अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
उत्तरकाण्ड - सर्ग ३: वाली और सुग्रीवका पूर्वचरित्र तथा रावण-सनत्कुमार-संवाद
| ३४४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
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पूर्वार्जितैः पुण्यपापैर्म्रियन्ते चोद्भवन्ति च ।<br>विष्णुना ये हतास्ते तु प्राप्नुवन्ति हरेर्गतिम् ॥४०॥ | अपने पाप-पुण्योंके अनुसार जन्मते-मरते रहते हैं; किन्तु जो भगवान् विष्णुके हाथसे मारे जाते हैं वे तो विष्णु-पद ही प्राप्त कर लेते हैं” ॥४०॥
श्रुत्वा मुनिमुखात्सर्वं रावणो हृष्टमानसः ।<br>योत्स्येऽहं हरिणा सार्धमिति चिन्तापरोऽभवत् ४१ | श्रीसनत्कुमारजीके मुखसे ये सब बातें सुनकर रावण मन-ही-मन अति प्रसन्न हुआ और वह सोचने लगा कि मैं श्रीहरिके साथ अवश्य युद्ध करूँगा ॥४१॥
मनःस्थितं परिज्ञाय रावणस्य महामुनिः ।<br>उवाच वत्स तेऽभीष्टं भविष्यति न संशयः ॥४२॥<br>कञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व सुखी भव दशानन । | मुनिवरने रावणके चित्तकी बात जानकर कहा—“वत्स ! इसमें सन्देह नहीं तेरी इच्छा अवश्य सफल होगी ॥ ४२ ॥ हे दशानन ! अभी चैनसे रह, कुछ काल और प्रतीक्षा कर ।”
एवमुक्त्वा महाबाहो मुनिः पुनरुवाच तम् ॥४३॥ | हे महाबाहो रघुनाथजी ! रावणसे ऐसा कह मुनि उससे फिर बोले—॥४३॥
तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि ह्यरूपस्यापि मायिनः ।<br>स्थावरेषु च सर्वेषु नदेषु च नदीषु च ॥४४॥ | “रावण ! वे रूप-रहित हैं, तथापि मैं तुझे उन मायावीके (मायासे धारण किये हुए ) रूप बतलाता हूँ। वे नद और नदी आदि समस्त स्थावरोंमें व्याप्त हैं ॥ ४४ ॥
ओङ्कारश्चैव सत्यं च सावित्री पृथिवी च सः ।<br>समस्तजगदाधारः शेषरूपधरो हि सः ॥४५॥ | ओंकार, सत्य, सावित्री, पृथिवी तथा सम्पूर्ण जगत्के आधार शेषनाग भी वे ही हैं ॥ ४५ ॥
सर्वे देवाः समुद्राश्च कालः सूर्यश्च चन्द्रमाः ।<br>सूर्योदयो दिवारात्री यमश्चैव तथाऽनिलः ॥४६॥<br>अग्निरिन्द्रस्तथा मृत्युः पर्जन्यो वसवस्तथा ।<br>ब्रह्मा रुद्रादयश्चैव ये चान्ये देवदानवाः ॥४७॥ | सम्पूर्ण देवगण, समुद्र, काल, सूर्य, चन्द्रमा, सूर्योदय, दिन, रात्रि, यम, वायु, अग्नि, इन्द्र, मृत्यु, मेघ, वसुगण, ब्रह्मा और रुद्र आदि तथा और भी जितने देव या दानव हैं वे सब भी उन्हींके रूप हैं ॥ ४६-४७ ॥
विद्योतते ज्वलत्येष पाति चात्तीति विश्वकृत् ।<br>क्रीडां करोत्यन्यथात्मा सोऽयं विष्णुः सनातनः ४८ | सम्पूर्ण विश्वको रचनेवाले वे सनातन विष्णुभगवान् निर्विकार होकर भी ( अपनी मायाके आश्रयसे ) नाना प्रकार-की लीलाएँ करते हैं। वे (विद्युत् होकर) चमकते हैं, (अग्नि होकर) प्रज्वलित होते हैं, (विष्णु-रूपसे) रक्षा करते हैं और (रुद्ररूपसे) सबको भक्षण कर जाते हैं ॥४८॥
तेन सर्वमिदं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।<br>नीलोत्पलदलश्यामो विद्युद्वर्णाम्बरावृतः ॥४९॥ | यह स्थावर-जंगम सम्पूर्ण त्रिलोकी एकमात्र उन्हींसे व्याप्त है। वे नीलकमलदलके समान श्यामवर्ण और बिजलीकी-सी आभावाला पीताम्बर धारण किये हुए हैं ॥४९॥
शुद्धजाम्बूनदप्रख्यां श्रियं चामाङ्कसंस्थिताम् ।<br>सदानपायिनीं देवीं पश्यन्नालिङ्ग्य तिष्ठति ॥५०॥ | तथा अपने वाम भागमें बैठी हुई शुद्ध सुवर्णकी-सी कान्तिवाली कभी नष्ट न होनेवाली भगवती लक्ष्मीजीकी ओर निहारते हुए उन्हें आलिङ्गन किये विराजमान हैं ॥५०॥
द्रष्टुं न शक्यते कैश्चिद्देवदानवपन्नगैः । | वे किसी भी देव, दानव या नागसे देखे नहीं जा
सर्ग ३ ]
उत्तरकाण्ड
३४५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यस्य प्रसादं कुरुते स चैनं द्रष्टुमर्हति ॥५१॥<br><br>न च यज्ञतपोभिर्वा न दानाध्ययनादिभिः ।<br>शक्यते भगवान्द्रष्टुमुपायैरितरैरपि ॥५२॥<br><br>भक्तैस्तद्गतप्राणैस्तच्चित्तैर्धूतकल्मषैः ।<br>शक्यते भगवान्विष्णुर्वेदान्तामलदृष्टिभिः ॥५३॥<br><br>अथवा द्रष्टुमिच्छा ते शृणु त्वं परमेश्वरम् ।<br>त्रेतायुगे स देवेशो भविता नृपविग्रहः ॥५४॥<br><br>हितार्थं देवमर्त्यानामिक्ष्वाकूणां कुले हरिः ।<br>रामो दाशरथिर्भूत्वा महासत्त्वपराक्रमः ॥५५॥<br><br>पितुर्नियोगात्स भ्रात्रा भार्यया दण्डके वने ।<br>विचरिष्यति धर्मात्मा जगन्मात्रा स्वमायया ॥५६॥<br><br>एवं ते सर्वमाख्यातं मया रावण विस्तरात् ।<br>भजस्व भक्तिभावेन सदा रामं श्रिया युतम् ॥५७॥ | सकते; जिसपर उनकी प्रसन्नता होती है वही उनका दर्शन कर सकता है ॥५१॥ यज्ञ, तप, दान, अध्ययन अथवा और किसी भी उपायसे भगवान् नहीं देखे जा सकते ॥५२॥ जो उनके भक्त हैं, जिनके प्राण और मन उन्हींमें लगे रहते हैं तथा वेदान्त-विचारसे जिनकी दृष्टि मलहीन हो गयी है उन निष्पाप महात्माओंको ही भगवान् विष्णुके दर्शन हो सकते हैं ॥५३॥ अब यदि तुझे भी (बिना किसी उपायके ही) उन परमेश्वरके दर्शनोंकी इच्छा है तो सुन—वे देवाधिदेव श्रीहरि, त्रेतायुगमें देव और मनुष्योंके कल्याणके लिये, राजवेषसे, इक्ष्वाकुके वंशमें दशरथजीके पुत्र महावीर और पराक्रमी भगवान् राम होकर अवतीर्ण होंगे ॥५४-५५॥ वे परम धार्मिक रघुनाथजी पिताकी आज्ञासे अपने भाई (लक्ष्मण) और अपनी स्त्री जगज्जननी मायाके सहित दण्डक वनमें विचरेंगे ॥५६॥ हे रावण ! इस प्रकार यह सारा तत्त्व मैंने तुझे विस्तारसे सुना दिया । अब तू लक्ष्मीजी सहित भगवान् रामका सदा भक्तिपूर्वक भजन कर" ॥५७॥ |
अगस्त्य उवाच
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं श्रुत्वाऽसुराध्यक्षो ध्यात्वा किञ्चिद्विचार्य च ।<br>त्वया सह विरोधेप्सुर्मुमुदे रावणो महान् ॥५८॥<br><br>युद्धार्थी सर्वतो लोकान् पर्यटन् समवस्थितः ।<br>एतदर्थं महाराज रावणोऽतीव बुद्धिमान् ।<br>हृतवान् जानकीं देवीं त्वत्ताऽऽत्मवधकाङ्क्षया ॥५९॥<br><br>इमां कथां यः शृणुयात्पठेद्वा<br>संश्रावयेद्वा श्रवणार्थिनां सदा ।<br>आयुष्यमारोग्यमनन्तसौख्यं<br>प्राप्नोति लाभं धनमक्षयं च ॥६०॥ | अगस्त्यजी बोले—हे राम ! यह सुनकर राक्षसराज रावणने कुछ देर सोच-विचार करनेके अनन्तर आपके साथ विरोध करना निश्चित किया और ऐसा निश्चय कर वह मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ ॥५८॥ वह युद्धकी इच्छासे सम्पूर्ण लोकोंमें घूमने लगा । हे महाराज ! आपके हाथसे मारे जानेकी इच्छासे ही महाबुद्धिमान् रावणने देवी जानकीजीको चुरा लिया था ॥५९॥ जो पुरुष इस कथाको सुने या पढ़ेगा अथवा सुननेकी इच्छावालोंको सदा सुनावेगा वह दीर्घ-आयु, आरोग्य, अनन्त सुख, इच्छित लाभ और अक्षय धन प्राप्त करेगा ॥६०॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥३॥
| ३४६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
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चतुर्थ सर्ग
राम-राज्यका वर्णन तथा सीता-वनवास।
श्रीमहादेव उवाच
एकदा ब्रह्मणो लोकादायान्तं नारदं मुनिम्।
पर्यटन् रावणो लोकान्दृष्ट्वा नत्वाऽब्रवीद्वचः॥ १ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! लोकान्तरोंमें घूमते हुए रावणने एक दिन श्रीनारदजीको ब्रह्मलोकसे आते हुए देखकर उनसे नमस्कार करके पूछा—॥ १ ॥
भगवन्ब्रूहि मे योद्धुं कुत्र सन्ति महाबलाः।
योद्धुमिच्छामि बलिभिस्त्वं ज्ञाताऽसि जगत्त्रयम्॥ २ ॥
"भगवन् ! मैं बलवानोंके साथ युद्ध करना चाहता हूँ, आप तीनों लोकोंसे परिचित हैं। कृपया बतलाइये, मुझसे लड़नेयोग्य महाबली पुरुष कहाँ हैं ?"॥ २ ॥
मुनिर्ध्यात्वाऽऽह सुचिरं श्वेतद्वीपनिवासिनः।
महाबला महाकायास्तत्र याहि महामते॥ ३ ॥
तब मुनीश्वरने बहुत देरतक सोचकर कहा— "हे महामते ! श्वेतद्वीपके रहनेवाले बड़े बलवान् और विशाल शरीरवाले हैं; तुम वहीं जाओ ॥ ३ ॥
विष्णुपूजारता ये वै विष्णुना निहताश्च ये।
त एव तत्र सञ्जाता अजेयाश्च सुरासुरैः ॥ ४ ॥
जो लोग भगवान् विष्णुकी पूजामें तत्पर रहते हैं अथवा जो स्वयं विष्णुभगवान्के ही हाथसे मारे गये हैं वे ही वहाँ उत्पन्न हुए हैं। वे देवता या दानव आदि किसीसे भी नहीं जीते जा सकते" ॥ ४ ॥
श्रुत्वा तद्रावणो वेगान्मन्त्रिभिः पुष्पकेण तान्।
योद्धुकामः समागत्य श्वेतद्वीपसमीपतः॥ ५ ॥
यह सुनकर रावण तुरन्त ही अपने मन्त्रियोंके सहित पुष्पक विमानपर चढ़कर श्वेतद्वीपके निकट आया ॥ ५ ॥
तत्रप्राहततेजस्कं पुष्पकं नाचलत्ततः।
त्यक्त्वा विमानं प्रययौ मन्त्रिणश्च दशाननः॥ ६ ॥
उस द्वीपकी प्रभासे तेजोहीन हो जानेके कारण पुष्पक और आगे नहीं बढ़ सका। अतः विमान और मन्त्रियोंको छोड़कर रावण स्वयं ही चला ॥ ६ ॥
प्रविशन्नेव तद्द्वीपं धृतो हस्तेन योषिता।
पृष्टश्च त्वं कुतः कोऽसि प्रेषितः केन वा वद ॥ ७ ॥
उस द्वीपमें घुसते ही एक स्त्रीने उसका हाथ पकड़कर पूछा— "बता, तू कौन है ? कहाँसे आया है ? और यहाँ तुझे किसने भेजा है ?" ॥ ७ ॥
इत्युक्तो लीलया स्त्रीभिर्हसन्तीभिः पुनः पुनः।
कृच्छ्राद्धस्ताद्विनिर्मुक्तस्तासां स्त्रीणां दशाननः॥ ८॥
इसी प्रकार वहाँ बहुत-सी स्त्रियोंने लीलापूर्वक हँसते-हँसते उससे वही बात कही और रावणको उन स्त्रियोंके हाथसे बड़ी कठिनतासे छुटकारा मिला ॥ ८ ॥
आश्चर्यमतुलं लब्ध्वा चिन्तयामास दुर्मतिः।
विष्णुना निहतो यामि वैकुण्ठमिति निश्चितः ॥९॥
यह देखकर उसे असीम आश्चर्य हुआ और वह दुर्बुद्धि सोचने लगा, 'मैं विष्णुभगवान्के हाथसे मरकर निःसन्देह वैकुण्ठको जाऊँगा ॥ ९ ॥
मयि विष्णुर्यथा कुप्येत्तथा कार्यं करोम्यहम्।
इति निश्चित्य वैदेहीं जहार विपिनेऽसुरः॥१०॥
अतः मुझे ऐसा कार्य करना चाहिये जिससे भगवान् विष्णु मुझपर कुपित हों' ऐसा सोचकर ही उस असुरने वनमें श्रीजानकीजीको हर लिया था ॥ १० ॥
जानन्नेव परात्मानं स जहारावनीसुताम्।
मातृवत्पालयामास त्वत्तः काङ्क्षन्वधं स्वकम्॥११॥
हे राम ! आपके हाथसे अपना वध करानेकी इच्छासे ही रावणने आपको परमात्मा जानते हुए भी श्रीसीताजीको चुरा लिया और उनका माताके समान पालन किया ॥ ११॥
राम त्वं परमेश्वरोऽसि सकलं
जानासि विज्ञानदृक्
हे राम ! आप परमेश्वर हैं, आप त्रिकालदर्शी
सर्ग ४] उत्तरकाण्ड ३९७
| भूतं भव्यमिदं त्रिकालकलना- | एवं विकल्पसे रहित होकर अपनी ज्ञान-दृष्टिसे भूत, |
| साक्षी विकल्पोज्झितः। | भविष्य और वर्तमान ये सब कुछ जानते हैं, हे |
| भक्तानामनुवर्तनाय सकलां | स्वामिन् ! आप अपने भक्तोंको मार्ग दिखानेके लिये |
| कुर्वन् क्रियासंहतिं | ही सारी लीलाएँ रचते हैं तथा आप सम्पूर्ण |
| त्वं शृण्वन्मनुजाकृतिर्मुनिवचो | लोकोंसे पूजित होकर भी मनुष्यरूपसे हम-जैसे |
| भासीश लोकाञ्चितः ॥१२॥ | मुनियोंके वचन सुनते हुए दिखलायी दे रहे हैं॥१२॥ |
| स्तुत्वैवं राघवं तेन पूजितः कुम्भसम्भवः। | इसप्रकार श्रीरघुनाथजीकी स्तुतिकर और उनसे |
| स्वाश्रमं मुनिभिः सार्धं प्रययौ हृष्टमानसः ॥१३॥ | सत्कार पा श्रीअगस्त्यजी अन्य मुनीश्वरोंके साथ प्रसन्न-चित्तसे अपने आश्रमको चले गये ॥ १३ ॥ |
| रामस्तु सीतया सार्धं भ्रातृभिः सह मन्त्रिभिः। | लक्ष्मीपति भगवान् राम सीताजी, भाइयों तथा |
| संसारीव रमानाथो रममाणोऽवसद्गृहे ॥१४॥ | मन्त्रियोंके सहित संसारी पुरुषोंके समान रमण (आचरण) करते हुए घरमें रहने लगे ॥ १४ ॥ |
| अनासक्तोऽपि विषयान्वभुजे प्रियया सह। | उन्होंने असंग होते हुए भी अपनी प्रियाके साथ नाना प्रकारके भोगोंको भोगा। वे सदा ही हनुमान् |
| हनुमत्प्रमुखैः सद्भिर्वानरैः परिवेष्टितः ॥१५॥ | आदि श्रेष्ठ वानरोंसे घिरे रहते थे ॥ १५ ॥ एक बार |
| पुष्पकं चागमद्राममेकदा पूर्ववत्प्रभुम्। | पहलेहीके समान भगवान् रामके पास पुष्पक विमान आया और बोला—"भगवन् ! मुझे कुबेरजीने अपने |
| प्राह देवं कुबेरेण प्रेषितं त्वामहं ततः ॥१६॥ | यहाँसे फिर आपकीही सेवामें भेजा है ॥ १६ ॥ (वे कहते हैं कि ) पहले तुझे रावणने जीता था |
| जितं त्वं रावणेनादौ पश्चाद्रामेण निर्जितम्। | और फिर उससे श्रीरामचन्द्रजीने जीता है। अतः |
| अतस्त्वं राघवं नित्यं वह यावद्वसेद्भुवि ॥१७॥ | जबतक वे पृथिवीतलपर रहें तबतक तू उन्हींको धारण कर ॥ १७॥ जिस समय रघुनाथजी वैकुण्ठको |
| यदा गच्छेद्रुघुश्रेष्ठो वैकुण्ठं याहि मां तदा। | चले जायँ उस समय तू मेरे पास आ जाना।" यह |
| तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह पुष्पकं सूर्यसन्निभम् ॥१८॥ | सुनकर श्रीरघुनाथजीने सूर्यके समान देदीप्यमान पुष्पकसे कहा—॥ १८ ॥ "तेरा कल्याण हो, जिस |
| यदा स्मरामि भद्रं ते तदाऽऽगच्छ ममान्तिकम्। | समय मैं तेरा स्मरण करूँ उसी समय तू मेरे पास आ जाना, अब तू जा और मेरी आज्ञासे गुप्तरूपसे |
| तिष्ठान्तर्धाय सर्वत्र गच्छेदानीं ममाज्ञया ॥१९॥ | सर्वत्र रह" ॥ १९ ॥ पुष्पकको इसप्रकार आज्ञा दे श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयों और मन्त्रियोंके साथ |
| इत्युक्त्वा रामचन्द्रोऽपि पौरकार्याणि सर्वशः। | मिलकर पुरवासियोंके सम्पूर्ण कार्य यथायोग्य रीतिसे |
| भ्रातृभिर्मन्त्रिभिः सार्धं यथान्यायं चकार सः ॥२०॥ | करने लगे ॥ २० ॥ |
| राघवे शासति भुवं लोकनाथे रमापतौ। | त्रिलोकीनाथ लक्ष्मीपति भगवान् रामके शासन- |
| वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तश्च भूरुहाः ॥२१॥ | कालमें पृथिवी धनधान्यसे पूर्ण और वृक्ष फलादिसे सम्पन्न थे ॥ २१ ॥ श्रीरघुनाथजीके राज्यमें समस्त |
| जना धर्मपराः सर्वे पतिभक्तिपराः स्त्रियः। | पुरुष धर्मपरायण थे, स्त्रियाँ पति-सेवामें तत्पर रहती |
| नापश्यत्पुत्रमरणं कश्चिद्राजनि राघवे ॥२२॥ | थीं और किसीको भी अपने पुत्रका मरण नहीं देखना |
| ३४८. | अध्यात्मरामायण | [सर्गः ४ |
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| समारुह्य विमानाग्र्यं राघवः सीतया सह ।<br>वानरैर्भ्रातृभिः सार्धं सञ्चचारावनिं प्रभुः ॥२३॥<br>अमानुषाणि कार्याणि चकार बहुशो भुवि ।<br>ब्राह्मणस्य सुतं दृष्ट्वा बालं मृतमकालतः ॥२४॥<br>शोचन्तं ब्राह्मणं चापि ज्ञात्वा रामो महामतिः।<br>तपस्यन्तं वने शूद्रं हत्वा ब्राह्मणबालकम् ॥२५॥<br>जीवयामास शूद्रस्य ददौ स्वर्गमनुत्तमम् ।<br>लोकानाम्युपदेशार्थं परमात्मा रघूत्तमः ॥२६॥<br>कोटिशः स्थापयामास शिवलिङ्गानि सर्वशः ।<br>सीतां च रमयामास सर्वभोगैरमानुषैः ॥२७॥<br>शशास रामो धर्मेण राज्यं परमधर्मवित् ।<br>कथां संस्थापयामास सर्वलोकमलापहाम् ॥२८॥<br>दशवर्षसहस्राणि मायामानुषविग्रहः ।<br>चकार राज्यं विधिवल्लोकवन्द्यपदाम्बुजः ॥२९॥ | पड़ता था ॥ २२ ॥ भगवान् राम सीताजी, भाइयों और वानरोंके साथ विमानपर चढ़कर पृथिवीपर घूमा करते थे ॥२३॥ उन्होंने संसारमें बहुत-सी अमानवीय लीलाएँ कीं । एक बार एक ब्राह्मण-पुत्रको बाल्यावस्थामें ही असमय मरा देख और उस ब्राह्मणको बहुत शोक करते जान रघुश्रेष्ठ परमात्मा महामति रामने वनमें तपस्या करते हुए एक शूद्रको (उसका कारण मानकर) मारा और उस बालकको जीवित किया तथा शूद्रको अत्युत्तम स्वर्गलोक दिया ॥२४-२६ ॥ उन्होंने लोगोंको उपदेश देनेके लिये जगह-जगह करोड़ों शिव-लिंग स्थापित किये और सीताजीका सब प्रकारके अलौकिक भोगोंसे अनुरञ्जन किया ॥ २७ ॥ इस प्रकार परमधार्मिक भगवान् राम धर्मपूर्वक राज्य-शासन करते रहे और उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंके पाप दूर करनेवाली अपनी पवित्र कीर्ति-कथा संसारमें स्थापित की ॥ २८ ॥ तीनों लोक जिनके चरणकमलोंकी वन्दना करते हैं उन माया-मानव-शरीरधारी श्रीरामचन्द्रजीने विधिपूर्वक दश हजार वर्ष राज्य किया ॥ २९ ॥ |
| एकपत्नीव्रतो रामो राजर्षिः सर्वदा शुचिः ।<br>गृहमेधीयमखिलमाचरन् शिक्षयन् जनान् ॥३०॥<br>सीता प्रेम्णाऽनुवृत्त्या च प्रश्रयेण दमेन च ।<br>भर्तुर्मनोहरा साध्वी भावज्ञा सा हिया भिया ॥३१॥<br>एकदा क्रीडाविपिने सर्वभोगसमन्विते ।<br>एकान्ते दिव्यभवने सुखासीनं रघूत्तमम् ॥३२॥<br>नीलमाणिक्यसंकाशं दिव्याभरणभूषितम् ।<br>प्रसन्नवदनं शान्तं विद्युत्पुञ्जनिभाम्बरम् ॥३३॥<br>सीता कमलपत्राक्षी सर्वाभरणभूषिता ।<br>राममाह कराभ्यां सा लालयन्ती पदाम्बुजे ॥३४॥ | राजर्षि भगवान् राम एकपत्नीव्रतका पालन करने-वाले थे। वे पवित्र-चरित्र रामजी लोगोंको शिक्षा देते हुए गृहस्थाश्रमके समस्त धर्मोंका पालन करते रहे ॥३०॥ साध्वी सीताजी भी उनके हृदयका रुख परखने-वाली थीं। उन्होंने अपने प्रेम, आज्ञापालन, नम्रता, इन्द्रियसंयम, लज्जा और भीरुता आदि गुणोंसे पतिका मन हर लिया था ॥ ३१ ॥ एक दिन श्रीरघुनाथजी अपने क्रीडावनके सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न भवनमें एकान्तमें सुखपूर्वक बैठे थे। उनके शरीरकी आभा नीलमाणिके समान थी, वे दिव्य भूषणोंसे भूषित थे, उनका मुख प्रसन्न और भाव गम्भीर था तथा वे विद्युत्पुञ्जके समान देदीप्यमान पीताम्बर धारण किये थे। उस समय सर्वालङ्कारसुसज्जिता कमलदललोचना श्रीसीताजीने अपने करकमलोंसे रघुनाथजीकी चरणसेवा करते हुए उनसे कहा-॥ ३२-३४ ॥ “हे देवाधिदेव ! हे |