१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत्
लय हो जाता है तब शब्द रहित परमपद का रूप होता है ॥ २ ॥
अनाहत शब्द से भी परे जो शब्द है, उसके पाने से ही योगी के संशय
की निवृत्ति होती है ॥ ३ ॥ केशाग्र के सौवें भाग का हजारवां भाग
और उसका आधे का भाग, उसका भी क्षय हो जाने पर
निरंजन होता है ॥ ४ ॥ जिस प्रकार फूलों में गन्ध रहती है, दूध में घी
रहता है, तिल में तेल और पाषाण में सोना होता है, जिस प्रकार
माला के दाने सूत में पिरोये रहते हैं, उसी प्रकार सब भूत निरंजन में
व्याप्त हैं। स्थिर बुद्धि वाला ज्ञानी मोह रहित होकर ऐसे ब्रह्म क ा
ज्ञान प्राप्त करके उसमें स्थिर रहता है ॥ ५-६ ॥
तिलानां तु यथा तैल पुष्पे गन्ध इवाश्रितः ।
पुरुषस्य शरीरे तु सबाह्याभ्यान्तरे स्थितः ॥७
वृक्षं तु सकलं विद्याच्छाया तस्यैव निष्कला ।
सकले निष्कले भावे सर्वत्रात्मा व्यवस्थितः ॥८
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वं मुमुक्षुभिः ।
पृथिव्याग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥९
अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके ।
अन्तरिक्ष यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥१०
उकारे तु लयं प्राप्ते द्वितीये प्रणवांशके ।
द्यौः सूर्यः सामवेदश्च स्वरित्येव महेश्वरः ॥११
मकारे तु लयं प्राप्ते तृतीये प्राणवांशके ।
अकारः पीतवर्णः स्याद्रजोगुण उदीरितः ॥१२
उकारः सात्त्विकः शुक्लो मकारः कृष्णतामसः ।
अष्टाङ्गं च चतुष्पादं त्रिस्थानं पञ्चदैवतम् ॥१३
जिस प्रकार तैल का आश्रय तिल : का आश्रय
पुष्प है इसी प्रकार ब्रह्म पुरुष शरीर के भीतर और बाहर स्थित