सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

अरण्यकाण्ड - सर्ग १०: शबरीसे भेंट

सर्ग १० ]अरण्यकाण्ड१४५

श्रीराम उवाच**श्रीरामचन्द्रजी बोले—**हे देवगन्धर्व ! मैं तुम्हारी
तुष्टोऽहं देवगन्धर्व भक्त्या स्तुत्या च तेऽनघ।<br>याहि मे परमं स्थानं योगिगम्यं सनातनम् ॥५५॥भक्ति और स्तुतिसे अति सन्तुष्ट हूँ । हे अनघ ! तुम योगियोंके प्राप्त करनेयोग्य मेरे सनातन परमधामको जाओ ॥ ५५ ॥
जपन्ति ये नित्यमनन्यबुद्ध्या<br>भक्त्या त्वदुक्तं स्तवमागमोक्तम्।<br>तेऽज्ञानसम्भूतभवं विहाय<br>मां यान्ति नित्यानुभवानुमेयम् ॥५६॥जो लोग तुम्हारे इस शास्त्रोक्त स्तोत्रका अनन्य बुद्धिसे नित्य भक्ति-पूर्वक जप करेंगे वे अन्तमें अज्ञानजन्य संसारसे मुक्त होकर मुझ नित्यानुभवरूप परमात्माको प्राप्त करेंगे ॥ ५६ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


दशम सर्ग

शबरीसे भेंट।

श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! (भगवान् रामसे)
लब्ध्वा वरं स गन्धर्वः प्रयास्यन् राममब्रवीत् ।<br>शबर्यास्ते पुरोभागे आश्रमे रघुनन्दन ॥ १ ॥वर पाकर (उनके परमधामको) जाते हुए उस गन्धर्व राजने कहा—"हे रघुनन्दन ! सामनेवाले आश्रममें शबरी रहती है।
भक्त्या त्वत्पादकमले भक्तिमार्गविशारदा ।<br>तां प्रयाहि महाभाग सर्वं ते कथयिष्यति ॥ २ ॥वह आपके चरण-कमलोंमें अति अनुराग रखनेके कारण भक्ति-मार्गमें कुशल है। हे महाभाग ! आप वहाँ पधारिये। वह आपको (सीताजी-के सम्बन्धमें ) सब बातें बता देगी" ॥ १-२ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ सोऽपि विमानेनार्कवर्चसा ।<br>विष्णोः पदं रामनामस्मरणे फलमीदृशम् ॥ ३ ॥ऐसा कहकर वह एक सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर विष्णुलोकको चला गया । सच है, राम-नाम-स्मरणका फल ऐसा ही है ॥ ३ ॥
त्यक्त्वा तद्विपिनं घोरं सिंहव्याघ्रादिदूषितम् ।<br>शनैरथाश्रमपदं शबर्या रघुनन्दनः ॥ ४ ॥तदनन्तर सिंह, व्याघ्रादिसे दूषित उस घोर वनको छोड़कर श्रीरघुनाथजी धीरे-धीरे शबरीके आश्रमपर पहुँचे ॥ ४ ॥
शबरी राममालोक्य लक्ष्मणेन समन्वितम् ।<br>आयान्तमारार्द्धूपेण प्रत्युत्थायाचिरेण सा ॥ ५ ॥लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीको समीप ही आते देख शबरी अत्यन्त हर्षसे तुरन्त उठ खड़ी हुई ॥ ५ ॥
पतित्वा पादयोरग्रे हर्षपूर्णाश्रुलोचना ।<br>स्वागतेनाभिनन्द्याथ खासने संन्यवेशयत् ॥६॥उसके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर आये और वह भगवान् रामके चरणोंमें गिर पड़ी तथा उनका स्वागत कर कुशल-प्रश्नादिके अनन्तर उन्हें सुन्दर आसनपर बैठाया ॥ ६ ॥
रामलक्ष्मणयोः सम्यक्पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः ।<br>तज्जलेनाभिषिच्याङ्गमथार्घ्यादिभिरादृता ॥७॥तदनन्तर अत्यन्त भक्तिसे श्रीराम और लक्ष्मणके चरण अच्छी प्रकार धोये और उस चरणोदकको अपने अङ्गोंपर छिड़क-कर अर्ध्यादिसे भगवान्‌का सत्कार किया ॥ ७ ॥ फिर

१४६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १०


सम्पूज्य विधिवद्रामं ससौमित्रिं सपर्यया ।<br>सङ्गृहीतानि दिव्यानि रामार्थं शबरी मुदा ॥८॥<br>फलान्यमृतकल्पानि ददौ रामाय भक्तितः ।<br>पादौ सम्पूज्य कुसुमैः सुगन्धैः सानुलेपनैः ॥९॥विविध सामग्रियोंसे राम और लक्ष्मणका विधिवत् पूजन-कर जो अमृतके समान दिव्य फल उसने श्रीरामचन्द्रजीके लिये इकट्ठे कर रखे थे वे अत्यन्त हर्षसे लाकर उन्हें दिये और उनके चरण-कमलोंका सुगन्धित पुष्प और चन्दन आदिसे पूजन किया ॥ ८-९ ॥
कृतातिथ्यं रघुश्रेष्ठमुपविष्टं सहानुजम् ।<br>शबरी भक्तिसम्पन्ना प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥१०॥इसप्रकार आतिथ्य-सत्कार हो चुकनेपर जब श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके सहित आसनपर विराजमान थे, शबरीने भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर कहा— ॥ १०॥
अत्राश्रमे रघुश्रेष्ठ गुरवो मे महर्षयः ।<br>स्थिताः शुश्रूषणं तेषां कुर्वती समुपस्थिता ॥११॥<br>बहुवर्षसहस्राणि गतास्ते ब्रह्मणः पदम् ।<br>गमिष्यन्तोऽब्रुवन्मां त्वं वसात्रैव समाहिता ॥१२॥<br>रामो दाशरथिर्जातः परमात्मा सनातनः ।<br>राक्षसानां वधार्थाय ऋषीणां रक्षणाय च ॥१३॥<br>आगमिष्यति सैकाग्रध्यानानिष्ठा स्थिरा भव ।<br>इदानीं चित्रकूटार्द्रावाश्रमे वसति प्रभुः ॥१४॥<br>यावदागमनं तस्य तावद्रक्ष कलेवरम् ।<br>दृष्ट्वैव राघवं दग्ध्वा देहं यास्यसि तत्पदम् ॥१५॥"हे रघुश्रेष्ठ ! इस आश्रममें पहले मेरे गुरु महर्षि ( मतंग ) रहा करते थे; मैं उनकी सेवा-शुश्रूषा करती हुई यहाँ हज़ारों वर्षोंसे रहती हूँ। अब वे महर्षिश्रेष्ठ ब्रह्मलोकको चले गये हैं। जाते समय उन्होंने मुझसे कहा था कि तू एकाग्रचित्त होकर यहीं रह ॥ ११-१२ ॥ सनातन परमात्माने राक्षसोंको मारने और ऋषियोंकी रक्षा करनेके लिये राजा दशरथके पुत्र रामरूपसे अवतार लिया है ॥ १३ ॥ वे (शीघ्र ही) यहाँ आयेंगे। तू एकाग्र-चित्तसे उनका ध्यान करती हुई यहाँ रह। आजकल भगवान् रामजी चित्रकूट पर्वतके आश्रममें विराजमान हैं ॥ १४ ॥ जबतक वे आवें तबतक तू अपने शरीरका पालन कर। रघुनाथजीके आनेपर उनका दर्शन करते हुए इस शरीरको जलाकर तू उनके परमधामको चली जायगी ॥ १५ ॥
तथैवाकरवं राम त्वद्ध्यानैकपरायणा ।<br>प्रतीक्ष्यागमनं तेऽद्य सफलं गुरुभाषितम् ॥१६॥हे राम ! गुरुजीके कथनानुसार मैं तभीसे आपका ध्यान करती हुई आपके आनेकी बाट देख रही थी। आज गुरुजीका वह वाक्य सफल हो गया ॥ १६ ॥
तव सन्दर्शनं राम गुरूणामपि मे नहि ।<br>योषिन्मूढाऽप्रमेयात्मन् हीनजातिसमुद्भवा ॥१७॥हे राम ! आपका दर्शन तो मेरे गुरुदेवको भी नहीं हुआ। फिर हे अप्रमेयात्मन् ! मैं तो नीच-जातिमें उत्पन्न हुई एक गँवारी नारी ही हूँ ! मेरी तो बात ही क्या है ? ॥ १७ ॥
तव दासस्य दासानां शतसङ्ख्योत्तरस्य वा ।<br>दासीत्वे नाधिकारोऽस्ति कुतः साक्षात्तवैव हि ॥१८॥जो आपके दासोंके दास हैं उनके भी जो उत्तरोत्तर सैकड़ों दासानुदास हैं मैं तो उनकी दासी होनेकी भी अधिकारिणी नहीं हूँ; फिर साक्षात् आपकी दासी कहलानेका तो मेरा मुँह ही कहाँ है ? ॥ १८ ॥
कथं रामाद्य मे दृष्टस्त्वं मनोवागगोचरः ।<br>स्तोतुं न जाने देवेश किं करोमि प्रसीद मे ॥१९॥हे राम ! आप तो मन या वाणीके विषय नहीं हैं फिर न जाने आज मुझे आपका दर्शन कैसे हो गया। हे देवेश्वर ! मैं आपकी स्तुति करना नहीं जानती। अब मैं क्या करूँ? प्रभो ! आप स्वयं ही (अपनी दयालुतासे) मुझपर प्रसन्न होइये" ॥ १९ ॥

सर्ग १० ]
अरण्यकाण्ड
१४७


श्रीराम उवाचश्रीरामचन्द्रजी बोले—पुरुषत्व-स्त्रीत्वका भेद अथवा
पुंस्त्वे स्त्रीत्वे विशेषो वा जातिनामाश्रमादयः ।जाति, नाम और आश्रम—ये कोई भी मेरे भजन-
न कारणं मद्भजने भक्तिरेव हि कारणम् ॥२०॥के कारण नहीं हैं। उसका कारण तो एकमात्र मेरी भक्ति ही है ॥२०॥ जो मेरी भक्तिसे विमुख हैं वे
यज्ञदानतपोभिर्वा वेदाध्ययनकर्मभिः ।यज्ञ, दान, तप अथवा वेदाध्ययन आदि किसी भी कर्मसे
नैवं द्रष्टुमंहं शक्यो मद्भक्तिविमुखैः सदा ॥२१॥मुझे कभी नहीं देख सकते ॥२१॥ अतः हे भामिनि ! मैं संक्षेपसे अपनी भक्तिके साधनोंका वर्णन
तस्माद्भाभिनि सङ्क्षेपाद्वक्ष्येऽहं भक्तिसाधनम् ।करता हूँ। उनमें पहला साधन तो सत्सङ्ग ही है
सतां सङ्गतिरेवात्र साधनं प्रथमं स्मृतम् ॥२२॥॥२२॥ मेरे जन्म-कर्मोंकी कथाका कीर्तन करना
द्वितीयं मत्कथालापस्तृतीयं मद्गुणेरणम् ।दूसरा साधन है, मेरे गुणोंकी चर्चा करना—यह तीसरा उपाय है और (गीता-उपनिषदादि) मेरे वाक्योंकी
व्याख्यातृत्वं मद्वचसां चतुर्थं साधनं भवेत् ॥२३॥व्याख्या करना उसका चौथा साधन है ॥२३॥ हे
आचार्योपासनं भद्रे मद्बुद्ध्याऽमायया सदा ।भद्रे ! अपने गुरुदेवकी निष्कपट होकर भगवद्बुद्धिसे सेवा करना पाँचवाँ, पवित्र स्वभाव, यम-नियमादिका
पञ्चमं पुण्यशीलत्वं यमादि नियमादि च ॥२४॥पालन और मेरी पूजामें प्रेम होना छठा, तथा मेरे
निष्ठा मत्पूजने नित्यं षष्ठं साधनमीरितम् ।मन्त्रकी सांगोपांग उपासना करना सातवाँ साधन कहा
मम मन्त्रोपासकत्वं साङ्गं सप्तममुच्यते ॥२५॥जाता है ॥२४-२५॥ मेरे भक्तोंकी मुझसे भी अधिक पूजा करना, समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करना,
मद्भक्तेष्वधिका पूजा सर्वभूतेषु मन्मतिः ।बाह्य पदार्थोंमें आसक्त न होना और शम-दमादि-
वाह्यार्थेषु विरागित्वं शमादिसहितं तथा ॥२६॥सम्पन्न होना—यह मेरी भक्तिका आठवाँ साधन है तथा तत्त्व-विचार करना नवाँ है। हे भामिनि !
अष्टमं नवमं तत्त्वविचारो मम भामिनि ।इस प्रकार यह नौ प्रकारकी भक्ति है। हे शुभ-
एवं नवविधा भक्तिः साधनं यस्य कस्य वा ॥२७॥लक्षणे ! जिस किसीमें ये साधन होते हैं वह स्त्री, पुरुष अथवा पशु-पक्षी आदि कोई भी क्यों न हो उसमें प्रेम-
स्त्रियो वा पुरुषस्यापि तिर्यग्योनिगतस्य वा ।लक्षणा-भक्तिका आविर्भाव हो ही जाता है ॥२६-
भक्तिः सञ्जायते प्रेमलक्षणा शुभलक्षणे ॥२८॥२८॥ भक्तिके उत्पन्न होने मात्रसे ही मेरे स्वरूपका
भक्तौ सञ्जातमात्रायां मत्तत्त्वानुभवस्तदा ।अनुभव हो जाता है और जिसे मेरा अनुभव हो जाता है उसकी उसी जन्ममें निस्सन्देह मुक्ति हो जाती है
ममानुभवसिद्धस्य मुक्तिस्तत्रैव जन्मनि ॥२९॥अतः यह सिद्ध हुआ कि मोक्षका कारण भक्ति ही
स्यात्तस्मात्कारणं भक्तिर्मोक्षस्येति सुनिश्चितम् ।है। (भक्तिके उपरोक्त नौ साधनोंमेंसे) जिसमें पहला
प्रथमं साधनं यस्य भवेत्तस्य क्रमेण तु ॥३०॥साधन होता है उसमें क्रमशः ये सभी आ जाते हैं। तब फिर उसे भक्ति तथा मुक्तिका प्राप्त होना निश्चित
भवेत्सर्वं ततो भक्तिर्मुक्तिरेव सुनिश्चितम् ।ही है। तू मेरी भक्तिसे युक्त है इसीलिये मैं तेरे पास
यस्मान्मद्भक्तियुक्ता त्वं ततोऽहं त्वामुपस्थितः॥३१॥आया हूँ ॥२९-३१॥ अब, मेरा दर्शन होनेसे तेरी मुक्ति हो ही जायगी—इसमें सन्देह नहीं। यदि तुझे
इतो मदर्शनान्मुक्तिस्तव नास्त्यत्र संशयः ।पता हो तो बता इस समय कमललोचना सीता
यदि जानासि मे ब्रूहि सीता कमललोचना ॥३२॥कहाँ है। मेरी प्रियदर्शना प्रियाको कौन ले गया है ?
कुत्रास्ते केन वा नीता प्रिया मे प्रियदर्शना ॥३३॥॥३२-३३॥
१४८अध्यात्मरामायण[ सर्ग १०

शबर्युवाच
देव जानासि सर्वज्ञ सर्वं त्वं विश्वभावन ।
तथाऽपि पृच्छसे यन्मां लोकानुसृतः प्रभो ॥३४॥
ततोऽहमभिधास्यामि सीता यत्राधुना स्थिता ।
रावणेन हृता सीता लङ्कायां वर्ततेऽधुना ॥३५॥
इतः समीपे रामास्ते पम्पानाम सरोवरम् ।
ऋष्यमूकगिरिर्नाम तत्समीपे महानगः ॥३६॥
चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं सुग्रीवो वानराधिपः ।
भीतभीतः सदा यत्र तिष्ठत्यतुलविक्रमः ॥३७॥
वालिनश्च भयाद्भ्रातुस्तदगम्यमृषेर्भयात् ।
वालिनस्तत्र गच्छ त्वं तेन सख्यं कुरु प्रभो ॥३८॥
सुग्रीवेण स सर्वं ते कार्यं सम्पादयिष्यति ।
अहमग्निं प्रवेक्ष्यामि तवाग्रे रघुनन्दन ॥३९॥
मुहूर्तं तिष्ठ राजेन्द्र यावद्दग्ध्वा कलेवरम् ।
यास्यामि भगवन् राम तव विष्णोः परं पदम् ॥४०॥
इति रामं समामन्त्र्य प्रविवेश हुताशनम् ।
क्षणात्रिर्धूय सकलमविद्याकृतबन्धनम् ।
रामप्रसादाच्छबरी मोक्षं प्रापातिदुर्लभम् ॥४१॥
किं दुर्लभं जगन्नाथे श्रीरामे भक्तवत्सले ।
प्रसन्नेऽधमजन्माऽपि शबरी मुक्तिमाप सा ॥४२॥
किं पुनर्ब्राह्मणा मुख्याः पुण्याः श्रीरामचिन्तकाः ।
मुक्तिं यान्तीति तद्भक्तिर्मुक्तिरेव न संशयः ॥४३॥
भक्तिर्मुक्तिविधायिनी भगवतः
$\qquad\quad$श्रीरामचन्द्रस्य हे ।
लोकाः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजयुगलं
$\qquad\quad$सेवध्वमत्युत्सुकाः ।
नानाज्ञानविशेषमन्त्रविततिं
$\qquad\quad$त्यक्त्वा सुदूरे भृशं ।
रामं श्यामतनुं स्मरारिहृदये
$\qquad\quad$भान्तं भजध्वं बुधाः ॥४४॥


शबरी बोली—हे देव ! हे सर्वज्ञ ! हे विश्वभावन ! आप सभी कुछ जानते हैं । तथापि हे प्रभो ! लोकाचारका अनुसरण करते हुए यदि आप मुझसे पूछते हैं तो इस समय सीताजी जहाँ हैं वह मैं आपको बतलाती हूँ । सीताजीको रावण हर ले गया है और इस समय वे लङ्कामें हैं ॥ ३४-३५ ॥ हे राम ! यहाँसे पास ही पम्पा नामका एक सरोवर है । उसके समीप ऋष्यमूक नामका एक बहुत बड़ा पर्वत है ॥ ३६ ॥ वहाँ अतुलित पराक्रमी वानरराज सुग्रीव अपने भाई वालीके भयसे सदा डरता हुआ अपने चार मन्त्रियोंके साथ रहता है । ऋषि-शापके भयसे वह स्थान वालीके लिये सर्वथा अगम्य है हे प्रभो ! आप वहाँ जाइये और उस सुग्रीवके मित्रत कीजिए वह आपका सब कार्य सिद्ध करेगा । हे रघुनन्दन ! अब मैं आपके सामने ही अग्निमें प्रवेश करूँगी ॥ ३७-३९ ॥ हे राजेश्वर ! हे भगवन् ! हे राम ! जबतक मैं अपने शरीरको जलाकर आप विष्णुभगवान्‌के परमधामको जाऊँ तबतक आप एक मुहूर्त्त यहाँ और ठहरिये ॥ ४० ॥

श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस प्रकार सम्भाषण करनेके अनन्तर शबरीने अग्निमें प्रवेश किया और एक क्षणमें ही समस्त अविद्याजन्य बन्धनोंको नष्ट कर भगवान् रामकी कृपासे अति दुर्लभ मोक्ष-पद प्राप्त किया ॥ ४१ ॥ भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीरामके प्रसन्न होनेपर संसारमें क्या दुर्लभ है । देखो, उनकी कृपासे नीच जातिमें उत्पन्न हुई शबरीने भी मोक्ष-पद प्राप्त कर लिया ॥ ४२ ॥ फिर श्रीरामका ध्यान करनेवाले पुण्यजन्मा ब्राह्मणादि यदि मुक्त हो जायें तो इसमें क्या आश्चर्य है ? निस्सन्देह, भगवान् रामकी भक्ति ही मुक्ति है ॥ ४३ ॥ अरे लोगो ! भगवान् श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ही मोक्ष देनेवाली है । अतः कामधेनुरूप उनके चरण-युगलोंकी अति उत्साहपूर्वक सेवा करो । हे बुद्धिमान् लोगो ! इन विविध विज्ञान-वार्ताओं और मन्त्र-विस्तारको अलग रखकर तुरन्त ही श्रीशंकरके हृदयधाममें शोभा पानेवाले श्यामशरीर भगवान् रामका भजन करो ॥ ४४ ॥


'इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥
समाप्तमिदमरण्यकाण्डम् ।

किष्किन्धाकाण्ड

श्रीसीतारामाभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण

किष्किन्धाकाण्ड

यो वालिना ध्वस्तबलं सुकण्ठं न्ययोजयद्राजपदे कपीनाम्।
तं स्वीयसन्तापसुतप्तचित्तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि॥

(इस पृष्ठ पर केवल सजावटी चित्र/रेखांकन है, कोई पाठ्य सामग्री नहीं है।)

The provided image is completely blank and does not contain any text or scripture to transcribe.

दास-भक्त हनुमानजी

तथेति तस्यारुरोह स्कन्धं रामोऽथ लक्ष्मणः । उत्पपात गिरेर्मूर्ध्नि क्षणादेव महाकपिः ॥
(अ० रा० कि० १ । २८-२९)