१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 283, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय २७५
यह दोषमय संसार कहाँ से आ गया है ? ॥ २७-२८ ॥ जाग्रत और
स्वप्न अवस्था में तो मैं अपने को कर्ता समझ कर व्यवहार करता हूँ, पर
सुषुप्ति में मेरी क्या अवस्था होती है ? इस प्रकार चिन्ता करता
हुआ वह अपने आभास रूप पर विचार करता है ॥ २९ ॥ रुई का
ढेर जैसे आग से जलने लगता है, वैसे ही चिदाभास अज्ञान में पड़
कर सांसारिक ताप से नष्ट हो जाता है ॥ ३० ॥
दहरस्थः प्रत्यगात्मा नष्टे ज्ञाने ततः परम् ।
विततो व्याप्य विज्ञानं दहत्येव क्षणेन तु ॥३१॥
मनोमयज्ञानमयान् सम्यग्दग्ध्वा क्रमेण तु ।
घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते ॥३२॥
ध्यायन्नास्ते मुनिश्चैवमा सुप्तेरा मृतेस्तु यः ।
जीवन्मुक्तः स विज्ञेयः स धन्यः कृतकृत्यवान् ॥३३॥
जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते ।
विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥३४॥
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
तदेव शिष्यत्यमलं निरामयम् ॥३५॥
इत्युपनिषत् ॥
इस प्रकार सांसारिक ज्ञान के मिटाने पर प्रत्यगात्मा विस्तार
को प्राप्त होकर विज्ञान का भी नाश कर देता है। इस प्रकार मनो-
मय और विज्ञानमय के पूर्णतः मिल जाने पर शाश्वत प्रकाश के समान
आत्मा ही अन्तर में प्रकाशित होता रहता है ॥ ३१-३२ ॥ जो आत्म-
ज्ञानी ऐसी आत्मा का नित्य प्रति ध्यान करता रहता है और मृत्यु के