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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

उत्तरकाण्ड - सर्ग ४: रामराज्यका वर्णन तथा सीता-वनवास

सर्ग ४ ] : उत्तरकाण्ड ३४९


संस्कृत (श्लोक)हिन्दी अनुवाद
देवदेव जगन्नाथ परमात्मन्सनातन ।<br>चिदानन्दादिमध्यान्तरहिताशेषकारण ॥३५॥<br>देव देवाः समासाद्य मामेकान्तेऽब्रुवन्वचः ।<br>बहुशोऽर्थ्यमानास्ते वैकुण्ठागमनं प्रति ॥३६॥<br>त्वया समेतश्चिच्छक्त्या रामस्तिष्ठति भूतले ।<br>विसृज्यास्मान्स्वकं धाम वैकुण्ठं च सनातनम्॥३७॥<br>आस्ते त्वया जगद्धात्रि रामः कमललोचनः ।<br>अग्रतो याहि वैकुण्ठं त्वं तथा चेद्रघूत्तमः ॥३८॥<br>आगमिष्यति वैकुण्ठं सनाथान्नः करिष्यति ।<br>इति विज्ञापिताऽहं तैर्मया विज्ञापितो भवान् ॥३९॥<br>यद्युक्तं तत्कुरुष्वाद्य नाहमाज्ञापये प्रभो ।<br>सीतायास्तद्वचः श्रुत्वा रामो ध्यात्वाऽब्रवीत्क्षणम्४०<br>देवि जानामि सकलं तत्रोपायं वदामि ते ।<br>कल्पयित्वा मिषं देवि लोकवादं त्वदाश्रयम्॥४१॥<br>त्यजामि त्वां वने लोकवादाद्भीत इवापरः ।<br>भविष्यतः कुमारौ द्वौ वाल्मीकेराश्रमान्तिके॥४२॥<br>इदानीं दृश्यते गर्भः पुनरागत्य मेऽन्तिकम् ।<br>लोकानां प्रत्ययार्थं त्वं कृत्वा शपथमादरात् ॥४३॥<br>भूमेर्विवरमात्रेण वैकुण्ठं यास्यसि द्रुतम् ।<br>पश्चादहं गमिष्यामि एष एव सुनिश्चयः ॥४४॥<br>इत्युक्त्वा तां विसृज्याथ रामो ज्ञानैकलक्षणः ।<br>मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैर्बलमुख्यैश्च संवृतः ॥४५॥<br>तत्रोपविष्टं श्रीरामं सुहृदः पर्युपासत ।<br>हास्यप्रौढकथासुज्ञा हासयन्तः स्थिता हरिम् ॥४६॥<br>कथाप्रसङ्गात्पप्रच्छ रामो विजयनामकम् ।<br>पौरा जानपदा मे किं वदन्तीह शुभाशुभम् ॥४७॥जगन्नाथ ! हे सनातन परमात्मन् ! हे चिदानन्द-स्वरूप ! हे आदि, मध्य और अन्तसे रहित सबके कारण ! हे देव ! देवताओंने आकर मुझसे एकान्तमें बहुत कुछ प्रार्थना करते हुए आपके वैकुण्ठ पधारनेके विषयमें कहा है ॥ ३५-३६ ॥ वे कहते हैं कि 'तुझ चिच्छक्तिसे युक्त होकर ही राम हम सबको और अपने सनातन स्थान वैकुण्ठको छोड़कर पृथिवीतलमें ठहरे हुए हैं ॥ ३७ ॥ हे जगद्धात्रि ! कमलनयन राम सदा तेरे साथ ही रहते हैं । यदि तू पहले वैकुण्ठको चली जाय तो श्रीरघुनाथजी भी वहाँ आकर हमें सनाथ कर देंगे ।' मुझसे उन्होंने इसप्रकार कहा है सो मैंने आपको सुना दिया ॥ ३८-३९ ॥ हे प्रभो ! मेरा कोई आदेश तो है नहीं, अब आप जैसा उचित समझें वैसा करें ।”<br><br>सीताजीके ये वचन सुनकर रघुनाथजीने कुछ देर सोचकर कहा- ॥ ४० ॥ “देवि ! मैं यह सब जानता हूँ । उसके लिये मैं तुम्हें उपाय बतलाता हूँ । मैं तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले लोकापवादके मिषसे तुम्हें लोकनिन्दासे डरनेवाले अन्य पुरुषोंके समान वनमें त्याग दूँगा । वहाँ श्रीवाल्मीकिजीके आश्रमके पास तुम्हारे दो बालक होंगे ॥ ४१-४२ ॥ इस समय तुम्हारे शरीरमें गर्भावथाके चिह्न दिखायी दे रहे हैं । (बालकोंके उत्पन्न होनेपर) तुम मेरे पास फिर आओगी और लोकोंकी प्रतीतिके लिये आदरपूर्वक शपथ करके तुरन्त ही पृथिवीके (फटनेपर उसके) छिद्रद्वारा वैकुण्ठको चली जाओगी । पीछे मैं भी वहाँ आ जाऊँगा; बस, अब यही निश्चय रहा" ॥४३-४४॥<br><br>एकमात्र ज्ञानस्वरूप भगवान् रामने सीताजीसे ऐसा कह उन्हें अन्तःपुरको भेज दिया और स्वयं नीतिशास्त्रके जाननेवाले मन्त्रियों तथा मुख्य-मुख्य सेनापतियोंसे घिरकर वहाँ विराजमान हुए । सुहृद्गण वहाँ बैठे हुए रामकी परिचर्यामें लगे हुए थे और हास्योक्तिमें कुशल विदूषकगण उन्हें हँसा रहे थे ॥ ४५-४६ ॥<br><br>तब भगवान् रामने प्रसंगवश विजय-नामक एक दूतसे पूछा- "मेरे, सीताके, मेरी माता और
३५०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४

सीतां वा मातरं वा मे भ्रातॄन्वा कैकयीमथ।<br>न भेतव्यं त्वया ब्रूहि शापितोऽसि ममोपरि ॥४८॥ | भाइयोंके अथवा कैकेयीके विषयमें पुरवासी लोग क्या कहते हैं? मैं तुम्हें अपनी शपथ कराता हूँ, तुम भय न करके सच-सच कहना" ॥४७-४८॥
इत्युक्तः प्राह विजयो देव सर्वे वदन्ति ते ।<br>कृतं सुदुष्करं सर्वं रामेण विदितात्मना ॥४९॥<br>किन्तु हत्वा दशग्रीवं सीतामाहृत्य राघवः ।<br>अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा स्वं वेश्म प्रत्यपादयत् ॥५०॥<br>कीदृशं हृदये तस्य सीतासम्भोगजं सुखम् ।<br>या हृता विजनेऽरण्ये रावणेन दुरात्मना ॥५१॥<br>अस्माकमपि दुष्कर्म योषितां मर्षं भवेत् ।<br>यादृग् भवति वै राजा तादृश्यो नियतं प्रजाः ॥५२॥ | भगवान्‌के इस प्रकार पूछनेपर विजयने कहा—<br>"देव ! सभी लोग कहते हैं कि आत्मज्ञानी महाराज रामने जो कार्य किये हैं वे सभी बड़े दुष्कर हैं ॥४९॥ किन्तु उन्होंने रावणको मारकर सीताको बिना किसी प्रकारका सन्देह किये ही अपने साथ लाकर घर रख लिया ( यह ठीक नहीं किया) ॥५०॥ भला, जिस सीताको दुरात्मा रावणने निर्जन वनमें हर लिया था न जाने उसके साथ भोग भोगते हुए उन्हें क्या सुख मिलता है? ॥५१॥ अब हमें भी अपनी स्त्रियोंके दुश्चरित्रको सहन करना पड़ेगा, क्योंकि जैसा राजा होता है प्रजा भी निःसन्देह वैसी ही होती है" ॥५२॥
श्रुत्वा तद्वचनं रामः स्वजनान्पर्यपृच्छत ।<br>तेऽपि नत्वाऽब्रुवन् राममेवमेतन्न संशयः ॥५३॥ | उसके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अपने आत्मीयोंसे पूछा। उन्होंने भी रघुनाथजीको प्रणाम करके यही कहा कि निःसन्देह ऐसी ही बात है ॥५३॥
ततो विसृज्य सचिवाग्विजयं सुहृदस्तथा ।<br>आहूय लक्ष्मणं रामो वचनं चेदमब्रवीत् ॥५४॥<br>लोकापवादस्तु महान्सीतामाश्रित्य मेऽभवत् ।<br>सीतां प्रातः समानीय वाल्मीकेराश्रमान्तिके ॥५५॥<br>त्यक्त्वा शीघ्रं रथेन त्वं पुनरायाहि लक्ष्मण ।<br>वक्ष्यसे यदि वा किञ्चित्तदा मां हतवानसि ॥५६॥ | तब श्रीरामचन्द्रजीने मन्त्रीगण, विजय और अपने सुहृदोंको विदाकर श्रीलक्ष्मणजीको बुलाया और उनसे इस प्रकार कहने लगे—"भैया लक्ष्मण ! सीताके कारण मेरी बड़ी लोकनिन्दा हो रही है। अतः तुम कल सबेरे ही सीताको रथपर चढ़ाकर वाल्मीकि मुनिके आश्रमके समीप छोड़ आओ । इस विषयमें यदि तुम कुछ कहोगे तो मानो मेरी हत्या ही करोगे" ॥५४-५६॥
इत्युक्तो लक्ष्मणो भीत्या प्रातरुत्थाय जानकीम् ।<br>सुमन्त्रेण रथे कृत्वा जगाम सहसा वनम् ॥५७॥<br>वाल्मीकेराश्रमस्यान्ते त्यक्त्वा सीतामुवाच सः।<br>लोकापवादभीत्या त्वां त्यक्तवान् राघवो वने॥५८॥<br>दोषो न कश्चिन्मे मातर्गच्छाश्रमपदं मुनेः ।<br>इत्युक्त्वा लक्ष्मणः शीघ्रं गतवान् रामसन्निधिम् ॥ | भगवान्‌की ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी डर गये । उन्होंने सबेरे उठते ही सुमन्त्रसे रथ जुड़वाया और उसमें जानकीजीको चढ़ाकर तुरन्त वनको चल दिये ॥५७॥ वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर पहुँचते ही उन्होंने सीताको उतार दिया और उनसे कहा—"रघुनाथजीने लोकापवादसे डरकर तुम्हें त्याग दिया है ॥५८॥ हे मातः ! इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, अब तुम मुनीश्वरके आश्रमपर चली जाओ ।" सीताजीसे इस प्रकार कह लक्ष्मणजी तुरन्त श्रीरामचन्द्रजीके पास चले आये ॥ ५९ ॥
सीताऽपि दुःखसन्तप्ता विललापातिमुञ्चवत् । | उस समय सीताजी अत्यन्त दुःखार्ता होकर अति

सर्ग ५ ] : उत्तरकाण्ड ३५१


शिष्यैः श्रुत्वा च वाल्मीकिः सीतां ज्ञात्वा स दिव्यदृक्।<br>अर्घ्यादिभिः पूजयित्वा समाश्वास्य च जानकीम् ।<br>ज्ञात्वा भविष्यं सकलमार्पयन्मुनियोषितम् ॥६१॥मूर्खा स्त्रियोंके समान विलाप करने लगीं। महर्षि वाल्मीकिने जब शिष्योंके मुखसे यह बात सुनी (कि एक स्त्री रो रही है) तो उन्होंने दिव्यदृष्टिसे जान लिया कि वह सीताजी ही हैं ॥६०॥ मुनि भविष्यमें होनेवाली सब बातें जानते थे। अतः उन्होंने अर्ध्यादिसे सीताजीका पूजन किया और उन्हें समझा-बुझाकर मुनिपत्नियोंको सौंप दिया ॥६१॥ वे मुनि-पत्नियाँ मुनीश्वरके कहनेसे उन्हें साक्षात् परमात्माकी भार्या लक्ष्मीजी जानकर नित्यप्रति भक्ति-भावसे उनकी पूजा करतीं और सदा ही अत्यन्त आदरसे नम्रतापूर्वक उनकी सेवा करती थीं ॥६२॥ इधर, सीताजीको त्याग देनेपर, जिनके चरणकमलोंका मुनिजन सेवन करते हैं वे विज्ञानचक्षु, अद्वितीय, आदिदेव परमात्मा राम भी समस्त भोगोंको छोड़कर वैराग्यपूर्वक मुनियोंके समान रहने लगे ॥६३॥
तास्तां सम्पूजयन्ति स्म सीतां भक्त्या दिने दिने ।<br>ज्ञात्वा परात्मनो लक्ष्मीं मुनिवाक्येन योषितः ।<br>सेवा चक्रुः सदा तस्या विनयादिभिरादरात् ॥६२॥
रामोऽपि सीतारहितः परात्मा<br>विज्ञानदृक्केवल आदिदेवः ।<br>सन्त्यज्य भोगानखिलान्विरक्तो<br>मुनिव्रतोऽभून्मुनिसेविताङ्घ्रिः ॥६३॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चम सर्ग

रामगीता।

श्रीमहादेव उवाच<br>ततो जगन्मङ्गलमङ्गलात्मना<br>विधाय रामायणकीर्त्तिमुत्तमाम् ।<br>चचार पूर्वाचरितं रघूत्तमो<br>राजर्षिचर्यैरभिसेवितं यथा ॥ १ ॥श्रीमहादेवजी बोले- हे पार्वती! तदनन्तर, रघुश्रेष्ठ भगवान् राम, संसारके मङ्गलके लिये धारण किये अपने दिव्यमङ्गल देहसे रामायणरूप अति उत्तमकीर्तिकी स्थापना कर पूर्वकालमें जैसा आचरण राजर्षिश्रेष्ठोंने किया है वैसा ही स्वयं भी करने लगे ॥१॥
सौमित्रिणा पृष्ट उदारबुद्धिना<br>रामः कथाः प्राह पुरातनीः शुभाः ।<br>राज्ञः प्रमत्तस्य नृगस्य शापतो<br>द्विजस्य तिर्यक्त्वमथाह राघवः ॥ २ ॥उदारबुद्धि लक्ष्मणजीके पूछनेपर वे प्राचीन उत्तम कथाएँ सुनाया करते थे। इसी प्रसंगमें श्रीरघुनाथजीने, राजा नृगको प्रमादवश ब्राह्मणके शापसे तिर्यग्योनि प्राप्त होनेका वृत्तान्त भी सुनाया ॥ २ ॥
कदाचिदेकान्त उपस्थितं प्रभुं<br>रामं रमालालितपादपङ्कजम् ।<br>सौमित्रिरासादितशुद्धभावनः<br>प्रणम्य भक्त्या विनयान्वितोऽब्रवीत् ॥ ३ ॥किसी दिन, भगवान् राम, जिनके चरणकमलोंकी सेवा साक्षात् श्रीलक्ष्मीजी करती हैं, एकान्तमें बैठे हुए थे। उस समय शुद्ध विचारवाले लक्ष्मणजीने (उनके पास जा) उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम कर अति विनीतभावसे कहा- ॥ ३ ॥ "हे महामते! आप शुद्धज्ञानस्वरूप, समस्त-
३५२अध्यात्मरामायण[सर्ग ५

त्वं शुद्धबोधोऽसि हि सर्वदेहिना-
मात्माऽध्यक्षीशोऽसि निराकृतिः स्वयम्।
प्रतीयसे ज्ञानदृशां महामते
पादाब्जभृङ्गाहितसङ्गसङ्गिनाम् ॥ ४ ॥

अहं प्रपन्नोऽस्मि पदाम्बुजं प्रभो
भवापवर्गं तव योगिभावितम्।
यथाऽञ्जसाऽज्ञानमपारवारिधिं
सुखं तरिष्यामि तथानुशाधि माम् ॥५॥

श्रुत्वाऽथ सौमित्रिवचोऽखिलं तदा
प्राह प्रपन्नार्तिहरः प्रसन्नधीः।
विज्ञानमज्ञानतमःप्रशान्तये
श्रुतिप्रपन्नं क्षितिपालभूषणः ॥ ६ ॥

आदौ स्ववर्णाश्रमवर्णिताः क्रियाः
कृत्वा समासादितशुद्धमानसः।
समाप्य तत्पूर्वमुपात्तसाधनः
समाश्रयेत्सद्गुरुमात्मलब्धये ॥७॥

क्रिया शरीरोद्भवहेतुरादृता
प्रियाप्रियौ तौ भवतः सुरागिणः।
धर्मेतरौ तत्र पुनः शरीरकं
पुनः क्रिया चक्रवदीर्यते भवः ॥ ८ ॥

अज्ञानमेवास्य हि मूलकारणं
तद्धानमेवात्र विधौ विधीयते।
विद्यैव तन्नाशविधौ पटीयसी
न कर्म तज्जं सविरोधिमीरितम् ॥ ९ ॥

नाज्ञानहानिर्न च रागसंक्षयो
भवेत्ततः कर्म सदोषमुद्भवेत्।
ततः पुनः संसृतिरप्यवारिता
तस्माद्बुधो ज्ञानविचारवान्भवेत् ॥१०॥ | देहधारियोंके आत्मा, सबके स्वामी और स्वरूपसे निरा-कार हैं। जो आपके चरणकमलोंके लिये भ्रमररूप हैं उन परमभागवतोंके सहवासके रसिकोंको ही आप ज्ञानदृष्टिसे दिखलायी देते हैं॥ ४॥ हे प्रभो! योगिजन जिनका निरन्तर चिन्तन करते हैं, संसारसे छुड़ानेवाले उन आपके चरणकमलोंकी मैं शरण हूँ, आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिससे मैं सुगमतासे ही अज्ञानरूपी अपार समुद्रके पार हो जाऊँ” ॥ ५ ॥<br><br>श्रीलक्ष्मणजीके ये सब वचन सुनकर शरणागत-वत्सल भूपालशिरोमणि भगवान् राम, सुननेके लिये उत्सुक हुए लक्ष्मणको उनके अज्ञानान्धकारका नाश करनेके लिये प्रसन्नचित्तसे ज्ञानोपदेश करने लगे ॥६॥ (वे बोले—) सबसे पहले अपने-अपने वर्ण और आश्रमके लिये (शास्त्रोंमें) बतलायी हुई क्रियाओंका यथावत् पालन कर, चित्त शुद्ध हो जानेपर उन कर्मोंको छोड़ दे और शमदमादि साधनोंसे सम्पन्न हो आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये सद्गुरुकी शरणमें जाय ॥ ७ ॥ कर्म देहान्तरकी प्राप्तिके लिये ही स्वीकार किये गये हैं, क्योंकि उनमें प्रेम रखनेवाले पुरुषोंसे इष्ट-अनिष्ट दोनों ही प्रकारकी क्रियाएँ होती हैं। उनसे धर्म और अधर्म दोनोंहीकी प्राप्ति होती है और उनके कारण शरीर प्राप्त होता है जिससे फिर कर्म होते हैं। इसी प्रकार यह संसार चक्रके समान चलता रहता है ॥८॥ संसारका मूल कारण अज्ञान ही है और इन (शास्त्रीय) विधिवाक्योंमें उस (अज्ञान) का नाश ही (संसारसे मुक्त होनेका) उपाय बतलाया गया है। अज्ञानका नाश करनेमें ज्ञान ही समर्थ हैं, कर्म नहीं, क्योंकि उस (अज्ञान) से उत्पन्न होनेवाला कर्म उसका विरोधी नहीं हो सकता * ॥ ९ ॥ कर्मद्वारा अज्ञानका नाश अथवा रागका क्षय नहीं हो सकता बल्कि उससे दूसरे सदोष कर्मकी उत्पत्ति होती है। उससे पुनः संसारकी प्राप्ति होना अनिवार्य है। इसलिये बुद्धिमान्-को ज्ञान-विचारमें ही तत्पर होना चाहिये ॥१०॥


* 'सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विघातस्य' अर्थात् जो कार्य जिस सम्बन्धसे उत्पन्न होता है वह उस सम्बन्धके नाशका कारण नहीं हो सकता। इसी न्यायके अनुसार अज्ञानसे उत्पन्न कर्मके द्वारा अज्ञान नष्ट नहीं हो सकता।

सर्ग ५ ] उत्तरकाण्ड ३५३


मूल संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद

ननु क्रिया वेदमुखेन चोदिता
तथैव विद्या पुरुषार्थसाधनम् ।
कर्तव्यता प्राणभृतः प्रचोदिता
विद्यासहायत्वमुपैति सा पुनः ॥ ११ ॥

अकर्मकृतौ दोषमपि श्रुतिर्जगौ
तस्मात्सदा कार्यमिदं मुमुक्षुणा ।
ननु स्वतन्त्रा ध्रुवकार्यकारिणी
विद्या न किञ्चिन्मनसाऽप्यपेक्षते ॥ १२ ॥

न सत्यकार्योऽपि हि यद्वदध्वरः
प्रकाङ्क्षतेऽन्यानपि कारकादिकान् ।
तथैव विद्या विधिभिः प्रकाशितै-
र्विशिष्यते कर्मभिरेव मुक्तये ॥ १३ ॥

हिन्दी अनुवाद:
कुछ वितर्कवादी ऐसा कहते हैं कि—जिसप्रकार वेदके कथनानुसार ज्ञान पुरुषार्थका साधक है वैसे ही कर्म वेदविहित हैं; और प्राणियोंके लिये कर्मोंकी अवश्य-कर्त्तव्यताका विधान भी है, इसलिये वे कर्म-ज्ञानके सहकारी हो जाते हैं। साथ ही श्रुतिने कर्म न करनेमें दोष भी बतलाया है; इसलिये मुमुक्षु-को कर्म सदा ही करते रहना चाहिये, और यदि कोई कहे कि ज्ञान स्वतन्त्र है एवं निश्चय ही अपना फल देनेवाला है, उसे मनसे भी किसी औरकी सहायता-की आवश्यकता नहीं है, तो उसका यह कहना ठीक नहीं क्योंकि जिसप्रकार (वेदोक्त) यज्ञ सत्य कर्म होनेपर भी अन्य कारकादिकी अपेक्षा करता ही है, उसी प्रकार विधिसे प्रकाशित कर्मोंके द्वारा ही ज्ञान मुक्तिका साधक हो सकता है (अतः कर्मोंका त्याग उचित नहीं है) ॥ ११–१३ ॥


केचिद्वदन्तीति वितर्कवादिन-
स्तदप्यसद्दृष्टविरोधकारणात् ।
देहाभिमानादभिवर्धते क्रिया
विद्या गताऽहङ्कृतितः प्रसिद्धयति ॥ १४ ॥

हिन्दी अनुवाद:
(सिद्धान्ती--) ऐसा जो कोई कुतर्की कहते हैं उनके कथनमें प्रत्यक्ष विरोध होनेके कारण वह ठीक नहीं है, क्योंकि कर्म देहाभिमानसे होता है और ज्ञान अहंकारके नाश होनेपर सिद्ध होता है ॥ १४ ॥


विशुद्धविज्ञानविरोचनाञ्चिता
विद्याऽऽत्मवृत्तिश्चरमेति भण्यते ।
उदेति कर्माखिलकारकादिभि-
र्निहन्ति विद्याऽखिलकारकादिकम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अनुवाद:
(वेदान्त-वाक्योंका विचार करते-करते) विशुद्ध विज्ञानके प्रकाशसे उद्भासित जो चरम आत्मवृत्ति होती है उसीका नाम विद्या (आत्मज्ञान) है। इसके अतिरिक्त कर्म सम्पूर्ण कारकादिकी सहायतासे होता है किन्तु विद्या समस्त कारकादिका (अनित्यत्वकी भावनाद्वारा) नाश कर देती है ॥ १५ ॥


तस्मात्त्यजेत्कार्यमशेषतः सुधी-
र्विद्याविरोधान्न समुच्चयो भवेत् ।
आत्मानुसन्धानपरायणः सदा
निवृत्तसर्वेन्द्रियवृत्तिगोचरः ॥ १६ ॥

हिन्दी अनुवाद:
इसलिये समस्त इन्द्रियोंके विषयोंसे निवृत्त होकर निरन्तर आत्मानुसन्धानमें लगा हुआ बुद्धिमान् पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंका सर्वथा त्याग कर दे। क्योंकि विद्याका विरोधी होनेके कारण कर्मका उसके साथ समुच्चय नहीं हो सकता ॥ १६ ॥


यावच्छरीरादिषु माययाऽऽत्मधी-
स्तावद्विधेयो विधिवাদকर्मणाम् ।
नेतीति वाक्यैरखिलं निषिध्य त-
ज्ज्ञात्वा परात्मानमथ त्यजेत्क्रियाः ॥ १७ ॥

हिन्दी अनुवाद:
जबतक मायासे मोहित रहनेके कारण मनुष्यका शरीरादिमें आत्मभाव है तभीतक उसे वैदिक कर्मानुष्ठान कर्त्तव्य है। 'नेति-नेति' आदि वाक्योंसे सम्पूर्ण अनात्म-वस्तुओंका निषेध करके अपने परमात्मस्वरूपको जान लेनेपर फिर उसे समस्त कर्मोंको छोड़ देना चाहिये॥ १७ ॥


यदा परात्मात्मविभेदभेदकं
विज्ञानमात्मन्यवभाति भास्वरम् ।

हिन्दी अनुवाद:
जिस समय परमात्मा और जीवात्माके भेदको दूर करने-वाला प्रकाशमय विज्ञान अन्तःकरणमें स्पष्टतया भासित...