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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

अरण्यकाण्ड - सर्ग १: विराध-वध

ॐ

अध्यात्मरामायण


अरण्यकाण्ड


प्रथम सर्ग

विराध-वध।


श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! उस दिन
अथ तत्र दिनं स्थित्वा प्रभाते रघुनन्दनः ।<br>स्नात्वा मुनिं समामन्त्र्य प्रयाणायोपचक्रमे ॥ १ ॥अत्रि मुनिके आश्रममें ही रहकर दूसरे दिन प्रातःकाल स्नान करनेके अनन्तर श्रीरघुनाथजीने मुनिवरकी सम्मतिसे चलनेकी तैयारी की ॥ १ ॥ वे बोले—"हे
मुने गच्छामहे सर्वे मुनिमण्डलमण्डितम् ।<br>विपिनं दण्डकं यत्र त्वमाज्ञातुमिहार्हसि ॥ २ ॥मुने ! हम सब मुनिमण्डलीसे सुशोभित दण्डकारण्यको जाना चाहते हैं, अतः आप हमें आज्ञा प्रदान कीजिये ॥२॥ और हमें मार्ग दिखानेके लिये कुछ शिष्योंको आज्ञा
मार्गप्रदर्शनार्थाय शिष्यानाज्ञाप्तुमर्हसि ।<br>श्रुत्वा रामस्य वचनं प्रहस्यात्रिर्महायशाः ।<br>प्राह तत्र रघुश्रेष्ठं राम राम सुराश्रय ॥ ३ ॥दीजिये ।" रामजीका यह कथन सुनकर महायशस्वी अत्रि मुनि श्रीरघुनाथजीसे हँसकर बोले—"हे राम ! हे देवताओंके आश्रयरूप ! सबके मार्गदर्शक तो
सर्वस्य मार्गद्रष्टा त्वं तव को मार्गदर्शकः ।<br>तथापि दर्शयिष्यन्ति तव लोकानुसारिणः ॥ ४ ॥आप हैं, फिर आपका मार्गदर्शक कौन बनेगा ? तथापि इस समय आप लोक-व्यवहारका अनुसरण कर रहे हैं अतः मेरे शिष्यगण आपको मार्ग दिखानेके लिये जायँगे" ॥ ३-४ ॥ तदनन्तर शिष्योंको आज्ञा दे
इति शिष्यान्समादिश्य स्वयं किञ्चित्तमन्वगात् ।<br>रामेण वारितः प्रीत्या अत्रिः स्वभवनं ययौ ॥ ५ ॥मुनिवर अत्रि स्वयं भी कुछ दूरं रामचन्द्रजीके साथ गये और फिर उनके प्रीतिपूर्वक मना करनेपर अपने आश्रमको लौट आये ॥ ५ ॥
क्रोशमात्रं ततो गत्वा ददर्श महतीं नदीम् ।<br>अत्रेः शिष्यानुवाचेदं रामो राजीवलोचनः ॥ ६ ॥एक कोश जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने एक बहुत बड़ी नदी देखी । तब कमलनयन रघुनाथजीने अत्रिके शिष्योंसे इस प्रकार पूछा—॥ ६ ॥ "हे ब्रह्मचारियो !
नद्याः सन्तरणे कश्चिदुपायो विद्यते न वा ।<br>ऊचुस्ते विद्यते नौका सुदृढा रघुनन्दन ॥ ७ ॥नदीको पार करनेका कोई उपाय है या नहीं ?" तब शिष्योंने कहा—"हे रघुनन्दन ! यहाँ एक सुदृढ़ नौका है ॥ ७ ॥ हम उसमें चढ़ाकर आपको एक
१०४अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

तारयिष्यामहे युष्मान्वयमेव क्षणादिह ।
ततो नावि समारोप्य सीतां राघवलक्ष्मणौ ॥ ८॥
क्षणात्सन्तारयामासुर्नदीं मुनिकुमारकाः ।
रामाभिनन्दिताः सर्वे जग्मुरत्रेर्यथाश्रमम् ॥ ९॥

तावेत्य विपिनं घोरं झिल्लीझङ्कारनादितम् ।
नानामृगगणाकीर्णं सिंहव्याघ्रादिभीषणम् ॥ १०॥
राक्षसैर्घोररूपैश्च सेवितं रोमहर्षणम् ।
प्रविश्य विपिनं घोरं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ ११॥

इतः परं प्रयत्नेन गन्तव्यं सहितेन मे ।
धनुर्गुणेन संयोज्य शरानपि करे दधत् ॥ १२॥
अग्रे यास्याम्यहं पश्चात्त्वमन्वेहि धनुर्धरः ।
आवयोर्मध्यगा सीता मायेवात्मपरात्मनोः ॥ १३॥
चक्षुश्चारय सर्वत्र दृष्टं रक्षोभयं महत् ।
विद्यते दण्डकारण्ये श्रुतपूर्वमरिन्दम ॥ १४॥

इत्येवं भाषमाणौ तौ जग्मतुः सार्धयोजनम् ।
तत्रैका पुष्करिण्यास्ते कल्हारकुसुमोत्पलैः ॥ १५॥
अम्बुजैः शीतलोदेन शोभमाना व्यदृश्यत ।
तत्समीपमथो गत्वा पीत्वा तत्सलिलं शुभम् ॥ १६॥
ऊषुस्ते सलिलाभ्याशे क्षणं छायामुपाश्रिताः ।
ततो ददृशुरायान्तं महासत्त्वं भयानकम् ॥ १७॥
करालदंष्ट्रवदनं भीषणन्तं स्वगर्जितैः ।
वामांशे न्यस्तशूलाग्रग्रथितानेकमानुषम् ॥ १८॥
भक्षयन्तं गजव्याघ्रमहिषं वनगोचरम् ।
ज्याऽऽरोपितं धनुर्धृत्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत् १९
पश्य भ्रातर्महाकायो राक्षसोऽयमुपागतः ।
आयात्यभिमुखं नोऽग्रे भीरूणां भयमावहन् ॥ २०॥
सज्जीकृतधनुस्तिष्ठ मा भैर्र्जनकनन्दिनि ।


क्षणमें ही नदीके उस पार पहुँचा देंगे ।” तब मुनि-कुमारोंने सीताके सहित राम और लक्ष्मणको नौकामें चढ़ाकर एक क्षणमात्रमें नदीके उस पार पहुँचा दिया । और फिर रामचन्द्रजी द्वारा प्रशंसित हो अत्रि मुनिके आश्रमको लौट आये ॥ ८-९ ॥

तब वे झिल्लियोंकी झनकारसे गुञ्जायमान, विविध वन्य पशुओंसे पूर्ण और सिंह-व्याघ्र आदि हिंस्र पशुओंसे भयानक एक घोर वनमें पहुँचे ॥ १० ॥ भयंकर रूपधारी राक्षसोंसे सेवित उस रोमाञ्चकारी घोर वनमें घुसकर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा— ॥ ११ ॥ “यहाँसे तुम्हें बहुत सावधान होकर हमारे साथ चलना होगा । मैं धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर और हाथमें बाण लेकर आगे-आगे चलता हूँ और तुम धनुष धारण कर पीछे चलो, तथा जीव और परमात्माके बीचमें रहनेवाली मायाके समान सीता हमारे बीचमें चलें ॥ १२-१३ ॥ हे अरिन्दम ! सब ओर सावधानीसे निगाह रक्खो । हमने पहले जैसा सुना था उसीके अनुसार इस दण्डकारण्यमें राक्षसोंका अत्यन्त भय दिखायी देता है” ॥ १४ ॥

इस प्रकार आपसमें बातचीत करते वे डेढ़ योजन (छः कोश) निकल गये । वहाँ कुमुद, कल्हार और कमलादिसे सुशोभित एक पुष्करिणी (तलाई) थी ॥ १५॥ वह कमलवन और शीतल जलसे अति सुन्दर दीख पड़ती थी । उन्होंने उसके निकट जाकर उसका शीतल जल पान किया ॥ १६ ॥ और कुछ देरकेलिये जलके किनारे वृक्षकी छायामें बैठ गये । उसी समय उन्होंने एक महा बलवान् और भयानक राक्षस आता देखा ॥ १७ ॥ उसका मुख तीक्ष्ण दाढ़ोंसे पूर्ण था, वह अपनी गर्जनासे अत्यन्त भय उत्पन्न करता था और उसके बाँयें कन्धेपर एक त्रिशूल रखा था जिसमें बहुत-से मनुष्य बिंधे हुए थे ॥ १८ ॥ वह बहुत-से जंगली हाथी, सिंह और भैंसोंको खाता हुआ आ रहा था । उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने प्रत्यञ्चा चढ़ाये हुए अपने धनुषको उठाकर लक्ष्मणजीसे कहा—॥ १९ ॥ “भाई ! देखो, हमारे सामने यह भीरु पुरुषोंको डरानेवाला उग्ररूप महाकाय राक्षस आ रहा है ॥ २० ॥ तुम धनुषपर बाण चढ़ाकर सावधान हो जाओ; जानकि ! तुम डरना मत !” ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी धनुषपर

सर्ग १ ] अरण्यकाण्ड १०५


इत्युक्त्वा बाणमादाय स्थितो राम इवाचलः ॥२१॥

स तु दृष्ट्वा रमानाथं लक्ष्मणं जानकीं तदा ।
अट्टहासं ततः कृत्वा भीषणमिदमब्रवीत् ॥२२॥
कौ युवां बाणतूणीरजटावल्कलधारिणौ ।
मुनिवेषधरौ बालौ स्त्रीसहायौ सुदुर्मदौ ॥२३॥
सुन्दरौ बत मे वक्त्रप्रविष्टकवलोपमौ ।
किमर्थमागतौ घोरं वनं व्यालनिषेवितम् ॥२४॥

श्रुत्वा रक्षोवचो रामः स्मयमान उवाच तम् ।
अहं रामस्त्वयं भ्राता लक्ष्मणो मम सम्मतः ॥२५॥
एषा सीता मम प्राणवल्लभा वयमागताः ।
पितृवाक्यं पुरस्कृत्य शिक्षणार्थं भवादृशाम् ॥२६॥

श्रुत्वा तद्रामवचनमट्टहासमथाकरोत् ।
व्यादाय वक्त्रं बाहुभ्यां शूलमादाय सत्वरः ॥२७॥
मां न जानासि राम त्वं विराधं लोकविश्रुतम् ।
मद्भयान्मुनयः सर्वे त्यक्त्वा वनमितो गताः ॥२८॥
यदि जीवितुमिच्छाऽस्ति त्यक्त्वा सीतां निरायुधौ ।
पलायतं न चेच्छीघ्रं भक्षयामि युवामहम् ॥२९॥

इत्युक्त्वा राक्षसः सीतामादातुमभिदुद्रुवे ।
रामश्चिच्छेद तद्बाहू शरेण प्रहसन्निव ॥३०॥
ततः क्रोधपरीतात्मा व्यादाय विकटं मुखम् ।
राममभ्यद्रवद्रामश्चिच्छेद परिधावतः ॥३१॥
पदद्वयं विराधस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥३२॥
ततः सर्प इवास्येन ग्रसितुं राममापतत् ।
ततोऽर्धचन्द्राकारेण बाणेनास्य महच्छिरः ॥३३॥
चिच्छेद रुधिरौघेण पपात धरणीतले ।


बाण चढ़ा पर्वतके समान निश्चल होकर खड़े हो गये ॥ २१ ॥

तदनन्तर उस राक्षसने राम, लक्ष्मण और जानकीजी-को देखकर बड़ा अट्टहास किया और सबको भयभीत करते हुए इस प्रकार कहा—॥ २२ ॥ “अरे बालको ! बाण, तूणीर और जटा-वल्कल आदि मुनिवेष धारण किये तुम कौन हो ? तुम्हारे साथमें एक स्त्री है और तुम बड़े मदोन्मत्त दिखायी देते हो ॥ २३ ॥ तुम बड़े सुन्दर हो और मेरे मुखमें जानेवाले ग्रासके समान हो । हाय ! सर्पादिकोंसे पूर्ण इस घोर वनमें तुम किसलिये आये हो ?” ॥ २४ ॥

राक्षसके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उससे मुसकाकर कहा—“मेरा नाम राम है और यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है ॥ २५ ॥ तथा यह रमणी मेरी प्राणप्रिया सीता है । हम पिताकी आज्ञासे तुम-जैसोंको शिक्षा देनेके लिये इस वनमें आये हैं” ॥ २६ ॥

रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर वह ठट्ठा मारकर हँसने लगा और उसने मुँह फैलाकर तुरन्त ही अपने हाथोंमें त्रिशूल उठा लिया ॥ २७ ॥ और बोला—“राम ! क्या तुम मुझे नहीं जानते ? मैं जगत्प्रसिद्ध विराध नामक राक्षस हूँ । मेरे ही भयसे समस्त मुनिजन इस वनको छोड़कर चले गये हैं ॥ २८ ॥ यदि तुम्हें जीनेकी इच्छा है तो सीताको छोड़कर बिना अस्त्र-शस्त्रोंके भाग जाओ, नहीं तो मैं अभी तुम दोनोंको खा जाऊँगा” ॥ २९ ॥

ऐसा कह वह राक्षस सीताजीको पकड़नेके लिये उनकी ओर दौड़ा । तब रामचन्द्रजीने हँसते हुए अपने बाणसे उसकी भुजाएँ काट डालीं ॥ ३० ॥ इसपर वह अत्यन्त क्रोधसे सन्तप्त हो अपना विकराल मुख फाड़कर रामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा । तब श्रीरघुनाथजीने अपनी ओर आते हुए विराधके दोनों पैर काट डाले। यह बड़ा ही आश्चर्य-सा हो गया ॥ ३१-३२ ॥ तदनन्तर, सर्पके समान अपने मुखसे ही रामजीको निगल जानेके लिये वह उनकी ओर बढ़ा । तब भगवान् रामने एक अर्द्धचन्द्राकार बाणसे उसका महान् शिर काट डाला । तब वह रुधिरसे लथपथ होकर तत्काल पृथिवीपर गिर पड़ा । इस प्रकार


१४

१०६अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

[संस्कृत श्लोक]

ततः सीता समालिङ्ग्य प्रशशंस रघूत्तमम् ॥३४॥

ततो दुन्दुभयो नेदुर्दिवि देवगणैरिताः ।
ननृतुश्चाप्सरा हृष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः ॥३५॥

विराधकायादतिसुन्दराकृति-
र्विभ्राजमानो विमलाम्बरावृतः ।
प्रतप्तचामीकरचारुभूषणो
व्यदृश्यताग्रे गगने रवैर्यथा ॥३६॥

प्रणम्य शमं प्रणतार्तिहारिणं
भवप्रवाहोपरमं घृणाकरम् ।
प्रणम्य भूयः प्रणनाम दण्डवत्-
प्रपन्नसर्वार्तिहरं प्रसन्नधीः ॥३७॥

विराध उवाच

श्रीराम राजीवदलायताक्ष
विद्याधरोऽहं विमलप्रकाशः ।
दुर्वाससाऽकारणकोपमूर्त्तिना
शप्तः पुरा सोऽद्य विमोचितस्त्वया ॥३८॥

इतः परं त्वच्चरणारविन्दयोः
स्मृतिः सदा मेऽस्तु भवोपशान्तये ।
त्वन्नामसङ्कीर्तनमेव वाणी
करोतु मे कर्णपुटं त्वदीयम् ॥३९॥

कथामृतं पातु करद्वयं ते
पादारविन्दार्चनमेव कुर्यात् ।
शिरश्च ते पादयुगप्रणामं
करोतु नित्यं भवदीयमेवम् ॥४०॥

नमस्तुभ्यं भगवते विशुद्धज्ञानमूर्तये ।
आत्मारामय रामाय सीतारामाय वेधसे ॥४१॥

प्रपन्नं पाहि मां राम यास्यामि त्वदनुज्ञया ।
देवलोकं रघुश्रेष्ठ माया मां मावृणोतु ते ॥४२॥

इति विज्ञापितस्तेन प्रसन्नो रघुनन्दनः ।
ददौ वरं तदा प्रीतो विराघाय महामतिः ॥४३॥


[हिन्दी अनुवाद]

उसे मरा देख श्रीसीताजीने रघुश्रेष्ठ भगवान् रामका आलिंगनकर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥३३-३४॥

उस समय आकाशमें देवगण दुन्दुभी बजाने लगे, अप्सराएँ प्रसन्नतापूर्वक नाचने लगीं और गन्धर्व तथा किन्नरगण गाने लगे ॥ ३५॥

इसी समय विराधके मृत शरीरसे आकाशस्थित सूर्यदेवके समान एक सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित और तपाये हुए सुवर्णालंकारोंसे सुसज्जित अति सुन्दर पुरुष प्रकट हुआ ॥३६॥ उस पुरुषने शरणागत जनोंका दुःख दूर करनेवाले, संसार-सागरसे पार करनेवाले, दयामय श्रीरामचन्द्रजीको प्रसन्नचित्तसे प्रणाम कर उन प्रसन्नचित्त और शरणागतोंके सकल दुःख दूर करनेवाले प्रभुको फिर भी दण्डके समान पृथिवीपर लोटकर बारम्बार प्रणाम किया ॥ ३७ ॥

विराध बोला—हे कमलदललोचन श्रीराम ! मैं विमलतेजोमय विद्याधर हूँ । मुझे पूर्वकालमें बिना कारण ही क्रोध करनेवाले श्रीदुर्वासाजीने शाप दिया था सो आज आपने मुझे शाप-मुक्त कर दिया ॥ ३८ ॥

अब आप ऐसी कृपा करें जिससे भविष्यमें मुझे संसार-बन्धनको दूर करनेवाली आपके चरणारविन्दोंकी स्मृति सर्वदा बनी रहे, मेरी वाणी सर्वदा आपका नामसंकीर्तन करती रहे, कान आपका कथामृत पान करते रहें, हाथ आपके चरणकमलोंका पूजन करते रहें और इसी प्रकार शिर आपके चरणयुगलोंमें प्रणाम करता रहे॥ ३९-४० ॥ हे विशुद्धज्ञानस्वरूप भगवन् ! आपको नमस्कार है । आप आत्मारूपसे सबमें रमण करनेवाले होनेसे राम हैं, (अपनी मायाके सहित विराजमान होनेसे युगलमूर्ति) श्रीसीता-राम हैं और संसारके रचनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ४१ ॥

हे राम ! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये । हे रघुश्रेष्ठ ! आपकी आज्ञासे मैं देवलोकको जा रहा हूँ; आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे आपकी माया मुझे आच्छादित न करे ॥ ४२ ॥

विराधके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर महामति श्रीरघुनाथजीने उसे प्रसन्न होकर यह वर दिया-॥ ४३ ॥