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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

उत्तरकाण्ड - सर्ग ५: रामगीता

३५४अध्यात्मरामायण[सर्ग ५

तदैव माया प्रविलीयतेऽञ्जसा<br>सकारका कारणमात्मसंसृतेः ॥१८॥<br>श्रुतिप्रमाणाभिविनाशिता च सा<br>कथं भविष्यत्यपि कार्यकारिणी ।<br>विज्ञानमात्रादमलाद्वितीयरू-<br>स्तस्मादविद्या न पुनर्भाविष्यति ॥१९॥<br>यदि स्म नष्टा न पुनः प्रसूयते<br>कर्ताऽहमस्येति मतिः कथं भवेत् ।<br>तस्मात्स्वतन्त्रा न किमप्यपेक्षते<br>विद्या विमोक्षाय विभाति केवला ॥२०॥<br>सा तैत्तिरीयश्रुतिराह सादरं<br>न्यासं प्रशस्ताखिलकर्मणां स्फुटम् ।<br>एतावदित्याह च वाजिनां श्रुति-<br>र्ज्ञानं विमोक्षाय न कर्म साधनम् ॥२१॥<br>विद्यासमत्वेन तु दर्शितस्त्वया<br>क्रतुर्न दृष्टान्त उदाहृतः समः ।<br>फलैः पृथक्त्वाद्वहुकारकैः क्रतुः<br>संसाध्यते ज्ञानमतो विपर्ययम् ॥२२॥<br>सप्रत्यवायो ह्यहमित्यनात्मधी-<br>रज्ञप्रसिद्धा न तु तत्त्वदर्शिनः ।<br>तस्माद्बुधैस्त्याज्यमविक्रियात्मभि-<br>र्विधानतः कर्म विधिप्रकाशितम् ॥२३॥<br>श्रद्धान्वितस्तत्त्वमसीति वाक्यतो<br>गुरोः प्रसादादपि शुद्धमानसः ।<br>विज्ञाय चैकात्म्यमथात्मजीवयोः<br>सुखी भवेन्मेरुरिवाप्रकम्पनः ॥२४॥<br>आदौ पदार्थावगतिर्हि कारणं | होने लगता है उसी समय आत्माके लिये संसार-प्राप्तिकी कारण माया अनायास ही कारकादिके सहित लीन हो जाती है ॥१८॥ श्रुति-प्रमाणसे उसके नष्ट कर दिये जानेपर फिर वह किसप्रकार अपना कार्य करनेमें समर्थ हो सकती है ? इसलिये उस एकमात्र ज्ञानस्वरूप निर्मल और अद्वितीय बोधकी प्राप्ति होनेपर फिर अविद्या उत्पन्न नहीं हो सकती ॥१९॥ जब एक बार नष्ट हो जानेपर अविद्याका फिर जन्म ही नहीं होता तो बोधवान्‌को 'मैं कर्ता हूँ' ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है ? इसलिये ज्ञान स्वतन्त्र है उसे जीवके मोक्षके लिये किसी और (कर्मादिकी) अपेक्षा नहीं है, वह स्वयं अकेला ही उसके लिये समर्थ है ॥२०॥ इसके सिवा तैत्तिरीय शाखाकी प्रसिद्ध श्रुति* भी स्पष्ट कहती है कि समस्त कर्मोंका त्याग करना ही अच्छा है, तथा 'एतावत्' इत्यादि वाजसनेयी शाखाकी श्रुति† भी कहती है कि मोक्षका साधन ज्ञान ही है कर्म नहीं ॥२१॥ और तुमने जो ज्ञानकी समानतामें यज्ञादिका दृष्टान्त दिया सो ठीक नहीं है, क्योंकि उन दोनोंके फल अलग-अलग हैं । इसके अतिरिक्त यज्ञ तो (होता, ऋत्विक्, यजमान आदि) बहुत-से कारकोंसे सिद्ध होता है और ज्ञान इससे विपरीत है (अर्थात् वह कारकादिसे साध्य नहीं है) ॥२२॥ (कर्मके त्याग करनेसे) मैं अवश्य प्रायश्चित्त-भागी होऊँगा — ऐसी अनात्म-बुद्धि अज्ञानियोंको हुआ करती है, तत्त्वज्ञानी-को नहीं । इसलिये विकाररहित चित्तवाले बोधवान् पुरुषको विहित कर्मोंका भी विधिपूर्वक त्याग कर देना चाहिये ॥२३॥<br><br>फिर शुद्ध-चित्त होकर श्रद्धापूर्वक गुरुकी कृपासे 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यके द्वारा परमात्मा और जीवात्माकी एकता जानकर सुमेरुके समान निश्चल एवं सुखी हो जाय ॥२४॥ यह नियम ही है कि प्रत्येक वाक्यका अर्थ जाननेमें पहले उसके पदोंके |


* 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्त्वमानशुः ।
परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति ॥ तै० आ० प्र० १० अ० १०
† 'एतावदरे खल्वमृतत्त्वम्'

सर्ग ५ ] । उत्तरकाण्ड । ३५५


वाक्यार्थविज्ञानविधौ विधानतः ।<br>तत्त्वम्पदार्थौ परमात्मजीवका-<br>वसीति चैकात्म्यमथानयोर्भवेत् ॥२५॥अर्थका ज्ञान ही कारण है । इस 'तत्त्वमसि' महावाक्यके 'तत्' और 'त्वम्' पद क्रमसे परमात्मा और जीवात्माके वाचक हैं और 'असि' उन दोनोंकी एकता करता है ॥२५॥
प्रत्यक्परोक्षादिविरोधमात्मनो-<br>र्विहाय सङ्गृह्य तयोश्चिदात्मताम् ।<br>संशोधितां लक्षणया च लक्षितां<br>ज्ञात्वा स्वमात्मानमथाद्वयो भवेत् ॥२६॥इन दोनों (जीवात्मा और परमात्मा) में जीवात्मा प्रत्यक् (अन्तःकरणका साक्षी) है और परमात्मा परोक्ष (इन्द्रियातीत) है, इस (वाच्यार्थरूप) विरोधको छोड़कर और लक्षणावृत्तिसे लक्षित उनकी शुद्ध चेतनताको ग्रहण कर उसे ही अपना आत्मा जाने और इसप्रकार एकीभावसे स्थित हो ॥२६॥
एकात्मकत्वाज्जहती न सम्भवे-<br>त्तथाऽजहल्लक्षणता विरोधतः ।<br>सोऽयम्पदार्थाविव भागलक्षणा<br>युज्येत तत्त्वम्पदयोरदोषतः ॥२७॥इन 'तत्' और 'त्वम्' पदोंमें एकरूप होनेके कारण जहतीलक्षणा नहीं हो सकती और परस्पर विरुद्ध होनेके कारण अजहल्लक्षणा भी नहीं हो सकती । इसलिये 'सोऽयम्' (यह वही है) इन दोनों पदोंके अर्थकी भाँति इन तत् और त्वम् पदोंमें भी भागत्यागलक्षणा ही निर्दोषतासे हो सकती है * ॥२७॥
रसादिपञ्चीकृतभूतसम्भवं<br>भोगालयं दुःखसुखादिकर्मणाम् ।<br>शरीरमाद्यन्तवदादिकर्मजं<br>मायामयं स्थूलमुपाधिमात्मनः ॥२८॥पृथिवी आदि पञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न हुए, सुख-दुःखादि कर्म-भोगोंके आश्रय और पूर्वोपार्जित कर्मफलसे प्राप्त होनेवाले इस मायामय आदि-अन्तवान् शरीरको विज्ञजन आत्माकी स्थूल उपाधि मानते हैं
सूक्ष्मं मनो बुद्धिदशेन्द्रियैर्युतं<br>प्राणैरपञ्चीकृतभूतसम्भवम् ।और मन, बुद्धि, दश इन्द्रियाँ तथा पाँच प्राण (इन सत्रह अङ्गों) से युक्त और अपञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न हुए सूक्ष्म शरीरको

* जहाँ शब्दोंके वाच्यार्थ (अर्थात् उनकी शक्तिवृत्तिसे सिद्ध होनेवाले अर्थ) को छोड़कर दूसरा अर्थ लिया जाता है वहाँ लक्षणा वृत्ति होती है । यह जहती, अजहती और जहदजहती नामसे तीन प्रकारकी है । जहतीलक्षणा में शब्दके वाच्यार्थका सर्वथा त्याग करके उसका बिलकुल नया ही अर्थ किया जाता है। जैसे 'गङ्गायां घोषः' (गङ्गाजीपर पशुशाला है) इस वाक्यके वाच्यार्थसे गङ्गाजीके प्रवाहपर पशुशालाका होना सिद्ध होता है। परन्तु यह सर्वथा असम्भव है । इसलिये यहाँ 'गङ्गा' शब्दका अर्थ 'गङ्गाप्रवाह' न करके 'गङ्गा-तीर' किया जाता है । परन्तु 'तत्' और 'त्वम्' पदके वाच्यार्थ 'ईश्वर' और 'जीव' का सर्वथा त्याग कर देनेसे उन दोनोंकी चेतनताका भी त्याग हो जाता है और चेतनताकी एकता ही अभीष्ट है; इसलिये जहतीलक्षणासे इन पदोंके अर्थकी एकता नहीं हो सकती ।
अजहतीलक्षणामें वाच्यार्थका त्याग न करके उसके साथ अन्य अर्थ भी ग्रहण किया जाता है । जैसे 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' (कौओंसे दहीकी रक्षा करो) इस वाक्यका अभिप्राय केवल कौओंसे दहीकी रक्षा कराना ही नहीं है बल्कि उसके साथ कुत्ता, बिल्ली आदि अन्य जीवोंसे सुरक्षित रखना भी है । यहाँ 'तत्' और 'त्वम्' पदके वाच्यार्थमें विरोध है फिर अन्य अर्थको सम्मिलित करनेसे भी वह विरोध तो दूर होगा ही नहीं; इसलिये अजहल्लक्षणासे भी उनकी एकता सिद्ध नहीं हो सकती । इन दोनोंके सिवा जहाँ कुछ अर्थ रक्खा जाता है और कुछ छोड़ा जाता है वह जहदजहती (भाग त्याग) लक्षणा होती है । जैसे 'सोऽयम्' (यह वही है) इस वाक्यमें 'अयम्' पदसे कहे जानेवाले पदार्थकी अपरोक्षता और 'सः' पदके वाच्य पदार्थकी परोक्षताका त्याग करके इन दोनोंसे रहित जो निर्विरोध पदार्थ है उसकी एकता कही जाती है । इसी प्रकार महावाक्यके 'तत्' पदके वाच्य 'ईश्वर' के गुण सर्वज्ञता, परोक्षता आदिका और 'त्वम्' पदके वाच्य 'जीव' के गुण अल्पज्ञता, प्रत्यक्ता आदिका त्याग करके केवल चेतनांशमें एकता बतलायी जाती है ।

३५६अध्यात्मरामायण[सर्ग ५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भोक्तुः सुखादेरनुसाधनं भवे-<br>च्छरीरमन्यद्विदुरात्मनो बुधाः ॥२९॥जो भोक्ताके सुख-दुःखादि-अनुभवका साधन है, आत्माका दूसरा देह मानते हैं॥२८–२९॥
अनाद्यनिर्वाच्यमपीह कारणं<br>मायाप्रधानं तु परं शरीरकम्।<br>उपाधिभेदात्तु यतः पृथक् स्थितं<br>स्वात्मानमात्मन्यवधारयेत्क्रमात् ॥३०॥(इनके अतिरिक्त) अनादि और अनिर्वाच्य मायामय कारण-शरीर ही जीवका तीसरा देह है। इसप्रकार उपाधि-भेदसे सर्वथा पृथक् स्थित अपने आत्मस्वरूपको क्रमशः (उपाधियोंका बाध करते हुए) अपने हृदयमें निश्चय करे ॥३०॥
कोषेष्वयं तेषु तु तत्तदाकृति-<br>र्विभाति सङ्गात्स्फटिकोपलो यथा।<br>असङ्गरूपोऽयमजो यतोऽद्वयो<br>विज्ञायतेऽस्मिन्परितो विचारिते ॥३१॥स्फटिकमणिके समान यह आत्मा भी (अन्नमयादि) भिन्न-भिन्न कोशोंमें उनके सङ्गसे उन्हींके आकारका भासने लगता है। किन्तु इसका भली-प्रकार विचार करनेसे यह अद्वितीय होनेके कारण असङ्गरूप और अजन्मा निश्चित होता है ॥३१॥
बुद्धेस्त्रिधा वृत्तिरपीह दृश्यते<br>स्वप्नादिभेदेन गुणत्रयात्मनः।<br>अन्योन्यतोऽस्मिन्व्यभिचारतो मृषा<br>नित्ये परे ब्रह्मणि केवले शिवे ॥३२॥त्रिगुणात्मिका बुद्धिकी ही स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति-भेदसे तीन प्रकारकी वृत्तियाँ दिखायी देती हैं किन्तु इन तीनों वृत्तियोंमेंसे प्रत्येकका एक दूसरीमें व्यभिचार होनेके कारण, ये (तीनों ही) एकमात्र कल्याणस्वरूप नित्य परब्रह्ममें मिथ्या हैं (अर्थात् उसमें इन वृत्तियोंका सर्वथा अभाव है) ॥३२॥
देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां<br>सङ्घादजस्रं परिवर्तते धियः।<br>वृत्तिस्तमोमूलतयाऽङ्गलक्षणा<br>यावद्भवेत्तावदसौ भवोद्भवः ॥३३॥बुद्धिकी वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतन आत्माके संघातरूपसे निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाली होनेके कारण अज्ञानरूपा है और जबतक यह रहती है तबतक ही संसारमें जन्म होता रहता है ॥३३॥
नेतिप्रमाणेण निराकृताखिलो<br>हृदा समास्वादितचिद्धनामृतः।<br>त्यजेदशेषं जगदात्तसद्रसं<br>पीत्वा यथाऽम्भः प्रजहाति तत्फलम् ३४'नेति-नेति' आदि श्रुति-प्रमाणसे निखिल संसारका बाध करके और हृदयमें चिद्धनामृतका आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत्को, उसके साररूप सत् (ब्रह्म) को ग्रहण करके त्याग दे, जैसे नारियलके जलको पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं ॥३४॥
कदाचिदात्मा न मृतो न जायते<br>न क्षीयते नापि विवर्धतेऽन्वयः।<br>निरस्तसर्वातिशयः सुखात्मकः<br>स्वयंप्रभः सर्वगतोऽयमद्वयः ॥३५॥आत्मा न कभी मरता है न जन्मता है; वह न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। वह पुरातन, सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, सुखस्वरूप, स्वयंप्रकाश, सर्वगत और अद्वितीय है ॥३५॥
एवंविधे ज्ञानमये सुखात्मके<br>कथं भवो दुःखमयः प्रतीयते।<br>अज्ञानतोऽध्यासवशात्प्रकाशते<br>ज्ञाने विलीयेत विरोधतः क्षणात् ॥३६॥जो इसप्रकार ज्ञानमय और सुख-स्वरूप है उसमें (ज्ञान होनेके बाद) यह दुःखमय संसार कैसे प्रतीत हो सकता है? यह तो अध्यासके कारण अज्ञान-से ही प्रतीत होता है ज्ञानसे तो यह एक क्षणमें ही लीन हो जाता है क्योंकि ज्ञान और अज्ञानका परस्पर

सर्ग ५ ] उत्तरकाण्ड ३५


यदन्यदन्यत्र विभाव्यते भ्रमा-
दध्यासमित्याहुरमुं विपश्चितः।
असर्षभूतेऽहिविभावनं यथा
रज्वादिके तद्वदपीश्वरे जगत्॥३७॥

विकल्पमायारहिते चिदात्मके-
ऽहङ्कार एष प्रथमः प्रकल्पितः।
अध्यास एवात्मनि सर्वकारणे
निरामये ब्रह्मणि केवले परे॥३८॥

इच्छादिरागादिसुखादिधर्मिकाः
सदा धियः संसृतिहेतवः परे।
यस्मात्सुसुप्तौ तदभावतः परः
सुखस्वरूपेण विभाव्यते हि नः॥३९॥

अनाद्यविद्योद्भवबुद्धिबिम्बितो
जीवः प्रकाशोऽयमितीर्यते चितः।
आत्मा धियः साक्षितया पृथक् स्थितो
बुद्ध्यापरिच्छिन्नपरः स एव हि॥४०॥

चिद्विम्बसाक्ष्यात्मधियां प्रसङ्गत-
स्त्वेकत्र वासादनलाक्तलोहवत्।
अन्योन्यमध्यासवशात्प्रतीयते
जडाजडत्वं च चिदात्मचेतसोः॥४१॥

गुरोः सकाशादपि वेदवाक्यतः
सञ्जातविद्यानुभवो निरीक्ष्य तम्।
स्वात्मानमात्मस्थमुपाधिवर्जितं
त्यजेदशेषं जडमात्मगोचरम्॥४२॥

प्रकाशरूपोऽहमजोऽहमद्वयो-
ऽसकृद्विभातोऽहमतीव निर्मलः।
विशुद्धविज्ञानघनो निरामयः
सम्पूर्ण आनन्दमयोऽहमक्रियः॥४३॥

सदैव मुक्तोऽहमचिन्त्यशक्तिमा-
नतीन्द्रियज्ञानमविक्रियात्मकः।
अनन्तपारोऽहमहर्निशं बुधै-
र्विभावितोऽहं हृदि वेदवादिभिः॥४४॥


विरोध है॥३६॥ भ्रमसे जो अन्यमें अन्यकी प्रतीति होती है उसीको विद्वानोंने अध्यास कहा है। जैसे प्रकार असर्परूप रज्जुमें सर्पकी प्रतीति होती है उस प्रकार ईश्वरमें संसारकी प्रतीति हो रही है॥३७॥ जो विकल्प और मायासे रहित है उस सबके पर निरामय, अद्वितीय और चित्स्वरूप परमात्मा ब्रह्ममें पहले इस 'अहंकार' रूप अध्यासकी ही कल्पना होती है॥३८॥ सबके साक्षी आत्मामें इच्छा, अनिच्छा, राग-द्वेष और सुख-दुःखादिरूप बुद्धिकी वृत्तियाँ ही जन्म-मरणरूप संसारकी कारण हैं; क्योंकि सुषुप्तिमें इनका अभाव हो जानेपर हमें आत्माका सुख-रूपसे भान होता है॥३९॥ अनादि अविद्यासे उत्पन्न हुई बुद्धिमें प्रतिबिम्बित चेतनका प्रकाश ही 'जीव' कहलाता है। बुद्धिके साक्षीरूपसे आत्मा उससे पृथक् है, वह परात्मा तो बुद्धिसे अपरिच्छिन्न है॥४०॥ अग्निसे तपे हुए लोहेके समान चिदाभास, साक्षी आत्मा तथा बुद्धिके एकत्र रहनेसे परस्पर अन्योन्याध्यास होनेके कारण क्रमशः उनकी चेतनता और जडता प्रतीत होती है। (अर्थात् जिस प्रकार अग्निसे तपे हुए लोहपिण्डमें अग्नि और लोहेका तादात्म्य हो जानेसे लोहेका आकार अग्निमें और अग्निकी उष्णता लोहेमें दिखायी देने लगती है उसी प्रकार बुद्धि और आत्माका तादात्म्य हो जानेसे आत्माकी चेतनता बुद्धि आदिमें और बुद्धि आदिकी जडता आत्मामें प्रतीत होने लगती है। इसलिये अध्यासवश बुद्धिसे लेकर शरीरपर्यन्त अनात्म-वस्तुओंको ही आत्मा मानने लगते हैं) ॥४१॥ गुरुके समीप रहनेसे और वेदवाक्योंसे आत्मज्ञानका अनुभव होनेपर अपने हृदयस्थ उपाधिरहित आत्माका साक्षात्कार करके आत्मारूपसे प्रतीत होनेवाले देहादि सम्पूर्ण जडपदार्थोंका त्याग कर देना चाहिये॥४२॥ मैं प्रकाशस्वरूप, अजन्मा, अद्वितीय, निरन्तर भासमान, अत्यन्त निर्मल, विशुद्ध-विज्ञानघन, निरामय, क्रियारहित और एकमात्र आनन्द-स्वरूप हूँ॥४३॥ मैं सदा ही मुक्त, अचिन्त्यशक्ति, अतीन्द्रिय, अविकृतरूप और अनन्तपार हूँ। वेद-वादी पण्डितजन अहर्निश मेरा हृदयमें चिन्तन करते हैं॥४४॥

३५८ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५


एवं सदात्मानमखण्डितात्मना
विचारमाणस्य विशुद्धभावना ।
हन्यादविद्यामचिरेण कारकै
रसायनं यद्वदुपासितं रुजः ॥ ४५ ॥

अर्थ: इस प्रकार सदा आत्माका अखण्ड-वृत्तिसे चिन्तन करनेवाले पुरुषके अन्तःकरणमें उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरन्त ही कारकादिके सहित अविद्याका नाश कर देती है, जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई ओषधि रोगको नष्ट कर डालती है ॥ ४५ ॥


विविक्त आसीन उपारतेन्द्रियो
विनिर्जितात्मा विमलान्तराशयः ।
विभावयेदेकमनन्यसाधनो
विज्ञानदृक्केवल आत्मसंस्थितः ॥ ४६ ॥

अर्थ: (आत्मचिन्तन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि) एकान्त देशमें इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे हटाकर और अन्तःकरणको अपने अधीन करके बैठे तथा आत्मामें स्थित होकर और किसी साधनका आश्रय न लेकर शुद्ध-चित्त हुआ केवल ज्ञानदृष्टिद्वारा एक आत्माकी ही भावना करे ॥ ४६ ॥


विश्वं यदेतत्परमात्मदर्शनं
विलापयेदात्मनि सर्वकारणे ।
पूर्णश्चिदानन्दमयोऽवतिष्ठते
न वेद बाह्यं न च किञ्चिदान्तरम् ॥ ४७ ॥

अर्थ: यह विश्व परमात्मस्वरूप है ऐसा समझकर इसे सबके कारणरूप आत्मामें लीन करे; इस प्रकार जो पूर्ण चिदानन्दस्वरूपसे स्थित हो जाता है उसे बाह्य अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं रहता ॥ ४७ ॥


पूर्वं समाधेरखिलं विचिन्तये-
दोङ्कारमात्रं सचराचरं जगत् ।
तदेव वाच्यं प्रणवो हि वाचको
विभाव्यतेऽज्ञानवशान्न बोधतः ॥ ४८ ॥

अर्थ: समाधि प्राप्त होनेके पूर्व ऐसा चिन्तन करे कि सम्पूर्ण चराचर जगत् केवल ओंकार-मात्र है। यह संसार वाच्य है और ओंकार इसका वाचक है। अज्ञानके कारण ही संसारकी प्रतीति होती है ज्ञान होनेपर इसका कुछ भी नहीं रहता ॥ ४८ ॥


अकारसंज्ञः पुरुषो हि विश्वको
ह्युकारस्तैजस ईर्यते क्रमात् ।
प्राज्ञो मकारः परिपठ्यतेऽखिलैः
समाधिपूर्वं न तु तत्त्वतो भवेत् ॥ ४९ ॥

अर्थ: (ओंकारमें अ उ और म ये तीन वर्ण हैं; इनमेंसे) अकार विश्व (जागृतिके अभिमानी) का वाचक है, उकार तैजस (स्वप्नका अभिमानी) कहलाता है और मकार प्राज्ञ (सुषुप्तिके अभिमानी) को कहते हैं; यह व्यवस्था समाधिलाभसे पहलेकी है, तत्त्वदृष्टिसे ऐसा कोई भेद नहीं है ॥ ४९ ॥


विश्वं त्वकारं पुरुषं विलापये-
दुकारमध्ये बहुधा व्यवस्थितम् ।
ततो मकारे प्रविलाप्य तैजसं
द्वितीयवर्णं प्रणवस्य चान्तिमे ॥ ५० ॥

अर्थ: नाना प्रकारसे स्थित अकाररूप विश्व पुरुषको उकारमें लीन करे और ओंकारके द्वितीय वर्ण तैजसरूप उकारको उसके अन्तिमवर्ण मकारमें लीन करे ॥ ५० ॥


मकारमप्यात्मनि चिद्घने परे
विलापयेत्प्राज्ञमपीह कारणम् ।
सोऽहं परं ब्रह्म सदा विमुक्तिम-
द्विज्ञानदृङ् मुक्त उपाधितोऽमलः ॥ ५१ ॥

अर्थ: फिर कारणात्मा प्राज्ञरूप मकारको भी चिद्घनरूप परमात्मामें लीन करे; (और ऐसी भावना करे कि) वह नित्यमुक्त विज्ञानस्वरूप उपाधिहीन निर्मल परब्रह्म मैं ही हूँ ॥ ५१ ॥


एवं सदा जातपरात्मभावनः
स्वानन्दतुष्टः परिविस्मृताखिलः ।
आस्ते स नित्यात्मसुखप्रकाशकः
साक्षाद्विमुक्तोऽचलवारिसिन्धुवत् ॥ ५२ ॥

अर्थ: इसप्रकार निरन्तर परात्मभावना करते-करते जो आत्मानन्दमें मग्न हो गया है तथा जिसे सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च विस्मृत हो गया है वह नित्य आत्मानन्दका अनुभव करनेवाला जीवन्मुक्त योगी निस्तरंग समुद्रके

सर्ग ५ ]उत्तरकाण्ड३५९

एवं सदाऽभ्यस्तसमाधियोगिनो<br>निवृत्तसर्वेन्द्रियगोचरस्य हि।<br>विनिर्जिताशेषरिपोरहं सदा<br>दृश्यो भवेयं जितषड्गुणात्मनः ॥५३॥ | समान साक्षात् मुक्तस्वरूप हो जाता है ॥५२॥ इस प्रकार जो निरन्तर समाधियोगका अभ्यास करता है, जिसके सम्पूर्ण इन्द्रियगोचर विषय निवृत्त हो गये हैं तथा जिसने काम-क्रोधादि सम्पूर्ण शत्रुओंको परास्त कर दिया है, उस छहों इन्द्रियों (मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों) को जीतनेवाले महात्माको मेरा निरन्तर साक्षात्कार होता है॥५३॥

ध्यात्वैवमात्मानमहर्निशं मुनि-<br>स्तिष्ठेत्सदा मुक्तसमस्तबन्धनः।<br>प्रारब्धमश्नन्नभिमानवर्जितो<br>मय्येव साक्षात्प्रविलीयते ततः ॥५४॥ | इस प्रकार अहर्निश आत्माका ही चिन्तन करता हुआ मुनि सर्वदा समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर रहे तथा (कर्ता-भोक्तापनके) अभिमानको छोड़कर प्रारब्ध-फल भोगता रहे। इससे वह अन्तमें साक्षात् मुझहीमें लीन हो जाता है ॥५४॥

आदौ च मध्ये च तथैव चान्ततो<br>भवं विदित्वा भयशोककारणम्।<br>हित्वा समस्तं विधिवादचोदितं<br>भजेत्खमात्मानमथाखिलात्मनाम् ॥५५॥ | संसारको आदि, अन्त और मध्यमें सब प्रकार भय और शोकका ही कारण जानकर समस्त वेदविहित कर्मको त्याग दे तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मारूप अपने आत्माका भजन करे॥ ५५॥

आत्मन्यभेदेन विभावयन्निदं<br>भवत्यभेदेन मयात्मना तदा।<br>यथा जलं वारिनिधौ यथा पयः<br>क्षीरे वियद्व्योमन्यनिले यथानिलः ॥५६॥ | जिस प्रकार समुद्रमें जल, दूधमें दूध, महाकाशमें घटा-काशादि और वायुमें वायु मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको अपने आत्माके साथ अभिन्नरूपसे चिन्तन करनेसे जीव मुझ परमात्माके साथ अभिन्न भावसे स्थित हो जाता है ॥५६॥

इत्थं यदीक्षेत हि लोकसंस्थितो<br>जगन्मृषैवेति विभावयन्मुनिः।<br>निराकृतत्वाच्छ्रुतियुक्तिमानतो<br>यथेन्दुभेदो दिशि दिग्भ्रमादयः ॥५७॥ | यह जो जगत् है वह श्रुति, युक्ति और प्रमाणसे बाधित होनेके कारण चन्द्रभेद और दिशाओंमें होनेवाले दिग्भ्रम-के समान मिथ्या ही है—ऐसी भावना करता हुआ लोक (व्यवहार) में स्थित मुनि, इसे देखे ॥ ५७ ॥

यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं<br>तावन्मदाराधनतत्परो भवेत्।<br>श्रद्धालुरत्यूर्जितभक्तिलक्षणो<br>यस्तस्य दृश्योऽहमहर्निशं हृदि ॥५८॥ | जबतक सारा संसार मेरा ही रूप दिखलायी न दे तब-तक निरन्तर मेरी आराधना करता रहे। जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है उसे अपने हृदयमें सर्वदा मेरा ही साक्षात्कार होता है ॥ ५८ ॥

रहस्यमेतच्छ्रुतिसारसङ्ग्रहं<br>मया विनिश्चित्य तवोदितं प्रिय।<br>यस्त्वेतदालोचयतीह बुद्धिमान्<br>स मुच्यते पातकराशिभिः क्षणात् ॥५९॥ | हे प्रिय ! सम्पूर्ण श्रुतियोंके साररूप इस गुप्त रहस्यको मैंने निश्चय करके तुमसे कहा है। जो बुद्धिमान् इसका मनन करेगा वह तत्काल समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥ ५९ ॥

भ्रातर्यदीदं परिदृश्यते जग-<br>न्मायैव सर्वं परिहृत्य चेतसा। | भाई ! यह जो कुछ जगत् दिखायी देता है वह सब माया है। इसे अपने चित्तसे

३६०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ६

मद्भावनाभावितशुद्धमानसः
सुखी भवानन्दमयो निरामयः ॥६०॥
अर्थ— निकालकर मेरी भावनासे शुद्धचित्त और सुखी होकर आनन्दपूर्ण और क्लेशशून्य हो जाओ ॥ ६० ॥

यः सेवते मामगुणं गुणात्परं
हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम्।
सोऽहं स्वपादाश्रितरेणुभिः स्पृशन्
पुनाति लोकत्रितयं यथा रविः ॥६१॥
अर्थ— जो पुरुष अपने चित्तसे मुझ गुणातीत निर्गुणका अथवा कभी-कभी मेरे सगुण स्वरूपका भी सेवन करता है वह मेरा ही रूप है। वह अपनी चरणरजके स्पर्शसे सूर्यके समान सम्पूर्ण त्रिलोकीको पवित्र कर देता है ॥ ६१ ॥

विज्ञानमेतदखिलं श्रुतिसारमेकं
वेदान्तवेद्यचरणेन मयैव गीतम्।
यः श्रद्धया परिपठेद् गुरुभक्तियुक्तो
मद्रूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्तिः ॥६२॥
अर्थ— यह अद्वितीय ज्ञान समस्त श्रुतियोंका एकमात्र सार है इसे वेदान्तवेद्य भगवत्पाद मैंने ही कहा है। जो गुरुभक्तिसम्पन्न पुरुष इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा उसकी यदि मेरे वचनोंमें प्रीति होगी तो वह मेरा ही रूप हो जायगा ॥ ६२ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठ सर्ग

लवण-वध, भगवान् रामके यज्ञमें कुश-लवके सहित महर्षि वाल्मीकिका पधारना और कुशको परमार्थोपदेश करना।

श्रीमहादेव उवाच
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति !

एकदा मुनयः सर्वे यमुनातीरवासिनः।
आजग्मू राघवं द्रष्टुं भयाल्लवणरक्षसः ॥ १ ॥
अर्थ— एक दिन यमुना-तटपर रहनेवाले समस्त मुनिजन लवण राक्षससे भय-भीत होकर श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करनेके लिये आये ॥ १ ॥

कृत्वाऽग्रे तु मुनिश्रेष्ठं भार्गवं च्यवनं द्विजाः।
असङ्ख्याताः समायाता रामादभयकाङ्क्षिणः ॥२॥
अर्थ— वे अगणित मुनिगण भृगुपुत्र मुनिश्रेष्ठ च्यवन-को आगे कर भगवान् रामसे अभय-लाभ करनेकी इच्छा-से आये ॥२॥

तान्पूजयित्वा परया भक्त्या रघुकुलोत्तमः।
उवाच मधुरं वाक्यं हर्षयन्मुनिमण्डलम् ॥ ३ ॥
अर्थ— रघुकुलश्रेष्ठ रामजीने उन मुनीश्वरोंका अत्यन्त भक्तिभावसे पूजन कर उन्हें प्रसन्न करते हुए मधुर वाणीसे कहा—॥ ३ ॥

करवाणि मुनिश्रेष्ठाः किमागमनकारणम्।
धन्योऽस्मि यदि यूयं मां प्रीत्या द्रष्टुमिहागताः॥४॥
अर्थ— "हे मुनिश्रेष्ठगण ! आपके यहाँ पधारनेका क्या कारण है ? (मुझे जो आज्ञा होगी) मैं वैसा ही करूँगा। यदि आप लोग मुझे प्रीतिपूर्वक देखनेके लिये ही यहाँ आये हैं, तो मैं धन्य हूँ ॥ ४ ॥

दुष्करं चापि यत्कार्यं भवतां तत्करोम्यहम्।
आज्ञापयन्तु मां भृत्यं ब्राह्मणा दैवतं हि मे ॥ ५ ॥
अर्थ— आपका जो अत्यन्त दुष्कर कार्य होगा वह भी मैं अवश्य करूँगा। आप मुझ सेवकको आज्ञा दीजिये; ब्राह्मण ही मेरे इष्टदेव हैं" ॥ ५ ॥

तच्छ्रुत्वा सहसा हृष्टश्च्यवनो वाक्यमब्रवीत्।
मधुनामा महादैत्यः पुरा कृतयुगे प्रभो ॥ ६ ॥
अर्थ— भगवान् रामके ये वचन सुनकर महर्षि च्यवनने सहसा प्रसन्न होकर कहा—"प्रभो ! पहले सत्ययुगमें

सर्ग ६ ] उत्तरकाण्ड ३६१


आसीदतीव धर्मात्मा देवब्राह्मणपूजकः ।<br>तस्य तुष्टो महादेचो ददौ शूलमनुत्तमम् ॥ ७ ॥<br>प्राह चानेन यं हंसि स तु भस्मीभविष्यति ।<br>रावणस्यानुजा भार्या तस्य कुम्भीनसी श्रुता ॥ ८ ॥<br>तस्यां तु लवणो नाम राक्षसो भीमविक्रमः ।<br>आसीदुरात्मा दुर्धर्षो देवब्राह्मणहिंसकः ॥ ९ ॥<br>पीडितास्तेन राजेन्द्र वयं त्वां शरणं गताः ।<br>तच्छ्रुत्वा राघवोऽप्याह मा भैर्बो मुनिपुङ्गवाः ॥१०॥<br>लवणं नाशयिष्यामि गच्छन्तु विगतज्वराः ।<br>इत्युक्त्वा प्राह रामोऽपि भ्रातॄन् को वा हनिष्यति ॥<br>लवणं राक्षसं दद्याद् ब्राह्मणेभ्योऽभयं महत् ।<br>तच्छ्रुत्वा प्राञ्जलिः प्राह भरतो राघवाय वै ॥१२॥<br>अहमेव हनिष्यामि देवाज्ञापय मां प्रभो ।<br>ततो रामं नमस्कृत्य शत्रुघ्नो वाक्यमब्रवीत् ॥१३॥<br>लक्ष्मणेन महत्कार्यं कृतं राघव संयुगे ।<br>नन्दिग्रामे महाबुद्धिर्भरतो दुःखमन्वभूत् ॥१४॥<br>अहमेव गमिष्यामि लवणस्य वधाय च ।<br>त्वत्प्रसादाद्रघुश्रेष्ठ हन्यां तं राक्षसं युधि ॥१५॥मधु नामक एक बड़ा ही धर्मात्मा और देवता तथा<br>ब्राह्मणोंका भक्त महादैत्य था । उससे प्रसन्न होकर<br>श्रीमहादेवजीने उसे एक अत्युत्तम त्रिशूल दिया ॥ ६-७ ॥<br>और कहा कि इससे तू जिसपर प्रहार करेगा वही<br>भस्मीभूत हो जायगा । सुना जाता है,<br>रावणकी छोटी बहिन कुम्भीनसी उसकी भार्या<br>थी ॥ ८ ॥ उससे उसके लवण नामका एक<br>महापराक्रमी दुष्ट-चित्त, दुर्जय और देवता-ब्राह्मणोंको<br>दुःख देनेवाला राक्षस उत्पन्न हुआ ॥ ९ ॥ हे राजेन्द्र !<br>उससे अत्यन्त पीड़ित होकर हम आपकी शरण आये<br>हैं।” यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने कहा—“हे मुनि-<br>श्रेष्ठ ! आपलोग किसी प्रकारका भय न करें ॥१०॥ आप<br>निश्चिन्त होकर पधारें, मैं लवणको अवश्य मार डालूँगा।”<br>मुनीश्वरोंसे ऐसा कह भगवान् रामने अपने भाइयोंसे<br>पूछा—“तुममेंसे कौन लवण राक्षसको मारेगा और<br>ब्राह्मणोंको महान् अभय देगा ?” यह सुनकर भरतजी-<br>ने श्रीरघुनाथजीसे हाथ जोड़कर कहा-॥ ११-१२॥<br>“देव ! लवणको मैं ही मारूँगा । प्रभो ! इसके लिये मुझे<br>ही आज्ञा दीजिये।” फिर शत्रुघ्नजीने श्रीरामचन्द्रजीको<br>प्रणाम करके कहा—॥ १३ ॥ “हे राघव ! श्रीलक्ष्मण-<br>जी युद्धमें बड़ा भारी कार्य कर चुके हैं, महामति भरत-<br>जीने भी नन्दिग्राममें रहकर बहुत कष्ट सहा है ॥ १४ ॥<br>अब लवणका वध करनेके लिये तो मैं ही जाऊँगा ।<br>हे रघुश्रेष्ठ ! आपकी कृपासे मैं उस राक्षसको युद्धमें<br>अवश्य मार डालूँगा” ॥ १५ ॥
तच्छ्रुत्वा स्वाङ्कमारोप्य शत्रुघ्नं शत्रुसूदनः ।<br>आहाद्यैवाभिषेक्ष्यामि मथुराराज्यकारणात् ॥१६॥<br>आनाय्य च सुसम्भारॉल्लक्ष्मणेनाभिषेचने ।<br>अनिच्छन्तमपि स्नेहादभिषेकमकारयत् ॥१७॥<br>दत्त्वा तस्मै शरं दिव्यं रामः शत्रुघ्नमब्रवीत् ।<br>अनेन जहि बाणेन लवणं लोककण्टकम् ॥१८॥<br>स तु सम्पूज्य तच्छूलं गेहे गच्छति काननम् ।<br>भक्षणार्थं तु जन्तूनां नानाप्राणिवधाय च ॥१९॥शत्रुघ्नके ये वचन सुनकर शत्रुदमन रघुनाथजीने<br>उन्हें अपनी गोदमें उठा लिया और कहा—“मैं आज<br>ही तुम्हारा (लवणकी राजधानी) मथुराके राज्यपर<br>अभिषेक करूँगा” ॥ १६ ॥ ऐसा कह लक्ष्मणजीसे<br>अभिषेककी सामग्री मँगा शत्रुघ्नजीकी इच्छा न होने-<br>पर भी श्रीरामचन्द्रजीने उनका प्रीतिपूर्वक अभिषेक<br>कर दिया ॥ १७ ॥ फिर उन्हें दिव्य बाण देकर<br>कहा—“तुम संसारके कण्टकरूप लवणको इस बाण-<br>से मार डालना ॥ १८ ॥ राक्षस लवण अपने घरमें<br>ही उस त्रिशूलकी पूजा कर नाना प्रकारके जीवोंको<br>खाने और मारनेके लिये वनको जाया करता है॥ १९॥
३६२अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

स तु नायाति सदनं यावद्वनचरो भवेत् ।
तावदेव पुरद्वारि तिष्ठ त्वं धृतकार्मुकः ॥२०॥
योत्स्यते स त्वया क्रुद्धस्तदावध्यो भविष्यति ।
तं हत्वा लवणं क्रूरं तद्वनं मधुसंज्ञितम् ॥२१॥
निवेश्य नगरं तत्र तिष्ठ त्वं मेऽनुशासनात् ।
अश्वानां पञ्चसाहस्रं रथानां च तदर्द्धकम् ॥२२॥
गजानां षट् शतानीह पत्तीनामयुतत्रयम् ।
आगमिष्यति पश्चात्तवमग्र साधय राक्षसम् ॥२३॥
इत्युक्त्वा मूर्ध््न्यवघ्राय प्रेषयामास राघवः ।
शत्रुघ्नं मुनिभिः सार्धमाशीर्भिरभिनन्द्य च ॥२४॥
शत्रुघ्नोऽपि तथा चक्रे यथा रामेण चोदितः ।
हत्वा मधुसुतं युद्धे मथुरांमकरोत्पुरीम् ॥२५॥
स्फीतां जनपदं चक्रे मधुरां दानमानतः ।
सीतापि सुषुवे पुत्रौ द्वौ वाल्मीकेरथाश्रमे ॥२६॥
मुनिस्तयोर्नाम चक्रे कुशो ज्येष्ठोऽनुजो लवः।
क्रमेण विद्यासम्पन्नौ सीतापुत्रौ बभूवतुः ॥२७॥
उपनीतौ च मुनिना वेदाध्ययनतत्परौ ।
कृत्स्नं रामायणं प्राह काव्यं बालकयोर्मुनिः ॥२८॥
शङ्करेण पुरा प्रोक्तं पार्वत्यै पुरहारिणा ।
वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥२९॥
कुमारौ स्वरसम्पन्नौ सुन्दरावाश्विनाविव ।
तन्त्रीतालसमायुक्तौ गायन्तौ चेरतुर्वने ॥३०॥
तत्र तत्र मुनीनां तौ समाजे सुररूपिणौ ।
गायन्तावमितो दृष्ट्वा विस्मिता मुनयोऽब्रुवन् ॥३१॥
गन्धर्वेष्वथ किन्नरेषु भुवि वा देवेषु देवालये
पातालेऽथतथा चतुर्मुखगृहे लोकेषु सर्वेषु च ।
अस्माभिश्चिरजीविभिश्चिरतरं दृष्ट्वा दिशः सर्वतो


अतः जबतक वह लौटकर घर न आवे, वनहीमें रहे, उससे पूर्व ही तुम नगरके द्वारपर धनुष धारण कर खड़े हो जाना ॥ २० ॥ लौटनेपर वह क्रोधपूर्वक तुमसे लड़ेगा और उसी समय मारा जायगा । इस प्रकार महाक्रूर लवणासुरको मारकर उसके मधुवनमें नगर बसाकर मेरी आज्ञासे वहीं रहो । तुम पहले जाकर उस राक्षसको ठीक करो, फिर तुम्हारे पीछे वहाँ पाँच हजार घोड़े, उनसे आधे ( ढाई हजार ) रथ, छः सौ हाथी और तीस हजार पैदल भी पहुँचेंगे ॥ २१–२३ ॥

ऐसा कह श्रीरघुनाथजीने शत्रुघ्नका शिर सूँघकर उनका आशीर्वादसे अभिनन्दन किया और उन्हें मुनियोंके साथ विदा किया ॥ २४ ॥ शत्रुघ्नजीने भी, भगवान् रामने जैसी आज्ञा दी थी वैसा ही किया । उन्होंने मधुपुत्र लवणासुरको मारकर मधुरापुरी बसायी ॥ २५ ॥ और दान-मानसे (लोगोंको सन्तुष्ट कर) उन्होंने मधुराको एक समृद्धिशाली नगर बना दिया ।

इस बीचमें श्रीसीताजीके वाल्मीकि मुनिके आश्रममें दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २६ ॥ मुनिने उनमेंसे बड़ेका नाम कुश और छोटेका लव रक्खा । धीरे-धीरे सीताजीके वे दोनों पुत्र विद्यासम्पन्न हो गये ॥ २७ ॥ मुनिके उपनयन-संस्कार करनेपर वे वेदाध्ययनमें तत्पर हुए । श्रीवाल्मीकिजीने उन दोनों बालकोंको सम्पूर्ण रामायणकाव्य पढ़ा दिया ॥ २८ ॥ पूर्वकालमें इसे त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकरने पार्वतीजीको सुनाया था । उसी आख्यानको समर्थ मुनि वाल्मीकिने वेदोंका विस्तृत ज्ञान करानेके लिये उन बालकोंको पढ़ाया ॥ २९ ॥ वे अश्विनीकुमारके समाने अति सुन्दर कुमार उसे वीणा बजाकर स्वरसहित गाते हुए वनमें विचरा करते थे ॥ ३० ॥ उन देवरूप बालकोंको जहाँ-तहाँ मुनियोंके समाजमें गाते देख वे मुनिगण अत्यन्त विस्मित हो आपसमें कहने लगते थे—॥ ३१ ॥ "हम चिरजीवियोंने बहुत दिनोंसे सभी दिशाएँ देखीं; किन्तु गन्धर्व, किन्नर, भूलोक, देवलोक, देवालय, पाताल अथवा ब्रह्मलोक आदि किसी भी लोकमें गाने-बजानेकी ऐसी कुशलता