अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ३: राजा दशरथका कैकेयीको वर देना
'सर्ग ३] अयोध्याकाण्ड ५१
दुष्टानामतिपापभाविताधियां
सङ्गं सदा चेद्भजे-
त्तद्बुद्ध्या परिभावितो व्रजति तत्
साम्यं क्रमेण स्फुटम् ॥८२॥
अतः सङ्गः परित्याज्यो दुष्टानां सर्वदैव हि ।
दुःसङ्गी च्यवते स्वार्थाद्यथेयं राजकन्यका ॥८३॥
बुद्धिसे प्रभावित होकर उन्हींके समान हो जायगा ॥८२॥ इसलिये सदा ही दुष्ट पुरुषोंका संग छोड़ना चाहिये, क्योंकि दुःसंगसे पुरुष इस राजकन्या (कैकेयी) के समान ही पुरुषार्थच्युत हो जाता है ॥८३॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
द्वितीयः सर्गः ॥२॥
तृतीय सर्ग
राजा दशरथका कैकेयीको वर देना।
श्रीमहादेव उवाच
ततो दशरथो राजा रामाभ्युदयकारणात् ।
आदिश्य मन्त्रिप्रकृतीः सानन्दो गृहमविशत् ॥१॥
तत्रादृष्ट्वा प्रियां राजा किमेतदिति विह्वलः ।
या पुरा मन्दिरं तस्याः प्रविष्टे मयि शोभना ॥२॥
हसन्ती मामुपायाति सा किं नैवाद्य दृश्यते ।
इत्यात्मन्येव संचिन्त्य मनसाऽतिविदूयता ॥३॥
पप्रच्छ दासीनिकरं कुतो वः स्वामिनी शुभा।
नायाति मां यथापूर्वं मत्प्रिया प्रियदर्शना ॥४॥
ता ऊचुः क्रोधभवनं प्रविष्टा नैव विद्महे ।
कारणं तत्र देव त्वं गत्वा निश्चेतुमर्हसि ॥५॥
इत्युक्तो भयसन्त्रस्तो राजा तस्याः समीपगः ।
उपविश्य शनैर्देहं स्पृशन्ववै पाणिनाब्रवीत् ॥६॥
किं शेपे वसुधापृष्ठे पर्यङ्कादीन् विहाय च ।
मां त्वं खेदयसे भीरु यतो मां नावभाषसे ॥७॥
अलङ्कारं परित्यज्य भूमौ मलिनवाससा ।
किमर्थं ब्रूहि सकलं विधास्ये तव वाञ्छितम् ॥८॥
श्रीमहादेवजी बोले-तदनन्तर महाराज दशरथने रामचन्द्रजीके अभ्युदयके लिये प्रजावर्ग और मन्त्रियोंको (माङ्गलिक कार्योंके लिये) आज्ञा देकर आनन्दपूर्वक अपने रनिवासमें प्रवेश किया ॥१॥ वहाँ अपनी प्रिया कैकेयीको न देखकर वे अत्यन्त विह्वल होकर मन-ही-मन कहने लगे, 'क्या कारण है, जो पहले अपने महलमें घुसते ही सदा हँसती हुई मेरे सामने आती थी वह सुमुखी आज दिखायी ही नहीं दे रही है?' अपने चित्तमें अत्यन्त दुःख मानकर इसी प्रकार सोचते-सोचते ॥२-३॥ उन्होंने दासियोंसे पूछा-'आज तुम्हारी शुभलक्षणा स्वामिनी कहाँ है? वह प्रियदर्शना प्रिया आज पूर्ववत् मेरे सामने क्यों नहीं आती ?' ॥४॥
दासियोंने कहा- "देव ! कारण तो मालूम नहीं, किन्तु आज वे कोप-भवनमें गयी हुई हैं; आप स्वयं ही वहाँ जाकर सब हाल जान लीजिये" ॥५॥
दासियोंके इस प्रकार कहनेपर राजा भयभीत होकर उसके पास गये और वहाँ बैठकर उसके शरीरपर धीरे-धीरे हाथ फेरते हुए बोले-॥६॥ "अयि भीरु ! आज पलंग आदिको छोड़कर इस प्रकार पृथिवीपर क्यों पड़ी हो ? तुम हमसे कुछ बोलती नहीं हो, इससे हमें बड़ा खेद हो रहा है ॥७॥ समस्त वस्त्राभूषण छोड़कर तुम मलिन वस्त्र पहने हुए पृथिवीपर क्यों पड़ी हो ? तुम्हारी जो इच्छा हो सो कहो,
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को वा तवाहितं कर्ता नारी वा पुरुषोऽपि वा ।
स मे दण्ड्यश्च वध्यश्च भविष्यति न संशयः ॥ ९ ॥
ब्रूहि देवि यथा प्रीतिस्तदवश्यं ममाग्रतः ।
तदिदानीं साधयिष्ये सुदुर्लभमपि क्षणात् ॥ १० ॥
जानासि त्वं मम स्वान्तं प्रियं मां खवशे स्थितम् ।
तथापि मां खेदयसे वृथा तव परिश्रमः ॥ ११ ॥
ब्रूहि कं धनिनं कुर्यां दरिद्रं ते प्रियङ्करम् ।
धनिनं क्षणमात्रेण निर्धनं च तवाहितम् ॥ १२ ॥
ब्रूहि कं वा वधिष्यामि वधार्हो वा विमोक्ष्यते ।
किमत्र बहुनोक्तेन प्राणान्दास्यामि ते प्रिये ॥ १३ ॥
मम प्राणात्प्रियतरो रामो राजीवलोचनः ।
तस्योपरि शपे ब्रूहि त्वद्विष्टं तत्करोम्यहम् ॥ १४ ॥
इति ब्रुवाणं राजानं शपन्तं राघवोपरि ।
शनैर्विमृज्य नेत्रे सा राजानं प्रत्यभाषत ॥ १५ ॥
यदि सत्यप्रतिज्ञोऽसि शपथं कुरुषे यदि ।
याच्ञां मे सफलां कर्तुं शीघ्रमेव त्वमर्हसि ॥ १६ ॥
पूर्वं देवासुरे युद्धे मया त्वं परिरक्षितः ।
तदा वरद्वयं दत्तं त्वया मे तुष्टचेतसा ॥ १७ ॥
तद्द्वयं न्यासभूतं मे स्थापितं त्वयि सुव्रत ।
तत्रैकेन वरेणाशु भरतं मे प्रियं सुतम् ॥ १८ ॥
एभिः संभृतसंभारैर्यौवराज्येऽभिषेचय ।
अपरेण वरेणाशु रामो गच्छतु दण्डकान् ॥ १९ ॥
मुनिवेषधरः श्रीमान् जटावल्कलभूषणः ।
चतुर्दश समास्तत्र कन्दमूलफलाशनः ॥ २० ॥
पुनरायातु तस्यान्ते वने वा तिष्ठतु स्वयम् ।
प्रभाते गच्छतु वनं रामो राजीवलोचनः ॥ २१ ॥
| मैं सब पूर्ण करूँगा ॥ ८ ॥ तुम्हारा अनिष्ट करनेवाला कौन है ? वह स्त्री हो अथवा पुरुष अवश्य मेरे दण्डका पात्र होगा । यही नहीं, उसका वध भी किया जा सकता है ॥ ९ ॥ हे देवि ! जिस प्रकार तुम्हारी प्रसन्नता हो वह मुझसे अवश्य कहो । वह कार्य अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी मैं इसी समय एक क्षणमें ही पूरा कर दूँगा ॥ १० ॥ तुम मेरे हृदयको जानती ही हो, मैं तुम्हारा अत्यन्त प्रिय और तुम्हारे वशीभूत हूँ । फिर भी तुम मुझे खिन्न करती हो ? तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है ॥ ११ ॥ बताओ, तुम्हारा प्रिय करनेवाले किस कंगालको मैं धनी कर दूँ अथवा तुम्हारे अप्रियकारी किस धनपतिको एक क्षणमें ही कंगाल बना दूँ ? ॥ १२ ॥ बताओ, किस अवध्यको मार डालूँ और किस वध्यको छोड़ दूँ ? हे प्रिये ! इस विषयमें और अधिक क्या कहूँ, मैं तुम्हें अपने प्राण भी दे सकता हूँ ॥ १३ ॥ कमल-नयन राम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं । मैं उन्हींकी शपथ करके कहता हूँ कि तुम्हें जो कुछ प्रिय हो मैं वही करूँगा” ॥ १४ ॥<br><br>महाराज दशरथके रामकी सौगन्ध खाकर इस प्रकार कहनेपर कैकेयीने धीरे-धीरे अपने आँसू पोंछकर राजासे कहा—॥ १५ ॥ “राजन् ! यदि आप सत्य-प्रतिज्ञ हैं और शपथ भी करते हैं तो शीघ्र ही मैं जो कुछ माँगूँ उसे सफल कर देना चाहिये ॥ १६ ॥ पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें मैंने आपकी रक्षा की थी उस समय प्रसन्न होकर आपने मुझे दो वर देनेको कहा था ॥ १७ ॥ हे सुव्रत ! मैंने वे दोनों वर आपके पास धरोहरके रूपमें रख दिये थे । अब उनमेंसे एक वरसे तो तुरन्त ही मेरे प्रिय पुत्र भरतको इस एकत्रित की हुई सामग्रीसे युवराज-पदपर अभिषिक्त कीजिये और दूसरेसे तुरन्त ही राम दण्डक-वनको चले जायें ॥ १८–१९ ॥ वहाँ श्रीमान् रामको जटा-वल्कलादि धारण कर कन्द-मूल-फल खाते हुए मुनिवेषसे चौदह वर्षतक रहना चाहिये ॥ २० ॥ उसके पश्चात् अपनी इच्छासे चाहे वे अयोध्यामें लौट आवें अथवा वनहीमें रहें किन्तु कमलनयन राम कल सबेरे ही अवश्य वनको चले जायें ॥ २१ ॥ यदि इसमें कुछ देरी होगी तो आपके सामने ही मैं अपने प्राण छोड़ दूँगी ।
| सर्ग ३ ] | अयोध्याकाण्ड | ५३ |
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| यदि किञ्चिद्विलम्बेत प्राणांस्त्यक्ष्ये तवाग्रतः।<br>भव सत्यप्रतिज्ञस्त्वमेतदेव मम प्रियम् ॥२२॥ | आप अपनी प्रतिज्ञा सत्य कीजिये, मेरा प्रिय कार्य बस यही है” ॥२२॥ |
| श्रुत्वैतद्दारुणं वाक्यं कैकेय्या रोमहर्षणम्।<br>निपपात महीपालो वज्राहत इवाचलः ॥२३॥ | कैकेयीके ऐसे रोमाञ्चकारी कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ वज्राहत पर्वतके समान गिर पड़े ॥२३॥ |
| शनैरून्मील्य नयने विमृज्य परया भिया।<br>दुःस्वप्नो वा मया दृष्टो ह्यथवा चित्तविभ्रमः ॥२४॥ | तत्पश्चात् धीरे-धीरे नेत्र खोलकर अति भयपूर्वक आँसू पोंछे और मन-ही-मन कहने लगे— 'मैंने यह कोई दुःस्वप्न देखा है या मेरे चित्तको भ्रम हो गया है?' ॥२४॥ |
| इत्यालोक्य पुरः पत्नीं व्याघ्रीमिव पुरः स्थिताम्।<br>किमिदं भाषसे भद्रे मम प्राणहरं वचः ॥२५॥ | इसी समय अपने सामने सिंहिनीके समान बैठी हुई रानी कैकेयीको देखकर कहने लगे—"हे भद्रे ! मेरे प्राणोंको हरनेवाले तुम ये क्या वचन बोल रही हो ? ॥२५॥ |
| रामः कमपराधं ते कृतवान्कमलेक्षणः।<br>ममाग्रे राघवगुणान्वर्णयस्यनिशं शुभान् ॥२६॥ | कमलनयन रामने तुम्हारा क्या अपराध किया है ? तुम तो अहर्निश मेरे सामने रामके शुभ गुण गाया करती थी ॥ २६ ॥ |
| कौसल्यां मां समं पश्यन् शुश्रूषां कुरुते सदा।<br>इति ब्रुवन्ती त्वं पूर्वमिदानीं भाषसेऽन्यथा ॥२७॥ | तुम तो पहले कहा करती थी कि 'राम मुझे और कौसल्याको समान जानकर सदा ही मेरी सेवा किया करते हैं।' फिर इस समय तुम यह उलटी बात कैसे कह रही हो ? ॥२७॥ |
| राज्यं गृहाण पुत्राय रामस्तिष्ठतु मन्दिरे ।<br>अनुगृहीष्व मां वामे रामान्नास्ति भयं तव ॥२८॥ | तुम अपने पुत्रके लिये राज्य ले लो, किन्तु रामको घर ही रहने दो। हे वामे ! तुम मुझपर कृपा करो, रामसे तुम्हें कोई भय न करना चाहिये" ॥ २८ ॥ |
| इत्युक्त्वाऽश्रुपरीताक्षः पादयोर्निपपात ह।<br>कैकेयी प्रत्युवाचेदं साऽपि रक्तान्तलोचना॥२९॥ | ऐसा कहकर महाराज दशरथ नेत्रोंमें जल भरकर कैकेयीके चरणोंमें गिर पड़े । तब उस कैकेयीने आँखें लाल करके यों कहा—॥ २९॥ |
| राजेन्द्र किं त्वं भ्रान्तोऽसि उक्तं तद्भाषसेऽन्यथा।<br>मिथ्या करोषि चेत्स्वीयं भाषितं नरको भवेत् ॥३०॥ | “राजेन्द्र ! क्या तुम्हारी बुद्धिमें भ्रम हो गया है जो अपने कथनके विपरीत बोल रहे हो; याद रखो, यदि तुमने अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी तो तुम्हें नरक भोगना पड़ेगा ॥ ३० ॥ |
| वनं न गच्छेदयदि रामचन्द्रः<br>प्रभातकालेऽजिनचीरयुक्तः।<br>उद्बन्धनं वा विषभक्षणं वा<br>कृत्वा मरिष्ये पुरतस्तवाहम् ॥३१॥ | सुनो, यदि कल प्रातःकाल ही मृगचर्म और वल्कल-वस्त्र धारण कर राम वनको न गये तो मैं तुम्हारे सामने ही फाँसी लगाकर या विष खाकर मर जाऊँगी ॥ ३१ ॥ |
| सत्यप्रतिज्ञोऽहमितीह लोके<br>विडम्ब्यसे सर्वसभान्तरेषु।<br>रामोपरि त्वं शपथं च कृत्वा<br>मिथ्याप्रतिज्ञो नरकं प्रयाहि ॥३२॥ | तुम संसारमें सभी सभाओंमें 'मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ' ऐसा कहकर लोगोंको धोखेमें डाला करते हो, अब तुम रामकी शपथ करके की हुई प्रतिज्ञाको भी तोड़ रहे हो, अतः तुम्हें नरकमें जाना पड़ेगा” ॥ ३२ ॥ |
| इत्युक्तः प्रियया दीनो मग्नो दुःखार्णवे नृपः।<br>मूर्च्छितः पतितो भूमौ विसंज्ञो मृतको यथा ॥३३॥ | अपनी प्रियाके ऐसे कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ दुःख-समुद्रमें डूबकर बड़े व्याकुल हो गये, |
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एवं रात्रिर्गता तस्य दुःखात्संवत्सरोपमा ।
अरुणोदयकाले तु वन्दिनो गायका जगुः ॥३४॥
निवारयित्वा तान् सर्वान्कैकेयी रोषमास्थिता ।
ततः प्रभातसमये मध्यकक्षमुपस्थिताः ॥३५॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या ऋषयः कन्यकास्तथा ।
छत्रं च चामरं दिव्यं गजो वाजी तथैव च ॥३६॥
अन्याश्च वारमुख्या याः पौरजानपदास्तथा ।
वसिष्ठेन यथाऽऽज्ञप्तं तत्सर्वं तत्र संस्थितम् ॥३७॥
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च रात्रौ निद्रां न लेभिरे ।
कदा द्रक्ष्यामहे रामं पीतकौशेयवाससम् ॥३८॥
सर्वाभरणसम्पन्नं किरीटकटकोज्ज्वलम् ।
कौस्तुभाभरणं श्यामं कन्दर्पशतसुन्दरम् ॥३९॥
अभिषिक्तं समायातं गजारूढं स्मिताननम् ।
श्वेतच्छत्रधरं तत्र लक्ष्मणं लक्षणान्वितम् ॥४०॥
रामं कदा वा द्रक्ष्यामः प्रभातं वा कदा भवेत् ।
इत्युत्सुकधियः सर्वे बभूवुः पुरवासिनः ॥४१॥
नेदानीमुत्थितो राजा किमर्थं चेति चिन्तयन् ।
सुमन्त्रः शनकैः प्रायाद्यत्र राजाऽवतिष्ठते ॥४२॥
वर्धयन् जयशब्देन प्रणमन्शिरसा नृपम् ।
अतिखिन्नं नृपं दृष्ट्वा कैकेयीं समपृच्छत ॥४३॥
देवि कैकेयि वर्धस्व किं राजा दृश्यतेऽन्यथा।
तमाह कैकेयी राजा रात्रौ निद्रां न लब्धवान्॥४४॥
राम रामेति रामेति राममेवानुचिन्तयन् ।
प्रजागरेण वै राजा ह्यस्वस्थ इव लक्ष्यते ।
राममानय शीघ्रं त्वं राजा द्रष्टुमिहेच्छति ॥४५॥
और मृतकके समान मूर्छित और संज्ञाशून्य होकर पृथिवीपर गिर पड़े ॥ ३३ ॥ इस प्रकार अत्यन्त दुःखके कारण उनकी वह रात्रि एक वर्षके समान बीती । इधर सूर्योदय होते ही गायक और वन्दीजन स्तुति-गान करने लगे ॥ ३४ ॥ किन्तु कैकेयीने अत्यन्त रोषमें भरकर उन सबको उसी समय रोक दिया । तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ऋषिगण, कन्याएँ, दिव्य छत्र और चँवर तथा हाथी और घोड़े आदि सभी अभिषेकोपयोगी वस्तुएँ मध्य-द्वारपर उपस्थित की गयीं ॥ ३५–३६ ॥ इनके अतिरिक्त वसिष्ठजीकी आज्ञानुसार मुख्य-मुख्य वारांगनाएँ तथा पुरवासी और जनपदवासी भी वहाँ उपस्थित हो गये ॥ ३७ ॥ उस रात स्त्री, बालक और वृद्ध किसीको भी नींद नहीं आयी । सभीको यही चटपटी लगी रही कि हम रेशमी पीताम्बर पहने भगवान् रामको कब देखेंगे ? ॥ ३८ ॥ जो समस्त आभूषणोंसे सुसज्जित, उज्ज्वल किरीट और कटक पहने हुए हैं तथा कौस्तुभमणिसे विभूषित और सैकड़ों कामदेवोंके समान सुन्दर श्याम-वर्ण हैं एवं सर्व-सुलक्षण-सम्पन्न श्रीलक्ष्मणजीने जिनके ऊपर श्वेत छत्र लगाया हुआ है ऐसे श्रीरामको राज्याभिषेकके अनन्तर मन्द मुसकानके सहित हाथीपर चढ़कर आते हुए हम कब देखेंगे ? वह मङ्गलप्रभात कब होगा ? इस प्रकार सभी पुरवासियोंका चित्त अति उत्कण्ठित हो रहा था ॥ ३९–४१ ॥
इसी समय मन्त्रिवर सुमन्त्र यह सोचकर कि ‘महाराज अभीतक कैसे नहीं उठे’ धीरेसे जहाँ राजा दशरथ थे वहाँ गये ॥ ४२ ॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने जय-जयकार कर राजाको शिर झुकाकर प्रणाम किया और उन्हें अत्यन्त खिन्न देखकर कैकेयीसे पूछा—॥ ४३ ॥ “देवि कैकेयि ! आपका अभ्युदय हो, कहिये आज महाराज अनमने कैसे दिखायी देते हैं ?” इसपर कैकेयीने कहा—“आज महाराजको रात्रिमें बिलकुल नींद नहीं आयी ॥ ४४ ॥ रात्रिभर रामका चिन्तन करते हुए ‘राम राम राम’ ही रटते रहे हैं । इस प्रकार जागते रहनेके कारण ही राजा कुछ अस्वस्थ दिखायी देते हैं । महाराज रामको देखना चाहते हैं, इसलिये तुम शीघ्र ही उन्हें लिवा लाओ” ॥ ४५ ॥