंमें उत्पन्न होकर मैंने करोड़ों बन्धु-बान्धव, पशुवर्ग और स्त्री-पुत्रादिके सम्बन्धका अनुभव किया है ॥ ३४ ॥

कुटुम्बभरणासक्त्या न्यायान्यायैरथार्जनम् ।
कृतं नाकरवं विष्णुचिन्तां स्वप्नेऽपि दुर्भगः ॥३५॥
मुझ अभागेने उस समय स्वप्नमें भी भगवान् विष्णुका स्मरण नहीं किया; बस, अपने कुटुम्बके भरण-पोषणमें आसक्त होकर न्याय अथवा अन्यायसे धन कमानेमें ही लगा रहा ॥ ३५ ॥

इदानीं तत्फलं भुङ्गे गर्भदुःखं महत्तरम् ।
अशाश्वते शाश्वतवद्देहे तृष्णासमन्वितः ॥३६॥
अब उसका फलरूप यह अति महान् गर्भ-दुःख भोग रहा हूँ और इस नश्वर देहको नित्य-सा समझकर इसकी तृष्णामें फँसा हुआ हूँ ॥ ३६ ॥

अकार्याण्येव कृतवान्न कृतं हितमात्मनः ।
इत्येवं बहुधा दुःखमनुभूय स्वकर्मतः ॥३७॥
मैं सदा अकार्य कर्म ही करता रहा, कभी अपना हित-साधन नहीं किया। अतः अपने कर्मानुसार मैं इसी प्रकार बहुत-से दुःख भोगता रहा ॥ ३७ ॥ अब

१९६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ८

कदा निष्क्रमणं मे स्याद्गर्भान्नरकसन्निभात् ।<br>
इत ऊर्ध्वं नित्यमहं विष्णुमेवानुपूजये ॥३८॥

इत्यादि चिन्तयन् जीवो योनियन्त्रप्रपीडितः ।<br>
जायमानोऽतिदुःखेन नरकात्पातकी यथा ॥३९॥

पूतिव्रणान्निपतितः कृमिरेष इवापरः ।<br>
ततो बाल्यादिदुःखानि सर्व एवं विभुङ्क्ते ॥४०॥

त्वया चैवानुभूतानि सर्वत्र विदितानि च ।<br>
न वर्णितानि मे गृध्र यौवनादिषु सर्वतः ॥४१॥

एवं देहोऽहमित्यस्मादभ्यासान्निरयादिकम् ।<br>
गर्भवासादिदुःखानि भवन्त्यभिनिवेशतः ॥४२॥

तस्माद्देहद्वयादन्यमात्मानं प्रकृतेः परम् ।<br>
ज्ञात्वा देहादिममतां त्यक्त्वात्मज्ञानवान् भवेत् ४३

जाग्रदादिविनिर्मुक्तं सत्यज्ञानादिलक्षणम् ।<br>
शुद्धं बुद्धं सदा शान्तमात्मानमवधारयेत् ॥४४॥

चेदात्मनि परिज्ञाते नष्टे मोहेऽज्ञसम्भवे ।<br>
देहः पततु वाऽऽरब्धकर्मवेगेन तिष्ठतु ॥४५॥

योगिनो नहि दुःखं वा सुखं वाऽज्ञानसम्भवम् ।

तस्माद्देहेन सहितो यावत्प्रारब्धसङ्क्षयः ॥४६॥

तावत्तिष्ठ सुखेन त्वं धृतकञ्चुकसर्पवत् ।<br>
अन्यद्वक्ष्यामि ते पक्षिन् शृणु मे परमं हितम्॥४७॥

त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणोऽव्ययः ।<br>
रावणस्य वधार्थाय दण्डकानागमिष्यति ॥४८॥

सीतया भार्यया सार्धं लक्ष्मणेन समन्वितः ।<br>
तत्राश्रमे जनकजां भ्रातृभ्यां रहिते वने ॥४९॥

रावणश्चोरवन्नीत्वा लङ्कायां स्थापयिष्यति ।<br>
तस्याः सुग्रीवनिर्देशाद्वानराः परिमार्गणे ॥५०॥


हिन्दी अनुवाद

"न जाने इस नरकतुल्य गर्भसे मैं कब निकलूँगा । फिर तो मैं सर्वदा श्रीविष्णुभगवान्‌की ही उपासना करूँगा" ॥ ३८ ॥ ऐसा ही चिन्ता करते-करते वह जीव योनियन्त्रसे पीड़ित होता हुआ अति कष्टसे जन्म लेता है, जैसे कोई पापी जीव नरकसे निकलता हो ॥ ३९ ॥ उस समय यह दुर्गन्धित व्रण (घाव) से गिरे हुए एक कीड़ेके समान होता है। फिर इसे बाल्यादि अवस्थाओंके क्लेश भोगने पड़ते हैं। इस प्रकार सभी देहधारियोंको ये कष्ट उठाने पड़ते हैं ॥४०॥

"हे गृध्र ! इसके पीछे होनेवाले युवावस्था आदिके सब दुःख तूने भी स्वयं देखे ही हैं और भी सब इन्हें जानते ही हैं, इसलिये मैंने इनका वर्णन नहीं किया ॥ ४१ ॥ इस प्रकार 'मैं देह हूँ' इस अभ्याससे उत्पन्न हुए देहाभिमानके कारण जीवको नरक और गर्भवास आदि अनेक दुःख उठाने पड़ते हैं ॥ ४२ ॥ अतः मनुष्यको चाहिये कि अपने आत्माको प्रकृतिसे अतीत तथा स्थूल-सूक्ष्म दोनों प्रकारके शरीरोंसे पृथक् जानकर देहादिकी ममता छोड़कर आत्मज्ञानसम्पन्न हो ॥ ४३ ॥ आत्माको सर्वदा जाग्रत् आदि अवस्थाओं- से रहित, सत्-चित्स्वरूप तथा शुद्ध, बुद्ध और शान्त-रूप जाने ॥ ४४ ॥ चेतनस्वरूप आत्माका ज्ञान हो जानेपर जब अज्ञानजनित मोह नष्ट हो जाता है तो फिर यह देह प्रारब्ध-कर्मके वेगसे रहे अथवा जाय योगीको किसी प्रकारका अज्ञान-जन्य सुख-दुःख नहीं होता ।

"अतः जबतक तेरा प्रारब्ध क्षय न हो तबतक काँचुलीसहित सर्पके समान आनन्दपूर्वक देह धारण करके रह । इसके अतिरिक्त हे पक्षिन् ! तेरे परम हितकी एक बात और बतलाता हूँ, सुन ॥ ४५--४७ ॥ त्रेतायुगमें अविनाशी नारायणदेव महाराज दशरथके यहाँ अवतार लेकर रावणका वध करनेके लिये अपनी भार्या सीता और भाई लक्ष्मणके सहित दण्डकारण्यमें आयेंगे ॥ ४८ ॥ वहाँ दोनों भाइयोंके तपोवनसे चले जानेपर रावण श्रीजानकीजी- को सूने आश्रमसे चोरके समान ले जाकर लंकामें रखेगा । तदनन्तर वानरराज सुग्रीवकी आज्ञासे उन्हें खोजते हुए कुछ वानरगण समुद्रतटपर आयेंगे, वहाँ