अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
अरण्यकाण्ड - सर्ग १०: शबरीसे भेंट
| सर्ग १० ] | अरण्यकाण्ड | १४५ |
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| श्रीराम उवाच | **श्रीरामचन्द्रजी बोले—**हे देवगन्धर्व ! मैं तुम्हारी |
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| तुष्टोऽहं देवगन्धर्व भक्त्या स्तुत्या च तेऽनघ।<br>याहि मे परमं स्थानं योगिगम्यं सनातनम् ॥५५॥ | भक्ति और स्तुतिसे अति सन्तुष्ट हूँ । हे अनघ ! तुम योगियोंके प्राप्त करनेयोग्य मेरे सनातन परमधामको जाओ ॥ ५५ ॥ |
| जपन्ति ये नित्यमनन्यबुद्ध्या<br>भक्त्या त्वदुक्तं स्तवमागमोक्तम्।<br>तेऽज्ञानसम्भूतभवं विहाय<br>मां यान्ति नित्यानुभवानुमेयम् ॥५६॥ | जो लोग तुम्हारे इस शास्त्रोक्त स्तोत्रका अनन्य बुद्धिसे नित्य भक्ति-पूर्वक जप करेंगे वे अन्तमें अज्ञानजन्य संसारसे मुक्त होकर मुझ नित्यानुभवरूप परमात्माको प्राप्त करेंगे ॥ ५६ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
दशम सर्ग
शबरीसे भेंट।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! (भगवान् रामसे) |
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| लब्ध्वा वरं स गन्धर्वः प्रयास्यन् राममब्रवीत् ।<br>शबर्यास्ते पुरोभागे आश्रमे रघुनन्दन ॥ १ ॥ | वर पाकर (उनके परमधामको) जाते हुए उस गन्धर्व राजने कहा—"हे रघुनन्दन ! सामनेवाले आश्रममें शबरी रहती है। |
| भक्त्या त्वत्पादकमले भक्तिमार्गविशारदा ।<br>तां प्रयाहि महाभाग सर्वं ते कथयिष्यति ॥ २ ॥ | वह आपके चरण-कमलोंमें अति अनुराग रखनेके कारण भक्ति-मार्गमें कुशल है। हे महाभाग ! आप वहाँ पधारिये। वह आपको (सीताजी-के सम्बन्धमें ) सब बातें बता देगी" ॥ १-२ ॥ |
| इत्युक्त्वा प्रययौ सोऽपि विमानेनार्कवर्चसा ।<br>विष्णोः पदं रामनामस्मरणे फलमीदृशम् ॥ ३ ॥ | ऐसा कहकर वह एक सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर विष्णुलोकको चला गया । सच है, राम-नाम-स्मरणका फल ऐसा ही है ॥ ३ ॥ |
| त्यक्त्वा तद्विपिनं घोरं सिंहव्याघ्रादिदूषितम् ।<br>शनैरथाश्रमपदं शबर्या रघुनन्दनः ॥ ४ ॥ | तदनन्तर सिंह, व्याघ्रादिसे दूषित उस घोर वनको छोड़कर श्रीरघुनाथजी धीरे-धीरे शबरीके आश्रमपर पहुँचे ॥ ४ ॥ |
| शबरी राममालोक्य लक्ष्मणेन समन्वितम् ।<br>आयान्तमारार्द्धूपेण प्रत्युत्थायाचिरेण सा ॥ ५ ॥ | लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीको समीप ही आते देख शबरी अत्यन्त हर्षसे तुरन्त उठ खड़ी हुई ॥ ५ ॥ |
| पतित्वा पादयोरग्रे हर्षपूर्णाश्रुलोचना ।<br>स्वागतेनाभिनन्द्याथ खासने संन्यवेशयत् ॥६॥ | उसके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर आये और वह भगवान् रामके चरणोंमें गिर पड़ी तथा उनका स्वागत कर कुशल-प्रश्नादिके अनन्तर उन्हें सुन्दर आसनपर बैठाया ॥ ६ ॥ |
| रामलक्ष्मणयोः सम्यक्पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः ।<br>तज्जलेनाभिषिच्याङ्गमथार्घ्यादिभिरादृता ॥७॥ | तदनन्तर अत्यन्त भक्तिसे श्रीराम और लक्ष्मणके चरण अच्छी प्रकार धोये और उस चरणोदकको अपने अङ्गोंपर छिड़क-कर अर्ध्यादिसे भगवान्का सत्कार किया ॥ ७ ॥ फिर |
१४६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १०
| सम्पूज्य विधिवद्रामं ससौमित्रिं सपर्यया ।<br>सङ्गृहीतानि दिव्यानि रामार्थं शबरी मुदा ॥८॥<br>फलान्यमृतकल्पानि ददौ रामाय भक्तितः ।<br>पादौ सम्पूज्य कुसुमैः सुगन्धैः सानुलेपनैः ॥९॥ | विविध सामग्रियोंसे राम और लक्ष्मणका विधिवत् पूजन-कर जो अमृतके समान दिव्य फल उसने श्रीरामचन्द्रजीके लिये इकट्ठे कर रखे थे वे अत्यन्त हर्षसे लाकर उन्हें दिये और उनके चरण-कमलोंका सुगन्धित पुष्प और चन्दन आदिसे पूजन किया ॥ ८-९ ॥ |
| कृतातिथ्यं रघुश्रेष्ठमुपविष्टं सहानुजम् ।<br>शबरी भक्तिसम्पन्ना प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥१०॥ | इसप्रकार आतिथ्य-सत्कार हो चुकनेपर जब श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके सहित आसनपर विराजमान थे, शबरीने भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर कहा— ॥ १०॥ |
| अत्राश्रमे रघुश्रेष्ठ गुरवो मे महर्षयः ।<br>स्थिताः शुश्रूषणं तेषां कुर्वती समुपस्थिता ॥११॥<br>बहुवर्षसहस्राणि गतास्ते ब्रह्मणः पदम् ।<br>गमिष्यन्तोऽब्रुवन्मां त्वं वसात्रैव समाहिता ॥१२॥<br>रामो दाशरथिर्जातः परमात्मा सनातनः ।<br>राक्षसानां वधार्थाय ऋषीणां रक्षणाय च ॥१३॥<br>आगमिष्यति सैकाग्रध्यानानिष्ठा स्थिरा भव ।<br>इदानीं चित्रकूटार्द्रावाश्रमे वसति प्रभुः ॥१४॥<br>यावदागमनं तस्य तावद्रक्ष कलेवरम् ।<br>दृष्ट्वैव राघवं दग्ध्वा देहं यास्यसि तत्पदम् ॥१५॥ | "हे रघुश्रेष्ठ ! इस आश्रममें पहले मेरे गुरु महर्षि ( मतंग ) रहा करते थे; मैं उनकी सेवा-शुश्रूषा करती हुई यहाँ हज़ारों वर्षोंसे रहती हूँ। अब वे महर्षिश्रेष्ठ ब्रह्मलोकको चले गये हैं। जाते समय उन्होंने मुझसे कहा था कि तू एकाग्रचित्त होकर यहीं रह ॥ ११-१२ ॥ सनातन परमात्माने राक्षसोंको मारने और ऋषियोंकी रक्षा करनेके लिये राजा दशरथके पुत्र रामरूपसे अवतार लिया है ॥ १३ ॥ वे (शीघ्र ही) यहाँ आयेंगे। तू एकाग्र-चित्तसे उनका ध्यान करती हुई यहाँ रह। आजकल भगवान् रामजी चित्रकूट पर्वतके आश्रममें विराजमान हैं ॥ १४ ॥ जबतक वे आवें तबतक तू अपने शरीरका पालन कर। रघुनाथजीके आनेपर उनका दर्शन करते हुए इस शरीरको जलाकर तू उनके परमधामको चली जायगी ॥ १५ ॥ |
| तथैवाकरवं राम त्वद्ध्यानैकपरायणा ।<br>प्रतीक्ष्यागमनं तेऽद्य सफलं गुरुभाषितम् ॥१६॥ | हे राम ! गुरुजीके कथनानुसार मैं तभीसे आपका ध्यान करती हुई आपके आनेकी बाट देख रही थी। आज गुरुजीका वह वाक्य सफल हो गया ॥ १६ ॥ |
| तव सन्दर्शनं राम गुरूणामपि मे नहि ।<br>योषिन्मूढाऽप्रमेयात्मन् हीनजातिसमुद्भवा ॥१७॥ | हे राम ! आपका दर्शन तो मेरे गुरुदेवको भी नहीं हुआ। फिर हे अप्रमेयात्मन् ! मैं तो नीच-जातिमें उत्पन्न हुई एक गँवारी नारी ही हूँ ! मेरी तो बात ही क्या है ? ॥ १७ ॥ |
| तव दासस्य दासानां शतसङ्ख्योत्तरस्य वा ।<br>दासीत्वे नाधिकारोऽस्ति कुतः साक्षात्तवैव हि ॥१८॥ | जो आपके दासोंके दास हैं उनके भी जो उत्तरोत्तर सैकड़ों दासानुदास हैं मैं तो उनकी दासी होनेकी भी अधिकारिणी नहीं हूँ; फिर साक्षात् आपकी दासी कहलानेका तो मेरा मुँह ही कहाँ है ? ॥ १८ ॥ |
| कथं रामाद्य मे दृष्टस्त्वं मनोवागगोचरः ।<br>स्तोतुं न जाने देवेश किं करोमि प्रसीद मे ॥१९॥ | हे राम ! आप तो मन या वाणीके विषय नहीं हैं फिर न जाने आज मुझे आपका दर्शन कैसे हो गया। हे देवेश्वर ! मैं आपकी स्तुति करना नहीं जानती। अब मैं क्या करूँ? प्रभो ! आप स्वयं ही (अपनी दयालुतासे) मुझपर प्रसन्न होइये" ॥ १९ ॥ |
सर्ग १० ]
अरण्यकाण्ड
१४७
| श्रीराम उवाच | श्रीरामचन्द्रजी बोले—पुरुषत्व-स्त्रीत्वका भेद अथवा |
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| पुंस्त्वे स्त्रीत्वे विशेषो वा जातिनामाश्रमादयः । | जाति, नाम और आश्रम—ये कोई भी मेरे भजन- |
| न कारणं मद्भजने भक्तिरेव हि कारणम् ॥२०॥ | के कारण नहीं हैं। उसका कारण तो एकमात्र मेरी भक्ति ही है ॥२०॥ जो मेरी भक्तिसे विमुख हैं वे |
| यज्ञदानतपोभिर्वा वेदाध्ययनकर्मभिः । | यज्ञ, दान, तप अथवा वेदाध्ययन आदि किसी भी कर्मसे |
| नैवं द्रष्टुमंहं शक्यो मद्भक्तिविमुखैः सदा ॥२१॥ | मुझे कभी नहीं देख सकते ॥२१॥ अतः हे भामिनि ! मैं संक्षेपसे अपनी भक्तिके साधनोंका वर्णन |
| तस्माद्भाभिनि सङ्क्षेपाद्वक्ष्येऽहं भक्तिसाधनम् । | करता हूँ। उनमें पहला साधन तो सत्सङ्ग ही है |
| सतां सङ्गतिरेवात्र साधनं प्रथमं स्मृतम् ॥२२॥ | ॥२२॥ मेरे जन्म-कर्मोंकी कथाका कीर्तन करना |
| द्वितीयं मत्कथालापस्तृतीयं मद्गुणेरणम् । | दूसरा साधन है, मेरे गुणोंकी चर्चा करना—यह तीसरा उपाय है और (गीता-उपनिषदादि) मेरे वाक्योंकी |
| व्याख्यातृत्वं मद्वचसां चतुर्थं साधनं भवेत् ॥२३॥ | व्याख्या करना उसका चौथा साधन है ॥२३॥ हे |
| आचार्योपासनं भद्रे मद्बुद्ध्याऽमायया सदा । | भद्रे ! अपने गुरुदेवकी निष्कपट होकर भगवद्बुद्धिसे सेवा करना पाँचवाँ, पवित्र स्वभाव, यम-नियमादिका |
| पञ्चमं पुण्यशीलत्वं यमादि नियमादि च ॥२४॥ | पालन और मेरी पूजामें प्रेम होना छठा, तथा मेरे |
| निष्ठा मत्पूजने नित्यं षष्ठं साधनमीरितम् । | मन्त्रकी सांगोपांग उपासना करना सातवाँ साधन कहा |
| मम मन्त्रोपासकत्वं साङ्गं सप्तममुच्यते ॥२५॥ | जाता है ॥२४-२५॥ मेरे भक्तोंकी मुझसे भी अधिक पूजा करना, समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करना, |
| मद्भक्तेष्वधिका पूजा सर्वभूतेषु मन्मतिः । | बाह्य पदार्थोंमें आसक्त न होना और शम-दमादि- |
| वाह्यार्थेषु विरागित्वं शमादिसहितं तथा ॥२६॥ | सम्पन्न होना—यह मेरी भक्तिका आठवाँ साधन है तथा तत्त्व-विचार करना नवाँ है। हे भामिनि ! |
| अष्टमं नवमं तत्त्वविचारो मम भामिनि । | इस प्रकार यह नौ प्रकारकी भक्ति है। हे शुभ- |
| एवं नवविधा भक्तिः साधनं यस्य कस्य वा ॥२७॥ | लक्षणे ! जिस किसीमें ये साधन होते हैं वह स्त्री, पुरुष अथवा पशु-पक्षी आदि कोई भी क्यों न हो उसमें प्रेम- |
| स्त्रियो वा पुरुषस्यापि तिर्यग्योनिगतस्य वा । | लक्षणा-भक्तिका आविर्भाव हो ही जाता है ॥२६- |
| भक्तिः सञ्जायते प्रेमलक्षणा शुभलक्षणे ॥२८॥ | २८॥ भक्तिके उत्पन्न होने मात्रसे ही मेरे स्वरूपका |
| भक्तौ सञ्जातमात्रायां मत्तत्त्वानुभवस्तदा । | अनुभव हो जाता है और जिसे मेरा अनुभव हो जाता है उसकी उसी जन्ममें निस्सन्देह मुक्ति हो जाती है |
| ममानुभवसिद्धस्य मुक्तिस्तत्रैव जन्मनि ॥२९॥ | अतः यह सिद्ध हुआ कि मोक्षका कारण भक्ति ही |
| स्यात्तस्मात्कारणं भक्तिर्मोक्षस्येति सुनिश्चितम् । | है। (भक्तिके उपरोक्त नौ साधनोंमेंसे) जिसमें पहला |
| प्रथमं साधनं यस्य भवेत्तस्य क्रमेण तु ॥३०॥ | साधन होता है उसमें क्रमशः ये सभी आ जाते हैं। तब फिर उसे भक्ति तथा मुक्तिका प्राप्त होना निश्चित |
| भवेत्सर्वं ततो भक्तिर्मुक्तिरेव सुनिश्चितम् । | ही है। तू मेरी भक्तिसे युक्त है इसीलिये मैं तेरे पास |
| यस्मान्मद्भक्तियुक्ता त्वं ततोऽहं त्वामुपस्थितः॥३१॥ | आया हूँ ॥२९-३१॥ अब, मेरा दर्शन होनेसे तेरी मुक्ति हो ही जायगी—इसमें सन्देह नहीं। यदि तुझे |
| इतो मदर्शनान्मुक्तिस्तव नास्त्यत्र संशयः । | पता हो तो बता इस समय कमललोचना सीता |
| यदि जानासि मे ब्रूहि सीता कमललोचना ॥३२॥ | कहाँ है। मेरी प्रियदर्शना प्रियाको कौन ले गया है ? |
| कुत्रास्ते केन वा नीता प्रिया मे प्रियदर्शना ॥३३॥ | ॥३२-३३॥ |
| १४८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १० |
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शबर्युवाच
देव जानासि सर्वज्ञ सर्वं त्वं विश्वभावन ।
तथाऽपि पृच्छसे यन्मां लोकानुसृतः प्रभो ॥३४॥
ततोऽहमभिधास्यामि सीता यत्राधुना स्थिता ।
रावणेन हृता सीता लङ्कायां वर्ततेऽधुना ॥३५॥
इतः समीपे रामास्ते पम्पानाम सरोवरम् ।
ऋष्यमूकगिरिर्नाम तत्समीपे महानगः ॥३६॥
चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं सुग्रीवो वानराधिपः ।
भीतभीतः सदा यत्र तिष्ठत्यतुलविक्रमः ॥३७॥
वालिनश्च भयाद्भ्रातुस्तदगम्यमृषेर्भयात् ।
वालिनस्तत्र गच्छ त्वं तेन सख्यं कुरु प्रभो ॥३८॥
सुग्रीवेण स सर्वं ते कार्यं सम्पादयिष्यति ।
अहमग्निं प्रवेक्ष्यामि तवाग्रे रघुनन्दन ॥३९॥
मुहूर्तं तिष्ठ राजेन्द्र यावद्दग्ध्वा कलेवरम् ।
यास्यामि भगवन् राम तव विष्णोः परं पदम् ॥४०॥
इति रामं समामन्त्र्य प्रविवेश हुताशनम् ।
क्षणात्रिर्धूय सकलमविद्याकृतबन्धनम् ।
रामप्रसादाच्छबरी मोक्षं प्रापातिदुर्लभम् ॥४१॥
किं दुर्लभं जगन्नाथे श्रीरामे भक्तवत्सले ।
प्रसन्नेऽधमजन्माऽपि शबरी मुक्तिमाप सा ॥४२॥
किं पुनर्ब्राह्मणा मुख्याः पुण्याः श्रीरामचिन्तकाः ।
मुक्तिं यान्तीति तद्भक्तिर्मुक्तिरेव न संशयः ॥४३॥
भक्तिर्मुक्तिविधायिनी भगवतः
$\qquad\quad$श्रीरामचन्द्रस्य हे ।
लोकाः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजयुगलं
$\qquad\quad$सेवध्वमत्युत्सुकाः ।
नानाज्ञानविशेषमन्त्रविततिं
$\qquad\quad$त्यक्त्वा सुदूरे भृशं ।
रामं श्यामतनुं स्मरारिहृदये
$\qquad\quad$भान्तं भजध्वं बुधाः ॥४४॥
शबरी बोली—हे देव ! हे सर्वज्ञ ! हे विश्वभावन ! आप सभी कुछ जानते हैं । तथापि हे प्रभो ! लोकाचारका अनुसरण करते हुए यदि आप मुझसे पूछते हैं तो इस समय सीताजी जहाँ हैं वह मैं आपको बतलाती हूँ । सीताजीको रावण हर ले गया है और इस समय वे लङ्कामें हैं ॥ ३४-३५ ॥ हे राम ! यहाँसे पास ही पम्पा नामका एक सरोवर है । उसके समीप ऋष्यमूक नामका एक बहुत बड़ा पर्वत है ॥ ३६ ॥ वहाँ अतुलित पराक्रमी वानरराज सुग्रीव अपने भाई वालीके भयसे सदा डरता हुआ अपने चार मन्त्रियोंके साथ रहता है । ऋषि-शापके भयसे वह स्थान वालीके लिये सर्वथा अगम्य है हे प्रभो ! आप वहाँ जाइये और उस सुग्रीवके मित्रत कीजिए वह आपका सब कार्य सिद्ध करेगा । हे रघुनन्दन ! अब मैं आपके सामने ही अग्निमें प्रवेश करूँगी ॥ ३७-३९ ॥ हे राजेश्वर ! हे भगवन् ! हे राम ! जबतक मैं अपने शरीरको जलाकर आप विष्णुभगवान्के परमधामको जाऊँ तबतक आप एक मुहूर्त्त यहाँ और ठहरिये ॥ ४० ॥
श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस प्रकार सम्भाषण करनेके अनन्तर शबरीने अग्निमें प्रवेश किया और एक क्षणमें ही समस्त अविद्याजन्य बन्धनोंको नष्ट कर भगवान् रामकी कृपासे अति दुर्लभ मोक्ष-पद प्राप्त किया ॥ ४१ ॥ भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीरामके प्रसन्न होनेपर संसारमें क्या दुर्लभ है । देखो, उनकी कृपासे नीच जातिमें उत्पन्न हुई शबरीने भी मोक्ष-पद प्राप्त कर लिया ॥ ४२ ॥ फिर श्रीरामका ध्यान करनेवाले पुण्यजन्मा ब्राह्मणादि यदि मुक्त हो जायें तो इसमें क्या आश्चर्य है ? निस्सन्देह, भगवान् रामकी भक्ति ही मुक्ति है ॥ ४३ ॥ अरे लोगो ! भगवान् श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ही मोक्ष देनेवाली है । अतः कामधेनुरूप उनके चरण-युगलोंकी अति उत्साहपूर्वक सेवा करो । हे बुद्धिमान् लोगो ! इन विविध विज्ञान-वार्ताओं और मन्त्र-विस्तारको अलग रखकर तुरन्त ही श्रीशंकरके हृदयधाममें शोभा पानेवाले श्यामशरीर भगवान् रामका भजन करो ॥ ४४ ॥
'इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥
समाप्तमिदमरण्यकाण्डम् ।
किष्किन्धाकाण्ड
श्रीसीतारामाभ्यां नमः
अध्यात्मरामायण
किष्किन्धाकाण्ड
यो वालिना ध्वस्तबलं सुकण्ठं न्ययोजयद्राजपदे कपीनाम्।
तं स्वीयसन्तापसुतप्तचित्तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि॥
(इस पृष्ठ पर केवल सजावटी चित्र/रेखांकन है, कोई पाठ्य सामग्री नहीं है।)
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दास-भक्त हनुमानजी
तथेति तस्यारुरोह स्कन्धं रामोऽथ लक्ष्मणः । उत्पपात गिरेर्मूर्ध्नि क्षणादेव महाकपिः ॥
(अ० रा० कि० १ । २८-२९)