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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

११२ ] [तृतीय अध्याय

११२ ] [तृतीय अध्याय
उद्यत है। वह तृप्त हो चुकने पर भी विभिन्न फलों की कामना करती
हुई उन्हें तोड़ती है और अधिक समय तक एक स्थान पर नहीं टिकती।
वह क्षण भर में आकाश-भ्रमण करती दिखाई देती है, क्षण भर में ही
पाताल गामिनी होती है और क्षण भर में ही विभिन्न दिशाओं में चक्कर
काटती है। विश्व के समस्त दुःखों में यह तृष्णा ही ऐसी है जो घोर
दुःखदायिनी है तथा महलों में रहने वालों को भी घोर संकट में फँसाती
है। यह तृष्णा एक महामारी है और इसे वही नष्ट कर सकता है जो
चिन्ता को छोड़दे। यदि चिन्ता का क्षण भर को भी त्याग कर दिया
जाय तो अत्यन्त सुख मिलता है। यदि थोड़ी सी भी चिन्ता मन में हो
तो उससे दुःख की प्राप्ति होती है। इस देह के समान तुच्छ, गुण-रहित
एवं शोच करने योग्य अन्य कोई पदार्थ नहीं है। इस देह रूप महान गृह
में अहंकार रूप गृहस्थ निवास करता है। यह देह चाहे चिरजीवित रहे
या शीघ्र नष्ट होजाय, इसकी मुझे चिन्ता नहीं। जिस देह रूप घर में
इन्द्रिय रूपी पशु पंक्तिबद्ध खड़े हैं और जिसके आंगन में तृष्णा रूपी
बंदरिया चलती-फिरती है, जिसमें चित्त-वृत्ति रूप भृत्यों का समावेश है,
ऐसा यह शरीर रूप गृह मुझे अभीष्ट नहीं है। जिह्वा रूपी बंदरिया से
आक्रान्त हुआ यह मुख रूप द्वार इतना भीषण हो रहा है कि प्रारम्भ में
ही दन्तरूप अस्थियाँ दृष्टिगोचर हो रही हैं ॥२२-३०॥
रक्तमांसमयस्यास्य सबाह्याभ्यन्तरे मुने ।
नाशैकधर्मिणो ब्रूहि क्व कायस्य रम्यता ॥३१
तडित्सु शरदभ्रेषु गन्धर्वनगरेषु च ।
स्थैर्यं येन विनिर्णीतं स विश्वसितु विग्रहे ॥३२
शैशवे गुरुतो भीतिर्मातृतः पितृतस्तथा ।
जनतो ज्येष्ठबालाच्च शैशवं भयमन्दिरम् ॥३३
स्वचित्तविलसंस्थेन नानाविभ्रमकारिणा ।
बलात्कामपिशाचेन विवशः परिभूयते ॥३४

महोपनिषत् ११३
दासाः पुत्राः स्त्रियश्चैव बान्धवाः सुहृदस्तथा ।
हसत्युन्मत्तकमिव नरं वार्धककम्पितम् ॥३५
दैन्यदोषमयी दीर्घा वर्धते वार्धके स्पृहा ।
सर्वापदामेकसखी हृदि दाहप्रदायिनी ॥३६
कच्चिद्वा विद्यते यैषा संसारे सुखभावना ।
आखुः स्तम्बमिवासाद्य कालस्तामपि कृन्तति ॥३७
तृणं पांसुं महेन्द्रं च सुवर्णं मेरुसर्षपम् ।
आत्मंभरितया सर्वमात्मसात्कर्तुमुद्यतः ।
कालोऽयं सर्वसंहारी तेनाक्रान्तं जगत्त्रयम् ॥३८
ऐसा य देह रूप गृह मुझे अच्छा नहीं लगता । हे पिताजी !
यह देह बाहर से तथा भीतर से भी मांस और रक्त से ही व्याप्त है
तो इस नाशवान् देह में सुन्दरता कहाँ से आई ? यदि कोई यह
विश्वास करता हो कि विद्युत में चपलता अथवा गंधर्वों की नगरी में
चंचलता नहीं है तो वह इस देह के स्थिर होने में भले ही सन्देह न करे ।
इस देह की तीनों अवस्थायें भय के देने वाली हैं । बालकपन में अपने
से बड़े लड़कों से तथा माता-पिता आदि से भय लगता है । युवावस्था
प्राप्त होने पर अपने ही चित्त के भीतर निवास करने वाले कामरूपी
पिशाश के भ्रम जाल में फँसकर पराजय को प्राप्त करता है । वृद्धावस्था
प्राप्त होने पर मनुष्य कांपता हुआ चलता-फिरता है । उसे देखकर स्त्रियाँ
बन्धु, मित्र, पुत्र, पुत्रियाँ तथा नौकर-चाकर भी हँसी उड़ाते हैं । उस
आयु में सामर्थ्यहीनता के कारण कामनाओं की अधिक वृद्धि होती है ।
यह जरावस्था हृदय को जलाने वाली सब विपत्तियों की सखी है । जिस
सुख की भावना सांसारिक प्राणी करता है, वह सुख है कहाँ ? काल
तो तिनके के समान काटता ही जाता है । वह काल छोटे से तिनके
और रज के कणों को भी महेन्द्र तथा मेरु पर्वत को भी सरसों के समान
कर देने में समर्थं है । यह सभी को नष्ट करने वाला है और अपना पेट